समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

साहित्य-संस्कृति

पढ़त :: वे डरते हैं… :: मनोज कुमार

समकालीन जनमत
पहले एक किस्सा :: बात बहुत पुरानी भी नहीं है। यही लगभग 100 साल पहले – सन 1920 की बात है। बात इतनी दूर की...
भाषा

उर्दू की क्लास : मुलज़िम और मुजरिम का फ़र्क़

( युवा पत्रकार और साहित्यप्रेमी महताब आलम की शृंखला ‘उर्दू की क्लास’ की बारहवीं          क़िस्त में मुलज़िम और मुजरिम के फ़र्क़...
कविता

रोमिशा की कविताओं में मैथिल स्त्री का अंतर्जगत बहुत मुखर है

समकालीन जनमत
रमण कुमार सिंह हाल के वर्षों में जिन युवा कवयित्रियों ने मैथिली साहित्य के क्षितिज पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की है, उनमें रोमिशा प्रमुख...
शख्सियतसाहित्य-संस्कृति

मुक्तिबोध की कविताः जमाने का चेहरा भी, भविष्य का नक्शा भी

समकालीन जनमत
प्रणय कृष्ण मुक्तिबोध ने बहुत तरह से अपनी कविता को व्याख्यायित करने की कोशिश की है. वह कालयात्री है, वह जन चरित्री है, लेकिन मेरी...
साहित्य-संस्कृति

जाति के झूठे वर्णवादी आधारों का प्रत्याख्यान है बिल्लेसुर बकरिहा

दुर्गा सिंह
बिल्लेसुर बकरिहा, निराला की चर्चित रचना है। विधा के बतौर इसे रेखाचित्र के रूप में भी रखा जा सकता है, लेकिन है यह एक उपन्यासिका...
कविता

दीपक जायसवाल की कविताएँ अतीत और वर्तमान की तुलनात्‍मक प्रतिरोधी विवेचना हैं

समकालीन जनमत
कुमार मुकुल अतीत और वर्तमान के तुलनात्‍मक प्रतिरोधी विवेचन और वैचारिक जद्दोजहद दीपक जायसवाल की कविताओं में आकार पाते हैं। समय के अभेद्य जिरहबख्‍तर को भेद...
स्मृति

एक नाराज़ सूरज डूब गया

समकालीन जनमत
अच्युतानंद मिश्र प्रगतिशील धारा से सम्बद्ध वरिष्ठ लेखक विष्णुचंद्र शर्मा(1/4/1933-2/11/2020) का 2 नवम्बर को निधन हो गया। सोचता हूँ वे अगर इस वाक्य को सुनते...
कविता

जोराम यालाम नाबाम की कविताएँ जीवन की आदिम सुंदरता में शामिल होने का आमंत्रण हैं

समकालीन जनमत
बसन्त त्रिपाठी जोराम यालाम नाबाम की कविताओं में आतंक, भय, राजनीतिक दाँव-पेंच, खून-खराबे से त्रस्त जीवन को आदिम प्रकृति की ओर आने का आत्मीय आमंत्रण...
पुस्तक

मार्क्सवाद की समझ

गोपाल प्रधान
2019 में डेमोक्रेसी ऐट वर्क से रिचर्ड डी वोल्फ़ की किताब ‘अंडरस्टैंडिंग मार्क्सिज्म’ का प्रकाशन हुआ । पतली सी इस किताब में लेखक का कहना...
कविता

उपासना झा की कविताएँ स्त्री वेदना से स्त्री चेतना के सफ़र की अभिव्यक्ति हैं

समकालीन जनमत
सोनी पाण्डेय जब भी स्त्री कविता से गुजरती हूँ मन कविता की आत्मा में कान लगा उसकी धड़कने(कहन) सुनने की कोशिश करने लगता है।मुझे याद...
जनमतसाहित्य-संस्कृति

रामलीला : राजनीति के नागपाश में जकड़ी संस्कृति

समकालीन जनमत
रामलीला : राजनीति के नागपाश में जकड़ी संस्कृति * अनिल शुक्ल   दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर इन दिनों सरयू नगरी से ‘अयोध्या की रामलीला’...
पुस्तक

मानव श्रम का इतिहास

गोपाल प्रधान
2019 में मंथली रिव्यू प्रेस से पाल काकशाट की किताब ‘हाउ द वर्ल्ड वर्क्स: द स्टोरी आफ़ ह्यूमन लेबर फ़्राम प्रीहिस्ट्री टु द माडर्न डे’...
साहित्य-संस्कृति

केस हिस्ट्री: मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

समकालीन जनमत
यह “ निबंध-नुमा भाषण या भाषण-नुमा निबंध ” मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की अंतिम रचना “शाम-ए-शेर-ए-याराँ” से लिया गया है। इसे उन्होंने ‘पाकिस्तान सोसाइटी ऑफ़ फ़िज़ीशियंस’...
भाषा

उर्दू की क्लास : “ज़ौक़” और “जौक़” का फ़र्क़

( युवा पत्रकार और साहित्यप्रेमी महताब आलम की शृंखला ‘उर्दू की क्लास’ की ग्यारहवीं     क़िस्त में ज़ौक़ और जौक़ का फ़र्क़ के बहाने उर्दू...
कविता

सविता पाठक की कविताएँ पितृसत्तात्मक चलन और पाखंड को उजागर करती हैं

समकालीन जनमत
रुपम मिश्र सविता पाठक मूल रूप से कहानीकार हैं । कहानी की गद्यात्मकता उनकी कविताओं में भी बनी रहती है । सविता की कविताएँ एक...
पुस्तक

विश्व पूंजीवाद और लोकतंत्र का अधिग्रहण

गोपाल प्रधान
(सदी की शुरुआत में प्रकाशित इस किताब को पढ़ते हुए लग रहा था कि वर्तमान भारत की कथा पढ़ रहा हूं।) 2001 में द फ़्री...
भाषा

उर्दू की क्लास : ज़ंग और जंग का फ़र्क़ ?

समकालीन जनमत
( युवा पत्रकार और साहित्यप्रेमी महताब आलम की शृंखला ‘उर्दू की क्लास’ की दसवीं    क़िस्त में ज़ंग और जंग का फ़र्क़ के बहाने उर्दू...
कविता

मृदुला की कविताएँ व्यवस्था की चमक के पीछे पसरे हुए अंधकार को उजागर करती हैं

समकालीन जनमत
कामिनी त्रिपाठी स्वभाव से सरल-सहज मृदुला सिंह छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल सरगुजा के एक कॉलेज में पढ़ाती हैं | यूँ तो उनका जन्म और पढ़ाई–लिखाई...
पुस्तक

समाजवाद के बारे में कुछ बुनियादी बातें

गोपाल प्रधान
2005 में स्टर्लिंग से माइकेल न्यूमैन की किताब ‘सोशलिज्म: ए ब्रीफ़ इनसाइट’ का प्रकाशन हुआ । चित्रों के साथ उसका नया संस्करण 2010 में वहीं...
पुस्तक

आलोक रंजन की किताब सियाहत

समकालीन जनमत
ममता सिंह सियाहत कितना अलग सा नाम है न! अधिकतर लोगों के लिए अंजाना, नया सा जबकि इससे मिलता जुलता लफ़्ज़ सियासत है जिससे देश...
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