पुस्तक

मार्क्सवाद की समझ

2019 में डेमोक्रेसी ऐट वर्क से रिचर्ड डी वोल्फ़ की किताब ‘अंडरस्टैंडिंग मार्क्सिज्म’ का प्रकाशन हुआ । पतली सी इस किताब में लेखक का कहना है कि 2008 के गम्भीर पूंजीवादी संकट की बेचैनी से ब्रेक्सिट, ट्रम्प, प्रवासी और विदेशी विरोधी दक्षिणपंथी लहर पैदा हुई है । 1929 के पूंजीवादी संकट के बाद घटी घटनाओं का दुहराव होता हुआ दिखाई दे रहा है । आर्थिक गिरावट का भय व्याप्त है । शिक्षा, मीडिया या सामाजिक आंदोलन संकट के दुहराव से निपटने का रास्ता नहीं बता पा रहे । हताशा और क्रोध में लोग किसी भी किस्म के बदलाव के साथ चले जा रहे हैं । शीतयुद्ध के पचास साला इतिहास को देखते हुए इस क्षोभ का दक्षिणपंथ के पक्ष में चले जाना बहुत आश्चर्यजनक नहीं है । आर्थिक संकट के लिए जिम्मेदार राजनीतिक संस्थान के विरोध का उन्हें यही तरीका समझ आ रहा है । अधिकांश समाजवादी पार्टियों ने नव उदारवाद का पल्ला थामकर जनता को विकल्पहीन बना दिया था । धीरे धीरे उन्हें अपनी गलती समझ आ रही है और वे वर्तमान समाजार्थिक हालात की बुनियादी आलोचना करना शुरू कर चुके हैं । अब व्यवस्था परिवर्तन की बातें हो रही हैं । इसी क्रम में पूंजीवाद की आलोचना की मार्क्सवादी परम्परा से उनका परिचय हो रहा है । मार्क्सवाद तथा उससे व्युत्पन्न सामाजिक बदलावों के बारे में आसान लेखन की मांग हो रही है । किताब इसके उत्तर में लिखी गई है । इसमें वर्तमान समस्याओं के वास्तविक समाधान का आधार प्रस्तावित किया गया है और विषमता, अस्थिरता और प्रतिक्रियावादी राजनीति पर आधारित समकालीन पूंजीवादी व्यवस्था की कलई उतारी गई है । मार्क्सवाद सदा से पूंजीवाद की आलोचना का हथियार रहा है । इस संघर्ष में दोनों ने एक दूसरे को बदला है । पूंजीवाद की अतियों और गिरावट की रोशनी में जब मार्क्सवाद फिर से प्रकट हुआ है तो इस समय के लिहाज से उसका नवीकरण होगा ।
इस प्रस्तावना के बाद लेखक ने पहले अध्याय में पूंजीवादी अर्थतंत्र की मार्क्सी आलोचना की ताकत और उपयोगिता को परखने की कोशिश की है । मार्क्स के समय के मुकाबले अब पूंजीवाद विश्व व्यवस्था बन चुका है । इस क्रम में उसमें बहुतेरे बदलाव आए हैं फिर भी इसका सार ऐसी अर्थव्यवस्था है जो गुलामी और सामंतवाद या अन्य किसी व्यवस्था से भिन्न है । वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और वितरण का पूंजीवादी तरीका उसी बुनियादी संरचना, गति, गलती और अन्याय पर टिका हुआ है जिसकी तीखी आलोचना मार्क्स ने की थी । सवाल है कि मार्क्स जैसे आलोचकों की बात पर ध्यान क्यों दिया जाए । उत्तर में लेखक बताते हैं कि किसी भी समाज के प्रशंसकों के मुकाबले उसके आलोचक उसे भिन्न नजर से देखते हैं । संतुलित और समझदार राय कायम करने के लिए इस पर ध्यान देना उचित होगा । मान लीजिए अगर आपको किसी परिवार का अध्ययन करना है तो उसे संसार का सर्वोत्तम परिवार मानने वाले से ही बात करके सही नतीजा नहीं मिलेगा । पूंजीवाद के मामले में इस किस्म के रुख के साथ मुसीबत यह है कि प्रशंसकों और आलोचकों के बीच बेहद तीखा टकराव रहता है । मानना ही होगा कि मार्क्स, मार्क्सवाद या समाजवाद जैसे शब्द कुछ लोगों के लिए काफी दिनों से डरावने रहे हैं । अमेरिका में तो शीतयुद्ध की शुरुआत से पहले ही पूंजीवाद के आलोचकों को खतरनाक घोषित कर दिया गया था । मार्क्स या मार्क्सवाद से भय और नफ़रत व्यापक पैमाने पर सिखाई जाती है । इसीलिए अधिकतर अमेरिकी उनके विचारों पर कोई ध्यान नहीं देते । अध्यापक उनके लेखन को खारिज करते रहे हैं इसीलिए उन अध्यापकों से दीक्षित शिक्षार्थी भी उनको देखने या समझने की जहमत नहीं उठाते । वह तो 2008 के संकट ने साबित कर दिया कि अस्थिरता पूंजीवाद की विशेषता बनी हुई है । इसी तरह विषमता की मौजूदगी ने पूंजीवाद की कल्याणकारी क्षमता के झूठ पर से परदा उठा दिया । इन सब बातों के चलते पूंजीवाद के आलोचकों को समझने की कोशिश विगत दशकों में शुरू हुई है । इन आलोचकों में मार्क्स का नाम सबसे ऊपर है ।
दूसरे अध्याय में लेखक ने इस बात पर विचार किया है कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में आखिर युवा मार्क्स को पूंजीवाद की आलोचना क्यों करनी पड़ी । इसका जवाब एक हद तक अठारहवीं सदी की फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों में निहित है । मार्क्स ने इन क्रांतियों के नारों को खासकर अपनाया । फ़्रांस से स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तथा अमेरिका से लोकतंत्र की धारणा लेकर उन्हें आधुनिक समाज में साकार करना चाहा । अपने समय के ढेर सारे युवकों की तरह उनको भी यकीन था कि पूंजीवाद इन धारणाओं को अमलीजामा पहनाने में मदद करेगा । लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उनको पूंजीवाद के इस वादे में अंतर्विरोध नजर आने शुरू हुए । गुलामी और सामंतवाद की जगह पूंजीवाद की स्थापना तो हुई लेकिन क्रांतियों के इन नारों की दिशा में उसकी बढ़त का कोई सबूत नहीं दिखा । असलियत में तमाम किस्म के सामाजिक विभाजन पैदा हो गए । मार्क्स को यह पूंजीवाद का छल प्रतीत हुआ । वे इस धोखे के शोध में जुट गए । इसी गहन शोध का नतीजा पूंजीवाद की आलोचनात्मक समझ में उनके योगदान के रूप में निकला । उन्होंने पाया कि पूंजीवाद की अपनी संरचना और उसके सामाजिक परिणाम ही इन नारों के साथ उसके छल के प्रमुख कारण हैं । इस अनुभूति के बाद उन्होंने इन नारों को अपना लिया । तब उन्हें लगा कि इन नारों को अमल में लाने के लिए पूंजीवादी अर्थतंत्र को बदलने की जरूरत है ।
इस फैसले पर पहुंचने के लिए उन्होंने गहन ऐतिहासिक शोध किया । गुलामी और सामंती अर्थतंत्र संबंधी शोध से उन्हें काफी दृष्टि मिली । गुलामी में मालिक और गुलाम होते हैं । काम गुलाम करते हैं और मालिक निगरानी करते हैं । इस व्यवस्था में गुलाम को कुछ भी स्वतंत्रता या लोकतंत्र हासिल न था । सामंती अर्थतंत्र में भूमिधर और भूदास आ बिराजे । अंतर यह था कि भूदास, गुलाम की तरह भूमिधर की निजी संपदा न थे । इनके मुकाबले पूंजीवाद भिन्न था । क्रांतियों ने गुलामी और भूदासता को उखाड़ फेंका । लोग बालिग मताधिकार का प्रयोग करके लोकतंत्र के मातहत रह सकते थे । इस भिन्नता के बावजूद पुरानी व्यवस्था से इसकी कुछ समानता भी थी । इस समानता को ही शोषण के बतौर मार्क्स ने स्थापित किया । गुलाम के परिश्रम से पैदा वस्तुओं और सेवाओं पर मालिक का पूरा अधिकार होता था और वही तय करता था कि उसका कितना हिस्सा गुलाम को लौटना है । इस गुलाम के कार्यदिवस को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है । पहला वह जिसके पैदावार को उसको ही लौटाया जाएगा । इसे मार्क्स गुलाम का ‘अनिवार्य श्रम’ कहते हैं । बचे हुए हिस्से की मेहनत की पैदावार मालिक के पास जानी है । इसे मार्क्स ‘अतिरिक्त श्रम’ कहते हैं । यही तर्क सामंतवाद के साथ भी लागू होता है । भूदास को जमीन का जो टुकड़ा अपने भरण पोषण के लिए मिलता है उस पर की गई मेहनत की पैदावार उसके काम आती है । यह उसका अनिवार्य श्रम है । बचे हुए समय की मेहनत से होने वाली पैदावार भूमिधर के पास जाती है और वह अतिरिक्त श्रम है । ठीक यही पूंजीवाद में मजदूर के साथ होता है । इसे शोषण इसीलिए कहा गया क्योंकि मेहनत करने वाले की मेहनत से पैदा वस्तुओं और सेवाओं का एक हिस्सा उसकी जगह कोई और हड़प जाता है । आबादी का दो हिस्सों में विभाजन तो सारत: कायम रहता है, बस उसके रूप बदलते जाते हैं । पूंजीवाद भी उसी तरह की व्यवस्था है जिसमें मुट्ठी भर लोग बहुसंख्यक जनता पर शासन करते हैं । इसमें नियोक्ता और कर्मचारी के रूप में पुराना विभाजन ही कायम रहता है । नियोक्ता नेताओं को काबू में रखते हैं और उनके जरिए सामाजिक विकास की दिशा तय करते हैं । स्वतंत्रता और लोकतंत्र के पक्ष में पूंजीवाद के न होने का कारण उसका आंतरिक संगठन है जिसमें कुछ ही लोग सभी तरह के फैसले लेते हैं । कर्मचारी इन फैसलों के भागीदार नहीं होते लेकिन इनके नतीजे उन्हें ही भुगतने पड़ते हैं ।
मार्क्स का देहांत 1883 में हुआ । बाद के वर्षों में संसार भर में लोगों ने उनके विचारों से प्रेरणा ली । दुनिया के सभी देशों में मार्क्सवाद विविध रूपों में फैला । उनके लेखन में ज्यादातर आर्थिक सवालों पर विचार किया गया है । वे उस समय के बौद्धिक थे जब शिक्षा और साक्षरता भी बहुत कम लोगों को उपलब्ध थी । दर्शन की शिक्षा ग्रहण की थी लेकिन बाद में आसपास की स्थिति को समझने के क्रम में अर्थशास्त्र की ओर मुड़े । इसमें उन्होंने कहा कि अनादि काल से लोग अतिरिक्त का उत्पादन करते रहे हैं । प्रत्येक समाज में मनुष्य श्रम की बदौलत जीवित रहा है । अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति का रूपांतरण ही श्रम है । लेकिन कुछ लोग हमेशा से ऐसे रहे हैं जो दूसरों की मेहनत पर निर्भर रहे हैं । इनके लिए शेष लोगों को खुद की जरूरत से अधिक का उत्पादन करना पड़ता रहा है । खुद के इस्तेमाल से अधिक इसी उत्पादन को मार्क्स अतिरिक्त कहते थे ।
तीसरे अध्याय में उनका कहना है कि मार्क्स का योगदान अधिकतर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में है । जब यूरोप में बहुत कम लोग शिक्षित या साक्षर हुआ करते थे उस समय के वे प्रतिबद्ध बौद्धिक थे । उनकी औपचारिक शिक्षा दर्शन में हुई थी लेकिन आस पास की दुनिया में रुचि के चलते जल्दी ही वे अर्थशास्त्र की ओर चले आये । मार्क्स का कहना था कि प्रत्येक ज्ञात मानव समाज में लोग अधिशेष का उत्पादन और वितरण करते आ रहे हैं । असल में प्रत्येक समाज में मनुष्य अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए श्रम की बदौलत प्रकृति का रूपांतरण करके जीवित रहा है । इस प्रक्रिया में वह अपने दिमाग और मांसपेशियों का इस्तेमाल प्रकृति को उपभोग्य उत्पाद में बदलने के लिए करता है । लेकिन सभी लोग श्रम नहीं करते । सभी मानव समाजों में एक हिस्सा ऐसा रहा है जो खुद श्रम करने की जगह दूसरों के श्रम से पैदा अधिशेष से जीवन यापन करता रहा है । जो उत्पादक होते हैं वे अधिशेष का उत्पादन करते हैं । समाज व्यवस्था के आलोचक होने के नाते मार्क्स इन दोनों के बीच भेद पर जोर देते हैं । कुछ कामगार ऐसे हैं जो अधिशेष का उत्पादन करते हैं और कुछ उस अधिशेष से लाभ उठाते हैं । इस भेद के चलते ही व्यवस्था के प्रति दोनों के रुख में अंतर देखा जाता है । मालिकों को मिलने वाले अधिशेष के चलते उनका हित मौजूदा व्यवस्था के बने रहने में होता है । मानव श्रम के शोषण की पहले की व्यस्थाओं के मुकाबले पूंजीवाद में यह शोषण नौकरी की औपचारिकताओं के परदे में छिपा रहता है । अपने ग्रंथ ‘पूंजी’ के पहले खंड में मार्क्स ने इसी परदे को तार तार करके अधिशेष के उत्पादन और वितरण की पूंजीवादी व्यवस्था को नंगा कर दिया । मशीन और कच्चे माल की लागत को घटा देने के बाद भी कामगार के श्रम से पैदा मूल्य उसको वेतन के रूप में चुकाये हुए मूल्य से अधिक होता है । पूंजीवादी व्यवस्था में यही अधिशेष अतिरिक्त मूल्य कहा जाता है । उत्पाद की बिक्री पर यह अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति को मुनाफ़े के रूप में हासिल हो जाता है । इसका एक हिस्सा वह कच्चे माल और उपकरणों की खरीद पर खर्च करता है, दूसरा हिस्सा श्रमिक को वेतन के रूप में देता है और तीसरे हिस्से को हड़प लेता है । इस व्यवस्था की समानता दास प्रथा से होने के कारण ही मार्क्स ने इसे पगारजीवी गुलामी कहा है । शोषण की इस व्यवस्था के चलते ही पूंजीवाद स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और लोकतंत्र जैसे अपने वादों को लागू नहीं कर सकता । इसीलिए इन्हें हासिल करने के लिए समाज से मनुष्य के शोषण की व्यवस्था समाप्त करनी होगी । अगर समाज के मुट्ठी भर लोग अधिकांश जनता द्वारा उत्पादित अधिशेष पर कब्जा कर लेते हैं और उसका मनमाना वितरण करते हैं तो यह बात फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों के घोषित प्रगतिशील मूल्यों के विरोध में जाती है और उन घोषणाओं को व्यर्थ कर देती है । अतिरिक्त मूल्य संबंधी मार्क्स के चिंतन को समझें तो पूंजीवादी समाज में मौजूद आजादी भ्रम साबित होती है । आजादी हासिल करने के लिए इस व्यवस्था को बदलना होगा । मार्क्स कहते हैं कि शोषक समाजों में उत्पादित अधिशेष का उपयोग इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए किया जाता है । यही कारण है कि मालिकों को केवल अर्थतंत्र ही नहीं, बल्कि राजनीति और संस्कृति के क्षेत्र में भी बरतरी प्राप्त होती है ।
शोषण और अधिशेष संबंधी विवेचन के सहारे मार्क्स वर्ग की नयी धारणा निर्मित करते हैं जो वर्ग की पारम्परिक धारणा से अलग है । मार्क्स से पहले वर्ग की बात करते समय लोग संपत्ति या ताकत के आधार पर आबादी को विभिन्न समूहों में विभाजित करते थे । संपत्ति का आधार लेने वाले अमीर गरीब या मध्य वर्ग के ऊपर और नीचे का विभाजन करते थे । ताकत पर जोर देने वाले शासक शासित का भेद बताते थे । मार्क्स ने वर्ग की इन पुरानी धारणाओं का इस्तेमाल सामाजिक आलोचना के लिए किया लेकिन साथ ही अतिरिक्त मूल्य के अपने विश्लेषण पर आधारित वर्ग की नयी धारणा का भी विकास किया । इसमें अधिशेष के उत्पादकों का वर्ग था, उसका अधिग्रहण करने वालों का वर्ग था और इसके वितरण में हिस्सा पाने वालों का वर्ग था । इनके बीच के टकरावों के चलते ही पूंजीवाद स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और लोकतंत्र के अपने वादों को निभाने में नाकाम रहता है । इस तरह मार्क्स ने वर्ग की अपनी धारणा से दिखा दिया कि सत्ता और संपत्ति के असमान वितरण के पुराने सामाजिक आलोचक उन सामाजिक अन्यायों को दूर करने में क्यों अक्षम रहे । वे आलोचक यह समझ नहीं सके कि सत्ता और संपत्ति के असमान सामाजिक वितरण में कमी लाने के लिए अधिशेष के संगठन को बदलना जरूरी है । उन्होंने स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और लोकतंत्र के वादे को साकार करने के लिए शोषण का खात्मा जरूरी नहीं समझा । अधिशेष के उत्पादन और वितरण के संदर्भ में ही मार्क्स ने वर्गीय टकरावों पर ध्यान दिया ।
चौथे अध्याय की शुरुआत मार्क्स द्वारा पूंजीवादी अर्थतंत्र के विवेचन से होती है । मार्क्स का विवेचन माल से शुरू होता है । इसका मतलब कि किसी भी वस्तु को उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुंचने के लिए बाजार की मध्यस्थता से होकर गुजरना पड़ता है । पूंजीवादी उद्यम कच्चा माल और मजदूर की श्रम शक्ति को खरीदते हैं इनके जोड़ से पैदा होने वाले माल को बेचते हैं । पूंजीवाद की बड़ी विशेषता यह है कि इसमें श्रम शक्ति खरीदी और बेची जाती है । इस तैयार माल की बिक्री से पूंजीपति को जो धन प्राप्त होता है वह उसके उत्पादन की लागत से अधिक होता है । यही अतिरिक्त पूंजी है । मार्क्स के इस विश्लेषण से एक नतीजा निकलता है कि पूंजीपति, उत्पादक मजदूरों की मजदूरी कम करने की फ़िराक में हमेशा रहता है । इसी तरह वह काम का समय और उसकी गति भी बढ़ाना चाहता है । कारण कि वे जितना अधिक मूल्य पैदा करेंगे और बदले में उन्हें जितना कम देना पड़ेगा उतना अधिक अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति को हासिल होगा । जितना अधिक उसे अतिरिक्त मूल्य हासिल उतना अधिक धन वह पूंजीवादी व्यवस्था को कायम रखने में लगायेगा । दूसरी ओर उत्पादक मजदूर अपनी मजदूरी बढ़ाने की मांग करते हैं क्योंकि उनका और परिवार का जीवन स्तर इसी पर निर्भर होता है । पिछले तीन सौ सालों से सफलता के साथ पूंजीवाद अपना पुनरुत्पादन करता रहा और दुनिया भर में प्रमुख उत्पादन पद्धति के बतौर फैला । फिर भी उसने साबित किया कि संपत्ति के साथ ही वह दरिद्रता का भी उत्पादन करता है । दरिद्रता को पूंजीवाद समाप्त नहीं कर सका । असल में दरिद्रता को समाप्त करने के लिए पूंजीवादी अर्थतंत्र को बदलना जरूरी है ।
इसके बाद पांचवें अध्याय में वे पूंजीवादी अधिशेष के वितरण पर ध्यान देते हैं । असल में इस वितरण को देखने से ही पता चलता है कि पूंजीवादी समाज के अन्य तमाम पहलुओं पर इसका कितना गहरा प्रभाव है । इस अधिशेष का सबसे बड़ा हिस्सा तो पूंजीपति खुद के उपभोग में लगाता है । इसका मकसद निजी संतुष्टि के साथ ही शेष आबादी से खुद को अलगाना भी होता है । इससे विषमता पैदा होती और कायम रहती है । फिर ऐसी विचारधारा पैदा होती है जिसमें अधिशेष के उत्पादक और अधिग्रहणकर्ता व्यक्तियों के बीच भेद के लक्षण तय कर दिये जाते हैं । पहले के समाजों में जैसे विषमता को स्वभाव या ईश्वर की देन कहा जाता था उसी तरह पूंजीवादी समाज में इसे योग्यता की उपज मान लिया जाता है । समाज के सभी शासक चाहते हैं कि उनकी हैसियत को स्थायी समझा जाये । खुद के उपभोग से बचा हुआ हिस्सा वे प्रबंधकों और निरीक्षकों पर लगाते हैं क्योंकि अधिशेष के उत्पादन के लिए उनकी जरूरत होती है । उनके काम से अधिशेष का उत्पादन नहीं होता लेकिन उसके उत्पादन के लिए उनकी जरूरत पड़ती है । यह भेद महत्व का है । प्रबंधक कच्चे माल को विक्रेय माल में बदलने हेतु मशीन पर मेहनत तो नहीं करता लेकिन वह उत्पादक श्रमिकों को नियंत्रित करता है । अधिशेष की अबाध आमद के लिए ऐसे लोगों में उसका वितरण जरूरी होता है । ये अनुत्पादक श्रमिक होते हैं लेकिन उत्पादक श्रमिकों से अधिशेष उत्पादित कराने के लिए उसका होना आवश्यक है । पूंजीवाद के पुनरुत्पादन के लिए दोनों का होना जरूरी होने का मतलब उनके बीच के भेद का खात्मा नहीं होता । पूंजीवाद को अपने अस्तित्व के लिए जिसकी भी जरूरत महसूस होती है उन सबको वह अधिशेष का हिस्सा बांटता है । उदाहरण के लिए उत्पादित माल की चोरी की आशंका के चलते उसे सुरक्षा संबंधी अनुत्पादक श्रमिकों को उसका एक हिस्सा प्रदान करना पड़ता है । सलाहकारों, वकीलों और सरकारों को भी उसमें से ही कुछ कुछ हिस्सा देना पड़ता है ।
इस पूरी जटिल व्यवस्था के केंद्र में पूंजीपति होता है । एक ओर उसे उत्पादक श्रमिकों से अधिकतम अधिशेष हड़पना होता है तो दूसरी ओर उसे अनुमान लगाना होता है कि पूंजीवाद के बने रहने के लिए इस अधिशेष को विभिन्न हिस्सेदारों में किस तरह वितरित किया जाये । इसलिए भी पूंजीवाद का विकास एक समान नहीं होता । अलग अलग पूंजीपति वर्तमान और भविष्य का आकलन अलग अलग करते हैं । कुछ आकलन सटीक बैठते हैं तो कुछ गड़बड़ा जाते हैं । उनमें आपसी संदेह और किसी संयोजन के प्रति गहनतर संदेह के चलते विकास की इस असमानता को काबू करना सम्भव नहीं रह जाता । इसके कारण ही विकसित और अविकसित क्षेत्र पैदा होते रहते हैं और उनकी अदला बदली जारी रहती है ।
छठवें अध्याय में वे मार्क्स के विश्लेषण में अंतर्विरोध की भूमिका को उजागर करते हैं । समाज को गढ़ने वाली तत्कालीन प्रवृत्तियों के साथ ही उसके विपरीत काम करने वाली प्रवृत्तियों को भी पहचानते हैं । इन सबके भीतर भी कार्यरत उन विरोधी तत्वों को भी वे खोजते हैं जिनके चलते समाज अलग अलग दिशाओं में चलता नजर आता है । अंतर्विरोध में मार्क्स की गति का कारण हेगेल हैं जिनका मानना था कि सब कुछ अंतर्विरोधी है । मार्क्स ने इसी तरह पूंजीवाद को अंतर्विरोध से भरा हुआ पाया । वे बताते हैं कि उत्पादक कामगारों से प्रत्येक पूंजीपति अधिकतम अधिशेष हासिल करना चाहता है ताकि विभिन्न अंशधारकों में उसका संतोषजनक वितरण कर सके । जितना अधिक मिले उतना अधिक रकम व्यवस्था को कायम रखने में लगायी जा सकती है इसलिए उनकी लालच का कारण पूंजीवादी व्यवस्था को जारी रखने की होड़ है । मजदूरों की मजदूरी घटाकर अधिशेष बढ़ाया जा सकता है । कम मजदूरी पर बाहर से मजदूर बुलाना पूंजीवाद के लिए नयी बात नहीं है । इससे बेकार हो गये मजदूरों में विक्षोभ का जन्म होता है । मजदूरी कम करने से जो लाभ हुआ होता है वह इस विक्षोभ को काबू करने के उपायों में स्वाहा हो जाता है । कम मजदूरी वाले कामगारों की निष्ठा भी कम ही होती है । इसी तरह के तमाम अंतर्विरोध पैदा होते जाते हैं । कमाई बढ़ाने का एक और रास्ता मजदूरों की जगह मशीनों का इस्तेमाल है । मजदूरी घटाने के इन तमाम उपायों से सबसे घनघोर अंतर्विरोध पैदा होता है जिसके तहत मजदूर के पास धन की कमी का मतलब वस्तुओं की बिक्री में भी घटोत्तरी हो जाती है । मजदूरी संबंधी लागत में कमी आने से उत्पादित वस्तु को बेचने की चाहत का विरोधी तत्व पैदा हो जाता है । पूंजीवादी प्रक्रिया में ही पूंजीपति की सफलता का निषेध मौजूद होता है । इस अंतर्विरोध से बाहर निकलने का कोई रास्ता पूंजीवाद के भीतर नहीं निकलता । इस अंतर्विरोध से ही चक्रीय संकट उपजता है । मजदूरी संबंधी लागत घटाने से उत्पादित माल की मांग भी घट जाती है । पूंजीवादी व्यवस्था इसी तरह उतार चढ़ाव के चक्र में चलती है । इन अंतर्विरोधों के कारण ही पूंजीवादी व्यवस्था अस्थिर बनी रहती है । पूंजीवाद में जैसी समाजर्थिक अस्थिरता रहती है वैसी अस्थिरता अगर किसी व्यक्ति में नजर आये तो उसे इलाज कराना पड़ता है ।
मार्क्स का कहना है कि पूंजीवाद विषमता और अस्थिरता को जन्म देता है । इसलिए भी इस व्यवस्था को बदलना बेहद जरूरी है । मार्क्स के लेखन से हम पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्विरोधों, कमियों और अन्यायों को समझ पाते हैं । जिस तरह अधिशेष का अधिग्रहण और वितरण होता है उसके चलते ही स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और लोकतंत्र को पूंजीवाद साकार नहीं कर सकता । अधिशेष के संगठन का विश्लेषण करके उन्होंने यह भी बताया कि पूंजीवाद की जगह जो व्यवस्था आयेगी उसमें अधिशेष के उत्पादक ही उसका अधिग्रहण करेंगे और उत्पादक तथा अनुत्पादक कामगार मिलकर लोकतांत्रिक तरीके से तय करेंगे कि कैसी सामाजिक सेवा के बदले अधिशेष का कितना हिस्सा मिलना चाहिए ।

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