समकालीन जनमत
जनमत

युवा भारत का उदय

जयप्रकाश नारायण

मारो सर! और मारो!!

पेपर लीक के खिलाफ जंतर मंतर पर चल रहे प्रोटेस्ट के दौरान एक नौजवान की यह ललकार भारत के युवाओं द्वारा रचे जा रहे नए इतिहास का उद्घोष है, और नये भारत के निर्माण का घोषणा पत्र है। नागपुर, महाराष्ट्र से आया यह नौजवान चारों तरफ़ लाठी और बंदूक से लैस पुलिस से घिरे होने के बावजूद ललकारते हुए उन्हें आमंत्रण दे रहा है । ‘मारो सर, और मारोʼ। एक अन्य नौजवान, जो रीवा, मध्य प्रदेश से है, वह खून से लथपथ है, फिर भी निर्भीक ढंग से कहता है, ‘मैं शहीद हूं । हर युग में जन्म लूंगा और शहीद होता रहूंगा। मैं हर युग में जुल्म के खिलाफ संघर्ष की नई उर्जा के साथ धरती पर जन्म लूंगा। मैं हर युग का शहीद हूं।ʼ

मैं उस नौजवान को नहीं जानता। उसका नाम क्या है? भारत की यथार्थ सामाजिक संरचना में वह किस धर्म, जाति से है। लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूं, कि जब तारीख आगे कदम बढ़ाने के लिए जड़ और प्रगति विरोधी ताकतों द्वारा खड़े किए गए अवरोधों से संघर्ष कर रही होती है, तो ऐसे दौर में ही भविष्य के नायक धमाकेदार आवाज के साथ अपना दावा पेश करते हैं। उनके कदमों की पदचाप और गति इतना तेज और ताकतवर होती है‌ कि क्रूर से क्रूर शासकों द्वारा खड़े किए गए सारे अवरोध ताश के पत्तों की तरह हवा में बिखर जाते हैं। इस ठोकर से इतिहास का पहिया तूफानी वेग से सारे अवरोधों को छिन्न-भिन्न करते हुए अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाता है। लगता है, 20 जुलाई 2026 आजाद भारत के इतिहास के पन्नों में इसी तरह दर्ज होने वाला है। इसके चाहे जो भी परिणाम निकले। लेकिन इतना तो तय है कि भारत वह नहीं रहने वाला है, जो 20 जुलाई 2026 के पहले था।

वर्तमान लोकतांत्रिक भारत कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के मनुष्य विरोधी क्रूर शिकंजे से संघर्ष में मुब्तिला है। शायद समय का पहिया लोकतंत्र की आकांक्षा लिए हुए अपने स्वाभाविक गति से आगे बढ़ते हुए उस मंजिल पर पहुंच गया है, जहां से भारत कॉर्पोरेट हिंदुत्व फासीवाद यानी “कम्पनी- राज दो ” के खिलाफ सर्वथा नये तरह के स्वतंत्रता संघर्ष को लड़ने के लिए अपने पर तौल रहा है ।दिल्ली के जंतर मंतर पर बलिदान देने के लिए उद्यत युवाओं के दृढ़ संकल्प और आत्मसंयम से इस बात का संकेत मिलने लगा है।

विगत 12 वर्षों से 140 करोड़ भारतीय जिस मनुष्य विरोधी संघी परियोजना से युद्धरत हैं, वह अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। “सब कुछ (मित्र)कॉर्पोरेट के नाम”, इस सूत्र वाक्य में भारत के पुनर्गठन का सारतत्व छिपा था। जिस तरह और जिस वेग से देश के संसाधनों को चंद कॉर्पोरेट घरानों के हाथ में सौपने का अभियान हिंदुत्व मार्का राष्ट्रवादियों द्वारा चलाया जा रहा है। उसी में भारत के 90 करोड़ नागरिकों की दरिद्रता, करोड़ों युवाओं की बेरोजगारी, 40% आबादी की भुखमरी, किसानों और परिवार सहित मजदूरों की आत्महत्या के कारण छिपे हैं। इसके साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा व‌ विध्वंस की कहानी जुड़ी है। यह सब कुछ कॉर्पोरेट लालच को पूरा करने के लिए मोदी के नेतृत्व में फासीवादी रास्ते से क्रूरता पूर्वक संपन्न हो रहा है ।

इस दौर में जिस तरह से भारत का अडानीकरण हुआ है, वह अभूतपूर्व है। उसने भारतीय नागरिकों के कंपनी राज -1 के क्रूर अनुभव को ताजा कर दिया है। अब लोकतांत्रिक भारत के साथ कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के फासीवादी माॅडल का अंतर विरोध विकसित होते हुए चरम पर पहुंच चुका है। इस अंतर विरोध की सक्रियता के चलते जंतर मंतर से भारत की दूसरी आजादी की कहानी की पटकथा लिखी जा रही है। हिंदुत्व फासीवाद के हमले से रक्त-स्नात युवा भारत हर युग के शहीदों के वारिस होने का दावा कर रहा है । तो‌ कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के मनुष्य विरोधी संरचना से मुक्ति के लिए नए भारत के उठ खडे होने के अलावा इससे और क्या समझा जा सकता है।

स्पष्ट है कि यह युवा विस्फोट आजाद और लोकतांत्रिक भारत को विघटित कर संघ-नीत मोदी सरकार द्वारा बड़े काॅर्पोरेट घरानों और साम्राज्यवादी पूंजी की लूट के अधीन पुनर्गठित करने की प्रक्रिया के खिलाफ नए दौर का स्वतंत्रता संघर्ष है। जो 1947 के पहले चले स्वतंत्रता संघर्ष से सर्वथा भिन्न विचारों और सामाजिक शक्तियों द्वारा निर्देशित और संचालित है। इसलिए इस दौर के प्रधान अंतर विरोध को हम- “कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ मार्का फासीवाद बनाम सार्वभौम स्वतंत्रत लोकतान्त्रिक भारत” के अंतर विरोध के रूप में चिन्हित कर सकते हैं।

जंतर मंतर पर जो कुछ भी घटित हुआ है । वह आजादी और लोकतंत्र की रक्षा के लिए बलिदान और सब कुछ न्योछावर कर देने का मानवीय उत्सव है। जो उपरोक्त अंतर विरोध के सक्रिय हो जाने का स्वाभाविक परिणाम है। वस्तुतः अब‌ संघी समर्पणवादी राष्ट्रवाद के साथ सार्वभौम लोकतांत्रिक समावेशी प्रगतिशील राष्ट्रवाद की टक्कर शुरू हो चुकी है। इसलिए वर्तमान युवा भारत सर्वथा भिन्न तरह के रचनात्मक संघर्षों और महान नागरिकों के रंगमंच पर आगमन का उत्सव मना रहा है। ‘जय भीम लाल सलाम’ के नारे से संकेत तो यही मिल रहा है कि भगत सिंह, करतार सिंह सराभा, अंबेडकर, गांधीजी के साथ स्वामी सहजानंद से लेकर नक्सलबाड़ी विद्रोह तक के हजारों बलिदानी भारतीयों की आत्मा पूंजी की मनुष्य विरोधी ताकतों के क्रूर लूट के खिलाफ एकताबद्ध हो उठ खडी हुई है।

कंपनी राज एक- प्लासी के युद्ध में सुजाउद्दौला की पराजय के बाद 100 वर्षों में ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए अंततोगत्वा दिल्ली पर शिकंजा कस दिया। 1757 के बाद से कंपनी राज के खिलाफ सौ से ज्यादा किसान और आदिवासी विद्रोह हुए थे। जो 100 वर्षों बाद संघनित होते हुए 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष के रूप में फूट पड़ा। इन सौ वर्षों में कंपनी द्वारा ब्रिटिश उद्योग जगत के स्वार्थ में लाए गए विभिन्न कानूनों ने भारत पर जो कहर ढाया और विपदा थोपी,  वैसा भारत के अतीत में कभी नहीं देखा गया था। इन कानूनों और नीतियों से जिस बड़े पैमाने पर कुटीर उद्योगों का विनाश हुआ और भुखमरी, बेरोजगारी, अकाल को जन्म दिया, वह अभूतपूर्व था। भारतीय समाज ने अतीत में ऐसी तबाही नहीं देखी थी। सोने की चिड़िया कहा जाने समृद्ध निर्यातक देश कंपनी राज के 100 वर्षों में ब्रिटिश उद्योग जगत पर आश्रित हो अपनी स्वायत्तता को बैठा। परिणाम स्वरुप 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष फूट पडना। जिसका मूल उद्देश्य था, अपना देश वापस लेना।
” हम है इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा” के जय घोष के साथ शुरू हुआ संघर्ष भारत के एकल राष्ट्र के रूप में उठ खड़ा होने का आधार बना । जिसने त्याग, बलिदान और देश प्रेम की नई परिभाषा गढ़ी।
यहीं से शुरू हुई साझा दुश्मन के खिलाफ साझा संघर्ष की महान भारतीय परंपरा। जब एक बार नवजात भारतीय राष्ट्र ने अपने प्रधान शत्रु ब्रिटिश उपनिवेशवाद को पहचान लिया, तो इस चेतना ने भारत के नवजागरण के दरवाजे खोल दिये । ठोस आकार ले रहे राष्ट्र-राज्य ने साहित्य-संस्कृति, कला, ज्ञान-विज्ञान, तर्क के क्षेत्र में महान उपलब्धियां दर्ज की। देश को गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए शहीद होने की जिस परंपरा की शुरुआत 1857 में हुई, उसने भारतीय नागरिकों को एक नए तरह के आत्म सम्मान और गौरवबोध से भर दिया। 1857 से 1947 के कालखंड में हमारे पूर्वजों ने जिस तरह की उपलब्धियां दर्ज की, उसकी मिसाल भारतीय उपमहाद्वीप के अतीत के इतिहास के किसी कालखंड में नहीं मिलती। हमारे पूर्वजों की कुर्बानियों से हासिल उपलब्धियों का परिणाम था कि विभाजन की क्रूर त्रासदी का मुकाबला करते हुए हमने 1950में लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य हासिल किया, जिसे एक संविधान में सूत्र बद्ध किया गया। आज 78 वर्ष बाद इन्हीं उपलब्धियों को मिटा देने का अभियान हिंदुत्व कॉर्पोरेट गठजोड़ द्वारा चल रहा है। जिसे,  विश्व साम्राज्यवाद का समर्थन हासिल है।

जब कोई समाज अपने प्रधान शत्रु की शिनाख्त कर लेता है, तो उसके गर्भ में पल रही अजेय मानवीय मेधा ठोस आकार लेते हुए मानव जीवन के समस्त उच्च मूल्यों, प्रवृत्तियों और‌ विचारों को चरम तक विकसित करने में सक्षम होती है। यही भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान संभव हुआ था।

2014 के बाद

2014 में कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के ठोस शक्ल लेने के बाद आजादी के संघर्ष की उपलब्धियां संकटग्रस्त हो गई । देश भारतीय मार्का फासीवाद की दिशा में आगे बढ़ गया। एक-एक कर लोकतांत्रिक संस्थाओं, मूल्यों, आदर्शों को तिलांजलि दी जाने लगी। खुलेआम भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का आवाहन किया गया और लोकतंत्र विरोधी उन्मादी ताकतें सड़क पर नंगा नाच करने लगीं। कमजोर वर्गों तथा अल्पसंख्यकों पर हमले की आड़ में भारत के कॉर्पोरेट नियंत्रण की परियोजना आगे बढ़ी। पहले कानूनों को बुलडोज़ किया गया। जिसने देशी-विदेशी पूंजी की लूट को सुगम बनाया। लोकतंत्र के स्पेस घटने लगे। सब कुछ बाजार और मुनाफे के हवाले कर दिया गया। सरकार ने नागरिक के अधिकार में कटौती शुरू की। शिक्षा, स्वास्थ्य निजी हाथों में चला गया। चुनाव मैनेज हो गया। संस्थाएं कंट्रोल कर ली गईं। देश पर चुनावी तानाशाही थोपी गई।

संघर्ष की दिशा -स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों और उपलब्धियों की रक्षा के लिए लड़ते हुए युवा प्रतिरोध ठोस शक्ल ले रहा है। आज का संघर्ष प्रतियोगी युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल देने के लिए सचेतन ढंग से किए जा रहे परीक्षा में भ्रष्टाचार और पेपर लीक और एनटीए की विफलताओं के खिलाफ शुरू होकर अंततः कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के केंद्र मोदी सरकार पर केंद्रित होने लगा है। जून-जुलाई में जंतर मंतर पर चले युवाओं के संघर्ष का ठोस योगदान यही है।

अतीत की निरंतरता – यहां से हमारा लोकतंत्र किस राह पर आगे बढ़ेगा। अभी कहना बहुत मुश्किल है। 1930 के दशक में भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जिस तरह के साहसिक प्रतिरोध और बलिदान का इतिहास रचा था। लगता है भारत के युवा उसी रास्ते पर आगे बढ़ चले हैं। चूंकि आज के शासक 1930 व 40 के दशक के महान स्वतंत्रता संघर्ष की उपलब्धियों के निषेध की पैदावार है। इसलिए यह दूसरा स्वतंत्रता संघर्ष इनके खिलाफ केंद्रित हो रहा है।

यहां याद रखना चाहिए कि वर्तमान युवा पीढ़ी आजादी के दौर के क्रांतिकारियों के बलिदान के अनुभवों से समृद्ध है। और 100 वर्षों बाद पुनः 21वीं सदी में साम्राज्यवाद के समक्ष समर्पण करने वाली ताकतों से सड़कों पर संघर्षरत है। आज की दुनिया बीसवीं सदी के मध्य की दुनिया से बहुत आगे बढ़ चुकी है। यह तकनीकी क्रांति का युग है। दुनिया जहां बड़े कॉर्पोरेट घरानों  की मुट्ठी में कैद है । वही आज का युवा मानव ज्ञान की उपलब्धियों से निर्मित तकनीक का संचालक है। यही कारण है कि इस कालखंड के युवाओं की चेतना और लक्ष्य में गुणात्मक फर्क है। अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ जहां भगत सिंह, गांधी और अंबेडकर अलग-अलग मंचों से एक लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे थे। वहीं, इस दौर के युवा नायक तीनों महापुरुषों के लक्ष्यों को एकल अखंड में समाहित किए हुए आगे बढ़ रहे हैं। “जय भीम लाल सलाम” के नारे कोई इसी अर्थ में देखा जाना चाहिए।
जहां ये विश्व साम्राज्यवाद की युद्धोन्मादी नीतियों व विकासशील देशों को गुलाम बनाने के सम्पूर्ण प्रोजेक्ट के विरुद्ध दुनियाभर में संघर्षरत जन-गण के साथ खडें हैं। वहीं देश के अंदर साम्राज्यवादी एजेंटों और देश को पीछे ले जाने में संलग्न आंतरिक ताकतों के खिलाफ संघर्ष में मुब्तिला है।

सही लक्ष्यसटीक निशाना– आज की युवा पीढ़ी अतीत की सभी दीवारों को ढहाते हुए आगे बढ़ा है। इसके ऊपर न अतीत का बोझ है, न परंपरा का बन्धन। न सामंती संस्कृति, सड़ी-गली नैतिकता का। यह पितृसत्ता के समस्त जकड़नों से मुक्त धर्म-जाति, भाषा, क्षेत्र, लिंग की विभाजनकारी रुढियों और वर्जनाओं से मुक्त राष्ट्रीय के साथ- वैश्विक नागरिक है। जिस तरह मुक्त विचरण ( लूट) की आजादी पूंजी को हासिल है। उसी तरह जेन-ज़ी श्रम की आजादी का उपभोग करने के लिए युद्ध रत है। इसलिए जब भारत में कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ ने लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक आजादी पर विभिन्न तरह से हमला शुरू किया, तो युवा तिलमिला उठा। यह पिछले 12 वर्षों से जेएनयू में कैंपस की स्वायत्तता और शैक्षणिक गुणवत्ता पर कॉर्पोरेट हिंदुत्व के हमले का प्रतिरोध कर रहा था। धीरे-धीरे इस प्रतिरोध की उर्जा भारत के सम्पूर्ण शैक्षणिक संस्थानों और प्रतियोगी छात्रों के व्यापक फलक तक जा पहुंची। जिस हद तक शिक्षा को खरीद और बिक्री की वस्तु बना देने की हिंदुत्व कॉरपोरेट गठजोड़ की नीति आगे बढ़ती गई। उसी हद यह युवा पीढ़ी इस साज़िश के खिलाफ शिक्षित और संगठित होती गई। जिसकी एक झलक दुनिया को पिछले दिनों जंतर मंतर पर देखने को मिली । जिससे लुटेरे चकित और चिंतित है।

जेन-ज़ी- यह युवा जिसे जेन जी कहा जा रहा है। आधुनिक विज्ञान, तकनीक, एआई की ताकत और स्पष्ट दृष्टि से लैस होने के कारण लोकतंत्र विरोधी कारपोरेट-हिंदुत्व फासीवाद के खतरे को पहचानता है। इनमें आंतरिक और वाह्य दुश्मनों की साफ-साफ समझ है। आज के युवा इन चार मूल्यों और लक्ष्यों (साम्राज्यवादी गुलामी से मुक्ति, जाति विनाश और साम्प्रदायिक विभाजन का खात्मा और वैज्ञानिक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण की मुकम्मल परियोजना और सरकारी जवाबदेही) को हासिल करने के लिए लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष समता मूलक समाज निर्माण का झंडा उठाए आगे बढ़ रहे हैं ।इसलिए उनके निशाने पर जहां साम्राज्यवादी पूंजी का क्रूर शोषण से मुक्ति का मुद्दा है, वहीं सामाजिक समानता, न्याय, लिंग, जाति, धर्म भेद की सभी दीवारों को ढहा देने की उत्कट आकांक्षा भी है। इसलिए इन लोकतंत्र विरोधी बेड़ियों का संरक्षक और आक्रामक समर्थक संघ उनके निशाने पर है ।

नये नायकों का आगमन – ये मोदी राज के षड्यंत्र और दमन, लोकतांत्रिक संस्थाओं के समर्पण और पतन , कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के उग्र सांप्रदायिक आक्रमण और विभाजन, तर्क ज्ञान और वैज्ञानिक चेतना पर हो रहे हमले, हिंदू राष्ट्र के प्रतिगामी एजेंडें तथा घिनौना जाति-धर्म आधारित समर्पणवादी निम्न पूंजीवादी नेतृत्व की छिपी खुली गद्दारी के खिलाफ पूर्णतया सचेत है। ये आधुनिक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष समावेशी भारत के सपने के लिए कुर्बान होने वाले आजादी के नए नायक हैं ।जो अपनी दावेदारी पेश करने के लिए रंगमंच पर आ चुके हैं। इसलिए वर्तमान संघर्ष सूक्ष्म और संगठित फासीवादी हमले के खिलाफ उच्च स्तर के त्याग और बलिदान की तीव्रता के कारण रोमांचक हो गया है। जो नीति व रणनीति को समृद्ध करते हुए निर्णायक संघर्ष के लिए कटिबद्ध है और वैचारिकी को अपडेट कर रहे है। इसने संघर्ष के किसी एक रूप का बंदी होने से इनकार कर दिया है। यह “सड़क से लेकर संसद तक ” उन सभी लोकतांत्रिक स्पेस की वापसी के लिए लड़ रहा है। जिसे पिछले 12 वर्षों में धीरे-धीरे छीन लिया गया। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से सीखते हुए आजाद भारत के निर्माण से हासिल सकारात्मक उपलब्धियों को बचाते हुए लोकतांत्रिक स्पेस के विस्तार के लिए लड़ रहा है। जिस कारण शासक वर्ग डरा हुआ है।

संघर्ष की दिशा– उदारीकरण के बाद निर्मित हुई वर्तमान विश्व व्यवस्था और उपनिवेशोत्तर विश्व के संघर्ष और सृजन के रास्ते सर्वदा भिन्न हैं और उन्हें होना भी चाहिए। वर्तमान युवा अपने अतीत की समस्त पीढ़ियों से अलग है! तकनीक सूचना और ज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति ने मानव जीवन को बेहद सूक्ष्म और मारक संघर्षों की दुनिया में ढकेल दिया है। जिससे अनुभव ज्ञान के साथ सामाजिक पहुंच और गतिशीलता के नए-नए दरवाजे खुलते हैं। आज की खगोलीय दुनिया का यथार्थ 20वीं सदी के उपनिवेश उत्तर काल से सर्वथा भिन्न है । बीसवीं सदी के राजनीतिक सामाजिक उपकरण और अस्त्र- शस्त्र लगभग अप्रासंगिक हो गए हैं। आज के दौर की सामाजिक गतिशीलता से रंग-बिरंगे नायकों के जन्म लेने और दावेदारी पेश करने व एक हद तक जन समर्थन हासिल कर लेने के कारण चुनौतियां उतनी ही जटिल है। इनकी गति तीव्र है । प्रभावित करने और नई पीढ़ी सहित अन्य तबको तक पहुंचने की क्षमता अनंत है। इसलिए यथार्थ बिल्कुल भिन्न तरह का है। यही कारण है कि परिवर्तन की शक्तियों के लिए इस दौर को समझने उसके अनुकूल चलने की चुनौती उतनी ही गम्भीर है।

भारत में उदारीकरण और मंडल मंदिर के दौर के एजेंडे और मांगे भोथरी हो चुकी हैं। जहां वर्ग तेजी से बदल रहे हैं। जो एक हदतक आभासी होने के साथ यथार्थ जीवन में धुंधले प्रतिबिंब प्रेषित कर रहे हैं। यही कारण है कि जंतर मंतर पर धर्म जाति भाषा क्षेत्र लिंग से मुक्त युवाओं की फौज खड़ी थी। सत्ता को संकट में डालने की उनकी क्षमता भी अदृश्य और गहरी है । इनके औजार एकदम आधुनिक हैं। वे” कर लो दुनिया मुठ्ठी में” के कारपोरेट लालच के युग में पैदा होने के वावजूद उसका निषेध है।
युग की विशेषता-हमें याद रखना चाहिए कि ये युवा (आधुनिक ज्ञान तकनीक से लैस बेरोजगार व टेक्नीशियन) उपनिवेशोत्तर दुनिया की उपज है। यानी उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों के एक हद तक पृष्ठभूमि में चले जाने या स्वतंत्र देशों के निर्माण की पहली मंजिल पूरी होने के बाद इनका जन्म हुआ है। 1991 में सोवियत ब्लॉक के बिखरने और एलपीजी आने के बाद नव स्वतंत्र देशों में बने राष्ट्र-राज्य का ढांचा ढहने लगा था।साम्राज्यवाद के प्रत्यक्ष नियंत्रण में खगोलीय दुनिया का निर्माण हुआ। जिसकी संचालन शक्ति मुख्यतः अमेरिकी साम्राज्यवाद के हाथ में थी। जिसको एक संगठित तंत्र (आईएमएफ वर्ल्ड बैंक और विश्व व्यापार संगठन) संचालित किया जा रहा था।
कहने का अर्थ यह है कि प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद बनाम व्यापक जनता का अंतर विरोध -जिसने उपनिवेशवाद विरोधी प्रगतिशील राष्ट्रवाद को जन्म दिया था -के हद तक पृष्ठभूमि में चले जाने के सात‌ दशक बाद जेन- जेड का जन्म हुआ है। उसे नवउपनिवेश वाद के युग में अपनी दावेदारी पेश करनी है।जिसके हथियार और वैचारिकी सर्वथा भिन्न होंगे। ‌‌

उम्मीद -मोदी राज के‌ 12 वर्षों और संघ के जन्म के 100 वर्षों में तैयार किए अदृश्य जाल को तोड़ने के लिए नवोदित भारत की ताकते रंगमंच। पर आ चुकी हैं। जिनकी शक्ति और क्षमता को समझने देखने के सारे पैमाने बदलने होंगे । 12वर्षों में पहली बार इन्होंने फासीवादी परियोजना को पीछे हटने पर मजबूर किया । डरऔर दमन के तंत्र को हवा में उड़ते हुए सत्ताधारियों को विदूषक बना दिया है। शाहीन बाग की औरतें, किसान आंदोलनकारी, एनसीआर के मजदूर और वर्तमान छात्र- युवा संघर्ष ने भारत में लोकतंत्र के भविष्य को जिंदा रखा है। आईए इंकलाबी तेवर के साथ इनका स्वागत करें!

फ़ीचर्ड इमेज- अंकुर राय

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