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साहित्य-संस्कृति

तबला : उत्पत्ति और घराने

तबले की उत्पत्ति और उसके नामकरण से संबंधित कई मत प्रचलित हैं. एक मत तो ये है कि एक मृदंग वादक जब प्रतियोगिता में हार गए तो गुस्से से मृदंग को पटक दिया. मृदंग दो भागों में टूट गया. जब मृदंग वादक का गुस्सा ठंडा हुआ तो दोनों हिस्सों को साथ रखकर थाप दिया तो बज रहे थे. टूटने के बाद भी बोला. यहाँ से एक नाम आया तब भी बोला. यहाँ से तबला बना. ये मत प्रचलित जरूर है लेकिन तर्कसंगत मालूम नहीं पड़ता है क्योंकि मृदंग की बनावट ऐसी होती है कि अगर वो टूट जाये तो वो बजाने लायक नहीं होगा.

एक मत ये है कि आमिर खुसरो ने तबले का निर्माण किया लेकिन इसके भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं. कुछ लोगों का मानना है कि भारतीय वाद्य पुष्कर से तबले का जन्म हुआ है. एक प्रचलित मत ये है कि मुग़ल सेना के साथ एक नक्कारे जैसा वाद्य चलता था जिसे तबल कहा जाता था. इसी से तबला बना. तबले की उतपत्ति कैसे हुई किसने की इसके बारे में कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है.

पखावज

तबले के कुल 6 घराने हैं जिसमें सबसे पुराना घराना दिल्ली है. दिल्ली से ही घरानों की नींव पड़ी. इसके अलावा फर्रुखाबाद, अजरारा, पंजाब, लखनऊ और बनारस तबले के घराने हैं. ख्याल गायन के साथ पखावज की संगत होती थी. ख्याल गायन के साथ पखावज के बोल जमते नहीं थे. 18वीं शताब्दी में आज का जो तबला है वो विकसित हुआ. पहले तबले में ज्यादा चांटी और मसाले (सियाही) का प्रयोग नहीं होता था लेकिन सिद्धार खाँ ढाढ़ी ने मसाले (सियाही) के प्रयोग के साथ कुछ कायदे, पेशकार और टुकड़ों की रचना की. उस्ताद सिद्धार खाँ ढाढ़ी मुहम्मद शाह रंगीला के प्रतिष्ठित संगीतकार थे. इन्होंने ही दिल्ली घराने की नींव डाली.

दिल्ली घराना :

दिल्ली पहला और सबसे पुराना घराना है. दिल्ली घराने के संस्थापक सिद्धार खान ढाढ़ी के तीन बेटे थे. पहले बेटे बुगरा खाँ, दुसरे बेटे माहताब खान और तीसरे बेटे घसीट खाँ थे. सिद्धार खान ढाढ़ी के दूसरे बेटे माहताब खान से तीन बेटे थे -मक्कू खाँ, मौदू खाँ और बख्शू खाँ .  बुगरा खान के दो बेटे थे उस्ताद सिताब खाँ और उस्ताद गुलाब खाँ. उस्ताद सिताब खाँ के भी दो बेटे थे- नजीर अली और बड़े काले खाँ. उस्ताद बड़े काले खाँ के पुत्र थे बोली बख्श. उस्ताद बोली बक्श के पुत्र थे नत्थू खाँ. उस्ताद नत्थू खाँ के शागिर्द थे मुनीर खाँ.

दिल्ली पर नादिरशाह के हमले से दिल्ली तबाह हुई तो दबिस्ताने दिल्ली के शायर लखनऊ और रामपुर का रुख अख्तियार करने लगे. शायरों के अलावा जो संगीतकार दिल्ली में थे वो भी दिल्ली से बाहर मुख़्तलिफ़ शहरों में गये. बाएं पर हाथ और दाएं पर उँगलियों के रखने का तरीका सभी घरानों का अलग-अलग है. साथ ही बोलो को निकालने की पद्धति भी घरानों की अलग-अलग है. इसी के कारण घरानों की अपनी -अपनी विशेषता है.

मृदंग

अजराड़ा घराना :
अजराड़ा घराने की शुरुआत दो भाइयों- कल्लू खाँ और मीरु खाँ से होती है. ये दोनों उस्ताद सिताब खाँ के शागिर्द थे. ये दोनों तबला सीखने के बाद अजराड़ा (मेरठ) आ गए और तबले के वादन में कुछ तब्दीलियां पैदा कर अजराड़ा घराने की शुरुआत की.इस घराने में उस्ताद क़ुतुब खाँ, उस्ताद तुल्लन खाँ, उस्ताद घीसा खाँ और उस्ताद मुहम्मदी बख्श मशहूर तबलानवाज हुए. उस्ताद काले खाँ इसी घराने के हैं जो उस्ताद चाँद खाँ के पुत्र और उस्ताद मुहम्मदी बख्श के पौत्र थे. साबिर खाँ इसी घराने के थे जिनकी मृत्यु 2016 में हो गयी.

लखनऊ घराना :
सिद्धार खाँ ढाढ़ी के बेटे माहताब खाँ के तीन बेटे हुए- मक्कू खाँ, मौदू खाँ और बख्शू खाँ. दिल्ली से तबले का इल्म हासिल करके मौदू खाँ और बख्शू खाँ लखनऊ आ गए और लखनऊ घराने की बुनियाद डाली. पंडित रामसहाय जिन्होंने बनारस घराने की नींव डाली उस्ताद मौदू खाँ के शागिर्द थे. उस्ताद मम्मू खाँ, मुहम्मद खाँ, मुन्ने खाँ, आबिद हुसैन, वाजिद हुसैन, पंडित बीरू मिश्र, पंडित सपन चौधरी लखनऊ घराने के तबलानवाज हैं.

बनारस घराना :
लखनऊ में 12 वर्ष तक उस्ताद मौदू खाँ से तबला सिखने के बाद पंडित राम सहाय बनारस आए और बनारस घराने की नींव डाली. इन्हीं के शिष्य हुए बैजू महाराज, रामशरण जी, यदुनन्दन जी, प्रताप महाराज. इन्होंने अपने भाई जानकी सहाय और भतीजे भैरों सहाय को भी तबले की शिक्षा दी. इस घराने के प्रसिद्ध तबला वादकों में पंडित दरगाही मिश्र, कंठे महाराज, बिक्कू जी, पंडित अनोखे लाल मिश्र, पंडित सामता प्रसाद (गुदई महाराज) और पंडित किशन महाराज हुए.

उस्ताद अहमद जान थिरकवा

फर्रुखाबाद घराना :

उस्ताद मौदू खाँ के भाई उस्ताद बख्शू खाँ के शागिर्द थे विलायत अली. विलायत अली खाँ उस्ताद बख्शू खाँ के दामाद भी थे. लखनऊ से तबला सीखने के बाद फर्रुखाबाद चले गए और फर्रुखाबाद घराने की नींव डाली. विलायत अली खाँ के चार पुत्र थे- निसार अली खाँ, अमान अली खाँ, हुसैन अली खाँ और नन्हे खाँ. इन्हीं से आगे ये घराने चला. इस घराने को आगे बढ़ाने में उस्ताद हुसैन अली खाँ का विशेष योगदान है. इनके शागिर्द हुए उस्ताद मुनीर खाँ. इन्हीं उस्ताद मुनीर खाँ के शागिर्द हुए अहमद जान थिरकवा. इस घराने के प्रमुख तबला वादकों में उस्ताद मसीत खाँ, गुलाम हुसैन, करामात खाँ, उस्ताद बन्दे हसन खाँ, पंडित ज्ञान प्रकाश घोष आदि हुए.

पंजाब घराना :
पंजाब घराना स्वतंत्र घराना है. मशहूर पखवाज वादक लाला भगवानदास के शिष्य फकीर बख्श ने पंजाब घराने की नींव डाली. उस्ताद फकीर बख्श के पुत्र थे. इन्हीं से ये घराना आगे बढ़ा. उस्ताद अल्ला रक्खा खाँ इस घराने के मशहूर तबला नवाज हुए. इन्हीं के पुत्र हैं मशहूर तबला नवाज ज़ाकिर हुसैन. उस्ताद अल्ला रक्खा खाँ के शागिर्द हैं आदित्य कल्याणपुर. आज की तारीख में पंजाब घराना और बनारस घराना सबसे मशहूर घराना है. पंजाब का ठेका मशहूर है. उस्ताद करीम बख्श बैरना, उस्ताद उस्ताद अल्ला दित्ता बघारपुरिया, उस्ताद अल्ताफ हुसैन (ताफो खान), उस्ताद तारी खान पाकिस्तान के पंजाब के मशहूर तबलानवाज़ हैं.

उस्ताद ज़ाकिर हुसैन और अल्ला रक्खा खान

चूँकि जब दिल्ली से तबला सीखकर सिद्धार खान ढाढ़ी के शिष्य देश के मुख्तलिफ़ शहरों में फ़ैल गये तो उन्होंने तबले के बोल, कायदों को बजाने में थोड़ा-थोड़ा बदलाव किया. हालाँकि 6 घराने होने के बावजूद शैली (बाज) दो ही हैं। पूरब बाज और पश्चिमी बाज.

तबला बजाने की जो पूरबी शैली है वो खुले हांथों की है जबकि पश्चिमी शैली बंद हाथों की शैली है. इसे किनार का बाज कहते हैं क्योंकि इस शैली में किनार का प्रयोग ज्यादा होता है. इसमें दो उँगलियों का प्रयोग होता है इसीलिए इसे बन्दबाज भी कहते हैं. इस शैली के अंतर्गत दिल्ली और अजराड़ा घराने आते हैं.
पूरबी शैली में थाप का प्रयोग होता है जिससे आवाज़ में और गूँज पैदा होती है. बेस का इस्तेमाल जिसे बायां कहा जाता है पर खुले हाथों से थपकी ली जाती है.

पंडित किशन महाराज

इस शैली में उँगलियों के साथ-साथ पंजे का भी इस्तेमाल होता है इसीलिए इसे खुला बाज भी कहते हैं. स्याही का इस्तेमाल ज्यादा होता है. इसमें पाँचों उँगलियों का प्रयोग होता है. कारण ये कि लखनऊ में नृत्य के साथ पखावज (खुले हाथों का वाद्य है) की संगति होती थी और तबला यहाँ आया तो पखावज का प्रभाव उसपर पड़ा तो वो खुले हाथों से बजाया जाने लगा. इस शैली के अंतर्गत लखनऊ, फर्रुखाबाद और बनारस घराने आते हैं.

ये तबले की उत्पत्ति और घराने से संबंधित मुख़्तसर सी बात थी। आगे अलग अलग घरानों की खासियत और उस्तादों पर बात की जायेगी…..

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