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पुस्तक

आलोक रंजन की किताब सियाहत

ममता सिंह


सियाहत कितना अलग सा नाम है न! अधिकतर लोगों के लिए अंजाना, नया सा जबकि इससे मिलता जुलता लफ़्ज़ सियासत है जिससे देश का बच्चा-बच्चा परिचित है। जब पहली बार सियाहत नाम सुना तो जानने की इच्छा हुई कि यह क्या है..पता चला यात्रा, सफ़र, पर्यटन को सियाहत कहते हैं। यात्रा वृत्तांत पढ़ने में रुचि होने के कारण इसे पढ़ना लाज़िमी था। पढ़ना शुरू किया तो एक नया आश्चर्यलोक सामने आया..वह जिसे सामान्यतः पर्यटक समय, सुविधा, रुचि अथवा दृष्टिकोण की कमी के कारण नहीं देख पाते, सोच पाते याकि ढूंढ पाते हैं उसे सियाहत के लेखक आलोक रंजन ने बख़ूबी जिया और लिखा है।दक्षिण भारत को एक उत्तर भारतीय जिज्ञासु, युवा, साहित्यप्रेमी अध्यापक की नज़रों से देखना निःसंदेह अद्भुत रहा है।
इसकी शुरुआती लाइनें इस किताब के रोचक होने की घोषणा कर देती हैं- “यहाँ जो भी रंग है-गहरा है ! पेड़ों की हरियाली से लेकर लोगों के चेहरों और चमड़े तक के रंग में यह गहराई देखी जा सकती है। इस गाढ़ेपन ने इस इलाक़े को एक अलग पहचान दी है। इसकी पहचान है-इसके चप्पे चप्पे का रहस्यमय होना।” वरक दर वरक आपको इस रहस्य की परतें खुलती दिखेंगी साथ में एलिस इन वंडरलैंड की तरह के आश्चर्यजनक तथ्य,जगहें…किसी यात्रा वृत्तान्त में जबतक वहाँ के निवासियों की बातें,आदतें,रहन सहन,सुख दुख समाहित न हों तब तक वृत्तान्त बिना आत्मा के एक ख़ूबसूरत शरीर भर होता है..आलोक रंजन ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि, लम्बे प्रवास, मनुष्यता के प्रति आदर और सहज जिज्ञासु स्वभाव के कारण उन जगहों को एक्सप्लोर किया जहाँ पहुंचना किसी सामान्य पर्यटक के बस की बात न होती, जैसे मुतुवान आदिवासियों का गांव ‘तेरा’..हाथियों, सांपों, जोंकों, जानवरों और घने जंगल के रास्ते को पार करने के बाद मिलने वाला गांव तेरा जिसके बारे में आलोक लिखते हैं कि – तेरा गाँव केरल के उस क्षेत्र में पड़ता है जिसके बारे में यदि कहा जाए तो केरल वाले भी नहीं मानेंगे कि ऐसा गाँव उनके राज्य में है ….सहज, सरल किन्तु कठिन परिस्थितियों में रहने वाले आदिवासियों के बीच रहने का वृत्तान्त मन में रोमांच पैदा करता है।
तमिलनाडु राज्य के आख़िरी हिस्से धनुष्कोटि जोकि 1964 में आये भीषण चक्रवाती तूफ़ान में सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो गया था, उसका वर्णन आपको रोमांच नहीं दुख और उदासी से भर देगा, और तभी यह समझ में आएगा कि हम अपने देश को, वहां के निवासियों को, उनके सुख दुख को कितना कम जानते हैं। इसी तरह ज्यू टाउन का वृत्तान्त हमें अपने मन में झांकने को विवश करता है।

केरल के यहूदी इस्राइल वापस जा रहे हैं, उन्हें लगता है वह उनका देश है, वहाँ उनके लोग हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे बंटवारे के वक़्त हिंदुस्तान से पाकिस्तान गए मुस्लिम और पाकिस्तान से हिंदुस्तान आये हिन्दू..बरसों बीत गए, पीढियां चुक गईं पर अपनी जगहों से उखड़े लोगों का दिल नई ज़मीन पर जम पाया या लोगों ने उन्हें खुले दिल से अपनाया ? जवाब सबको मालूम है। तभी आलोक ताक़त और आक्रामक तरीक़े से बढ़ते इस्राइल के बारे में लिखते हैं कि- “इस्राइल जब बड़ा हो रहा हो तो वह निश्चित रूप से बाहर के देशों में बसी अपनी क़ौम को आकर्षित करेगा।वहाँ ज़्यादा अवसर हैं,अपनी तरह के लोग हैं इसीलिए वहाँ का आकर्षण भारतीय यहूदियों को भी बुला रहा है। कोचीन के यहूदी भी इसके अपवाद नहीं हैं। एक धर्म के होने के बावजूद वहाँ के यहूदी और मटानजेरी के यहूदियों में दूसरी समानता नहीं होगी। यह इतिहास का ऐसा पन्ना है जिसे आसानी से रटा तो जा सकता है लेकिन समझा नहीं जा सकता।”
इसी तरह बीजापुर, बादामी की यात्रा में मिले जर्मन पर्यटकों के साथ आलोक की बातचीत देश के हालात,अंतर्विरोधों साथ ही भारत को देखने जानने के उनके नज़रिये से भी परिचित कराती है..आलोक की नज़र से छोटी और उपेक्षित जगहें बच नहीं सकी हैं,वह हर एक जगह को अपना दुलार,अपना समय देते चलते हैं साथ ही ज़िन्दगी की बड़ी बड़ी सीखें भी जैसे-“कितनी अजीब बात है,झरने भी मनुष्यों की तरह होते हैं।जो छोटा-वो अकेला।जो बड़ा उसके यहाँ चहल पहल।”
“भोजन की पसन्द-नापसन्द प्रेम में किये गए आपके फ़ैसलों की तरह होती हैं,जो पसन्द आया,आया।वरना किसी चीज़ का कोई वैज्ञानिक कारण नहीं ढूंढा जा सकता।”
“यह अजीब सा दुर्भाग्य है कि हम वही नहीं करते जो पास हो और जिसे सबसे आसानी से किया जा सकता है।”
ऐसे ही अनेक सूक्ति वाक्यों, रोमांचक क़िस्सों से भरी है यह किताब..बौद्धिकता के दिखावे से परे किन्तु कदम कदम पर शेर-ओ-शायरी, दोहों, कवियों, लेखकों, फ़िल्मों के ज़िक्र से महकती हुई…
जिन्हें पिक्चर पोस्टकार्डों के इतर का दक्षिण भारत देखना-जानना हो वह इसे अवश्य पढ़ें।

किताब भारतीय ज्ञानपीठ से आई है और 250 रुपये की है।

(ममता सिंह पेशे से अध्यापिका हैं और सावित्री बाई फुले नाम से पुस्तकालय चलाती हैं।)

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