शशांक पाण्डेय
26 जुलाई 1876 को, आज से ठीक 150 साल पहले सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने कलकत्ते में इंडियन एसोसियेशन की स्थापना की थी। इस एसोसिएशन के पहले महान-आन्दोलन के केन्द्र में थी छात्रों की वेदना। औपनिवेशिक सरकार ने भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में बैठने के लिये आयु-सीमा 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी थी। यह एक ऐसा परिवर्तन था जिसने एक झटके में सबसे ऊँचे दफ्तर में भारतीय युवाओं के पहुँचने के दरवाजे पूरी तरह बन्द कर दिये। उन युवाओं की शिकायत को सरकार ने रोजमर्रा के एक प्रशासनिक-फुटनोट की तरह महत्वहीन माना। बनर्जी ने उसे एक संवैधानिक प्रश्न बना दिया, पूरे भारत का दौरा किया और इस परीक्षा में बैठनेवाले छात्रों के गुस्से को पहली अखिल भारतीय राजनीतिक लामबन्दी में परिवर्तित कर दिया। इस खारिज की गयी पीढ़ी की निष्ठा को राज फिर कभी बहाल नहीं कर पाया।
पचास साल पहले 1976 की सर्दियों और मानसून में दो महाद्वीपों में दो देश वास्तविक काल में एक-दूसरे के विपरीत सबक सीख रहे थे। 16 जून को दक्षिण अफ्रीका के ‘सवेतो’ में पठन-पाठन की भाषा के रूप में ‘एफ्रिकान्स’ को थोपने के विरोध में स्फूर्त आन्दोलन का सरकार द्वारा दमन हथियारों से किया गया; उसके अगलेे हफ्तों में सैकड़ों मौतें हो गयीं। भारत में आपातकाल के दौरान दूसरे साधनों के प्रयोग द्वारा कैम्पस खाली करा लिये गये, छात्र-संघों को निलम्बित कर दिया गया और आन्तरिक सुरक्षा कानून (मीसा) के अन्तर्गत विभिन्न मत के कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूँस दिया गया। प्रिटोरिया ने गोलियाँ इस्तेमाल कीं और नई दिल्ली ने निवारक-नज़रबंदी का रास्ता इख्तियार किया। दोनों मुतमईन थे कि उन्होंने कानून-व्यवस्था बहाल कर ली है। 15 साल के अन्दर ‘सवेतो’ ने रंगभेद को अशासनीय बना दिया और आपतकाल की पीढ़ी ने 1977 के बाद के राजनीतिक नेतृत्व के लिये तमाम नगीने पैदा कर दिये। युवाओं के दमन द्वारा कमाई गयी व्यवस्था दोनों देशों के लिये बहुत मँहगी साबित हुयी।
वही पैटर्न एक बार फिर आजमाया जा रहा है
इस जुलाई में संसद और जन्तर-मन्तर के चारों ओर की गलियों ने उसी प्रिज्म के तीसरे फलक से रूबरू कराया है। एक ऑनलाइन व्यंग्य से जो कुछ उपजा उसने लम्बे अर्से बाद सबसे विशाल छात्र-लामबन्दी का रूप धर लिया, जिसके मूल में वे शिकायतें हैं जो न तो बनावटी हैं और न ही अमूर्त; नीट-यूजी के लीक हुये पर्चे के कारण मेडिकल में प्रवेश के लिये एक ऐसी परीक्षा रद करनी पड़ी जिसमें 20 लाख से अधिक छात्र प्रत्याशी थे और इसके अलावा वह ऑन-स्क्रीन मार्किंग विवाद भी था जिसने हजारों छात्रों को अधर में छोड़ दिया था। जहाँ तक राज्य की प्रतिक्रिया का प्रश्न है, उसने उसी पुराने पैटर्न का इस्तेमाल किया-बैरिकेड लगाये, आँसू-गैस और बैटन चार्ज किये और संसद की ओर मार्च करते हुये सौ से ज्यादा छात्रों को घायल कर दिया और इसके अतिरिक्त सत्ता के सबसे ऊपरी सतह के अलंकृत व्याख्यानों में उनकी तुलना कीड़ों-मकोड़ों से की गयी।
इतिहास बताता है कि इसके पहले कि यह पैटर्न खुद को मुकम्मल कर ले, सरकार को तीन सबक सीख लेने चाहिये। पहला सबकः उचित शिकायत को ताकत के जरिये तितर-बितर नहीं किया जा सकता, उल्टे वह उसे संगठित ही कर देती है। ‘सवेतो’ का उभार किसी क्रान्ति के तौर पर नहीं हुआ था। इसका उदय एक भाषा- विशेष थोपने के विरोध में स्कूली बच्चों के मार्च के साथ हुआ था। उस मार्च पर गोेलीबारी ने उसे क्रान्ति बना दिया। हर मृत छात्र की तस्वीर उस आन्दोलन में नये छात्रों के भर्ती करने के विज्ञापन का पोस्टर बन गयी, निर्वासन-शिविर उन किशोरों से भर गये जो जून 1976 के बाद देश छोड़कर भाग गये थे। सत्ता के अपने ही एक कमीशन ने बाद में स्वीकार किया कि मूल शिकायत नहीं बल्कि पुलिस की प्रतिक्रिया ने उस एकमात्र प्रदर्शन को पुनर्जागरण में परिवर्तित कर दिया।
यह कोई दक्षिण-अफ्रीकी प्रविधि ही नहीं है, यह सार्वभौमिक है। जब कोई राज्य किसी विशेष सीमित-माँग का उत्तर सामान्यीकृत हिंसा से देता है तो एक नीतिगत विवाद, गरिमा के प्रश्न में बदल जाता है और गरिमा के प्रश्न पर समझौते नहीं होते। लाठी-चार्ज की अगली सुबह जब छात्र जन्तर-मन्तर पर दोबारा आ धमके और निडर होकर कैमरे का मुकाबला करने लगे तो वे ‘सवेतो’ और उसके बाद के दूसरे सैकड़ों आलेखों का ही अनुसरण कर रहे थे। वह सरकार जो उनकी वापसी को ताकत की नाकामी का सबूत मानने के बजाय दमनीय अवमानना समझ रही है, अपने ही पतन की तैयारी कर रही है।
तिरस्कार की राजनीति
दूसरा सबकः तिरस्कार, छात्रों की तुलना में राज्य की विधिसम्मतता को ही अधिक तेजी से प्रभावित करती है। औपनिवेशिक सरकार का द्वारा 1876 में की गयी गलती प्रारम्भ में नीतिगत नहीं थी। यह रोजमर्रा की एक कार्यवाही मात्र थी। परन्तु सिविल सेवा में आयु के प्रश्न को हल्के में लेने से समस्त शिक्षित पीढ़ी में यह सन्देश चला गया कि सरकार की नज़र मे उनकी महत्वाकांक्षा का कोई वजूद ही नहीं है। बनर्जी ने इस बात को समझ लिया कि लामबन्दी के हथियार के तौर पर ज़ख़्म से ज्यादा कारगर है तिरस्कार और इसी समझ के तहत ‘इंडियन एसोसियेशन’ खड़ा हो गया।
तिरस्कार के प्रति सजगता की सहज-वृत्ति आज भी जीवित है। जब भारत के मुख्य-न्यायाधीश जैसी संवैधानिक संस्थायें युवाओं के एक वर्ग को परिभाषित करने के लिये ‘पेस्ट कंट्रोल’ जैसी शब्दावली तक पहुँच जाती हैं तो वे राज की गलतियाँ ही दुहरा रही होती हैं, और उनके लिये माफी की कोई जगह नहीं है। युवाओं के ऊपर अमानवीय भाषा की बौछार किसी आन्दोलन को संकुचित नहीं करती बल्कि उसकी पहचान, उसके प्रतीकों और उसके उच्च नैतिक स्तर को एक झटके में और भी धारदार बना देती है। इस हफ्ते संसद के बाहर खड़े प्रदर्शनकारियों को यह दोष गढ़ना ही नहीं था कि राज्य उन्हें अवमानना का दोषी मानता है, सरकार ने आधिकारिक रूप से उन्हें दोषी माना है। गतिरोध दूर करने के प्रति गम्भीर सरकार को इस प्रयास का प्रारम्भ किसी रियायत से नहीं बल्कि बहुत सादा ढंग से और सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किये जाने के अभिलेखन से करना चाहिये था कि सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता उस प्रत्येक नागरिक के लिये वैध विधिक चिन्ता का विषय है जो किसी परीक्षा में बैठता है और वे लोग जो यह सवाल उठा रहे हैं, उसी परीक्षा के हितग्राही हैं, दुश्मन नहीं।
तीसरा सबक
प्रदर्शन केवल लक्षण है; रोग है अवरुद्ध उत्तरदायित्व। छात्र सड़कों पर इसलिये नहीं होते कि उन्हें आँसू गैस का मज़ा लेना है। वे ऐसा तब करते हैं जब अपनी शिकायतों के निवारण के लिये वे सारे संस्थागत दरवाजे़ खटखटा चुके होते हैं और वे खुलते ही नहीं। 1876 का ऊफान इसलिये उठा था कि भारतीयों के पास ऐसा कोई प्रतिनिधायी मंच नहीं था जहाँ सिविल सर्विसज़ के नियमों पर बहस सम्भव होती और फिर ‘इंडियन एसोसियेशन ’ही वह मंच बन गया जो उन्हे संविधान नहीं दे पा रहा था। आपातकाल में कैम्पस खामोश हो गये थे क्योंकि उत्तरदायित्व की सामान्य व्यवस्था, अदालतें, प्रेस, विधायिका सभी निलम्बित पड़ी थीं; 1977 में जब व्यवस्था बहाल हुयी तो जो परिणाम आये वे एकदम स्पष्ट थे।
जेन-जी की अगुवाई में चला शिक्षा-सुधार आन्दोलन आश्वासन नहीं क्रियान्वन- भरोसेमंद जाँच, परीक्षा-सुधार और पर्चे लीक होने की संस्थागत नाकामी का उत्तरदायित्व लिये जाने पर मुखर था। यही वे माँगें हैं जिसे कार्यशील संसदीय व्यवस्था और नियामक परीक्षण के द्वारा बिना कोई बैरिकेड लगाये पूरा कर दिया जाना चाहिये था। इसलिये इस प्रदर्शन का स्थायी जवाब भीड़ के बेहतर नियंत्रण की व्यूहरचना नहीं बल्कि उत्तरदायित्व की प्रभावशाली निर्मिति में अवस्थित है, जिसमें परीक्षा-प्राधिकारी को समुचित स्वतंत्रता प्राप्त हो, मूल्यांकन एवं पुनर्मूल्यांकन विधिक पारदर्शिता के अधीन हो, संसदीय समिति की समीक्षा के परिणाम प्रकाशित हों और उन परिणामों के प्रतिफल के लपेटे में अधिकारी भी आयें केवल कक्ष-निरीक्षक और बिचैलिये ही नहीं। जो राज्य ऐसी प्रणाली विकसित करता है वही सड़कों को महत्वहीन बना पाता है। जो राज्य ऐसी प्रणाली विकसित नहीं कर पाता उसमें सड़कें अपरिहार्य हो जाती हैं।
समुचित उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाय
यह सिर्फ तारीखों का इत्तेफाक है पर काम का भी है, कि जुलाई 2026 का कहर उसी हफ्ते में टूटा है जिसमें ‘इंडियन एसोसियेशन ’की 150वीं वर्षगाँठ पड़ती है। 1876 में सत्ताधीशों के जे़हन में यह बात आयी ही नहीं थी कि किसी परीक्षा को लेकर छात्रों की शिकायत ऐसे आन्दोलन में बदल जायेगी जो उनके शासन का अन्त कर देगा। 1976 में भारत और दक्षिण-अफ्रीका में सत्ताधीश यह सोच ही नहीं पाये थे कि जिन किशोरों को जेलों में ठूँसा जा रहा है, कल उन्हीं के हाथों में राज्य की कमान आ जायेगी। कोई सरकार कभी भी नहीं सोच पाती कि एक दिन वही पैटर्न उनपर भी लागू हो जायेगा। पैटर्न इसी तरह चलता रहता है।
जन्तर-मन्तर पर जमा युवा, सरकार का समर्पण नहीं चाहते थे। वे सिर्फ इतना चाहते थे कि सरकार जो परीक्षायें चला रही है उनमें उसकी सलाहियत सुनिश्चित हो। डेढ़ सदी के इस सबूत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जो सरकारें लोगों की सुनती हैं वही टिक पाती हैं।
लेखक दिल्ली के एक अधिवक्ता हैं और पूर्व में सांसदों के विधिक सहायक भी रह चुके हैं।
‘द हिन्दू’ दिनांक 03.08.2026 से साभार
अनुवादः दिनेश अस्थाना
फीचर फोटो: अंकुर राय

