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पुस्तक

समाजवाद के बारे में कुछ बुनियादी बातें

2005 में स्टर्लिंग से माइकेल न्यूमैन की किताब ‘सोशलिज्म: ए ब्रीफ़ इनसाइट’ का प्रकाशन हुआ । चित्रों के साथ उसका नया संस्करण 2010 में वहीं से छपा । किताब में चार अध्याय थे- समाजवादी परंपराएं, क्यूबाई साम्यवाद और स्वीडेन का सामाजिक जनवाद, नव वामपंथ तथा समाजवाद का वर्तमान और भविष्य । इन अध्यायों के अतिरिक्त किताब में आगे के अध्ययन के लिए पुस्तक सूची भी दी गई थी । बाद में इसे आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से इसे 2005 में ‘सोशलिज्म: ए वेरी शार्ट इंट्रोडक्शन’ शीर्षक से छापा गया । 2020 में इसका अद्यतन संस्करण छपा है । इस संस्करण में पांच अध्याय हैं । स्टर्लिंग वाले संस्करण के अतिरिक्त एक अध्याय समाजवाद को लेकर कठमुल्लेपन से बाहर जाकर सोचने के बारे में है ।
लेखक का कहना है कि दक्षिणपंथी अतिवाद, संकुचित राष्ट्रवाद और निरंकुश तानाशाही के वर्तमान राजनीतिक माहौल में समाजवाद के बारे में लिखना बहुत मुश्किल है फिर भी जरूरी है । उन्होंने बताया है कि सौ साल से तमाम समाजवादी यकीन करते रहे थे कि पूंजीवाद का नाश तय है और उसकी जगह समाजवाद आयेगा । इसके उलट हुआ यह कि पूंजीवाद विजयी नजर आ रहा है और बहुतेरे लोगों को लग रहा है कि बचा खुचा समाजवाद इस सदी में पूरी तरह से खत्म हो जायेगा । लेखक को इस मान्यता पर आपत्ति है और वे समाजवाद को वर्तमान के लिए भी प्रासंगिक मानते हैं । उनको आशा है कि उनकी किताब से पाठक को सही फैसला लेने में मदद मिलेगी ।
उनके मुताबिक सबसे पहले सवाल उठता है कि समाजवाद है क्या । इसके समर्थक और विरोधी इसका मतलब स्वत:स्पष्ट मानते हैं फिर भी यह उतना स्पष्ट है नहीं । मसलन एक समय लेनिन ने इसे सोवियत सत्ता और विद्युतीकरण का मेल कहा था । रूस की परम्परा से नाखुश पश्चिम के तमाम लोग इसे लेबर पार्टी की नीतियों से जोड़कर देखते हैं । इसकी धारणा में इतनी विविधता है कि इसे कुछ लोग केंद्रवादी तो कुछ स्थानीयतावादी, कुछ ऊपर से संगठित तो कुछ नीचे से निर्मित, कुछ आदर्श तो कुछ व्यावहारिक, कुछ क्रांतिकारी तो कुछ सुधारवादी मानते हैं । इसे राज्य विरोधी और राज्यवादी, अंतर्राष्ट्रीयतावादी और राष्ट्रवादी, राजनीतिक पार्टी समर्थक और विरोधी, ट्रेड यूनियन पर निर्भर और उससे स्वतंत्र, धनी उद्योगीकृत देशों लायक और गरीब किसान समुदायों से संबद्ध, स्त्री विरोधी और नारीवादी, विकासवादी और पर्यावरणवादी- संक्षेप में सब कुछ बताया जाता है ।
इन सबसे बचने के लिए लेखक ने समाजवाद की कुछ बुनियादी विशेषताओं को चिन्हित किया है । सबसे पहले उन्होंने इसको समतामूलक समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध माना है । इस समता के स्तर और उसे हासिल करने के उपायों के बारे में जो भी मतभेद हों, लेकिन कोई भी समाजवादी संपत्ति और सत्ता की वर्तमान विषमता का पक्ष नहीं लेगा । समाजवादी लोग यह मानते हैं कि पूंजीवाद के तहत समाज के एक हिस्से के लोगों को पूंजी और संपदा की विरासत हासिल होने के चलते विशेषाधिकार और अवसर उपलब्ध होते हैं, जबकि दूसरे हिस्से के लोगों की वंचना के चलते उन्हें उपलब्ध अवसर और उनका प्रभाव सीमित हो जाते हैं । इसीलिए सभी समाजवादी किसी न किसी हद तक पूंजीवादी संपत्ति संबंधों का विरोध करते हैं और ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते हैं जिसमें ढांचागत विषमताओं पर आधारित बाधा का सामना किये बगैर सबके विकास की सम्भावना खुली हो । इस समाज को बनाने के तरीके के मामले में भी उन सबमें इस बात पर सहमति है कि इसका निर्माण सहकार और एकजुटता के मूल्यों के आधार पर होगा । यह बात समाजवाद के तीसरे अभिलक्षण से जुड़ी है ।
मानव जाति के बेहतर भविष्य और आपसी सहकार की उसकी क्षमता में उम्मीद भी समाजवादी सोच का अंग है । नये समाज के निर्माण के लिए इस उम्मीद और उसकी जरूरत की मात्रा के मामले में मतभेद हो सकते हैं । जो लोग कानून जनित ऊंच नीच से मुक्त स्वशासी समुदायों की स्थापना करना चाहते हैं उनके लिए मानव स्वभाव की अच्छाई में भरोसे का भारी महत्व है । यह तो सही है कि फ़ासीवाद के उभार के बाद बुनियादी मानव स्वभाव पर उनका भरोसा टूटा है इसके बावजूद समाजवादी लोग निजी स्वार्थ और होड़ को बुनियादी मानव स्वभाव बताने का हमेशा विरोध करते हैं । इन चीजों को वे पूंजीवादी समाज की ही विशेषता मानते हैं और समझते हैं कि पूंजीवाद के खात्मे के बाद ये भी खत्म हो जायेंगे । इसके अतिरिक्त अधिकांश समाजवादी मानते हैं कि सचेत मानव प्रयास के जरिए दुनिया में बड़े बदलाव लाये जा सकते हैं । यह सच है कि मार्क्स के बहुतेरे व्याख्याताओं ने आर्थिक निर्धारण पर इतना जोर दिया है कि बदलाव लाने में मनुष्य की भूमिका समझने में मुश्किल पेश आती है । इसके बावजूद समाजवादियों ने मौजूदा हालात के सामने कभी समर्पण नहीं किया । वे मानते हैं कि मनुष्य के हालात को तय करने में भाग्य, परम्परा या धर्म का कोई योगदान नहीं होता ।
इन खासियतों के आधार पर समाजवाद को अन्य विचारों से अलगाया जा सकता है । इसका मतलब यह नहीं कि उसके भीतर विविधता नहीं है । असल में आधुनिक समाजवाद का जन्म तो उन्नीसवीं सदी के यूरोप में हुआ लेकिन बाद में उसे तमाम किस्म के समाजों के अनुरूप ढाला गया । रूस में 1917 की अक्टूबर क्रांति के बाद कम्युनिज्म के उभार के चलते खास तरह के समाजवाद का उदय हुआ और इससे यूरोपीय देशों के उपनिवेशों में स्वाधीनता के लिए संघर्षरत लोगों को भारी प्रेरणा मिली । जब इन राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलनों का स्पर्श उसे मिला तो इस प्रक्रिया में खुद कम्युनिस्ट आंदोलन को भी कई रूप मिले । 1949 में चीन की सत्ता पर कब्जा करने से बहुत पहले ही दीख गया था कि माओ ने उसके साथ किसानों को जोड़ने का नया पहलू विकसित किया है । इसी तरह उत्तरी कोरिया और वियतनाम के कम्युनिस्ट आंदोलन की विशेष स्थिति के कारण वहां भी अलग किस्म का समाजवाद पैदा हुआ । उनकी विशेष स्थिति का कारण बहुत हद तक गृहयुद्ध, राष्ट्रीय मुक्ति और उसके बाद का अमेरिकी हस्तक्षेप था ।
कुछ और किस्म के समाजवाद भी देखने में आये । 1948 में इजरायल की स्थापना से बहुत पहले यहूदी लोगों ने किबुत्ज़ आंदोलन के जरिए लघु सहकारी समुदायों का प्रयोग किया था । 1950 के बाद मिस्र के नेतृत्व में आधुनिकता और राष्ट्रवाद के साथ धर्मनिरपेक्ष समाजवाद जैसी चीज का प्रयोग अरब मुल्कों में किया गया । इसी तरह उत्तर औपनिवेशिक अफ़्रीका में, खासकर घाना और तंजानिया में स्थानीय परम्पराओं के साथ समाजवाद का मेल कराने की कोशिश हुई । लैटिन अमेरिका में भी इसी तरह के भांति भांति के प्रयोग किये गये लेकिन अमेरिकी महाशक्ति के हस्तक्षेप के चलते क्यूबा को छोड़कर शेष प्रयोग पराजित हुए ।
लेखक को इस बात का अफसोस है कि समाजवाद की इस भारी विविधता को वे पूरी तरह से इस छोटी किताब में व्याख्यायित नहीं कर पाये । फिर भी जिस हद तक उन्होंने उसके बुनियादी तत्वों को उभारा है उससे उनको उम्मीद है कि इस समय भी समाजवाद की सोच से नौजवानों को प्रेरणा मिलेगी । कहा जा सकता है कि उनकी उम्मीद आधारहीन नहीं है क्योंकि अमेरिका में फिलहाल समाजवाद के प्रति प्रचंड आकर्षण दिखाई दे रहा है और वहां भी इसका एक नया रूप तैयार करने की कोशिश हो रही है । साफ है कि यह गुंजाइश भी समाजवाद की इस विविधता के इतिहास से पैदा हुई है ।

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