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प्रेमचंद साहित्य में दलित विमर्श: प्रो. चमनलाल

प्रो. चमनलाल


प्रेमचंद के दलित विमर्श को लेकर हिन्दी लेखकों में काफी विवाद है। प्रेमचंद के जीवनकाल के दौरान भी उनके साहित्य को लेकर विवाद उठते रहते थे। उनके जीवनकाल में ही उन्हें ‘घृणा का प्रचारक’, ‘ब्राह्मण विरोधी’, ‘प्रचारवादी’, विदेशी साहित्य का नकलची इत्यादि कहा गया।

इस सारे दुष्प्रचार का जवाब प्रेमचंद ने तो अधिक नहीं दिया, लेकिन उनके प्रशंसक बालकृष्ण शर्मा नवीन ने कहा था कि प्रेमचंद के निंदक मर जाएंगे, लेकिन प्रेमचंद जीवित रहेंगे।

आज कौन पं. ज्योतिप्रसाद निर्मल या ठाकुर श्रीनाथ सिंह या ऐसे कुछ और लोगों का नाम जानता है, जिन्होंने प्रेमचंद के जीवनकाल में उनपर बहुत नीचे स्तर पर आक्रमण किए थे। लेकिन प्रेमचंद पर आक्रमणों का सिलसिला पूरी तरह खत्म कभी नहीं हुआ।

प्रेमचंद के देहांत के 65-70 साल बाद उनके बहुचर्चित उपन्यास ‘रंगभूमि’ को सार्वजनिक रूप से जलाया गया और उन्हें ‘दलित विरोधी’ कहा गया।

हाल में उन्हें ‘सामंत का मुंशी और ‘जारकर्म का दोषी’ करार दिया गया। कुछ वर्ष पूर्व उन्हें ‘सूदखोर’ आदि उपाधियों से विभूषित किया गया था। इन सब आरोपों के साथ एक प्रेमचंद को या तो साहित्य से खारिज करने की या उनका कद कम करने की कोशिश की जाती है तो दूसरी ओर उन्हें बेहद गरीब, बेचारा मास्टर, लेकिन जनता का महान लेखक सितारा आदि रूप में संकल्पित किया जाता है।

1980 में यदि उनकी जन्मशती पर ढेरों कार्यक्रम हुए तो 25 बरस बाद अब उनकी सवा सौंवी जयंती पर देशभर में कार्यक्रम हो रहे हैं।

प्रेमचंद के प्रति दोनों ओर से यह अतिवादी दृष्टिकोण है। स्वयं प्रेमचंद को अपनी चाटुकारिता पसंद न थी। कई जगह पर उन्होंने लिखा है कि उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ आदि उपाधियों की जरा भी इच्छा नहीं है, इस तरह की उपाधियां देने का उन्होंने हमेशा जोरदार विरोध किया और जीवन और साहित्य में वस्तुगत और संतुलित नजरिया अपनाने पर जोर दिया।

प्रेमचंद ने अपने जीवन में संतुलित नजरिया अपनाने का भरसक प्रयत्न किया और उनका दलित विमर्श इसी संतुलित और वस्तुगत दृष्टिकोण का परिचायक है।

किसी भी लेखक में किसी तरह के विमर्श को देखने समझने के लिए दो-तीन आधार है । सबसे बड़ा और प्रमुख आधार है उसका लेखन सृजनात्मक व चिंतनपरक दोनों, लेकिन मुख्य तौर पर सृजनात्मक।

दूसरा आधार है उसका अपना जीवन व्यवहार। जीवन व्यवहार के स्तर पर भारत के ही नहीं; दुनिया के लेखकों के जीवन में भी अन्तर्विरोध मिलेंगे।

लेखकों में सोचने लिखने और स्वयं अपने जीवन में उस सोच को अपनाने के स्तर पर अनेक अन्तर्विरोध मिलेंगे। लेखकों में सोचने लिखने और स्वयं अपने जीवन में उस सोच को अपनाने के स्तर पर अनेक अन्तर्विरोध उभर आते हैं।

लेखक के अपने जीवन और उसके लेखन के जीवन में जश्मीन आसमान का फर्क है। एक लेखक का जीवन लगभग सौ वर्ष में सिमट जाता है, लेकिन उसके लेखन का जीवन, दशकों, सदियों व कई बार सहस्राब्दियों तक भी चल सकता है और प्रेमचंद के लेखन का जीवन उनके व्यक्ति जीवन के प्रति तमाम तरह की प्रतिक्रियाओं के बावजूद, काफी दीर्घकालीन रहेगा।

लेखक के व्यक्तिगत जीवन संबंधी प्रमाणिकता की तलाश उनके जीवनकाल में ही अधिक सार्थक होती है। लेखक के देहांत के बाद उसके जीवन की घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं एक हद तक निरर्थक प्रयास होते हैं या ज्यादा से ज्यादा उनका महत्व एकेडमिक स्तर तक सीमित होता है।

अब यदि प्रेमचंद पर जारकर्म के आरोप लगाए भी जाएं तो दुनिया की कोई भी अदालत मृत व्यक्ति पर मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं देती और जब तक किसी व्यक्ति पर लगे आरोपों की किसी न्यायिक अदालत द्वारा पुष्टि न कर दी जाए, तब तक उन आरोपों का अपराधी उन्हें नहीं घोषित किया जा सकता।

हां, लेखक का लेखन हमेशा पाठकों/आलोचकों की कचहरी में पड़ताल के लिए उपलब्ध रहता है और वह एक ऐसी प्रमाणिक सामग्री है, जिससे जीवित या मृत लेखक किसी भी तरह मुनकर नहीं हो सकता, केवल उस सामग्री की व्याख्या से जीवित अवस्था में वह अपनी सहमति/असहमति व्यक्त कर सकता है।

तो वस्तुगत स्तर पर प्रेमचंद के किसी भी विमर्श को उनके जीवन से नहीं उनके लेखन से व्याख्यायित किया जाना जरूरी भी है और सही तथा वस्तुगत भी।

उनके जीवन में बार-बार झांकना कई बार अपनी ही दृष्टि की सीमाओं को जगजाहिर करना सिद्ध हो जाता है। अतः प्रेमचंद का जीवन जैसा भी था और प्रायः वह अपने लेखन के काफी हद तक अनुरूप ही था, उनके लेखन को ही उनके दलित विमर्श को समझने का आधार बनाया जाएगा और जैसे उनके अपने जीवन में अन्तर्विरोध थे, कुछ कुछ वैसे ही अन्तर्विरोध उनके लेखन में भी नजर आते हैं, जिनपर इस आलेख में ध्यान आकर्षित किया जाएगा।

प्रेमचंद ने करीब साढ़े तीन दशक के अपने लेखन काल में विपुल मात्रा में साहित्य रचा है, जिसमें सृजनात्मक और चिंतनपरक दोनों तरह का साहित्य शामिल है। उनके लेखन में करीब पन्द्रह उपन्यास, ढाई सौ के करीब कहानियां, तीन नाटक, कुछ बच्चों के लिए लेखन के अतिरिक्त अनुवाद अहंकार (अनातोले फ्रांस), गाल्सवर्दी के तीन नाटक, फिसानाए आज़ाद का लिप्यंतरण (आजाद कथा) के साथ-साथ ‘विविध प्रसंग’ के तीन खंडों में आठ सौ के करीब लेख, टिप्पणियां व समीक्षाएं तथा चिट्ठी पत्रा’ को दो भागों में पांच सौ साठ से ऊपर पत्र शामिल हैं।

दुलारे लाल भागर्व व कुछ अन्य व्यक्तियों से भी उनके पत्र मिल जाते तो यह संख्या हज़ार का आंकड़ा पार कर जाती। प्रेमचंद के जीवन व लेखन पर ढेरों किताबें, हिन्दी और उर्दू में छप चुकी है व छप रही है लेकिन उनका जीवनवृत जानने के लिए उनके अपने ‘जीवनसार’ या मेरी पहली रचना के इलावा उनकी पत्नी शिवरानी देवी रचित ‘प्रेमचंद घर में’, पुत्र अमृत राय रचित ‘कलम का सिपाही’ व मदन गोपाल रचित ‘कलम का मजदूर’ ही ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

अमृतराय और मदन गोपाल ने लगभग साथ ही साथ प्रेमचंद की जीवनी लिखी और दोनों ही जीवनियों में विवरण का अद्भुत साम्य मिलता है। लेकिन मदन गोपाल की जीवनी में श्रद्धा कम, तथ्यों व घटनाओं का विवरण अधिक वस्तुगत है।
प्रेमचंद के इस विपुल साहित्य में से उनके सृजनात्मक साहित्य में अभिव्यक्त दलित विमर्श से ही हिन्दी में अधिकांश विवाद पैदा हुए हैं। जैसे उनकी ‘कफन’ कहानी पर ‘दलित विरोधी’ होने का आरोप लगने से कही पहले हंसराज रहबर ने इस पर प्रगतिवाद विरोधी कहानी होने का आरोप लगा दिया था। दलित साहित्य पर पिछले एक दशक से शुरू हुई चर्चा में ‘कफन’ को ‘दलित विरोधी’ कहानी कहा गया।

‘रंगभूमि’ उपन्यास की उसके छपने से लेकर भारतीय दलित साहितय अकादमी द्वारा 2004 में सार्वजनिक रूप से उसकी प्रतियां जलाए जाने तक प्रायः प्रशंसा ही हुई है।

प्रेमचंद के जीवन काल में तो ‘रंगभूमि’ को ही प्रेमचंद का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता रहा, ‘गोदान’ से भी बढ़ कर। प्रेमचंद के देहांत के बाद ‘गोदान’ को उनकी ही नहीं, हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ (शायद उर्दू की भी) औपन्यासिक रचना माना गया। साथ ही ‘कर्मभूमि’, ‘प्रेमाश्रम’, ‘रंगभूमि’, व सेवासदन भी अन्य उपन्यासों की अपेक्षा अधिक चर्चा में रहे।

‘रंगभूमि’ की प्रशंसा में उसके साहित्यक गुणों के साथ साथ पहली बार एक दलित को उपन्यास का नायक बनाने को भी सराहनीय समझा गया, लेकिन उपन्यास छपने के करीब अस्सी वर्ष बाद दलित नायकत्व स्थापित करने वाले उपन्यास को इस आधार पर ‘दलित विरोधी’ कहा गया कि उसमें सूरदास का उल्लेख, जातिवाचक नाम के साथ किया गया है। और इसे हाल में बने उस कानून का उल्लंघन बताया गया, जिसके अनुसार किसी व्यक्ति को अपमानित करने के लिए उसकी जाति का उल्लेख नहीं किया जा सकता।

इस कानून का सन्दर्भ उच्च जाति से संबंधित उन वर्चस्ववादी वर्गों जैसे जमींदार, कारखानेदार, बड़े अफसर आदि का है, जो अपने यहां काम करने वाले मजदूरों या मातहतों को उनकी जाति का नाम लेकर अपमानित करते हैं, जिनका बड़ा मार्मिक वर्णन ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ में मिलता है।

लेकिन ‘रंगभूमि’ के किसी भी पाठक या आलोचक को उसमें प्रेमचंद द्वारा अपने किसी पात्र को इस ऐसे नज़रिए से पेश करने की गवाही नहीं मिल सकती।

‘रंगभूमि’ के नायक सूरदास की जाति चमार होने का स्पष्ट उल्लेख करके भी प्रेमचंद ने उसे इतना सम्मानीय पात्र बनाया है कि तथाकथित ऊंची जातियों के लोग उसकी कुर्बानी के सामने बौने नज़र आते है और उसकी कीर्ति से स्पृहा करते हैं।

इसी प्रकार प्रेमचंद के सर्वश्रेष्ठ उपन्यास ‘गोदान’ के बहुचर्चित सिलिया मातादीन प्रसंग में भी जिस आक्रामक ढंग से मातादीन के मुंह में हड्डी डालकर उसे चमार बनाया जाता है और कैसे पं. दातादीन को चमारिन स्त्री सिलिया को उसके पुत्र द्वारा भोग्या समझे जाने पर दंडित किया जाता है, इससे भी प्रेमचंद का अक्स दलित विरोधी का न होकर काफी सशक्त दलित समर्थक का ही उभरता हे।

उपन्यास की अन्य प्रमुख पात्र कुर्मी स्त्री धनिया का किरदार भी प्रेमंचद ने ऐसी प्रखर और जागरूक स्त्री के रूप में चित्रित किया है कि उपन्यास के सभी पुरुष पात्र उसके सामने छोटे लगने लगते हैं।

‘कर्मभूमि’ उपन्यास में तो प्रेमचंद ने दलितों के लिए अत्यंत संवेदनशील मुद्दे मंदिर प्रवेश की ही समस्या नहीं उठाई, बल्कि दलित कर्म के संगठित होकर संघर्ष करने का भी विसतार से चित्राण किया है। ‘कर्मभूमि’ में दलित समस्याओं व संघर्षों का चित्राण व्यापक रूप में किया गया है।

‘प्रेमाश्रम’ में अछूतों से बेगार लिए जाने व किसानों द्वारा भी उनसे अच्छा व्यवहार न किए जाने का चित्राण हुआ है। ‘कायाकल्प’ में भी दलितों द्वारा बेगार करवाए जाने की प्रथा के प्रतिरोध के स्वर मुखरित हुए हैं। ‘कायाकल्प’ में प्रेमचंद पहली बार चमारों के लिए मजदूर शब्द का भी इस्तेमाल करते हैं।
‘गबन’ उपन्यास में प्रेमचंद ने देवीदीन खटीक के पात्र रूप में राष्ट्रीय आंदोलन में दलितों के योगदान को रेखांकित किया है। ‘गबन’ के दलित पात्र अपने को निम्न जाति न समझ कर अपने जाति गौरव का भी परिचय देते हैं।
इस आलेख में प्रेमचंद के चिंतनपरक लेखन में दलित विमर्श पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया गया है, लेकिन उनके कथा-साहित्य पर संक्षेप में इसलिए विचार किया गया है कि प्रेमचंद के दलित विमर्श संबंधी अभी तक उनके सृजनात्मक साहित्य को केन्द्र में रख कर ही चर्चा अधिक हुई है। उपन्यासों के अतिरिक्त दलित जीवन को मार्मिक रूप से चित्रित करने वाली प्रेमचंद की करीब पचास कहानियों में से अधिक चर्चित कहानियां हैं । ‘सद्गति’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘मंदिर’, ‘मंत्र’, ‘घासवाली’, ‘सवा सेर गेहूँँ’, ‘शूद्र’, ‘कफन’, ‘देवी’, आदि। ‘कफन’ को यद्यपि दलित विरोधी या प्रगतिवाद विरोधी कहा गया है, लेकिन कहानी के वस्तुगत ढंग से अध्ययन से ऐसी कोई लेखकीय भावना नजर नहीं आती। ‘कफन’ कहानी में बल्कि एक रूपक के ज़रिए वर्चस्ववादी या शोषक वर्गों द्वारा गरीब व दलित वर्गों के क्रूर शोषणका वर्णन कथित निठल्ले पात्रों द्वारा करवाया गया है।

ऐसे पात्रा गोर्की व लूशुन की कहानियों में भी मिलते हैं और वहां भी गोर्की व लूशुन की लेखकीय संवेदना अपने ऐसे ही चोर या निठल्ले पात्रों से ही जुड़ी होती है।
सृजानात्मक साहित्य में दलित पात्रों के चित्राण के साथ साथ प्रेमचंद ने ‘ज़माना’, ‘मर्यादा’, ‘माधुरी’, ‘हंस’ और ‘जागरण’ आदि पत्रा-पत्रिकाओं में समय-समय पर संपादकीयों या अन्य लेख व टिप्पणियों के रूप में भारतीय समाज में व्याप्त दलित समस्या पर गंभीरता से चिंतन किया है।

1933 में ‘हंस’ के एक अंक के मुखपृष्ठ पर प्रेमचंद ने डॉ. अंबेडकर का चित्रा भी छापा, जो उन दिनों काफी बड़ी बात थी। विविध प्रसंग के तीन खंडों में से दूसरे खंड में ‘छूत अछूत’ शीर्षक से प्रेमचंद के 27 लेख या टिप्पणियां संकलित है। इसी खंड में ‘राष्ट्रीय रंगमंच स्वाधीनता संग्राम’ शीर्षक से संकलित लेखों में ‘अछूतपन मिटता जा रहा है’, में भी प्रेमचंद का दलित विमर्श अभिव्यक्त हुआ है। खंड एक में ‘पुराना जमाना नया जमाना तथा खंड तीन में ‘जीवन और साहित्य में घृणा का स्थान’, जातिभेद मिटाने की एक योजना’, ‘हिन्दू समाज के बीभत्स दृश्य’ (1-3) में भी प्रेमचंद का दलित विषयक चिंतन उभर कर सामने आया है।
प्रेमचंद के चिंतनपरक इन तीस से अधिक लेखों/टिप्पणियों द्वारा प्रेमचंद का दलित चंतन भी स्पष्ट देखा जा सकेगा, साथ ही इस बात को भी देखा जा सकेगा कि प्रेमचंद के कथा साहित्य में दलित जीवन या पात्रों का जैसा चित्राण हुआ है, वह उनके इन लेखों के चिंतन का ही प्रतिरूप है या उससे कुछ अलग है।

फरवरी 1919 के ‘ज़माना’ (उर्दू) में प्रकाशित ‘पुराना ज़मानाः नया ज़माना’ लेख में प्रेमचंद ने दलित समस्या की ओर प्रत्यक्ष ध्यान तो नहीं दिलाया है, लेकिन रूस की अक्टूबर 1917 की क्रांति की प्रशंसा करके किसान मजदूरों की दशा की ओर ध्यान दिलाकर अपने चिंतन के जनतांत्रिक तत्व को अवश्य रेखांकित कर दिया
‘क्या यह शर्म की बात नहीं कि जिस देश में नव्वे फीसदी आबादी किसानों की हो, उस देश में कोई किसान सभा, कोई किसानों की भलाई का आंदोलन, कोई खेती का विद्यालय, किसानों की भलाई का कोई व्यवस्थित प्रयत्न न हो। आने वाला ज़माना अब किसानों और मज़दूरों का है।दुनिया की रफ्तार इसका साफ सबूत दे रही है। हिन्दुस्तान इस हवा से बेअसर नहीं रह सकता। (विविध प्रसंग भाग एक, पृ. 268, 1962 संस्करण)

‘विविध प्रसंग’ भाग तीन में संकलित प्रेमचंद के बहुचर्चित निबंध ‘जीवन और साहित्य में घृणा का स्थान’ में 1933 में लिखा कि उन पर उनकी रचनाओं में ब्राह्मणों के प्रति घृणा के प्रचार का आरोप है।

इस आरोप को नकारते हुए प्रेमचंद ने स्पष्ट किया कि ‘नवीन साहित्य समाज का खून चूसने वालों, रंगे सियारों, हथकंडेबाजों और जनता के अज्ञान से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वालों के विरूद्ध उतने ही ज़ोर से आवाज उठा रहा है और दीनों, दलितों, अन्याय के हाथ सताये हुओं के प्रति उतने ही जोर से सहानुभूति उत्पन्न करने का प्रयत्न कर रहा है।

प्रेमचंद की दलित वर्ग के प्रति चिंता वास्तव में जनतांत्रिक विचारों से ओत-प्रोत है। फरवरी 1934 में लिखी टिप्पणी ‘जातिभेद मिटाने की एक योना में भी प्रेमचंद बड़े व्यंग्य से पूछते हैं.
‘‘क्या, हम पहले कायस्थ या ब्राह्मण या वैश्य हैं, पीछे आदमी। किसी से मिलते ही एक पहला सवाल यही करते हैं कि आप कौन साहब है। ग्रामीणों में भी यही प्रश्न पूछा जाता है कौन ठाकुर? और हम कितने गर्व से अपने को शर्मा, वर्मा, तिवारी, चतुर्वेदी लिखते हैं कि क्या पूछना?

यह इसके सिवा क्या है कि भेदभाव हमारे रक्त में सन मया है और हममें जो पक्के राष्ट्रवादी है, वे भी अपनी सांप्रदायिकता का बिगुल बजाकर फूले नहीं समाते, वरना उसकी जरूरत ही क्या है कि हम अपने को चतुर्वेदी या त्रिवेदी कहें। खासकर उस दशा में कि हमने वेद की सूरत भी नहीं देखी और इसमें भी संदेह है कि हमारे पूर्वजों ने भी कभी इसके दर्शन किए थे।’’
विविध प्रसंग के इसी खंड में प्रेमचंद ने तीन भागों में लेख शृंखला लिखीµहिन्दू समाज के वीभत्स दृश्य। मार्च-अप्रैल 1934 में लिखी इस शृंखला के पहले भाग में हिन्दू समाज में लाश की कैसे दुर्गति की जाती है, इस पर विस्तार से चर्चा की है, दूसरे भाग में अंधविश्वासों की, जिसके चलते तीर्थस्थान ‘ठगों के अड्डे और पाखंडियों के अखाड़ें बन गए हैं और तीसरे भाग में मंदिरों की भीतरी दुर्दशा के चित्रा खींचे गए हैं. जितनी तीखी भाषा में प्रेमचंद ने इस कटु यर्थाथ को व्यक्त किया है वैसा किसी दलित पृष्ठभूमि में लेखक ने भी नहीं किया होगाा.

‘‘इन मंदिरों की आड़ में आज बड़े-बड़े लल्जाजनक कृत्य हो रहे हैं। पुजारियों का, महंतों का और धर्मगुरूओं का जीवन भयानक विलासित से भरा हुआ है। वे मंदिरों की आड़ में जघन्य से जघन्य कर्म करते नहीं शर्माते। ईश्वर को गाना सुनाकर खुश रखने के लिए उन्हें वेश्याएं चाहिएं। इस बहाने वे अपने राक्षसी कामना को पूरी करते और अपने जीवन को विलास-वासना और पतन के गहरे गढ़े में डाल देते हैं।

जिस पर भी हिन्दू समाज के लिए वे पूज्य हैं, माननीय हैं और देवता तुल्य हैं, क्योंकि वे पुजारी हैं, महन्त हैं और धर्मगुरू हैं ।’’
‘विविध प्रसंग खंड दो’ में दलित प्रश्न पर अधिक विचार मिलते हैं और ये विचार गांधी और गांधीवाद से प्रभावित हैं। मई 1932 की छोटी से टिप्पणी ‘अछूतपन मिटता जा रहा है’ में प्रेमचंद ने कहा।

‘जाति के बंधन इन कल कारखानों के युग में बहुत दिन तक नहीं रह सकते। महात्मा गांधी अछूतों की लड़ाई लड़ रहे हैं और इस काम में उन्हें कितने ही सज्जनों का सहयोग मिल रहा है। आधी कठिनाई इसलिए बढ़ गई है कि अछूत स्वयं अपने को नीच समझता है और ऊंची जातियों से दूर रहना ही अपना धर्म समझता है। (पृ. 93)

इस टिप्पणी की पहली पंक्ति सैद्धान्तिक रूप में सही है, लेकिन कल कारखाने लगने के सौ से ज्यादा साल बाद तक अभी व्यवहारिक रूप में सही सिद्ध नहीं हो पाई है। अंत में अछूतों द्वारा स्वयं को नीचा समझा जाने की वृति तो ब्राह्मण वर्ग ने मनुस्मृति’ आदि ग्रंथों द्वारा उनके दिमाग में कूट-कूट कर भरी है, उस विषैली व खुद की दुश्मन वृति से अब वे मुक्त हो रहे हैं और इससे मुक्त होने में भूमिका गांधी की न होकर डॉ. अंबेडकर व उनके चिंतन की है, जिससे प्रेमचंद अभी कुछ दूर ही थे।

छूत-अछूत शीर्षक से संकलित 27 लेख भी 1932-34 के बीच ही लिखे गए हैं, वास्तव में इन लेखों से प्रेमचंद का दलित विमर्श अधिक साफ तरीके से उभरा है।
‘छूत-अछूत’ शीर्षक से पहला लेख ‘महान तप’ है, जिसमें महात्मा गांधी द्वारा दिसंबर 1932 में यरवदा जेल में दलितों के लिए पृथक निर्वाचन के विरोध में भूख हड़ताल शुरू किए जाने का संदर्भ है। 19 दिसंबर 1932 को छपे इस लेख में महात्मा गांधी के प्रति प्रेमचंद की श्रद्धा छलक-छलक पड़ती है ‘धन्य हो महात्मा!

राष्ट्र की सेवा में तुम पहले ही अपना सर्वस्व अर्पण कर चुके थे। एक प्राण रह गया था। उसे भी राष्ट्र को ही भेंट करने जा रहे हो।’ (विविध प्रसंग, भाग दो, पृ. 437, 1962 संस्करण)
‘हम स्वीकार करते हैं कि शूद्रों के साथ हमने अन्याय किया है। हमने उन्हें भी भर कर रौंदा, कुचला, दला। इस अन्याय ने जिस हृदय को सबसे ज्यादा दुखी किया है, वह उसी तपस्वी का हृदय है जिसने अपना जीवन दलित भाईयों की सेवा में ही व्यतीत किया है (वही पृ. 438)। प्रेमचंद इस लेख में पूरे तौर पर गांधी के विचारों का समर्थन करते हैं और दलित वर्ग या समुदाय को हिन्दू समाज का ही अंग मानते हैं। ‘उनके देवता वही है, जो सब हिन्दुओं के हैं। आदर्श वही हैं दृष्टिकोण वही हैं। हिन्दुत्व उनके अणु अणु में भरा हुआ है। (पृ. 439, वही)
26 सितंबर 1932 को प्रकाशित अपने लेख ‘हमारा कर्तव्य’ में प्रेमचंद सम्मिलित निर्वाचन संबंधी गांधी-अंबेडकर समझौते का स्वागत करते हैं व गांधी जी के सात दिन के उपवास से हासिल इस समझौते को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बताते हुए ब्रिटिश राजनीतिज्ञों द्वारा ‘महान कौटिल्य के सीमेंट से तैयार’ उस दीवार को ध्वस्त करना बताते हैं जो ‘हिन्दू अछूतों को अलग करने के लिए बनाई थी।

इस लेख में वे अपने पाठकों को गांधी का यह वचन भी याद दिलाते हैं।
‘अस्पृश्यता या छुआछूत अगर हिन्दू धर्म में हो तो मुझे कहना पड़ेगा कि उसमें शैतानियता भरी हुई है, धर्म नहीं,। पर मेरा दृढ़ विश्वास है कि हिन्दू धर्म में यह सब कुछ नहीं है।’ (पृ. 442)
इन दोनों लेखों से स्पष्ट है कि दलित संबंधी चिंतन में प्रेमचंद डॉ. अंबेडकर से अधिक महात्मा गांधी से प्रभावित थे,। 14 नवम्बर 1932 को ‘हरिजनों के मंदिर प्रवेश का प्रश्न’ विषय पर प्रेमचंद चिंता व्यक्त करते हैं कि उस समय के इस सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का हल यदि जल्द न किया गया तो ‘महात्मा जी फिर न अनशन शुरू कर दें।’ 21 नवंबर 1932 को इसी विषय पर प्रकाशित अपने लेख में प्रेमचंद ने बनारस के तथाकथित ‘वर्णाश्रम स्वराज्य संघ’ के अछूतों के मंदिर प्रवेश के विरोध के आंदोलन की जमकर खबर ली है, जिसके ‘फीटन आरोही मार्तण्डों में एक पुरी के श्री 108 शंकराचार्य भी थे। इस लेख में हिन्दू धर्म नेताओं में व्याप्त पाखंड की प्रेमचंद ने धज्जियां उड़ाई है।‘अछूत के पैसे तो आप बेधड़क ले लेते हैं अछूत कोई मंदिर बनावे, आप दलबल के साथ जाएंगे, मंदिर में देवता की स्थापना करेगे, तर माल खाएंगे, हां अछूत ने उसे छुआ न हो। दक्षिणा लेंगें, इसमें कोई हर्ज नहीं, न होना चाहिए। लेकिन अछूत मंदिर में नहीं जा सकता, उसने देवता अपवित्रा हो जाएंगे। (पृ. 448 वही)

पाखंडी ब्राह्मणों की खबर लेते हुए प्रेमचंद ने इसी लेख में आगे लिखाµ‘इसी काशी में हजारों मदसेवी ब्राह्मण और वह भी तिलकधारी निकल आएंगे।, फिर भी वे ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणों के घरों में चमारियां हैं, फिर भ्ज्ञी उनके ब्राह्मणत्व में बाधा नहीं आती, किन्तु अछूत नित्य स्नान करता हो, कितना ही आचारवान हो, वह मंदिर में नहीं जा सकता। क्या इसी नीति पर हिन्दू धर्म स्थिर रह सकता है? (पृ. 449, वही) इन्हीं वर्षों में डॉ. अंबेडकर ने घोषणा की थी कि उनका जन्म तो उनके वश में नहीं था, लेकिन वे एक हिन्दू के रूप में कभी नहीं मरेंगे और मृत्यु से दो महीने से कम समय पहले, लेकिन इस घोषणा के बीस वर्ष बाद 14 अक्टूबर 1956 को डॉ. अंबेडकर ने अकेले नहीं, अपने लाखों श्रद्धालुओं के साथ हिन्दू धर्म का त्याग करके बौद्ध धर्म में दीक्षा ली।

डॉ. अंबेडकर ने हिन्दू धर्म में सुधार का बीस वर्ष तक इंतज़ार किया, लेकिन देश की आजादी के दस वर्ष बाद तक भी जब हिन्दू धर्म में सुधार होता उन्हें नज़र नहीं आया और अपनी सन्निकट मृत्यु के दरपेश उन्होंने अपना सार्वजनिक रूप से दिया वचन निभाया और भारत के दलित वर्ग के सामने भी नया पथ खोला, दुर्भाग्य से जिस पथ पर डॉ. अंबेडकर के नाम लेवा दलित नेता भी नहीं चले।
5 दिसंबर 1932 को प्रकाशित अढ़ाई पंक्तियों की टिप्पणी में प्रेमचंद ने नागपुर में हरिजन बालकों के लिए अलग छात्रावास बनाने का विरोध किया, क्योंकि इससे ‘अछूतपन मिटेगा नहीं और दृढ़ होगा। इस नीति पर तो अब की भारत सरकार भी चल रही है। 30 जनवरी, 1933 को मंदिर प्रवेश पर वाइसराय के रूख की आलोचना करते हुए प्रेमचंद ने लिखा कि ‘मद्रास कौंसिल में रीयुत सुब्बरायन को ‘मंदिर प्रवेशाधिकार संबंधी बिल पेश करने का अधिकार नहीं दिया। (पृ. 418) ज़ाहिर है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद भारत में ‘फूट डालो और राज करो’ नीति के तहत दलित समस्या का भी लाभ उठा रहा था।
असेंबलियों में दलित ‘पृथक निर्वाचन’ क्यों चाहते थे, इसका एक उदाहरण तो प्रेमचंद ने अपनी 10 अप्रैल 1933 को प्रकाशित टिप्पणी में स्वयं ही दे दिया है। महात्मा गांधी के अनशन के दबाव के नीचे डॉ. अंबेडकर ने ‘सम्मिलित निर्वाचन स्वीकार कर लिया, लेकिन बंबई कारपोरेशन के चुनाव में एक हरिजन श्री देवरूखकर को सवर्ण हिन्दुओं ने जैसे हराया उससे प्रेमचंद को तो ठेस पहुंची, लेकिन उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया कि पृथक निर्वाचन की बात सही थी। हालांकि उन्होंने इस टिप्पणी के अंत में चेतावनी जरूर दे दी ‘अगर सजातीय हिन्दू इस तरह हरिजन उम्मीदवारों को हतोत्साहित करते रहे तो आपस में वैमनस्य और असंतोष बढ़ेगा और पूना के समझौते का जो उद्देश्य था वह गायब हो जाएगा।’ (पृ. 461 वही)
हरिजनों या दलितों के मंदिर प्रवेश के अधिकार और आंदोलन को लेकर प्रेमचंद ने इस बीच कई लेख लिखे। इसके इलावा 8 जनवरी 1934 को एक लंबा लेख क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं? उपशीर्षक टके पंथी पुजारी, पुरोहित और पंउे हिन्दू जाति के कलंक हैं, लिखा।
इस लेख में प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता और जातिवाद को राष्ट्रवाद के घोर विरोधी बताते हुए लिखा।

‘हिन्दू जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल हैं, जो एक विशाल जोंक की भांति उसका खून चूस रहा है और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है। राष्ट्रीयता की पहली शर्त है, समाज में साम्य भाव का दृढ़ होना। उसके बिना राष्ट्रीयता की कल्पना नहीं की जा सकती। (पृ. 417 वही)

राष्ट्रीयता की अपनी अवधारणा की कुछ और व्याख्या करते हुए प्रेमचंद इसी लेख में आगे कहते हैंµ‘हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन न कायस्थ न क्षत्रिय। उसमें सभी भारतवासी होगे, सभी ब्राह्मण होगे या सभी हरिजन होगे। (पृ. 473)
इस लेख में प्रेमचंद ने पं. ज्योतिप्रसाद निर्मल द्वारा अपने ऊपर लगाए आरोपों का उत्तर भी दिया हैµ‘निर्मल जी हमें ब्राह्मण द्वेषी बताकर संतुष्ट नहीं हुए उन्होंने हमें हिन्दू द्रोही भी सिद्ध किया है, क्योंकि हमने अपनी रचनाओं में मुसलमानों को अच्छे रूप में दिखाया है। तो क्या आप चाहते हैं कि हम मुसलमानों को भी उसी तरह चित्रित करें जिस तरह पुरोहितों और पाखंडियों को करते हैं? हमारा आदर्श सदैव से यह रहा है कि जहां धूर्तता और पाखंड और सबलों द्वारा निर्बलों पर अत्याचार देखों, उसको समाज के सामने रखो, चाहे हिन्दू हो, पंडित हो, बाबू हो, मुसलमान हो, या कोई हो। इसलिए हमारी कहानियों में आपको पदाधिकारी, महाजन, वकील और पुजारी गरीबों का खून चूसते हुए मिलेंगे और गरीब किसान मजदूर, अछूत और दरिद्र उनके आघात सहकर भ्ज्ञी अपने धर्म और मनुष्यता को हाथ से न जाने देंगे, क्योंकि हमने उन्हीं में सबसे ज्यादा सच्चाई और सेवाभाव पाया है। (पृ. 475, वही)

लेख के अंत में प्रेमचंद एक बार फिर इस बात पर जोर देते हैं कि राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्णव्यवस्था, ऊंचनीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है।’ (पृ. 476, वही)

8 जनवरी 1934 को प्रकाशित प्रेमचंद का यह लेख उनके दलित विमर्श पर भविष्य की भारतीय समाज व्यवस्था के अवधारणा की समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वास्तव में इस लेख में दलित समस्या संबंधी प्रेमचंद के विचार महात्मा गांधी के विचारों से आगे बढ़े हुए दिखाई देते हैं। विशेषतः भारतीय समाज व्यवस्था के नए संभावित रूप का उनका स्वप्न प्रगतिशील विचारों व वर्ग दृष्टि की झलक देता है।

‘छूत-अछूत’ शीर्षक से लेखमाला की अंतिम टिप्पणी 14 मई 1934 को प्रकाशित है जो एक साथ कटु और मार्मिक दोनों है शीर्षक है।‘इस हिमाकत की कोई हद है?’।शुरू का वाक्य है।
‘छूआछूत और जातपांत का भेद हिन्दू समाज में इतना बद्धमूल हो गया है कि शायद उसका सर्वनाश करके ही छोड़े।’ यह पूरी टिप्पणी यहां प्रेमचंद के शब्दों में ही दर्ज हैµ‘खबर है कि किसी स्थान में एक कुलीन हिन्दू स्त्रा कुएं पर पानी भरने गई।

संयोगवश कुएं में गिर पड़ी। बहुत से लोग तुरन्त कुएं पर जमा हो गए और उस औरत को बाहर निकालने का उपाय सोचने लगे, मगर किसी में इतना साहस नहीं था कि कुएं में उतर जाता। वहां कई हरिजन भी जमा हो गए थे। वे कुएं में जाकर उस स्त्री को निकाल लाने को तैयार हुए, लेकिन हरिजन कुएं में कैसे जा सकता था। अपवित्र हो जाता, नतीजा यह हुआ कि अभागिनी स्त्री कुएं में मर गयी।
प्रेमचंद का निष्कर्ष वाक्य है ‘क्या छूत का भूत कभी हमारे सिर से न उतरेगा?
वास्तव में प्रेमचंद के विचारों में गांधीवाद से मोहभंग 1934 के आसपास ही होना शुरू हुआ था और 1936 में तो वह पूरी तरह से उनसे मुक्त हो गए थे। उसका बहुत बड़ा कारण प्रेमचंद का भारतीय साहित्य परिषद को ‘हंस’ सौंपने और किए उनसे निराश होकर वापिस लेने में निहित है, जिसके तुरंत बाद वे गंभीर रूप से बीमार पड़े और उन्हें अपने विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति का अवसर ही नहीं मिल पाया, थोड़ी बहुत अभिव्यक्ति केवल अधूरे उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ में ही कर पाए। इस प्रसंग को मदन गोपाल ने प्रेमचंद की अपनी जीवनी ‘कलम का मजदूर’ में संक्षेप में दर्ज किया है।
जैनेन्द्र कुमार के सुझाव पर 1935 में भारतीय साहित्य परिषद में ‘हंस’ को अपना मुख पत्र बनाने का प्रस्ताव किया, जिसमें सभी भाषाओं के साहित्य का हिन्दी अनुवाद छपना था। प्रेस को हो रहे लगातार घाटे के कारण प्रेमचंद ने सोचा था कि परिषद ‘हंस’ को उनके ही प्रेस में छपवाती रहेगी, लेकिन परिषद ने उसे सस्ता साहित्य मंडल प्रेस दिल्ली से छपवाने का निर्णय किया। ‘हंस’ के संपादक रूप में प्रेमचंद के साथ कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का नाम जुड़ा।

अक्टूबर 1935 से ‘हंस’ नए रूप में निकला। ‘हंस’ के 22 सदस्य सलाहकार मंडल में पहला नाम महात्मा गांधी का था। भारतीय साहित्य परिषद की कार्यकारिणी के सभापति भी महात्मा गांधी ही थे।

इधर प्रेमचंद जून 1936 में घातक रूप से बीमार पड़े और जून और जुलाई 1936 के ‘हंस’ में सेठ गोविंददास के नाटक ‘स्वातंत्र्य सिद्धान्त’ नाटक के प्रकाशन पर अंग्रेज सरकार ने एक हजार रूपये की ज़मानत मांग ली। भारतीय साहित्य परिषद ने इतने बड़े बड़े व्यक्तियों के कार्यकारिणी में होते हुए, जिनके रहते किसी तरह भी पैसे की कमी न हो सकती थी, ‘हंस’ की जमानत राशि जमा करने से इन्कार कर दिया।

12 अगस्त 1936 को ‘हंस’ की ज़मानत राशि न भर पाने से ‘हंस’ का प्रकाशन बंद करने की घोषणा प्रेमचंद के ही नाम से की तथा साथ ही भारतीय साहित्य परिषद से ‘हंस’ के संबंध विच्छेद की भी, जिसके लिए उन्होंने ‘सस्ता साहित्य मंडल,’ दिल्ली का पता परिषद के साथ पत्र व्यवहार के लिए दिया।

पहले से ही गंभीर रूप से बीमार प्रेमचंद के लिए यह भयानक आघात था, बिना उनसे पूछे उनके नाम से यह घोषणा की गई। उनके परिवार और मित्रां ने प्रेमचंद की रूग्ण दशा और ‘हंस’ के प्रति प्रेमचंद के लगाव को देखते हुए यह ज़मानत राशि जमा करवाई। ‘हंस’ को प्रेमचंद अपना तीसरा पुत्र मानते थे।

जीवन में गांधीवादियों के प्रेमचंद के साथ इस अमानुषिक कृत्य ने वास्तव में प्रेमचंद को निर्णायक रूप से गांधी और गांधीवाद से अलग किया। सितंबर में ‘हंस’ को दोबारा निकालते हुए इसे प्रगतिशील, अन्त:र्प्रान्तीय और अन्तर्राष्ट्रीय रूप देते हुए ‘आलोचनात्मक, उन्नतिमूलक और विवेक प्रणीत’ साहित्य का पूर्ण समर्थक और संदेशवाहक बनाया गया। जैनेन्द्र कुमार और श्री भारतीय को प्रेमचंद के अतिरिक्त संपादक बनाया गया।

‘हंस’ के इसी अंक में ‘महाजनी सभ्यता’ लेख छपा जो उनके चिंतन में प्रगतिशील दिशा में निर्णायक मोड़ का प्रतिविंम्ब है। ‘दो बहनें’ कहानी में भी इन विचारों की झलक मिलती है। लेकिन प्रेमचंद के चिंतन में यह निर्णायक मोड़ उस घड़ी व उन परिस्थितियों में आया, जब वे मृत्युशैय्या पर थे।

‘हंस’ का अक्टूबर 1936 अंक शायद उनके जीवन काल में निकल ही नहीं पाया। लेकिन प्रेमचंद ने मृत्युशैय्या पर लेटे हुए भी भारतीय साहित्य परिषद द्वारा 12 अगस्त, 1936 को जो क्रूरता उनके साथ की गई, उसका हिसाब सितंबर अंक में चुकता करके ही संसार से विदा ली। जीवन के अंतिम क्षणों में उन्हें ऐसे आघात न लगते तो शायद वे कुछ और समय जी जाते और अपनी वैचारिक प्रखरता व प्रतिबद्धता को और स्पष्ट रूप में अभिव्यक्त कर जाते।
कुल मिलाकर प्रेमचंद का जीवन, व्यक्तित्व व चिंतन एक निरंतर संघर्ष की गाथा है, जो गुण के स्तर पर उच्च से उच्चतर की ओर गया है। उनके चिंतन और लेखन का मूलतत्व मानववाद और विवेकशील जनतांत्रिक भावना थी। उनके सृजनात्मक लेखन में दलित विमर्श इतना प्रखर है कि उनकी जाति संबंधी जानकारी न हो तो उसे किसी दलित पृष्ठभूमि के लेखक की रचना भी समझा जा सकता है। उनके चिंतनपरक लेखन में व्यक्त दलित विमर्श गांधी और गांधीवाद से प्रभावित है, लेकिन चेतना का जो स्वरूप विकसित हो रहा था, हिन्दी और अन्यभाषी पाठक उससे वंचित रह गए, लेकिन उसका अंतिम स्वरूप निश्चय ही उच्चतर मानववादी या भगत सिंह के विकसित हो रहे समाजवादी चिंतन जैसा ही होता। ज़ाहिर है उससे उनका दलित विमर्श भी और अधिक प्रखर व निखरा हुआ होता।

(यह  प्रो. चमनलाल द्वारा साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित प्रेमंचद अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में 27 अक्टूबर 05 को पढ़ा गया आलेख है।
 डॉ. चमन लाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के भारतीय भाषा केन्द्र प्रोफेसर व पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष हैं। हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेजी में उनकी तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं।)

(लेख उपलब्ध कराने के लिए अजय मिश्रा जी का धन्यवाद)

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