Category : साहित्य-संस्कृति

जेरे बहस स्मृति

नेहरू और फासीवाद : संघ विरोध के मायने

मुकेश आनंद
स्मृति दिवस पर विशेष 1917 ईस्वी में रूस में सम्पन्न हुई मजदूरों की क्रांति ने सारी दुनिया के समाजों के प्रतिक्रियावादी तत्वों को भयभीत, चौकन्ना...
कविता

‘ पांव में छाले आंख में आंसू पीड़ा भरी कहानी लिख/मजदूरों के साथ हुई जो सत्ता की मनमानी लिख ’

समकालीन जनमत
लखनऊ.  कोरोना काल में बड़ी मात्रा में कविताएं रची जा रही हैं। मानव संकट सृजन के लिए आधार बनता है। आज की रचनाओं में भावों...
साहित्य-संस्कृति

नक्सलबाड़ी आंदोलन और भारतीय साहित्य

गोपाल प्रधान
भारतीय साहित्य के इतिहास में नक्सलवादी आंदोलन का एक विशेष स्थान है. सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के साथ साहित्य में भी नक्सल धारा की उपस्थिति बनी हुई...
पुस्तक

इंडोनेशिया का कत्लेआम

गोपाल प्रधान
2020 में पब्लिक अफ़ेयर्स से विनसेन्ट बेविन्स की किताब ‘ द जकार्ता मेथड : वाशिंगटन’स एन्टीकम्युनिस्ट क्रूसेड & द मास मर्डर प्रोग्राम दैट शेप्ड आवर...
कविता

कविता कृष्णपल्लवी की कविताएँ बाहरी कोलाहल और भीतरी बेचैनी से अर्जित कविताएँ हैं

समकालीन जनमत
विपिन चौधरी साहित्यिक एक्टिविज्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाने वाली पोस्टर-कविता, हमेशा से विरोध प्रदर्शनों का अहम् हिस्सा रही हैं. सबसे सघन समय में...
ये चिराग जल रहे हैं शिक्षा

शुक्रिया, छंगा मास्साब, बहुत शुक्रिया!

नवीन जोशी
( वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक नवीन जोशी के प्रकाशित-अप्रकाशित संस्मरणों की  श्रृंखला ‘ये चिराग जल रहे हैं’ की  पांचवीं  क़िस्त  में  प्रस्तुत  है   नवीन   जोशी ...
सिनेमा

आदिवासी समाज के उत्पीड़न और आक्रोश की कहानी

मुकेश आनंद
(महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्मों पर  टिप्पणी के क्रम में आज प्रस्तुत है मशहूर निर्देशक गोविंद निहलानी की आक्रोश । समकालीन जनमत केेे लिए मुकेश आनंद द्वारा...
स्मृति

राजीव गांधी से एक मुलाकात

नेहरू ने जिस आत्मनिर्भर एवं समाजवादी भारत की परिकल्पना की थी, राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में उसे मूर्त रूप प्रदान करने की कोशिश...
व्यंग्य

आख़िर क्यों? दी नेशन वॉन्ट्स टू नो!

समकालीन जनमत
( एक तरफ़ महामारी और दूसरी तरफ़ सरकारी तंत्र की नाकामी के कारण मानव जीवन की हाड़ कंपा देने वाली ऐसी भयानक बेक़दरी को उसके...
साहित्य-संस्कृति

हिंदी में प्रगतिशील आंदोलन

गोपाल प्रधान
हिंदी में प्रगतिशील आंदोलन की स्थिति को समझने के लिए उसके जन्म के समय की राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों पर ध्यान देना जरूरी है । सन 1929...
कविता

‘मजदूर थे वो जब तक सबके ही काम आए/मजबूर हो गए तो सबको ही खल रहे हैं’

समकालीन जनमत
लखनऊ। लोग कोरोना की चपेट में ही नहीं हैं बल्कि लाॅक डाउन से पैदा हुई अव्यवस्था के भी शिकार हुए हैं, हो रहे हैं। लोगों...
चित्रकला

रेखा चित्रों के जरिये प्रवासी मजदूरों की पीडा़ को अभिव्यक्त करता चित्रकार राकेश कुमार दिवाकर

समकालीन जनमत
कोरोना लाकडाउन ने लाखों लोगों को एक झटके में बेरोजगार, बेबस और लाचार कर दिया है. इसका सबसे गंभीर असर गरीबों , मजदूरों व निम्न...
कविता

पंकज की कविताएँ जाति-संरचना के कठोर सच की तीखी बानगी हैं

समकालीन जनमत
सुशील मानव पंकज चौधरी की कविताएँ दरअसल विशुद्ध जाति विमर्श (कास्ट डिस्कोर्स) की कविताएँ हैं। जो अपने समय की राजनीति, संस्कृति ,समाज, अर्थशास्त्र न्याय व्यवस्था...
ये चिराग जल रहे हैं

जिज्ञासु : ‘ अचल ’ की परम्परा के वाहक

नवीन जोशी
( वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक नवीन जोशी के प्रकाशित-अप्रकाशित संस्मरणों की  श्रृंखला ‘ये चिराग जल रहे हैं’ की  चौथी  क़िस्त  में  प्रस्तुत  है   कुमाऊंनी भाषा ...
स्मृति

नंदकिशोर नवल : हिन्दी आलोचना की एक असमाप्त यात्रा 

आशुतोष कुमार
नवल जी हिन्दी की साहित्यिक सम्वेदना और सुरुचि को उत्पीडित साधारण-जन के संघर्ष की जरूरतों के मुताबिक़ ढालने वाले आलोचकों में अग्रणी रहे हैं.  संघर्ष...
सिनेमा

सामंती मूल्यबोध से आधुनकि मूल्यों की टकराहट को दर्ज करती ‘माया दर्पण’

मुकेश आनंद
(महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्मों पर  टिप्पणी के क्रम में आज प्रस्तुत है मशहूर निर्देशक कुमार शाहनी की माया दर्पण । समकालीन जनमत केेे लिए मुकेश आनंद...
कहानी साहित्य-संस्कृति

लाल्टू की चार कहानियों का पाठ

समकालीन जनमत
(समकालीन जनमत  द्वारा चलाई जा रही फ़ेसबुक लाइव श्रंखला के तहत 12 मई 2020 की शाम हिंदी रचनाकार लाल्टू ने अपनी चार कहानियों  ‘काश कि...
नाटक

रंगनायक द लेफ्ट थिएटर का नया प्रयोग, फेसबुक लाइव पर नाटक का मंचन

समकालीन जनमत के फेसबुक पेज पर 12 मई से 23 मई तक चलने वाले लाइव साहित्यिक कार्यक्रम में 12 मई को दोपहर 2 बजे रंगनायक...
स्मृति

असगर अली इंजीनियर : सच्चा धर्मनिरपेक्ष, नायाब विद्वान और निर्भीक एक्टिविस्ट

फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ एकजुटता ही आज डा़ असग़र अली इंजीनियर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी....
स्मृति

मैंने कैफ़ी आज़मी को देखा है, सुना है और जाना है

“बस इक झिझक है यही हाल ए दिल सुनाने में, कि तेरा जिक्र भी आएगा इस फसाने में।” जिस समय कैफ़ी साहब का इंतकाल (10...