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शख्सियत साहित्य-संस्कृति

मुक्तिबोध की कविताः जमाने का चेहरा भी, भविष्य का नक्शा भी

प्रणय कृष्ण

मुक्तिबोध ने बहुत तरह से अपनी कविता को व्याख्यायित करने की कोशिश की है. वह कालयात्री है, वह जन चरित्री है, लेकिन मेरी कविताएँ  हिडिम्बा हैं.

एक काले समय को कोई कविता में लिखेगा तो कविताएँ  कैसी होती जाएँगी- विकृताकृतबिम्बा- विकृत आकृतियों का बिम्ब. अब इसको कोई कविता कहेगा क्या!

इसलिए मुक्तिबोध को पढ़ना साहित्यानुरागियों के लिए उतना आवश्यक हो चाहे या न हो, लेकिन दुनिया को बदलने के लिए जो लोग कोशिश कर रहे हैं, बदलना चाहते हैं और जो दुनिया को बदलने चले हैं, तो खुद भी बदलते जाएँगे- उनके लिए मुक्तिबोध बहुत ही आवश्यक हैं. वे चाहे साहित्य कुछ भी न पढ़ें.

इसलिए जिन लोगों की साहित्य में ट्रेनिंग है, उनके लिए मुक्तिबोध बड़ी मुश्किल पैदा करते हैं. क्योंकि, हम उस कवि से वह अपेक्षा ही नहीं कर सकते, जो किसी भी कवि से एक पाठक अपेक्षा करता है.

उनकी कविताओं में स्मृति, स्वप्न, फैंटेसी बहुत है. स्मृति बड़ी ताकतवर चीज होती है, जैसे मनुष्य के जीवन में आनुवंशिकी बड़ी ताकतवर चीज होती है. लेकिन, वही स्मृतियाँ ताकतवर होती हैं, जो हमारी आज की जी जा रही जिंदगी से अपना सम्बन्ध रखती हैं.

मुक्तिबोध की कविताओं में बहुत स्मृतियाँ हैं. ‘अँधेरे में’ कविता में ही तिलक, तालस्ताय, गाँधी आते हैं. गाँधी काव्य नायक को एक बच्चा दे जाते हैं. वह कंधे पर बैठा हुआ है, फिर वह बच्चा सूरजमुखी के गुच्छों में बदल जाता है.

उसके बाद एक बार और बदलता है, वह रायफल बन जाता है. यह बच्चा बार-बार आता है उनकी कविताओं में, कई बार आता है.

एक कविता है उनकी- एक अंतर्कथा, अग्नि के अधिष्ठान खोजती माँ. माँ है जो सूखी हुई टहनियों को, सूखे हुए डंठल को खोज रही है. बच्चा है जो इसे टोकरी में उठाये हुए है.

अचानक सूखी हुई डंठल से पक्षियों के गाने जैसा स्वर सुनाई पड़ता है. बच्चा माँ से पूछता है कि यह पक्षी स्वर क्या है, तो माँ कहती है कि इन सूखी हुई टहनियों में, डंठलों में, लकड़ियों में जो आग बंद है वही गा रही है.

सूखी डालियों की बंद आग है खुलने को. कोई कवि, कोई रचनाकार, कोई कार्यकर्ता, वह जिनको चुनता है, याकि चुनेगा, वह जीवन के तमाम मर्म-अनुभव, जिनको कचरे के ढेर में डाल दिया गया है, जिनसे लोग मुंह चुराते हैं, क्योंकि सभ्यता की रूचि के अनुकूल वह नहीं है.

वह इस देश के, इस समाज के सबसे गरीब लोग हैं, जिनके चेहरे, जिनका शरीर निचुड़ चुका है, वही सूखी डालियाँ हैं, सूखी डंठल है.

एक से एक सुन्दर बिम्ब आते हैं और वे एक दूसरे से ऐसे उलझे हैं जैसे नव-साक्षर खेतिहर के अक्षर हैं. तो पूरी जिन्दगी वह आदमी एक कवि के रूप में ऐसी सूखी हुई डालियों, सूखी हुई डंठलों को खोजता है.

ऐसे मर्म-अनुभव जिनको कविता से, जिंदगी से बहिष्कृत कर दिया गया है, ऐसे लोग जिनको हाशिये पर फेंक दिया गया है.

मुक्तिबोध की कविता और जिंदगी इन्हीं का फिर से पुनर्वास है. इन्हीं के हाथ में नवनिर्माण की शक्ति है. इन्हीं के अन्दर वह बंद आग है खुलने को. कवि और कुछ नहीं कर रहा है, बस वही आग कैसे खुल जाए एक चकमक की चिंगारी की तरह. और, वह बंद आग खुलनी है, बाहर भी, अन्दर भी.

मुक्तिबोध की कविता खूब बाहर जाती है, खूब अन्दर आती है. इसलिए आप इसमें जाएँगे तो बेहद बेचैन होंगे. हम कह सकते हैं, कि जैसे गीता, कुरान, बाइबिल लोग पढ़ते हैं, ऐसे ही दुनिया को बदलने का संकल्प रखने वाले मुक्तिबोध को पढ़ सकते हैं.

लेकिन, इसके आगे यह उपमा ख़त्म हो जाती है, क्योंकि गीता, बाइबिल, कुरान में आपको अपने सवालों पर एक ढाँढस, एक आश्वासन वगैरह मिलता है. मुक्तिबोध के यहाँ कोई आश्वासन नहीं.

यहाँ एक चीज मिलती है, कि आपके अपने भीतर ही युग-युग के जो अनुभव हैं मनुष्यता के, मनुष्यधारा के, जो तेज बौछार करते रेडियम की तरह चमकते हैं.

लेकिन इस चमक को हमने अंतर्गुहावास दे दिया है. अपने ही चेतना के भीतर उन चमकते हुए हीरों को, कणों को जो सदियों से मनुष्यता ने इकठ्ठा किया है, हर मनुष्य के पास वह है.

हर नया बच्चा जो पैदा होता है, तो सभ्यता का सारा इतिहास उसको आयाचित ही मिल जाता है. ऐसे ही युग-युग के अनुभव, युग-युग के संघर्ष, युग-युग की पीड़ाएँ, युग-युग की सद्चितवेदना, वह सब हम लोगों को मिली हुई है, हमारे भीतर है, लेकिन हमने अपने ही भीतर से उस अंश को निकाल फेंका है या सोच लिया है कि वह हमारा अंश ही नहीं है, मुक्तिबोध की कविता आपको वहाँ जाकर सीधे अटैक करती है.

 

इस अपरिचय का कारण क्या है, हमारी-आपकी कमजोरियाँ, अपनी कमजोरियों से चिपके रहना. तो मुक्तिबोध की कविताओं के सामने आपको निहत्था जाना होगा, तब आपके भीतर एक दूसरी प्रक्रिया वह शुरू करती है. और इसीलिए आसान नहीं है मुक्तिबोध के पास जाना और मुक्तिबोध को पढ़ना.

रामजी राय ने लिखा है, कि मुक्तिबोध सत्य के सहानुभुतिकर्ता ही नहीं बनाते बल्कि सत्य को पाने के लिए सक्रिय कार्यकर्ता में बदल देने की क्षमता रखते हैं. ऐसा आह्वान मुक्तिबोध की कविता में है.

इसलिए उनके पास जाने से डरते हैं, क्योंकि तब तो छोड़ देना होगा अपनी कमजोरियों को. हममें से कितने लोग छोड़ पाते हैं उन कमजोरियों को, जबकि मिला सबको है.

अभी मैं वर्ग की बात नहीं कर रहा हूँ. मनुष्यता के युगों-युगों का अनुभव जिसको अंतर्कथा में वे कहते हैं, कि वह नेतृत्वकर्ता है.

जो माँ है, वह युगों-युगों के अनुभवों का नेतृत्व है और मेरी कविता उसकी अनुगता है. और वह सबको मिला है तो उसकी अलग-अलग वर्ग, अलग-अलग मात्रा में उसकी अवहेलना करते हैं इसलिए उनके पास जाने पर एक तरफ बाहर की दुनिया का द्वंद्व मिलेगा और उतना ही तीखा अन्दर की दुनिया का द्वंद्व मिलेगा.

बचपन से लेकर बड़े होने तक तमाम तरह की परिस्थितियों के प्रति हमारा मन अनुकूल या प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ करता है.

उसी का पुंज अन्दर बनता जाता है, वही हमारा व्यक्तित्व कहलाता है. और यह जो बाहरी दुनिया है और जो अंतर्जीवन है जन्म से ले कर अंत तक, वह जीवन के दो भुज हैं. तीसरा भुज है, जो जोड़ता है दोनों को, वह है चेतना जो दोनों के संघात से बनती है. इस चेतना के स्वरुप को, उसकी प्रकृति का अनुसन्धान उनकी कविता का एक स्तर है, और दूसरा स्तर है, कि एकदम अपने समय के बारे में तमाम तरह के भ्रमों को तोड़ना.

उनके यहाँ जो अँधेरा है, वह वास्तविकता है. और जो चाँद है- डूबता चाँद कब डूबेगा. चांदनी है, चमकीलापन है, तड़क-भड़क है, ताम-झाम है, उनके भीतर कैसे अँधेरा छिपा हुआ है, इसकी शिनाख्त मुक्तिबोध की कविताएँ करती हैं. और यह उनके प्रतीकों में बोलती है.

 

मुक्तिबोध का जन्मदिन 13 नवम्बर को है और जवाहर लाल नेहरु का 14 नवम्बर है. दोनों समकालीन थे. समकालीन इस मामले में नहीं,  क्योंकि वे नेहरू से बहुत छोटे थे उम्र में, मृत्यु लगभग आस-पास हुई है. और जवाहरलाल नेहरू का समय भी, उसमें बड़ी उम्मीदें, उत्साह.

तमाम तरह के लोगों में तमाम तरह की धारणाएँ  थीं. देश आजाद भी हुआ था. और, मुक्तिबोध उसी समय को कह रहे हैं, कि डूबता चाँद कब डूबेगा!!

उसी समय में वे देख रहे हैं कि यह अँधेरा बढ़ता जा रहा है, घना होता जा रहा है. यह आज़ादी के बाद के हिंदुस्तान का जो यथार्थ है, उसको उनके अलावा और कवियों ने भी देखा, जैसे निराला हैं, और भी हैं, लेकिन ये कवि सिर्फ अँधेरा देख पाते हैं.

लेकिन उस अँधेरे की शक्तियाँ कौन सी हैं, वह अँधेरा फैला कैसे है! किसके लिए, क्या चीज है ढँक रहा है वो, किस चीज की पर्देदारी कर रहा है या जो रौशनी है वह किस चीज का संकेत केंद्र है और तब वे कौन से लोग होंगे, किस प्रक्रिया के तहत वह अँधेरा छटेगा, दूर होगा. यह सब बातें मुक्तिबोध के करने की थी और मुक्तिबोध जिंदगी भर यही करते रहे.

 

मुक्तिबोध के बारे में लोगों ने कहा है,  कि वे जैसे एक ही कविता बार-बार बनाते हैं. क्यों? क्योंकि वह पूरी ही नहीं होती. वे कहते हैं कविताएँ  अधूरी रह जाती हैं.

मैं अपनी ही अधूरी कविता में से उमग कर जन्म लेना चाहता हूँ. उनकी कविता कोशिश है लगातार, हर बार. आलोचना, समीक्षा, जगत-समीक्षा, लगातार खोज, खोज, खोज जारी है.

एक नये भारत की खोज. एक भारत की खोज पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी की थी- भारत: एक खोज. एक दूसरे भारत की खोज मुक्तिबोध करते हैं, और वहाँ वह भारत ऐसा है कि वह चम्बल की घाटी में बदल रहा है. बहुत ही रक्त-रंजित. वह भारत अलग भारत है.

जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ आजादी की लड़ाई चल रही थी, तब मुक्ति की संकल्पना और लक्ष्य दूसरे थे. जब आजादी मिल गयी, तब मुक्ति की एक दूसरी परिकल्पना चाहिए.

और यह बदला हुआ हिंदुस्तान कैसा है. यहाँ पर कौन लोग किसके खिलाफ लड़ रहे हैं. किसके हितों की सुरक्षा हो रही है.

इसलिए एक दूसरा भाष्य इस पूरे हिंदुस्तान का उन्हें करना था. और इसके चलते न जाने कहाँ-कहाँ का चक्कर उनकी कविताएँ  लगाती हैं.

उनकी कविताएँ  ही नहीं लेखों में भी सारी विश्व- परिस्थिति तक वे जाते है. उनकी एक कविता है जमाने का चेहरा. उसमें विश्व-युद्ध से ले कर और जब 1953 में वह कविता लिखी जा रही है, उस समय तक दुनिया में जितने भी युद्ध लड़े जा रहे थे साम्राज्यवादियों द्वारा, वह अमेरिका जो विश्वयुद्ध के बाद ताकतवर हो कर निकलता है और वह मध्यपूर्व जो आज सुलग रहा है, अमेरिका ने उसी समय पचास के दशक में वहाँ पर अपना साम्राज्य विस्तार करना शुरू कर दिया था.

विभिन्न तरीके के धार्मिक तानाशाहों को यहाँ-वहाँ से मिला कर लेकिन इसके खिलाफ अरब-वीर भी लड़ रहे हैं. इस कविता में वे कहते हैं कि साम्राज्यवादी संस्कृति भारतीय आकृति में हमारे पास आ रही है.

और उसी समय का उनका एक लेख है, जिसमें वे कहते हैं कि प्रथम पंचवर्षीय योजना में १०० करोड़ का विदेशी निवेश हुआ है, कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी तब इसके खतरों से वाकिफ नहीं थी।

वह तो कह रही थीं कि भारत के स्वाधीन अर्थतंत्र के लिए जरूरी है चीन और रूस से अच्छे रिश्ते और इसलिए हमें सबसे ज्यादा जोर इसी पर लगाना है, कि साम्राज्यवाद के प्रत्यक्ष रूप से चले जाने के बाद भी जो हमारा अर्थतंत्र अभी भी उसके प्रभाव में है, उससे छूटने के लिए, स्वतंत्र अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए संघर्ष ही प्राथमिक है.

मुक्तिबोध कहते हैं, कि परिस्थिति बदल गयी है और कम्युनिस्ट पार्टियों के दस्तावेज में यही बात आती है तीसरी-चौथी कांग्रेस में कि अभी भी मुख्य अंतर्विरोध साम्राज्यवाद के साथ है, उसके चले जाने के बाद भी. एक स्वतंत्र देश के रूप में अपना निर्माण करना और इसके लिए जरूरी है चीन-रूस के साथ दोस्ती और दूसरे नंबर पर आता है, कि सामंतवाद से अंतर्विरोध. मुक्तिबोध कहते हैं, जी नहीं.

जिस वर्ग को राष्ट्र का नेत्रृत्वकर्ता वर्ग समझ रहे हैं, वह स्वतंत्र अर्थतंत्र का विकास कर रहा है, लेकिन वह समझौता भी कर रहा है, और आप(कम्युनिस्ट) यह नहीं कह रहे हैं. वे कहते हैं, यह मुख्य तत्व है- स्वतंत्र अर्थतंत्र में विदेशी पूँजी-निवेश का बढ़ते चले जाना- इसी के साथ कविता में यह बात आती है कि साम्राज्यवादी संस्कृति भारतीय आकृति में ढल रही है. संस्कृति में भी अर्थव्यवस्था है.

यहाँ पर वे बाकी के कवियों से अलग हो जाते हैं. इसलिए उनको समझना बड़े-बड़े आलोचकों के लिए भी मुश्किल रहा है.

क्योंकि मुश्किल तो यही है, कि भारत में कौन से गठजोड़ बन रहे हैं, किस तरह की शक्तियां हैं. वे बार-बार नया, नये की जन्मकुंडली लिख रहे हैं. नया जो अभी एक शिशु है, बच्चा है आप कह सकते हैं भविष्य-स्वप्न है भारत की मुक्ति का.

पीछे के लोग जो दायित्व छोड़ कर गए हैं, अभी वह शिशु-रूप है, उसके अंग-प्रत्यंग सुस्पष्ट नहीं हुए हैं अभी, इसलिए वह रो कर अपनी उपस्थिति जताता है. इसकी सुरक्षा करनी है, इसको बड़ा करना है.

जिसको, सचमुच एक ऐसे सपने को भौतिक शक्ति में परिवर्तित करना है. इसको ले कर उनकी कविता का संधान लगातार चलता रहता है. इसीलिए मुक्तिबोध सिर्फ स्मृति सन्दर्भ नहीं हैं, वे जीवित प्रसंग भी इसीलिए हैं.

वह खुद भी और उनकी कविता में भी स्मरण आते हैं, किसी खास सन्दर्भ में आते हैं. एक यात्रा जो चली है हिंदुस्तान की मुक्ति की जिसके कुछ पड़ाव हैं, गाँधी-तिलक. उसके बाद यह मुक्ति यात्रा इसलिए रुक नहीं सकती कि मुक्ति तो मिली नहीं. जैसे हम बार-बार अँधेरे की बात कर रहे हैं, ऐसा नहीं कि खाली मुक्तिबोध कह रहे थे.

यह दाग-दाग उजाला यह शब् गज़ीदा शहर/यह वह शहर तो नहीं/ कि जिसकी आरजू ले कर चले थे यार/ कि मिल जाएगी कहीं न कहीं. यह फ़ैज़ कह रहे हैं. 1947 में कह रहे हैं- कि रात की रुकी हुई सुबह है यह. और – चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आयी.

 

तो अब चलना किस दिशा में है. यह देखना होगा कि दुनिया भर में आज़ादी के चलने वाले ताम-झाम, जश्न में अँधेरे क्या हैं, अंधेरों का श्रोत वही है जहाँ से उजाले आ रहे हैं. जिसे उजाला कहा जा रहा है, दरअसल वहीं अँधेरा छिपा हुआ है.

जिसे मंगल कहा जा रहा है, उसी में अमंगल छिपा हुआ है. यही मुक्तिबोध की कविता बार-बार दिखाती है और इस तरह से सचेत करती है उन सभी लोगों को जो उसी तरह के मंगल का वेश धारण कर के अमंगल व्याप्त होता जा रहा है चारों ओर, उसको हर युग में पहचानना है.

 

कम रचनायें ऐसी होती हैं जिनका चेहरा उत्तरोत्तर भविष्य में खुलता चला जाता है. ‘अँधेरे में’ और ‘ज़माने का चेहरा’ भी ऐसी रचनायें हैं. ‘अँधेरे में’ जो बार-बार सांकल खटखटाने की बात आती है, कोमल शरीर के आने की बात है, पुकारती हुई पुकार के खो जाने की बात है. कोई पुकार रहा है, कोई दरवाजा खटखटा कर जा रहा है, कोई हवा आ कर बाल संवार जा रही है- वह कुछ न कुछ कह रही है, वे जिन्दगी के इशारे हैं और वह कह यह रही है कि तुम्हारे भीतर जब तक संघर्ष नहीं चलेगा, भयानक संघर्ष, और वह समाज को भी उसी रूप में देखते हैं, कि आजाद हिंदुस्तान में जितना वर्गों के बीच का तनाव है वह उससे पहले नहीं दिखायी पड़ता था, या उतना नहीं था.

और वे कविता के बारे में भी बातचीत करते हुए कहते हैं- यह तनाव एक ऐसी स्थिति है कि जिसमें कवियों में अंतर्मुखता भी आ जाती है, इतना भीषण उस द्वंद्व का स्वरुप है. उनका समन्वय नहीं हो सकता.

वे कहते हैं- समन्वय झूठ. न वर्गों का समन्वय हो सकता है, न मन के अन्दर की इस तरह की प्रवित्तियों का समन्वय हो सकता है.

जहाँ, सुविधा भी बहुत प्यारी है और परिवर्तन भी चाहिए. और जब समन्वय नहीं है तो रास्ता कहाँ से आता है, इसलिए उनकी सारी कविताएँ द्वंद्वात्मक हैं.

भयानक ताकतें एक दूसरे से लड़ती हैं, मन के भीतर भी, मन के बाहर भी और इसलिए कोई वहाँ जाता है तो उसके भयंकर चुम्बकीय आकर्षण से खिंचे बगैर, बेचैन हुए बगैर नहीं रह पाता.

वे अपनी कविता में सीधे-सीधे कहते हैं कि जो कल तक स्वाभाविक नहीं लगता था, वह आज स्वाभाविक है.

इसी तरह से जो आज स्वाभाविक और सच लग रहा है, कल को असत्य साबित हो सकती है. और जो लोग आज भविष्यदृष्टि के साथ काम कर रहे हैं, उन्हें आज ही असत्य देखना होगा और असत्य कहना होगा.

इसलिए नेहरू युग के तमाम चमचमाते हुए ताम-झाम के बीच वे कहते हैं, कि अँधेरा है, यह चांदनी नहीं है जो खिली हुई है.

वहां देखो कि तिरस्कृत लोग किस तरह से रह रहे हैं. भाखरा नांगल, आज़ाद हिंदुस्तान के मंदिर, वहाँ पर क्या हाल है बाकी हिन्दुस्तानियों का!! इतनी तगड़ी फ्लैस लाइट लगे हैं कि नीचा नगर दिखाई ही नहीं पड़ता. सब कुछ, सारी रौशनी तो ऊँचे नगर में है. उस समय की भी स्मार्ट सिटीज़ थीं, उस समय के भी प्रतीक और वहाँ पर मुक्तिबोध की कविता इसे ज्यादा स्पष्ट करती है-

उजाड़ प्रकाश सपने में

कि वे जान पड़ते हैं तुरत ही

गहन चिंताक्रांत हो कर सोचने लगते

कि बेबीलोन सचमुच नष्ट होगा क्या

प्रतिष्ठित राज्य-संस्कृति के

प्रभावी दृश्य सुन्दर सभ्यता के तुंग स्वर्ण-कलश

सब आदर्श

उनके भाष्य करता ज्ञानवान महर्षि

ज्योतिर्विद, गणित-शास्त्री, विचारक कवि

सभी वे याद आते हैं

प्रतापी सूर्य हैं वे सब विकराल

धब्बों के अँधेरे विवरतम में से

उमड़ कर दल बाँध उड़ते आ रहे हैं गिद्ध

पृथ्वी पर झपटते हैं

निकालेंगे नुकीली चोंच से आँखें

कि खायेंगे हमारी दृष्टियाँ ही

हमारी दृष्टि खा जाएगा यह उजाला, यह चमक क्योंकि अँधेरा तो उसके भीतर से आ रहा है. गिद्ध आ रहे हैं पृथ्वी पर, पृथ्वी को नोंचने आ रहे हैं. इन गिद्धों का साक्षात्कार है मुक्तिबोध की कविता में.

इनको देखो और इस उजाले से बिलकुल भी चमत्कृत हो कर, भ्रमित हो कर रहने की जरूरत नहीं है.

अँधेरे का भाष्य करना, अँधेरे का संधान करना, सभ्यता की समीक्षा करना और उसके लिए कहाँ से कहाँ तक प्रतीक उनके पास हैं- भूगर्भ-शास्त्र से ले कर एस्ट्रोनोमी तक.

जमीन के अन्दर घुस कर भी हमको संधान करना है, आसमान में विचरते हुए भी करना है. पूरी सभ्यता की कितनी सर्वांग समीक्षा करनी है. और तब हमको समझ में आ पायेगा कि अँधेरा है क्या, कहाँ से आता है अँधेरा. और वह अँधेरा हमारे भीतर भी, हमारी चेतना में भी कहाँ-कहाँ तक फैला है.

जो अन्वेषण, शोध, समीक्षा के प्रतीक हैं मुक्तिबोध के यहाँ और सब अपने समय के वैज्ञानिक प्रयोगों से आते हैं. रेडियम उनके यहाँ आता है चमकते हुए तेज उत्कीर्ण करते हुए जो चमकदार पत्थर हैं, वह चेतना में बहुत आते हैं और तब समझते हैं कि सभ्यता क्या है!!

वे बार-बार खोजते हैं, जो मित्र हैं वह तो हैं ही पर न जाने कितनी आत्माएं दूर-देश से आती हैं, उनके पास बैठती हैं और मनुष्य के युगों-युगों के अनुभव को सुनाती हैं. उस रात में जाने कितनी-कितनी हरकतें होती हैं.

वह रात न केवल वास्तविकता की भीषणता की रात है, बल्कि संभावनाओं की, अपने स्वप्नों के जाग्रत होने की भी रात है, वह रात एकतरफा नहीं है.

वह रात भी भयंकर द्वंद्वात्मक है. और इसीलिए उनकी कविता का पूरा विन्यास ही द्वंद्वात्मक है. द्वंद्व और तनाव को जीते हुए तथा उस तनाव को वहन कर के वे जो ले आते हैं, उसे उनकी कविता की एक पंक्ति में देखना ठीक होगा-

कोयल का स्वर अति प्राचीन-अति नवीन

ऐसे मूल्य जो बड़े चिरंतन बड़े सनातन हैं, उतने ही नये हैं. इस नये का नयापन क्या है. कौन सा पुरानापन वह पुरानापन नहीं है जो आज के नयेपन को जन्म दे सके.

उसको ख़त्म करना होगा, उसका नये के अन्दर प्रवेश, उस भूत का वर्तमान के अन्दर घुस आना, भयानक तबाही पैदा करेगा.

आज जो हो रहा है, आज के समय की बात हो रही है, आज का समय और अँधेरे में कविता. मैं एक कविता पढ़ना चाहता हूँ 1963 की कविता है. अँधेरे में कविता वे 1957 से 64 तक लिखते रहे.

जब नागपुर में थे, तब से ले कर जब राजनंदगाँव आये तो मुकम्मल हुई. कई ड्राफ्ट हैं उसके, संशोधित करते रहे उसे लेकिन 1963 की एक कविता है भूल-गलती, उनकी कविता के क्या है कि उसके तमाम सारे बिम्ब दूसरी कविताओं में भी मिल जायेंगे.

एक कविता में कोई बात समझ में नहीं आ रही तो दूसरी कविता में वह स्पष्ट हो जायेगी. उनकी सारी कविताएँ  ऐसी जुडी हैं एक दूसरे से कि लगता है, एक ही कविता है. भूल-गलती.

इसे आज के समय को ध्यान में रख कर पढ़ें तो समझ में आएगी कि किस किसम की भूल-गलती है जिसके बारे में 1963 में आगाह किया जा रहा है. लेकिन जाहिर है, कि वह प्रक्रिया उस तरह से नहीं चलती, चल पाती इसलिए वह भूल-गलतियाँ आती ही रहती हैं. लेकिन उसके समय में भी उसका प्रतिरोध, प्रतिवाद भी पैदा होता है. भूल-गलती कविता देखिये-

भूल-गलती आज बैठी है

जिरह बख्तर पहन कर तख़्त पर दिल के (कौन बैठा है इस समय दिल के या दिल्ली के इस समय तख़्त पर बैठने से पहले दिल पर बैठना होता है जनता के, जो बैठी है वह भूल-गलती है किसकी हम सब की)

चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर आँखें चिलकती हैं नुकीले तवज पत्थर की (आदिम बर्बरता है जिसे आज भूल-गलती के रूप में हमने अपने दिल पर बैठाया है. उसके हथियार कैसे हैं आदि मानव जब शिकार करता था उस तरह से उसकी आँखें हैं, शिकारी आँखें

खड़ी है सब कतारें झुकाये … दरबारे आम में (जो बोला जा रहा सब जगह सब जगह वाहवाही हो रही है कोई वैज्ञानिक उठ कर नहीं बोलता कि महाभारत में स्टेम सेल का अविष्कार नहीं हुआ था कोई वैज्ञानिक उठ कर खड़ा नहीं हुआ कि क्या बकवास कर रहे हो.

यह तो कह सकते हो कि हिंदुस्तान में मेटलर्जी में बड़ा काम हुआ था, एस्ट्रोनोमी में भी प्राचीन भारत में काम हुआ था, मैथमेटिक में हुआ था लेकिन स्टेम सेल में नहीं हुआ था लेकिन नहीं

सामने बेचैन घावों की अजब सी लकीरों से कटा चेहरा…

खामोश  सब खामोश

बस एक ही है ईमान लम्बे ऊँचे कद का जो सुल्तानी निगाहों में निगाहें डाल रहा है बाकि सब चुप हैं

मनसबदार, शायर और सूफी

यह सोचा जाता है कि क्रांतिकारी शक्तियों के पक्ष में जनता क्यों नहीं आ रही है, वही बात है वे ही शक्तियां जो तानाशाही को ललकारती हैं उनके साथ लोग क्यों नहीं खड़े हो पाते!! उसकी व्याख्या है यह

कोई सोचता ….

यही तो बात है जमाना सांप का काटा, यह जो ताम-झाम है तड़क-भड़क है उसने जनता की चेतना को सम्मोहित कर लिया है. एक आदमी है जो कहता है मैं जादूगर हूँ, सचमुच जादूगर है, जादूगर क्या करता है निगाहें बाँध लेता है. वह जो दिखाता है, जनता देखती है, यही है भूल-गलती.

इसीलिए वह एक ऊँचा कद जिस्म पर नस्तर, जिसको जिंदगी की शर्म सी शर्त नामंजूर है. बाकी सब बेबस हैं, वे सलाम में खड़े हैं बेजुबान, उसके साथ नहीं आ रहे हैं, क्योंकि हमारी-आपकी कमजोरियों के स्याह जिरह बख्तर पहन कर वह बैठा है. हमारी-आपकी कमजोरियां क्या हैं, ज़माने का सांप का काटा हुआ होना क्या है, यह वही विमर्श है जो कभी भी इस तरह के निजाम आने के पहले संक्रामक तौर से आम जनता को ग्रस लिया करता है. उनकी तमाम इच्छाएं, तमाम सपने जिंदगी की बदनसीबी इन सबसे मिला-जुला कर जो एक मनोविज्ञान बनता है एक त्राता का उसको दुह लेते हैं ऐसे लोग.

बहुत सारे चमकीले ख्वाब दिखाए जाते हैं जिससे लोगों की चेतना गिरफ्त में आती है. इसीलिए वह प्रतिरोधी अकेला है.

हमारी भूल-गलती लोहे का जिरहबख्तर पहन कर बैठी है. आज चाह कर भी उसे मार नहीं सकते. हमारी ही भूल-गलतियाँ शासक-वर्ग का जिरहबख्तर बन गयी हैं, उनकी सुरक्षा बन गयी हैं. हमारी ही अपनी चेतना का विभ्रम में पड़ जाना, चमत्कृत हो जाना, हमारी आँखें बंध जाना, सम्मोहित हो जाना.

उसने हमारे प्रतिरोध को अकेला कर दिया है. हमारे प्रतिरोध का गुप्त सोना.

इतने में हमीं में से अजीब तरह का कोई निकल भागा

भरे दरबारे आम …सहम कर रह गये

आज जो देश में स्थिति है, यही है. यह अँधेरे में जो मार्शल लॉ लगा है, किसी जनक्रांति को दबाने के निमित्त जिसमें डोमाजी उस्ताद हैं.

राजनीति का अपराधीकरण जिसे कहते हैं, वह कोई आज का ही नहीं हुआ है. डोमाजी से ले कर आलिमो-फाजिल, उद्योगपति, बुद्धिजीवी सब उसमें शामिल हैं. तानाशाही को बनाने में सभी शामिल हैं.

उनका नेत्रृत्व शहर का सबसे खतरनाक, सबसे निकृष्ट, शहर का सबसे बड़ा गुंडा डोमाजी उस्ताद कर रहा है. यह जो रात के अँधेरे में चल रह है, दिन भर अपने ऑफिस में बैठ कर षड्यंत्र करते हैं, रात में सब मिलते हैं और वही जुलूस चलता है उनका ‘अँधेरे में’.

आधा चेहरा कोलतारी भैरव, आधा सिन्दूरी, ये सब मिलते हैं रात के अँधेरे में. जब इस अँधेरे को देखोगे, वास्तविकता को देखोगे, तब समझ में आयेगा इनका गठजोड़ क्या है!! अलग-अलग मंत्रालयों से ले कर और अदालतों तक की तमाम शक्तियाँ एक साथ कैसे हैं!! वह ‘अँधेरे में’ के रात के उस जुलूस में दिखाई पड़ता है.

आज एक तिहाई हमारा देश सेना और परा-मिलिट्री फ़ोर्स के हवाले है, आर्म्स फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट, आतंकवाद-निरोधी बहुत सारे क़ानून, जो पहले के हैं चल ही रहे हैं. आज ओपरेशन ग्रीन हंट से ले कर तमाम इंसरजेंसी को रोकने-तोड़ने के लिए आर्मी तैनात की जा रही है और यह जो चुप्पी है कि कोई आदमी जो खड़ा हो कर बोल रहा है, वह गलत, बेबुनियाद, बेइन्तहां, बकवास बोल रहा है, उसके खिलाफ कोई बोलने को तैयार नहीं है. जिन लोगों पर यह जिम्मेदारी थी कि वे समाज की आवाज बनेंगे, वे बुद्धिजीवी खामोश हैं.

ऐसे में जनांदोलन की शक्तियां, जनता की स्थिति है कि जमाना सांप का काटा तब दूसरे तरीके भी अख्तियार किये जाते हैं. बुर्ज के उस तरफ भी पहुंचना, जाना पड़ता है. सच्चाई के सुनहरे तेज अक्सों के धुंधलके से मुहैया कर रहा है लश्कर.

तो, आज का जो मंजर है वह उस कविता में भी है, अन्य कविताओं में भी है. इस वक्त बहुत जरूरी है कि चतुर्दिक ढंग से उस भ्रम को छांटा जाए. कोई कवि उसमें मदद कर रहा है तो वह मुक्तिबोध हैं.

 वे अपनी फैंटेसी को कहते हैं कि वह कल वास्तव होगी. अब वह फैंटेसी क्या है, वह फैंटेसी इस कालेपन के बाद खिलने वाला अरुण कमल भी है.

जब मठ और गढ़ तोड़े जायेंगे और वह परम अभिव्यक्ति अनिर्वार, जो कोई साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं है, साहित्यिक मठ और गढ़ नहीं तोड़े जा रहे हैं, वास्तविक मठ और गढ़ तोड़े जा रहे हैं- जहाँ पर सत्ता रहा करती है, जहाँ पर क़ानून बनते हैं, जहाँ पर जनता को प्राप्त थोड़े से न्याय, लोकतंत्र को हटाया जाता है, जहाँ से झूठ बोले जाते हैं, वही प्रतापी सूर्य जहाँ से बहुत बड़ा अँधेरे का विवर, जहाँ से गिद्ध आते हैं, उनको ढहाया जाना भी उनकी फैंटेसी का हिस्सा है, जिसे वे कहते हैं वह कल वास्तव होगी.

इसलिए हो सकता है कि आज के परिदृश्य में बहुत से लोग कविताओं के पास जायेंगे, वहां निराशा मिले, विलाप मिले, प्रलाप मिले, मुक्तिबोध के यहाँ यह है, इसलिए नहीं क्योंकि वह जानते हैं कि जो चीज भी, जहाँ भी है, उसके भीतर से उसका अपना द्वंद्व पैदा होगा, होना ही है.

पूरा इतिहास द्वंद्वात्मक है, पूरा समाज द्वंद्वात्मक है और इस द्वंद्व को पकड़ कर उसका सचमुच निषेध करने वाली शक्तियों को खड़ा करना.

यह समाज परिवर्तन चाहने वाले, राजनीतिक परिवर्तन चाहने वाले और साहित्य की दुनिया में काम करने वाले या जो लोग भी जिस फील्ड में हों, उन सबका दायित्व हो जाता है कि वे निषेध करें क्योंकि इन्हीं सबसे वे भ्रम टूटेंगे.

एक बहुत बड़ा व्यापक मोर्चा जनता का, जिन्हें कि हरदम उन सूखी लकड़ियों को थाम्हे रखना होगा, तलाशे रहना होगा, जिसके अन्दर आग बंद है. उनको थाम्हे बगैर कुछ नहीं बनेगा, वही केन्द्रीय चीज है, वही चीज है जो बताएगी कि प्रतापी सूर्यों के अन्दर जो है इतने बड़े बड़े कलावंत, महान महर्षि ज्ञानवान इन लोगों ने जितने चमकदार सभ्यता को बनाया है उसके अन्दर इतना बड़ा काला धब्बा है जिसके अन्दर से गिद्ध आ रहे हैं पृथ्वी पर.

इसमें ये लाखों-लाख लोगों की शिरकत से होने वाली चीज है और जैसे ही इसके सहभागी आप बनते हैं वैसे ही मुक्तिबोध की कविता के सारे नायकों और वाचकों की तरह आप अपने भीतर से बदलने लगते हैं. आप ही दुनिया को नहीं बदलते, दुनिया भी आपको बदलती है. दोनों बातें एक साथ होती है और तब जो है चकमक की चिंगारियां जिसे रगड़ कर भक्क से आग जलती है, जो मुक्तिबोध की कविता का एक बिम्ब है, वह आग जलेगी.

इसलिए बहुत बुरे समय में भी- मुक्तिबोध कोई अँधेरे के कवि नहीं हैं, अँधेरे की शिनाख्त करने वाले कवि हैं, झूठे उजालों को उघाड़ने, एक्सपोज करने वाले कवि हैं. और सचमुच जो रेडियोधर्मी युग-युग की जो चेतना है आगमिष्यति है, भवितव्य है, उसकी रचना के कवि हैं. ‘अंधेरे में’ पढ़ते हुए भी हम लोगों को शायद इसी तरफ ले जाएगी.

बिना किसी व्याख्या के आप सीधे मुक्तिबोध की कविताओं के पास जाइए क्योंकि शब्द के साथ मनुष्य का जो सम्बन्ध है वही चित्र के साथ नहीं है, चलचित्र के साथ नहीं है.

शब्द जो है उसकी अपनी गूँज होती है, उसके अपने चित्र होते हैं और जब खुद पढ़ेंगे, अपने भीतर कुछ घटता हुआ महसूस करेंगे. साथ में कोई व्याख्याकार नहीं, कोई एलेस्त्रीसियन नहीं, आप हों मुक्तिबोध की कविताएँ हों, मुझे लगता है कि जमाने का चेहरा भी समझ में आएगा और भविष्य का नक्शा भी!

(मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ के पचास वर्ष पूरे होने के अवसर पर आज़मगढ़ में 13 नवंबर 2014 को आयोजित एक गोष्ठी में दिया गया वक्तव्य समकालीन जनमत के पाठकों के लिए)

 

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