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कविता

सविता पाठक की कविताएँ पितृसत्तात्मक चलन और पाखंड को उजागर करती हैं

रुपम मिश्र


सविता पाठक मूल रूप से कहानीकार हैं । कहानी की गद्यात्मकता उनकी कविताओं में भी बनी रहती है । सविता की कविताएँ एक जागरूक संवेदनशील और आधुनिक स्त्री की कविताएँ हैं।

उनकी कविताओं में सामंती बंधनों को तोड़ती छटपटाती स्त्री है साथ ही वह स्त्री अपने समय समाज पर पूरी दृष्टि रखती है। उसे पता है कि पूंजीवाद स्त्री के बंधनों को लेकर व्याकुल नहीं है बल्कि अपने मुनाफे को लेकर व्याकुल होता है। स्त्री की अस्मिता और अस्तित्व दोनों पर पड़े संकट को वो महसूस करती हैं।

उनकी कविताओं में कश्मीर का दर्द भी है और बेरोजगारी की छटपटाहट भी, बर्बाद हुआ पर्यावरण उन्हें झकझोरता है। इन्ही अर्थों में वह स्त्री के लिए खींची गई परिधि को लांघती है और स्पष्ट करती हैं कि आधुनिक स्त्री स्वतंत्र चेता है जरूरी नहीं कि वह सिर्फ स्त्री-जीवन की कथा ही कहे।

स्त्री का संसार पूरे समाज की निर्मिति से अलग नहीं है उसके पूरे जीवन को समाज में हो रही हर घटना प्रभावित करती है। दंगों के दंश पर उनकी कविता जली ऊंगली में वह कहती है…
जली ऊंगली 
बीच वाली उंगली जल गई थी
कब क्या बताऊं
तो सुनो भुने आलू चुराने चली थी
चिपक गया अंगार
एक छोटा सा टुकड़ा आग का

सविता पाठक की कविताओं से पहले मैंने उनकी कहानियाँ पढ़ी थी इसलिए उनकी जमीन को स्पष्ट पहचानती थी , कुछ ब्लॉग पर जाकर उनकी कविताएं पढ़ी तो चकित रह गयी बिना किसी कला दर्शन के सविता की कविताएँ सीधे अपना उद्देश्य रख देती हैं

प्रपंची समाज की सारी कुटिलता पर उनकी कविता सूक्ष्म निगाह रखती है और बिना किसी लाग- लपेट के अन्याय को स्पस्ट कहती हैं।
जहाँ तक बात हो स्त्रीवाद की तो स्त्री दुख कहते हुए सविता एकदम खांटी जमीन पर उतर जाती हैं और ढूँढ लेती हैं स्त्रियों के वो मार्मिक दुःख जिसे हम देखते हुए भी देख नहीं पाते या समाज ने हमारी सोच को ऐसा प्रशिक्षण दिया है कि वो हमें देखने नहीं देता जैसे एक जगह सविता लिखतीं हैं कि-

मेरी मां पिट जाती थी
‘किससे पूछ के दिया घर का सामान’
और मैं हो जाती थी और ढृढ़
मेरी पीढ़ी ने संस्कृति को यूं ही समझा
बाकि तुम्हारे उपाख्यान,
तुम्हारे रक्षक
गांव की बाजार के लुहेड़े हैं

जिन्होंने पहनी है दहेज में मिली सोने की जंजीरे
और कसी हैं किसी मज़लूम के कर्ज से खरीदी हुई अंगुठियाँ
जिनके घरों की दीवारों पर छपी है दर्द की दास्तान
जिनके कुंए,जिनके तालाब
जिनके गांव का देवता
डूब के मर गये या भट गये
या फिर
तुम्हारे रक्षक
वो नाकाबिल पकौड़ी-चोर हैं
जो बस खड़े रहते है दुकान पर बाट जोहते दिन भर
कोई आये कुछ मंगाये
और वो कुछ खाये
फिर देश काल संस्कृति गपियायें

इसमें स्त्री दुःख कहते हुए सविता गाँव की अधकचरा संस्कृति पर भी चोट करती हैं कि किस तरह एक विशेष वर्ग का गवई समाज अकर्मक बनकर दिन भर चौराहों के चक्कर लगाता है और मुफ्तखोरी की लत को अपनी शान समझता है।

मुज्जफरपुर जो कि मेरा देश है– ये कविता सविता के मन से निःसृत आक्रोश है जिसमें शेल्टर होम की अबोध बच्चियों की पीड़ा से वो बिलख उठी हैं और आदमखोरों के लिए मृत्य भी उन्हें नहीं मंजूर वो ऐसे लोगों से भाषा तक छीन लेना चाहतीं हैं ,ये कविता परपीड़ा से तड़प उठी कोमल मन का गहरा आक्रोश है।

मृत्युदंड

मेरा बस चलता तो
तुम्हे मरने नहीं देती
तुम्हे सुनाती दिन रात वो चीखें
बार बार दिखाती वो दृश्य
रात दिन दिखाती कि देखो अपनी हनक और हीनता
तुम्हे गिराती ऐसे खड्डे में जहां सिर्फ तुम्हारी आवाज ही गूंजे
तुम रोते चिल्लाते
तुमसे छीन लेती भाषा

एक प्रिविलेज समाज की जो चालाकियाँ थी स्त्री पर शासन करने की , उसे अपनी सुविधानुसार चलाने की या साफ कहें तो नियंत्रित करने की भावना ये सिर्फ पितृसत्ता का दोष नहीं ध्यान से देखें तो असल खेल पूंजीवाद का है ,पूंजीवाद वो अज़गर है जो बारी-बारी से सबको निगलता है ।

भय कविता लिखते हुए सविता नियंत्रित करने वाले समाज के चेहरे पर पड़ा आवरण एकदम से खींच लेती और दिखाती हैं उनके सारे डर को कि वे इतिहास भूगोल से भी डरते हैं , किताबों डर कर कपड़े में लपेटे रहते हैं , यहाँ तक कि वो नौनिहालों की आँखों में उठे प्रश्नों से भी डरते हैं , उनका ये डर किस तरह संसार को विनाश की ओर ले जा रहा है इसकी बानगी देखिये –
बौखलाहट में वे काटने लगे पेड़ो को , पाटने लगे नदियों को ,मारने लगे लोगों को…!

इसी तरह नकली संवेदनाओं को देखकर सविता का आहत मन खीज कर आओ संवेदनाओं का डिब्बा बनाये कविता लिखता है। अन्याय के खिलाफ लड़ाई को लेकर एक कविता में सविता सीधे कहती हैं कि युद्ध लाज़िम है तुम चाहो न चाहो !

इसमें सविता बहुत गहराई से शोषितों की पीड़ा निरखती हैं और स्पष्ट करती हैं कि लड़ाई किसी जाति वर्ग तक सीमित नहीं है लड़ाई सिर्फ़ सरहद पर नहीं लड़ी जाती , दुकानों अस्पतालों ,रसोईं और बिस्तर तक लड़ी जा रही है। वे कहती हैं कि मैंने देखा-बड़े बडे बुलडोजर विशालकाय नन्हें-नन्हें घरों पर चलते हैं

सविता एक श्रेष्ठ अनुवादक हैं विदेशी भाषा की कई किताबों का अनुवाद वो करती रहती हैं तो जाहिर है उनकी सोच कई संस्कृतियों को परखते चल रही है इसतरह के कई अलग-अलग देशों के कल्चर पर उनकी गहरी पैठ है ।

सविता मूलरूप से कहानीकार हैं तो उनकी कहानियाँ जहाँ मध्यम गति से किसी ठहरे परिदृश्य पर कुछ ठह कर कुछ कहती हैं वही उनकी कविताओं का स्वर एक दम अलग है। इन अर्थों में उनकी कविता में तुरंत फूट पड़े प्रतिरोध, भीतर जमता क्षोभ के स्वर हैं।

गाँवों से लेकर महानगरीय जीवन के बीच कस्बे और छोटे शहरों के समाज के मुँह पर जो मुखौटे हैं सविता उन्हें अपनी कविताओं में उतारती चलती हैं क्योंकि उनकी दृष्टि की गहरी पैठ बताती है कि उन्होंने जीवन के इन विभिन्न स्तरों को बेहद करीब से देखा है और देखा ही नहीं कविता कहीं इतनी उग्र मुखर होती है कि लगता है कवियत्री ने ही इसे जिया है ।

जहाँ तक मैंने उनकी कविताओं और कहानियों को पढ़ा है तो मुझे लगता है कि समाज को अपने चेहरा देखने के लिए सविता ने उनके सामने गर्द झाड़- पोछकर साफ आईना रखा है जिसमें पितृसत्तात्मक चलन के ओढ़े गये पाखंड और दम्भ को वो कहती चलती हैं । एक सदियों से पीछे धकेली जा रही कौम को धर्म और संस्कृति के नाम पर हुए ढोंग को जानने के लिए सविता को पढ़ना ज़रूरी है।

 

सविता पाठक की कविताएँ

1. तुम्हारी संस्कृति मेरी संस्कृति

थोड़ी सी सब्जी में से
हम भाई-बहनों की सब्जी में से
कटोरी मे भर के
मां ने सिखाया था, छुप के दो गली पार दे के आना
नहीं बताना किसी को,पापा को भी नहीं
छुप के देना सबसे छोटी दुल्हन को
जी करता होगा उसका कुछ अच्छा खाने को
रेडियो के कवर के अंदर मां का बैंक
तुड़ी-मुड़ी नोट दे के आना होता था दूसरे गांव
कोई भी मंदिर हो, कोई भी मस्जिद हो
करना चाहिए प्रणाम
अपने घर कोई आये,आये अगर कोई दुख में तो
वो है भगवान
खटिया-मचिया मांगा है जब तब,मांगा है, दिया है, लिया है
नन्ही-नन्ही ये चोरियां
बहुत ऊंचा बना देती है मेरी मां का रसूख
और जिनके सहारे बच जाती है भारतीय संस्कृति की लाज
बाढ़,सूखा या आयी हो कोई विप्पति
मां को समझाना होता था सबसे आसान
मेरी मां पिट जाती थी
‘किससे पूछ के दिया घर का सामान’
और मै हो जाती थी और ढृढ़
मेरी पीढ़ी ने संस्कृति को यूं ही समझा
बाकि तुम्हारे उपाख्यान,
तुम्हारे रक्षक
गांव की बाजार के लुहेड़े हैं
जिन्होंने पहनी है दहेज में मिली सोने की जंजीरे
और कसी हैं किसी मजलूम के कर्ज से खरीदी हुई अंगुठियां
जिनके घरों की दीवारों पर छपी है दर्द की दास्तान
जिनके कुंए,जिनके तालाब
जिनके गांव का देवता
डूब के मर गये या भट गये
या फिर
तुम्हारे रक्षक
वो नाकाबिल पकौड़ी-चोर हैं
जो बस खड़े रहते है दुकान पर बाट जोहते दिन भर
कोई आये कुछ मंगाये
और वो कुछ खाये
फिर देश काल संस्कृति गपियायें

 

2. बेज़ार दिल

बेज़ार दिल
वो दिन ब दिन कमजोर हो रहा
और नजरों को लगता है कुछ गफलत हो रही है
लगता है दुकानों की सारी डमी सड़कों पर चलने लगी है
उन्होंने पहने हैं एक जैसे कपड़े
उनकी अदायें भी एक जैसी
वो कुछ इंच नाप के मुस्कुराते हैं
और मैं ढ़ूढ़ने लगती हूं उनकी चाभी
आज की थीम है लाल,कल थी गुलाबी
कभी नीली,कभी पीली
उनसे मांगती हूं माफी
और देखती हूं – छू के
प्लास्टिक तो नहीं ये
पता नहीं। बस लगता है कि डमी सड़को पर चलने लगी है
तुम्हें यकीन नहीं है
ना करो
क्या मेरी बुद्धि जा रही है
करीब जा के देखो उन्होंने आंखो पर बांधी है काली-काली पट्टियां
एकदम काली-काली
उन्हे कुछ नहीं दिखता
उनके कपड़े, उनके घुँघराले बाल जैसे अंगूर की लतर के रोंये लगते हैं ना
मुझे भी लगते हैं
वो आदमी देखो,कितना ताकतवर
एकदम मजबूत,बाजूओं की मछलियां उछलती है उसकी
और शरीर वैसा, जैसे गोंडवाना की मजबूत चट्टानें
तुम्हे भी लगता है ना
लेकिन वो निकर भी खुद नहीं पहनता
उसका चश्मा भी, उसका नहीं, रोज रोज बदलता है
उसकी टोपी भी उसकी नहीं
वो थीम है किसी दुकान का।
वो बच्चें कुछ गब्बू-लड्डु सरीखे
दुनिया के सबसे स्वस्थ-सुंदर से दिखते
सोचना मत कि, वो तुम्हारे पास आयेंगे
उनकी प्यारी फ्राक और बाबासूट
मैला नहीं होता
वे नहीं जाते-खेलने,नहीं करते कुछ भी ऐसा-वैसा
बस वही करते हैं-वही खेलते हैं
जो थीम है दुकान की।

 

3. मुज़फ्फरपुर जो कि मेरा देश है ….

मृत्युदंड
मेरा बस चलता तो
तुम्हे मरने नहीं देती
तुम्हे सुनाती दिन रात वो चीखें
बार बार दिखाती वो दृश्य
रात दिन दिखाती कि देखो अपनी हनक और हीनता
तुम्हे गिराती ऐसे खड्डे में जहां सिर्फ तुम्हारी आवाज ही गूंजे
तुम रोते चिल्लाते
तुमसे छीन लेती भाषा
तुमसे छीन लेती तुम्हारे हिस्से की रौशनी
तुमसे छीन लेती तुम्हारे हिस्से की हंसी
और छीन लेती तुम्हारे आंसू
तुम रोओ भी तो तेजाब बहे और झुलस जाये तुम्हारा चेहरा
मेरा बस चले तो तुम्हे देती ऐसी सजा
मृत्यु नहीं
ऐसा जीवन जहां तुम जानो कि जानवर के नाम पर चूहे होते हैं
गिलहरी के नाम पर काकरोच
फर्क नहीं कर पाओ चांद और सूरज में
तुम्हारा दिमाग पिलपिला दिमाग
छीट देती उस पर चूना
इतना सड़ा देती कि तुम्हे घृणा होती खुद से
तुम अलग करना चाहते खुद को अपने शरीर से
और शरीर चिपका ही रहता तुमसे
और तुम्हारा दो इंची मांस का लोथड़ा काट के फेंक देती
और कुत्ते खाने से कर देते इंकार
मेरे पास माफी नहीं
लेकिन मेरे पास मृत्यु नहीं
मेरे पास तुम्हे देने के लिए ऐसा जीवन है
जहां अभिशप्त आदमी किलझ रहा हो प्यास से और
मेरी बेटियां थामे हो जीवन-जल जिनको देख पाने की ताब न हो तुममे
और पी न सको तुम एक बूंद भी।

 

4. उदासी

समंदर की आती जाती लहरों के
बीच लेटी है रेत पर
उठने की इच्छा नहीं
चिरनिद्रा में मानो लीन
नमक सिर्फ आंखों से नहीं बहता है उसके
वह खार खार हो गई है
हवा का कोई झोंका
चिड़िया की कोई डुबकी
धान और सुपारी के खेत-बाग
उनकी सोंधी गंध
नहीं जगा पा रहे है अब
कितने विशाल जहाजों को प्रवाह में लाने वाली लहरें
उसे पटक पटक के झिंझोडती है
वो खोई है जैसे चिरनिद्रा में लीन
मानो एक नींद की आस जगा रही हो
उदासी है तो है
गहन,गहरी,अतल
समुन्दर और आकाश की तरह
पृथ्वी को आगोश में लिए

 

5. भय
उन्होंने हर किसी से डरना सीख लिया था
चांद जब पूरा निकलता
तो प्रेतत्मायें घेर के झांकने लगती हैं
झट उन्होंने खिड़की बंद की
और हर जतन किया झिरकी में कील ठोकने का
वट की जटायें जब अपनी प्रिया मिट्टी को चूमती
तो उन्हे लहू टपकाते बूढ़े का दृश्य नजर आता
पीपल के पत्ते ताली बजाते तो उन्हें बरसों पहले डूब मरी बहू की हंसी याद आती
बड़हल गुड़हल महुआ लिसोड़ा
सब उनके डरावने सपने में आते थे
ईमली की छांव में उनका जी मचलाता था
शमी के सिर पर लगी कनगी से उन पर बवाल उतर आता था
उन्होंने डरना सीखा था
उन्हें यूं ही बड़ा किया गया था
घूंट घूंट में डर पिला कर
नहीं पार करना संमदर
नहीं पार करना नदियां
नहीं खाना कहीं का खाना
कच्चा –खाना, पक्का-खाना
छूत खाना-अछूत खाना
नहीं पीना कहीं का पानी
उन्होंने डरना सीखा था
हर किसी से
झबरीला कुत्ता उन्हे भ्रष्ट करने के लिए काफी था
बिल्ली रास्ता काटे तो पूछो मत
रूक जाते हैं तेज पहिए
उनके डर का घेरा रोज बड़ा हो रहा था
वो डर के मारे कहते-अंधेरा कायम रहे
जुगनू देख के धौकनी चलती थी उनकी
उन्हें हर समय खतरा था
भ्रष्ट होने का
पतित होने का
वर्णसंकर होने का
नष्ट होने का
वे डरते थे हर उस आदमी से
जो डरता नहीं था
जिसके बाल नहीं कटे थे उनकी किताब के चित्र के हिसाब से
जो खाता नहीं था उनकी किताब के चित्र के हिसाब से
जो गाता नहीं था उनकी किताब के चित्र के हिसाब से
वो औरतें जो नदियों की तरह उछलती-किलकती थी
वे बहुत डरावनी थीं
वे औरतें जो प्रशान्त मैदानों में बहती, ठाठ से रहती थी
वे भी बहुत डरावनी थीं
वैसे वे औरतों से ही डरते थे
कभी भरोसा नहीं करते थे
वे रोज बनाते थे नई नियमावली
औरतों के लिए
कभी कभी उनकी मंडली में जब वे शामिल हो जाती थीं
तब वे जादू से कायान्तरण करते
रूपान्तरण करते औरतों का,
बड़ी बड़ी कलाएं इजाद की उन्होंने
डर को काबू करने के लिए
और डर बड़ा होता रहा
उन्हें हर समय डर लगता था
कोई मार देगा
कोई खा जायेगा
वे इतिहास और भूगोल से भी
डरते थे
कविता कहानी देख कर उन्हे हौल उठता था
विज्ञान के नाम पर कंपकंपी छूटती थी उन्हें
डर के मारे उन्होंने नदियों को बोतल में भर लिया
डर के मारे बेल पर आरी चलाई और पत्र गमले में उगा लिया
किताबों को कपड़ें में लपेट दिया
वो जितने जतन करते उनका डर बढ़ता जाता
वो दिन में डर जाते थे
नींद में चिहूंक जाते
वे बौखलाहट में काटने लगे पेड़ों को
पाटने लगे नदिंयो
मारने लगे लोगों को
वो रोज भेजते सूचना
हमें डर है
हमें डर है
हमें डर है
कहते हैं उनका सरगना तो
बच्चों की प्रश्नातुर आंखों से भी डरता है

 

6. कश्मीर

देहाती, बऊक
की तरह मुँह खोल के देखती है मेरी अन्तःचेतना
अभी उसे शहर में रहने का शऊर नहीं आया
बचपन की फेफनहीं किताब का वो चित्र
पहाड़ी घर, पहाड़ी खेत सीढ़ीनुमा
चिपका है उसकी दीवार पर भात की लेई से
कश्मीर से आया हर आदमी
उसके सपनों के रास्ते आता हुआ सा लगता है
कहां धूप से तपे-जले उसके गांव के लोग
दुपहरियां में पांव पर छौंक लगाती
पैर में खुटी चुभाती मेरी मिट्टी
कहां ये
बर्फ के फाहे से झक सफेद,सेब से सुर्ख
आंखों में तो इनकी झीले,नदियां और पहाड़ है
नीले-नीले
ये मुंह खोलते हैं मेरा देहाती मन मुंह खोल के सुनने लगता है
सिगड़ी लेके चलते हैं लम्बा सा लबादा ओढ़ते हैं
बताओ तो खुद को गरम रखने के लिए क्या क्या करते हैंं
बड़े नारे लगाये हाथ में झंडा थामे कश्मीर से कन्याकुमारी हम सब एक हैं
जाग जाती थी करेमुआ के साग से भरी गड़ही
खिल उठती थी उसमें कमलिनी
कैसे कैसे नाम प्यारे, प्यारे नाम
देस-परदेस मिला जुला जैसे संझा हो दुपहरिया की
देहाती मन उसकी तो समझ देस-परदेस की रही
आंखे फाड़-फाड़ के देखती है ऐसे में अन्तःचेतना
कई बार लुच्ची सी लगने लगती है औरों को
अब जब
वो सपनों के रास्ते आये लोग खून से लथपथ हैं
उनकी लाशों से कैसे किनारा करूं
कोई बताये..
इस देहाती मन को कोई समझाये..

 

7. झूठ-सच

और जब से उन्होंने जाना
सच में होती है ताकत
सच चमकता है,रौशन कर देता
सच हथियार बन जाता है और नितांत अकेले के साथ भी रहता है
उन्होंने लिख दिया सच और झूठ सिक्के के दो पहलू हैं
नजर का फेर है
अंधेर का असर है
सफेद कागज पर उकेरे स्याह वाक्य
सच पगली औरत का बयान है
सच मूर्खों का आख्यान है
जब से उन्होंने जाना सच में आग की आत्मा बसती है
वह जागती आंखों में जा घुलती है,भभक भभक के फैल जाती है
उन्होंने पट्टियां इजाद की
रंग-बिरंगी
इतनी की सच का रंग कुछ का कुछ हो जाय
उन्होंने ढ़ेरों रंगीन चित्र सजाया
आदमी मारे,उनकी जबान मारी
उनकी किताबों को मुर्दा बनाया
फिर सम्पुट में लेकर आये
पवित्र ग्रंथ की पवित्र बातें
सत्य का संधान सबके बस की बात नहीं
नरो वा कुंजरो
स्त्री पाप का मूल
ऊंच-नीच,ऊंच-नीच
जब से उन्होंने जाना सच अदम्य साहस स्रोत है
वे जोर-जोर से चिल्लाने लगे
वो जोर- जोर से रोने लगे
उनकी अदाकारी देख
असली आदमी घबरा गया
वो क्रोध में हुंकार भरने लगे
उनकी हुंकार सुन
अभी अभी क्रोधित हुआ आदमी चुप हो गया
अब वो हर पल एक दुनिया रचते हैं
झूठ सच झूठ का घोल मिला कर
ऐसे में सच को छानना..
सच को छानना अब एक काम है
अफसोस की नजर भी धुंधली हो जाती है कई बार आदमी की

8. आओ संवेदनाओं के डिब्बे बनायें

उम्र ,रंग, कितना-किसका
पता लगाएं
तेरा-मेरा, इसका-उसका
हमें क्या पता, किसका -किसका
थोड़ा होंठ हिलाये, थोड़ी पलकें झपकाए
ये तो ऐसे, वो तो वैसे
ऐसे को तो,ऐसे ही ऐसे
कंधे उंचकाए,तिरछे हो कुछ मुस्काऐं
कितना बोले, कितना रोयें
जाति धरम की बात खुले
तब तो कुछ बोलें
ओह!कांच की प्लेट है टूटी
माथा फोडे, टेसूऐ गिराये
आओ संवेदनाओं के डिब्बे बनाए।
रोजगार
ले डंडा लगा चुम्बक
दिन भर लोहा ढूढों
बडी कमाई है
ले लो चूहेदानी
घर घर जाके मूस पकडो
पन्नी बीनो
टाई लगा के
छिलनी बेचो
ये कर लो वो करलो
न हो कुछ तो खा पी के मर लो

 

9. एक कविता

और जब आत्मा पर धुंध छा गई है
गला भरा सा रहता है
और आंखे पनीली जलती
आत्मा मोहताज सी लगती है किसी चीज के बगैर
क्यों कि मैंने पैर में पहिए लगा लिए है
वक्त नहीं है कि आत्मा को देखूं
कि वो क्या चाहती है
मैं उसे खींच के बाहर करने की कोशिश करती हूं
वो मुझे खींच के मेरे मरने का दृश्य दिखाती है
युद्द सिर्फ सरहद पर नहीं लड़ा जाता
वो दुकानों पर,सड़को पर,अस्पतालों में
रसोई में और बिस्तर पर हर जगह कहीं ज्यादा बेहरम है
मैंने देखा है
बड़े-बड़े बुलडोजर विशालकाय
नन्हें नन्हें घरों पर चलते
एक चूल्हा चौका और वो नानी के यहां मिला छोटा गिलास
प्यार से खरीदा गया बच्चे का बस्ता
और सहेज के बुना गया छोटा सा सपना
सब कुछ कुचलते हुए
मैंने सोचा कि सट के खड़ी हो दरवाजे पर
कह दूं नहीं ऐसी निर्मम हत्या की गवाह मैं नहीं बन सकती
युद्ध चलने लगा मेरे ही भीतर
एक ब एक मैं घबरा गई
मुझे मेरे बरतन
मेरा चौका मेरे बच्चे का बस्ता
कुचला हुआ सा लगा
ठंडे हो रहे शरीर को देख कर आत्मा ने छेड़ दिया राग
युद्द लाजिम है तुम चाहो न चाहो

 

10. अर्थ के पहले

शब्दों को अकेले न छोड़ो
शब्द से दूर है वाक्य
वाक्य दूर है अर्थ से
इतने नजदीक हैं एक दूसरे के ये सब, बिल्कुल आसपास पड़े लेकिन बिखरे
अनगढ़ नहीं हैं शब्द न अर्थ, ये पूरे पक चुके हैं अपने प्रयोग में
गोमुख की बर्फीली चट्टान से रिसता पानी
विस्तार लेता है गंगोत्री में
और उतरते उतरते भागीरथी, गंगा बनकर पुलक उठती है
जुड़ना और अर्थ बनना पता है नदियों को
अनुगूंज और अर्थ से भरे शब्द और वाक्य
किलकते हैं जलकथाओं में।

किसी ने कहा वाक्यों को शब्दों में तोड़ दो
और शब्दों को उनके छिपे अर्थों में
फिर किसी ने इतनी टूटफूट को जस का तस उठाया
और तोड़ने लगा दांत से
अर्थ चित्कार उठा मुझे इतना नहीं तोड़ो मैं बिखरा हूं पन्ने के बाहर भी भीतर भी मेरे होने की सम्भावनायें न खत्म करो।
..
शब्द बीज हैं कुछ नरम कुछ चरेर
कुछ को चाहिए रात भर पानी का साथ
कुछ को बस चाहिए जरा सी गीली मिट्टी
अर्थ के कल्ले फूट पड़ते हैं

पेड़ों की छाल और विराने में पड़े पत्थर,
खम्बों और मीनारों पर अभिव्यक्त किये
लहूलुहान नाखूनों के साथ मुस्कुराता इतिहास
अचम्भित है
अत्याधुनिक भाषा के साफ्टवेयर पर चुप्पी की पट्टी चिपकी है
दुनिया की सबसे तेज सबसे प्रखर भाषा को हैक कर लिया है किसी ने
गुफाओं की दीवारों पर रंगोरोगन का ठेका मिला है शब्दों को
पत्तों और फूलों को चुन चुन कर स्याही बटोरते कलाकारों को
नगों से जड़ी राजमुद्रित अंगूठियां पेश हैं
अर्थ है पहनो नहीं तो ऊंगलियों को कूच दिया जायेगा।
..
तस्वीरें कैद हैं मठों और गढ़ों में, वंशावली दिखाओ तब नाम लेने के हकदार हो।
जनेऊ ही नहीं जुड़ता यहां, अम्बेडकर को भी जनेऊ की तरह बरता जाता है
अर्थ अटका सा कहता है यज्ञोपवीत की रस्म का विस्तार है
परम्पराओं से अस्थिफूल चुने जाते हैं यहां
अर्थ गंगा में तिरोहित होते हैं मंत्रोच्चार के साथ

बुद्ध की तस्वीर चुरा ली है डिप्रेशन की दुकानवाले ने
अर्थ एक ऐसे सोने के पेड़ की उत्पत्ति है जिस पर लगे हैं हीरे जवाहरात के फल
एक ऐसी मीनार पर बैठ गयें हैं बुद्ध जो अंतरिक्ष से भी ऊंची है जिनके पांव के नीचे से चांदी की चमकती नदी बहती है।
मैत्रेय प्रश्न करते हैं यह जो भौओं के मध्य से प्रकाश प्रकट हो रहा है उसके क्या निहितार्थ हैं
अर्थ दुबका सा कहता है बुद्ध को नहीं परेशान करती है गुरबत में डूबी मरती तस्वीरें
उनके पीछे एक चांद की आभा उग आयी है और भौओं के बीच से उठती चौंध में चन्ना कुछ नहीं दिखा सकता
..।
शब्द बिखरे हैं रोज कोई खेल खेल कर दिखाता है उसके चमत्कार
अर्थ ऐसे कौधते हैं जैसे आकाश में चमक उठती है दस हजार रूपये वाली फुलझड़ी
अर्थ बुझ जाते हैं और अंधेरा और घना और घना आ धमकता है
व्याकरण की पुस्तक पड़ी है उस पर लिपटा है मृतकों के लिए बना वस्त्र
भिंग् क्लींग स्वाहा का शोर बहुत है, नये देव पुराने देव कोटि कोटि देवों में विलीन हैं
अर्थ कहता है कि जजमानी खत्म नहीं हुई और न जजमान
..
शब्दों के ढेर से
अक्षरों से नयी नयी दोस्ती लिए बच्चा जोड़ कर दुहरा रहा है
मरणासन्न पड़ा अर्थ ताकत जमा करता है
बुदबुदाता है एकता में शक्ति है।
तितली का धागा मंडराने लगता है कायनात पर।

 

11. तासीर

मैं बहुत ही फीकी और बेस्वाद औरत हूं
तुम्हारे मजमें को मेरा होना ही बेमजा कर सकता है
तुम्हारी चाय में मक्खी की तरह गिर पड़ूगी
और तुम्हारा जी खराब हो जायेगा
तुम्हारे संगीत में ढ़ोल की तरह फट जाऊंगी
तुम्हारे नृत्य में बेतिया बैताल हो जाऊंगी
तुम्हे बिल्कुल मजा नहीं आयेगा।
तुम ढ़ूढोगे मुझमे थोड़ा खट्टा, थोड़ा मीठा
और कभी कभी तीखा और चटपटा
मैं नीम कैसेली बन कर जीभ को ऐंठ दूंगी
तुम्हे बिल्कुल मजा नहीं आयेगा
तुम मुझे एक पल के लिए बरत नहीं सकते
तहजीब नहीं सीखी तुमने वो
जिसमें झरते अमलतास दोपहर को हसीन बनाते हैं
और गुलमोहर आंखों में खिलते और आसमान में छा जाते हैं
कनेर बारिश में भींग कर हाथों में नहीं मौसम को हल्दी लगाते हैं
शमी की कलगी से काला भौरा उड़कर गुनगुनाता है
और पूरी कायनात में बिखर जाता है गीत का कोई टुकड़ा
मैं बदमजा कर दूंगी तुम्हारी रौनक
बुलाना नहीं! बत्ती की तरह गुल हो जाऊंगी
धरी रह जायेगी तुम्हारी लड़िया, झड़िया
पेट्रोल की तरह उड़ जाऊंगी,कील की तरह चुभ जाऊंगी तुम्हारी गाड़ी के पहिए में
मैं बहुत ही फीकी बेस्वाद औरत हूं

 

(अध्यापन के पेशे से जुड़ी सविता पाठक साहित्य की अलग-अलग गतिविधियों में शामिल रही हैं। उन्होंने ‘अम्बेडकर के जख्म’ नाम से उन्होंने ‘वेटिंग फॉर वीजा’ का हिन्दी अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त सविता पाठक ने विश्व स्तर के कवियों और साहित्यकारों की रचनाओं का अनुवाद समय समय पर किया है। क्रिस्टीना रोजोटी के अनुवाद ‘गोबलिन मार्केट’ पर हिन्दी नाटक अकादमी से प्रायोजित नाटक ‘माया बाजार’ का मंचन प्रख्यात रंगकर्मी प्रवीण शेखर ने एनसीजेडसीसी इलाहाबाद में किया।

देश के कई प्रतिष्ठित मंचों, पत्रिकाओं, पोर्टलों और आकाशवाणी से कविता और कहानी पाठ, अनुवाद कार्य और राजनीतिक सामाजिक लेख प्रकाशित होते रहे हैं।

सविता पाठक ने अंग्रेजी साहित्य में वीएस नॉयपाल के साहित्य और जीवन संबंध पर वर्ष 2008 में पीएचडी की है। सविता पाठक का जन्म 02 अगस्त 1976 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर शहर में हुआ। पढ़ाई-लिखाई अलग-अलग शहरों में हुई है। फिलहाल वे दिल्ली विश्वविद्यालय के अरविंद महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन कर रही हैं।

सम्पर्क: [email protected]

 

टिप्पणीकार कवयित्री रूपम मिश्र, पूर्वांचल विश्वविद्यालय से परास्नातक हैं  और प्रतापगढ़ जिले के बिनैका गाँव की रहने वाली हैं. कई महत्वपूर्ण साहित्यिक मंचों पर स्थान पा चुकीं रुपम देश की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में  प्रकाशित हो रही हैं।

सम्पर्क: [email protected] )

 

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