समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

साहित्य-संस्कृति

प्रतिरोध साहित्य का मूल स्वर है जो समाज निर्माण का स्वप्न लेकर चलता है

डॉ हरिओम
  साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता रहा है. मतलब समाज जैसा है उसे वैसा ही दिखाने वाला लेखन साहित्य है. बचपन से हम...
कविताजनभाषाजनमत

अपने समय से सार्थक संवाद हैं सुस्मिता पाठक की कविताएँ

समकालीन जनमत
रमण कुमार सिंह समकालीन मैथिली कविता में सुस्मिता पाठक एक सुपरिचित और सम्मानित नाम है। मैथिली में स्त्री लेखन को आधुनिक चेतना और नया तेवर...
साहित्य-संस्कृति

प्रगतिशील आन्दोलन की विरासत और हमारा समय

समकालीन जनमत
अपने संयुक्त कार्यक्रमों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए तीन लेखक संगठनों जलेस (जनवादी लेखक संघ), दलेस (दलित लेखक संघ) तथा जसम (जन संस्कृति मंच)...
कहानी

साम्प्रदायिक राजनीति के ख़तरनाक खेल को बेनक़ाब करती है कहानी ‘गौसेवक’

डॉ रामायन राम
28 अगस्त 2019 को सुप्रसिद्ध कथाकार अनिल यादव को उनकी ‘हंस’ में प्रकाशित कहानी ‘गौसेवक’ के लिए वर्ष 2019 के हंस कथा सम्मान से नवाजा...
नाटकसाहित्य-संस्कृति

राजेश कुमार को उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

समकालीन जनमत
  लखनऊ । जनवादी नाटककार राजेश कुमार को उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा हुई है । नुक्कड़ नाटक आन्दोलन में शुरुआती...
स्मृति

‘ फ़िराक़ ’ गोरखपुरी : एक बुजुर्ग बालक

समकालीन जनमत
  ‘ बचा के रखी थी मैंने अमानते-तिफ़ली ’ …… ‘फ़िराक़’ साहब के भीतर एक बच्चा रहता रहा है। वे इस हयात, कायनात, उसके रहस्य-रोमांच...
कवितासाहित्य-संस्कृति

उमेश पंकज का कविता पाठ: ‘मेहतर से नहीं कोई इंसान बेहतर’

कौशल किशोर
लखनऊ, 25 अगस्त। ‘वह पेड़ पर चढ़ कर/हरा बन गयी…..पेड़ से वह गिर गयी/रोप दी गयी मिट्टी में/वह फिर से उग रही है/उस तरह जिस...
कविताजनमत

अंधेरे की घुसपैठ के प्रतिरोध में रोशनी की सुरंग बनाते नवगीत

समकालीन जनमत
डॉ. दीपक सिंह डॉ. राजेंद्र गौतम  कवि, समीक्षक और शिक्षाविद के रूप में एक जाना-पहचाना नाम है | बरगद जलते हैं (1997), पंख होते हैं...
सिनेमा

‘प्रतिरोध का सिनेमा’ ने मंझंनपुर में की दो दिवसीय सिनेमा कार्यशाला

समकालीन जनमत
पहला दिन मंझनपुर के खण्ड शिक्षाधिकारी डॉ. अविनाश सिंह के सहयोग से प्रतिरोध का सिनेमा ने यहाँ सारस स्टेडियम में दो दिवसीय बाल फिल्मोत्सव का...
ख़बरसिनेमा

ग्रामीण भारत में सिनेमा यात्रा

लगभग 25 साल पहले, श्री जहूर सिद्दीकी ने बागपत जिले के रतौल में अपने पैतृक घर को पड़ोस के बच्चों के लिए एक स्कूल में...
जनमतशख्सियतसाहित्य-संस्कृति

त्रिलोचन की याद : बज़िद अपनी राह चलने वाला कवि

रामजी राय
(आज त्रिलोचन का जन्मदिन होता है । इस मौके पर प्रस्तुत है ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक रामजी राय का यह संस्मरण ।) “पथ पर...
कविताजनमत

‘सफ़र है कि ख़त्म नहीं होता’ : सोनी पाण्डेय की कविताएँ

समकालीन जनमत
मदन कश्यप हिन्दी में स्त्री कवयित्रियों की सांकेतिक उपस्थिति तो आदिकाल से रही है। लेकिन 1990 की दशक में जो बदलाव आया उसका एक सकारात्माक...
साहित्य-संस्कृति

प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भोजली पर्व

समकालीन जनमत
पीयूष कुमार हमारे यहाँ छत्तीसगढ़ की संस्कृति प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसके मानवीय एकीकरण की भावना से अनुपूरित है। यह समय समय पर लोक...
कविता

विजय राही की कविताएँ वर्तमान के साथ अंतःक्रिया करती हैं

समकालीन जनमत
अलोक रंजन  एक कवि का विस्तार असीमित होता है और यदि कवि अपने उस विस्तार का सक्षम उपयोग करते हुए अपनी आंतरिक व्याकुलता को समय...
जनमतशख्सियतस्मृति

दलित साहित्य को शिल्प और सौंदर्यबोध देने वाले भाषा के मनोवैज्ञानिक थे मलखान सिंह

सुशील मानव
परसों शाम को फोन पर बात हुई, मैंने पूछा था, सर नया क्या लिख रहे हैं इन दिनों। उन्होंने जवाब में कहा था- “ये मेरे...
कविता

अजय सिंह की कविताएँ अकेले पड़ जाने का खतरा उठा कर भी अपनी बात कहती हैं

उषा राय लखनऊ. शिरोज हैंग आऊट कैफे , गोमतीनगर में प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कवि और राजनीतिक विश्लेषक अजय सिंह ने अपनी...
जनमतशख्सियतस्मृति

उजले दिनों की उम्मीद का कवि वीरेन डंगवाल

समकालीन जनमत
मंगलेश डबराल ‘इन्हीं सड़कों से चल कर आते हैं आततायी/ इन्हीं सड़कों से चल कर आयेंगे अपने भी जन.’ वीरेन डंगवाल ‘अपने जन’ के, इस...
जनमतशख्सियतस्मृति

कटरी की रुक्मिनी: कविता का अलग रास्ता

डॉ रामायन राम
वीरेन डंगवाल 70 के दशक की चेतना के कवि हैं। कविता के क्षेत्र मे उनका प्रवेश 70 के दशक में हुआ । यह वह समय...
जनमतयात्रा वृतान्त

जित देखूँ तित लाल… (प्राग यात्रा-संस्मरण)

समकालीन जनमत
डॉ. रेखा उप्रेती सामान बाँध लिया है| वियना में बिताया यह दिन किसी नायाब तोहफे सा हमारी झोली में आ गिरा है और अब प्राग...
कविताजनमत

स्मृति और प्रेम का कवि कुंदन सिद्धार्थ

समकालीन जनमत
जैसे पूरा गांव ही कमरे में समा गया हो! जब भी कोई शहर से लौटकर गाँव आता तो सारे लोग उसे घेरकर घण्टों शहर की...
Fearlessly expressing peoples opinion