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प्रेमचंद जयंती पर आयोजित हुई गोष्ठी

आज़मगढ़, 31 जुलाई 2026, प्रेमचंद जयंती के अवसर पर प्रलेस, जलेस, जसम, इप्टा और जनवादी लोक मंच ने एक गोष्ठी का आयोजन किया। रैदोपुर स्थित राहुल चिल्ड्रेन एकेडमी में आयोजित इस गोष्ठी का विषय ‘न्याय और जनतंत्र के सन्दर्भ में प्रेमचंद’ रखा गया था। विषय की प्रस्तावना रखते हुए जसम के दुर्गा सिंह ने कहा, कि आज देश वैचारिक संघर्ष के उसी दौर में पहुंच गया, जहाँ वह 1930-40 के दशक में था। उस समय प्रगतिशील, सेकुलर, जनतांत्रिक भारतीय राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद के बीच का संघर्ष आज फिर से राजनीति और समाज के केन्द्र में आ गया है। 1930 का यह वही दशक है, जहाँ प्रेमचंद अपने रचना और विचार के उत्स पर होते हैं। इसी समय प्रेमचंद संस्कृति के सवाल पर ज्यादा मुखर होते हैं। लेकिन जिस एक सवाल को प्रेमचंद कई सन्दर्भों से उठाते हैं, वह न्याय का सवाल है। इस रूप में प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ आज सबसे ज्यादा प्रासंगिक है। अभी ताजा घटनाक्रम जंतर-मंतर पर चले आन्दोलन का है, जहाँ बच्चे-बच्चियों और किशोरों पर, छात्रों पर कील लगी लाठियां चलायी गयीं, पैलेट गन चलाये गये और देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने कहा, कि इस मामले को सुनने के लिए उनके पास समय नहीं है। जिस संस्था की निष्पक्षता और स्वतंत्रता यह सुनिश्चित करती है, कि किसी देश का जनतंत्र या लोकतंत्र कितना टिकाऊ होगा, कितना आगे तक चलेगा, वही सबसे पहले ढह गयी। आज इस देश में न्याय चुनिंदा हो गया है। जाति, धर्म देखकर न्याय किया जा रहा है। उस समय रंगभूमि उपन्यास के नायक सूरदास का घर जलाया गया था, आज सूरदास का घर बुलडोज हो रहा है। इसी के साथ सामाजिक लोकतंत्र का सवाल भी आज मुख्य सवाल है। इस सवाल को प्रेमचंद जो जीवन सन्दर्भ देते हैं, उसे सदगति, ठाकुर का कुआँ, सवा सेर गेहूं आदि के माध्यम से पाया जा सकता है। प्रेमचंद सामाजिक शोषण में धर्म की भूमिका को चिन्हित करते हैं। ब्राह्मणवाद को कटघरे में खड़ा करते हैं। आज सत्ता में बैठी शक्तियाँ उसी धर्म की आड़ में ब्राह्मणवादी मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए अपना खुंखार रूप लेकर सामने आ खड़ी हैं। इसके विरुद्ध लड़ रही शक्तियों के लिए प्रेमचंद आज भी दिशा दिखाने वाले लेखक हैं। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे कन्हैया यादव ने कहा, कि प्रेमचंद के उपन्यासों में आन्दोलन है। प्रेमचंद आन्दोलन को लेकर अपनी कथा बुनते हैं। सम्मान, न्याय, बराबरी इन आन्दोलनों के मूल्य हैं। उन्होंने पंच परमेश्वर कहानी को याद करते हुए कहा, कि न्याय पर जनतंत्र टिकता है। लेकिन आज न्यायाधीश बच्चों पर चल रही लाठी के बीच कहता है, कि उसके पास समय नहीं है। इससे पता चलता है, कि यह देश कहाँ जा रहा है। लेकिन इसमें निराश होने की जरूरत नहीं है। उन्होंने रंगभूमि उपन्यास के सूरदास के माध्यम से कहा, कि हम हारेंगे, लेकिन हम फिर लड़ेंगे और जीतेंगे। उन्होंने कहा, कि किसी आन्दोलन का हासिल शून्य नहीं होता। और किसी आन्दोलन के लिए त्याग और प्रतिबद्धता का होना जरूरी है। इसके अलावा आन्दोलन में कौन दोस्त है, कौन दुश्मन इसकी भी पहचान होनी चाहिए। प्रेमचंद अपने उपन्यास में यह सब दिखाते हैं। उन्होंने प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि पर तफ्सील से बात की। इप्टा के बैजनाथ यादव ने कहा, कि आज न्याय और जनतंत्र दोनों पर गहरा संकट है, लेकिन जंतर-मंतर के आन्दोलन ने 1942 के आन्दोलन को छुआ है। यह आन्दोलन उसी उर्जा और लक्ष्य तक पहुंचा है। जसम के कविता नंदन ने कहा, कि जिस देश में शिक्षित और विद्वानों को जेल में डाला जाय, छात्रों पर लाठी और पैलेट गन चलाये जाय और न्यायपालिका बिक जाय, अपनी स्वतंत्रता खो दे, उस देश में जनतंत्र बच नहीं सकता। उन्होंने कहा, कि हमारा आलस है, कि हम इन सवालों पर चुप्पी लगाये रहे। गोष्ठी में जलेस के अजय गौतम ने प्रेमचंद के नाटकों और कहानियों के माध्यम से न्याय और जनतंत्र पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, कि हमें अपने आस-पास की चीजों पर भी न्याय के पक्ष में खड़ा होना अपने व्यवहार में शामिल करना होगा। कोयलसा डिग्री काॅलेज के अध्यापक जयराम यादव ने कहा, कि प्रेमचंद अपने समय में अकेले लेखक हैं, जो दुनिया के लेखकों की बराबरी में खड़े होते हैं, उसी ऊंचाई से। उन्होंने कहा, कि प्रेमचंद अपने समय की दो लड़ाइयों को पहचानते हैं और उसे अपनी रचनाओं में उठाते हैं, एक विदेशी गुलामी से मुक्ति और दूसरे देश के भीतर सामाजिक गुलामी से मुक्ति। गोष्ठी में प्रलेस सचिव डाॅ. वी सी यादव, सत्यम प्रजापति ने अपनी बात रखी। इसके अलावा कविता नन्दिनी और लोकायन के राजनाथ यादव ने अपने जनगीत प्रस्तुत किये। संचालन दुर्गा सिंह ने किया। आभार जनवादी लोक मंच के रविन्द्र नाथ राय ने व्यक्त किया।

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