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जनमत शख्सियत स्मृति

उजले दिनों की उम्मीद का कवि वीरेन डंगवाल

मंगलेश डबराल


‘इन्हीं सड़कों से चल कर आते हैं आततायी/ इन्हीं सड़कों से चल कर आयेंगे अपने भी जन.’ वीरेन डंगवाल ‘अपने जन’ के, इस महादेश के साधारण मनुष्य के कवि हैं.

इसी के साथ वे उन दूसरे प्राणियों और जड़-जंगम वस्तुओं के कवि भी हैं, जो हमें रोज़मर्रा के जीवन में अक्सर दिखाई देती हैं लेकिन हमारे दिमाग में दर्ज नहीं होतीं. कविता के ये ‘अपने जन’ सिपाही रामसिंह और इलाहाबाद के मल्लाहों, लकड़हारों और रेलवे स्टेशन के फेरीवालों, डाकियों, अपने दोस्तों की बेटियों समता और भाषा, और निराला, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, पीटी ऊषा, तारंता बाबू, किन्हीं माथुर साहब और श्रोत्री जी तक फैले हुए हैं. वस्तुओं के स्तर पर यह संसार भाप के इंजन, हाथी, ऊँट, गाय, भैंस, कुत्ते, भालू, सियार, सूअर, मक्खी, मकड़ी, पपीते, इमली, समोसे, नींबू, जलेबी, पुदीने, भात और पिद्दी का शोरबा आदि तक हलचल करता है.

इन जीवित-अजीवित चीज़ों से वीरेन का व्यवहार कितना आत्मीय और ऐंद्रीय है, इसके साक्ष्य उनकी बहुत सी रचनाओं में हैं. मसलन, ‘फरमाइशें’ में वे कहते है : ‘कुत्ते मुझे थोड़ा-सा स्नेह दे/गाय ममता/भालू मुझे दे यार/शहद के लिए थोड़ा/अपना मर्दाना प्यार/भैंस दे थोड़ा बैरागीपन/बंदर फुर्ती/अपनी अक्ल से मुझे बख्शे रहना सियार’.’ इस कविता में कुत्ते, गाय, भालू, भैंस, बंदर और सियार की अपनी-अपनी स्वभावगत विशेषताओं का एक वर्णन है, लेकिन असल चीज़ शायद वह प्रेम और आत्मीयता है जो इन प्राणियों के प्रति कवि के भीतर से उमड़ती है. कवि सियार से भी यह कहता है कि मुझे तुम्हारी अक्ल यानी चालाकी की कोई ज़रूरत नहीं है.

भाप इंजन को याद करती, नींबुओं को सलाम करती, पोस्टकार्डों की महिमा गाती, अधेड़ नैनीताल की उधेड़बुन में उलझती, फूलों से भरी हुई फरवरी का ‘घुटनों चलती बेटी’ की तरह स्वागत करती, जीव-जंतुओं और खाद्य पदार्थों की विलक्षण सत्ता का गुणगान करती इन कविताओं का उद्देश्य उनका एक ‘लार्जर दैन लाइफ’ रूपांतरण करना नहीं, बल्कि उनके अपने अस्तित्व को, एक खास और संक्षिप्त अर्थ को, उनके उस छोटे से प्रकाश को दिखलाना है जिसे हम प्राय: भूले रहते है.

साधारण चीज़ों की एक असाधारण दुनिया दिखाने का काम हिंदी कविता में कुछ हद तक हुआ है, लेकिन वीरेन की कविता जैसे एक जि़द के साथ कहती है कि मामूली लोग और मामूली चीज़ें दरअसल उसी तरह हैं जिस तरह वे हैं और इसी मामूलीपन में उनकी सार्थकता है जिसे पहचानना उनके जीवन का सम्मान करना है और हम जितना अधिक ऐसे जीवन को जानेंगे, उतने अधिक मानवीय हो सकेंगे. व्यापक नकार और ‘सिनिसिज़्म’ के दौर में वीरेन की कविता जीवन के स्वीकार को ज़रा भी नहीं छोड़ती.

‘मक्खी’ शीर्षक कविता में स्याही में गिरी हुई मक्खी को जब बाहर निकाला जाता है तो ‘वह दवात के कगार पर बैठी रही कुछ देर / हाल में घटी दुर्घटना के बोझ से झुकी हुई और पस्त/फिर दवात की ढलान पर रेंगती उतर गई धूप में/अपने जुड़े पंखों पर पतली टांगों को चलाते हुए/उसने लिया हवा और धूप को /अपने झिल्ली डैनों पर/खिड़की पर बैठे हुए/कुछ देर बाद वह वहाँ नहीं थी/सलाख पर….गिरी न होगी /उड़ चली होगी दूसरी मक्खियों के पास/क्योंकि मक्खियाँ गिरा नहीं करती कहीं से/अगर वे जि़ंदा हों.’

वीरेन के अड़सठ वर्षीय जीवन-काल (जन्म: 5 अगस्त 1947; निधन: 28 सितम्बर 2015) में तीन कविता संग्रह, कुछ छिटपुट लेख और ‘पहल पुस्तिका’ के रूप में तुर्की के क्रांतिकारी महाकवि नाजिम हिकमत की कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए.

संग्रहों का यह सफ़र 1991 में ‘इसी दुनिया में’ से शुरू हुआ हालांकि तब तक ‘रामसिंह’, ‘पीटी उषा’, ‘मेरा बच्चा’, ‘गाय’, ’भूगोल-रहित’, ‘दुःख’, ‘समय’ और ‘इतने भले नहीं बन जाना साथी’ जैसी कविताओं ने वीरेन को मार्क्सवाद की ज्ञानात्मक संवेदना से अनुप्रेरित प्रतिबद्ध और जन-पक्षधर कवि की पहचान दे दी थी, जिसकी आवाज़ अपने समकालीनों से कुछ अलहदा और अनोखी थी और अपने पूर्ववर्ती कवियों से भी गहरा संवाद करती थी. उसमें खास तौर पर निराला और शमशेर बहादुर सिंह के काव्य विवेक की रोशनी थी. ‘इसी दुनिया में’ की कुछ कविताएँ कवि की मूल प्रस्थापनाओं का घोषणा पत्र जैसी मानी जा सकती हैं :

‘मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ
और गुठली जैसा
छिपा शरद का ऊष्म ताप
मैं हूँ वसन्त का सुखद अकेलापन
जेब में गहरी पडी मूंग़फली को छांट कर
चबाता फुरसत से
मैं चेकदार कपडे की कमीज़ हूँ
उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं
मैं उनका मुखर गुस्सा हूँ.’

आत्मकथ्य सरीखी इन पंक्तियों में वीरेन की काव्य संवेदना के प्रमुख सरोकार साफ़ हो जाते हैं. उसमें अनुभव की उदात्तता है तो रोजमर्रा की मामूली चीज़ों के प्रति गहरा लगाव भी. ग्रीष्म की तेजस्विता और शरद की ऊष्मा और वसंत के सुखद अकेलेपन के साथ जेब में पडी मूंग़फली और चेकदार कमीज़ की महत्ता एक नया अनुभव और नया सौंदर्यशास्त्र निर्मित करती है. यहाँ उदात्त अनुभवों और साधारण दुनियावी चीज़ों में कोई बुनियादी विभेद नहीं है, अमूर्तनों और भौतिक उपस्थितियों के बीच कोई दूरी नहीं है, बल्कि वे एक दूसरे के साथ और उनके भीतर भी अस्तित्ववान और पूरक हैं. मामूलीपन और नगण्यता के जिस गुणगान के लिए वीरेन की कविता पहचानी गयी, उसकी शुरुआत इस तरह की बहुत सी और खासकर ‘पीटी उषा’ जैसी कविताओं से हुई थी जिसमें वीरेन क्रिकेट की संभ्रांतता के बरक्स पीटी ऊषा के खेल की अपेक्षाकृत निम्नवर्गीयता, उसके सामान्य चेहरे और सांवलेपन को उभारते हुए उसे ‘मेरे गरीब देश की बेटी’ कह कर समोधित करते हैं: ‘उसकी आंखों की चमक में जीवित है अभी/भूख को पहचानने वाली विनम्रता/ इसीलिए चहरे पर नहीं है/ सुनील गावस्कर की छटा.’ वे उसे सलाह देते हैं कि अगर खाना खाते समय तुम्हारे मुँह से चपचप की आवाज़ होती है तो यह अच्छा है क्योंकि जो लोग ‘बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता मानते हैं/ वे दुनिया के सबसे खाऊ और इसलिए खतरनाक लोग हैं.’

‘पर्जन्य’, वरुण’,’इंद्र’, ‘द्योस’ जैसे रूपकों और बिम्बों पर रोमांचक शिल्प की कविताओं में भी वीरेन की संवेदनात्मक स्मृति का स्वरूप इसी तरह जनवादी रहा. इन वैदिक छवियों को साधारण जन की आंखों से और एक भौतिक भूमिका में देखा गया है. वीरेन जब इंद्र का उल्लेख करते हैं तो उसकी उंगलियों में मोटी-मोटी पन्ने की अंगूठियां दिखलाना नहीं भूलते: ‘वह समुद्रों को उठाकर सितार की तरह बजाता है/ वह पानी का स्वामी है,/सातों समुद्रों और सारी नदियों पर उसका एकाधिकार है/ जबकि यहाँ हमारे कंठ स्वरहीन और सूखे हैं’. वन की देवी वन्या भी जंगलात के अफसरों की क्रूरता से भयभीत स्त्री है और अपने ही जंगल में जाते हुए आशंका से भरी हुई है: ‘अकेले कैसे जाऊँगी मैं वहाँ/मुझे देखते ही विलापने लगते हैं चीड़ के पेड़/सुनाई देने लगती है/ किसी घायल लड़की की दबी-दबी कराह.’ इन रचनाओं में वीरेन ने देवताओं के संसार में भी वर्ग-विभेद को, उनकी जन-पक्षधर और जन-विरोधी उपस्थितियों को जिस तरह रेखांकित किया, वह हिन्दी कविता लका एक नया आयाम था जिसमें पपीता, इमली, समोसे, जलेबी, ऊँट, हाथी, गाय, मक्खी जैसी वस्तुएं भी पहली बार कविता का विषय बनीं.

ये कविताएँ जिस दौर में लिखी गयीं, वह नेहरू-युगोत्तर मोहभंग की सामाजिक-बौद्धिक-राजनीतिक उथल-पुथल, नक्सलबाडी की ‘वसंत गर्जना’ और उसके क्रूर दमन, विश्व स्तर पर वियतनाम युद्ध के विरोध, अमेरिका की विद्रोही बीट पीढी की अराजकता और काली या अश्वेत चेतना से उबलता हुआ था. वीरेन की संवेदना पर भी इस उभार की गहरी छाप पडी. उन्हीं दिनों आलोकधन्वा की ‘जनता का आदमी’ और ‘गोली दागो पोस्टर’, लीलाधर जगूड़ी की ‘बलदेव खटिक’ और वीरेन की ‘रामसिंह’ नक्सलबाडी संघर्ष की प्रमुख कविताओं के रूप में लोकप्रिय हुईं और नाटक की शक्ल में भी मंचित की गयीं. इन सभी कविताओं का मुख्य सरोकार मनुष्य का शोषण-दमन करने वाली शासक शक्तियों का प्रतिरोध करना, क्रांति का स्वप्न जगाना और मानवीय अच्छाई समानता के संघर्ष की अनिवार्यता को रेखांकित करना था. ‘रामसिंह’ एक गरीब पहाडी परिवार के बेटे और फ़ौजी सिपाही के छुट्टी पर घर जाते हुए देखती है और उसे आत्म-साक्षात्कार के बिंदु तक ले जाती है:

‘तुम किसकी चौकसी करते हो रामसिंह?
तुम बन्दूक के घोड़े पर रखी किसकी उँगली हो?
किसका उठा हुआ हाथ?
किसके हाथों में पहना हुआ काले चमड़े का नफ़ीस दस्ताना?
ज़िन्दा चीज़ में उतरती हुई किसके चाकू की धार ?
कौन हैं वे, कौन
जो हर समय आदमी का एक नया इलाज ढूँढते रहते हैं?
जो रोज़ रक्तपात करते हैं और मृतकों के लिए शोकगीत गाते हैं
जो कपड़ों से प्यार करते हैं और आदमी से डरते हैं
वे माहिर लोग हैं रामसिंह
वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं’

यह कविता अपने क्रांतिकारी वक्तव्य के अलावा रामसिंह के फ़ौजी जीवन के ब्यौरों के साथ पहाड़ के स्मृति-बिम्बों को एक विरोधाभासी संयोजन में रखने की वजह से भी याद की गयी: ऐसे बिंब तब तक हिन्दी कविता में बहुत नहीं आये थे: ‘पानी की तरह साफ़ ख़ुशी’, ‘घड़े में, गड़ी हुई दौलत की तरह रक्खा गुड़’, ‘हवा में मशक्कत करते पसीजते चीड़ के पेड़’, ‘नींद में सुबकते घरों पर गिरती हुईं चट्टानें’, ‘घरों में भीतर तक घुस आता बाघ’ ऐसे ही सघन दृश्य थे. हाथी, ऊँट, गाय, पपीता, इमली, समोसे वगैरह पर लिखी कविताओं की संरचना विवरणात्मक और निबंध सरीखी है. ‘गाय’ कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ—’वह एक गाय है/धुँधला सफेद है उसका रंग/वह घास चर रही है/वहाँ जहाँ बरसात ने मैदान बना दिया है/जब वह चरती है तो चर्र-चर्र करती है’—तीसरी-चौथी कक्षा के उस बच्चे के वाक्यों की याद दिलाती है जिसे परीक्षा में गाय पर निबंध लिखने के लिए कहा गया हो. यह संघ परिवार की करतूतों और परोपजीवी धर्मतंत्र द्वारा एक संकीर्ण धार्मिक प्रतीक में बदल दी गयी गाय नहीं, बल्कि भारतीय गाँवों और किसान जीवन के ‘सेकुलर स्पेस’ की प्राणी है.

‘इसी दुनिया में’ की समीक्षा करते हुए रवींद्र त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘कवि गाय को धार्मिक संदर्भों से मुक्त कर उसे आत्मीय रूप में प्रस्तुत करता है. यह भारतीय मनुष्य और गाय के उदात्तीकृत रिश्ते का एहसास है.’ इस संग्रह की ‘इलाहाबाद:1970’ और ‘सड़क के लिए सात कविताएँ’ भी चर्चा में रहीं और इलाहाबाद को तत्कालीन साहित्यिक माहौल में अनोखे ढंग से देखती थीं: ‘छूटते हुए छोकडेपन का गम, कडकी, एक नियामत है डोसा/ कॉफ़ी हाउस में थे कुछ लघुमानव, कुछ महामानव/ दो चे गेवारा/ मनुष्य था मेरे साथ रमेन्द्र/उसके पास थे चार रुपये.’

संग्रह की एक और कविता में वीरेन मनुष्य के दुःख की पहचान एक नए और भैतिक ढंग से करते हैं, उसे ‘भाप की तरह तैरते हुए’ देखते हैं अँधेरे में भी उसकी सच्चाई से साक्षात्कार करते हैं, और फिर उससे एक सार्थक राजनीतिक आयाम दे देते हैं: ‘नकली सुखी आदमी की आवाज़ में/टीन का पत्तर बजता है/ मसलन मारे गये लोगों पर/राजपुरुष का रुंधा हुआ गला.’ इस तरह के अप्रत्याशित अर्थ-स्तर वीरेन की कविता में बहुत बार आते हैं और एक कथ्य अचानक एक ज्यादा व्यापक अनुभव तक चला जाता है. मुक्तिबोध ने जब ’कविता की स्थानान्तरगामी प्रवृत्ति’ की ज़रूरत का ज़िक्र किया था तो उनका आशय ऐसे ही विस्तारों से रहा होगा. ‘तोप’ शीर्षक कविता इसकी एक सुंदर मिसाल है जो कवि की प्रतिबद्धता, अन्याय के साधनों और जन-सघर्षों से जुडी ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को बतलाती है.

सन 1857 की जन-क्रांति का दमन करने के काम आयी एक औपनिवेशिक तोप का मौजूदा हाल यह है कि उस पर बच्चे घुड़सवारी करते हैं और चिड़ियाँ कभी उसके ऊपर और कभी भीतर बैठ बैठकर गपशप करती हैं. अंत में कवि कहता है: ‘कितनी भी बड़ी हो तोप/एक दिन तो होना ही है उसका मुंह बंद.’ दरअसल वीरेन आरम्भ में ही एक अलग किस्म के कवि के रूप में सामने आये और ‘इसी दुनिया में’ आठवें दशक की कविता का एक प्रमुख दस्तावेज़ बन गया.

ग्यारह साल बाद सन 2002 में वीरेन का दूसरा संग्रह ‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ प्रकाशित हुआ, जिस पर उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला. कुछ समय तक यह चर्चा भी रही कि दोनों संग्रहों में से कौन सा बेहतर है. निश्चय ही, ‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ पहले संग्रह से आगे का कदम था—शिल्प-सजगता और भाषा के स्तर पर कहीं अधिक परिपक्व, लेकिन संवेदना की आधार-भूमि पहले जैसी थी. यह स्वाभाविक भी था क्योंकि अच्छे कवियों की मूल भूमि बदलती नहीं है, उनका मूल निवास वही रहता है, सिर्फ उनका जलागम-क्षेत्र–कैचमेंट एरिया—विस्तृत होता रहता है, संवेदना ग्रहण करने के स्रोत बढ़ते जाते हैं. ख़ास बात यह है कि उनकी ज़्यादातर वे कविताएँ बेहतर मानी गयीं जिनमें कहीं-न-कहीं ‘इसी दुनिया में’ की ऊष्मा और विकलता का विस्तार था. संग्रह की शीर्षक कविता, के साथ ‘हड्डी खोपड़ी खतरा निशान’, ‘रात-गाडी’, ‘मां की याद’, ‘माथुर साहब को नमस्कार’, ‘फैजाबाद-अयोध्या’, ‘हमारा समाज’, ‘कुछ नयी कसमें’, ‘सूअर का बच्चा’, ‘तारंता बाबू से कुछ सवाल’, ‘पोस्टकार्ड महिमा’ और ‘उजले दिन ज़रूर’ ऐसी ही अर्थ-बहुल और शिल्प-समृद्ध रचनाएँ हैं जिनमें से ‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ वीरेन की हस्ताक्षर-कविता बनी.

‘उजले दिन ज़रूर’ को अपने प्रतिबद्ध जनवादी कथ्य के कारण ‘इतने भले नहीं बन जाना साथी’ और ‘हमारा समाज’ जैसी पहले संग्रह की कविताओं के साथ बहुत सी साहित्यिक गोष्ठियों, और खासकर जनसंस्कृति मंच और ‘हिरावल’ के कार्यक्रमों में गाया जाने लगा. इसी दौर में वीरेन ने नाज़िम हिकमत की कई प्रभावशाली कविताओं का अनुवाद किया.

‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ वीरेन की बेहतरीन कविताओं में शामिल है. यह किसी अज्ञात ईश्वर, किसी ‘करुणानिधान’ से किये गये शिकवे की तरह है, जिसमें प्रकृति के विशाल कारोबार को, नदी, पर्वत, हाथी की सूंड, कुत्ते की जीभ और दुम, मछली, छिपकली और आदमी की आंतों के जाल को ‘भगवान का कारनामा’ करार देते हुए समकालीन यथार्थ की अमानुषिकताओं-विरूपनों के बारे में विचलित करने वाले सवाल पूछे गये हैं:

‘नहीं निकली कोई नदी पिछले चार-पांच सौ सालों से
जहाँ तक मैं जानता हूँ
न बना कोई पहाड़ या समुद्र
एकाध ज्वालामुखी ज़रूर फूटते दिखाई दे जाते हैं कभी-कभार.
बाढ़ेँ तो आयीं खैर भरपूर, काफी भूकंप,
तूफ़ान खून से लबालब हत्याकांड अलबत्ता हुए खूब
खूब अकाल, युद्ध एक से एक तकनीकी चमत्कार
रह गई सिर्फ एक सी भूख, लगभग एक सी फौजी
वर्दियां जैसे
मनुष्य मात्र की एकता प्रमाणित करने के लिए
एक जैसी हुंकार, हाहाकार!
प्रार्थनाग्रृह ज़रूर उठाये गए एक से एक आलीशान!
मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से
वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार
ऊँगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!
आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर
तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार?’

‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ हमारे समाज, लोकतंत्र और मनुष्य की आत्मिक संरचना में आये क्षरण और गिरावट को दर्ज करता है. ‘हड्डी खोपड़ी खतरा निशान’ में जब वीरेन कहते हैं कि ‘अब दरअसल सारे खतरे खत्म हो चुके हैं/प्यार की तरह’ तो वे एक आत्म-केन्द्रित, खुदगर्ज़ और संवेदना-रहित होते जाते समाज पर गहरा व्यंग्य करते हैं. ऐसी रचनाओं में खास तौर से लोकतंत्र पर बढ़ने वाले संकटों, साम्प्रदायिक ताकतों के उन्माद की तीखी प्रश्नाकुल चीरफाड़ मिलती है: ‘पर हमने कैसा समाज रच डाला है/इसमें जो दमक रहा, शर्तिया काला है/वह क़त्ल हो रहा सरे आम सड़कों पर/ निर्दोष और सज्जन, जो भोला-भाला है/ किसने ऐसा समाज रच डाला है/ जिसमें बस वही दमकता है जो काला है.’ अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस की त्रासदी पर लिखते हए वीरेन दो कविताओं में निराला को याद करते हैं और राम और निराला दोनों को तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सांप्रदायिक-फासिस्ट ताकतों के प्रतिरोध का औज़ार बना देते हैं. ’अयोध्या-फैजाबाद’ निराला की एक कविता-पंक्ति को उधृत करते हुए कहती है:

‘वह एक और मन रहा राम का
जो न थका
इसीलिए रौंदी जा कर भी
मरी नहीं हमारी अयोध्या
इसीलिए हे महाकवि, टोहता फिरता हूँ मैं
इस
अँधेरे में
तेरे पगचिन्ह.’

एक छंदबद्ध कविता उजले दिन ज़रूर’ में भी देश और समाज के हालात बतलाने के लिए राम की शक्ति पूजा का सन्दर्भ है: ‘आकाश उगलता अन्धकार फिर एक बार/ संशय विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती/…होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार/ तब कहीं मेघ ये छिन्न -भिन्न हो पाएँगे/ आयेंगे उजले दिन ज़रूर आयेंगे.’

‘रात-गाडी’ भी संग्रह की एक अहम कविता है हालाँकि उसकी चर्चा ज्यादा नहीं हुई.वह ‘दीन और देश’ यानी नैतिकता और समाज के विकृत-अमानवीय परिदृश्य की पड़ताल करती है जहां एक तरफ ‘बेरोजगारों के बीमार कारखानों’ जैसे विश्वविद्यालय हैं, ‘राजधानियां गुंडों के मेले हैं’, ‘कलावा बांधे गदगद खल विदूषक’ हैं जो ‘सोने के मुकुट पहनकर फोटो उतरवा रहे’ हैं और दूसरी तरफ ‘बेघर बेदाना बिना काम के मेरे लोग/ चिंदियों की तरह उड़े चले जा रहे हैं/ हर ठौर देश की हवा मैं.’

दो विसंगतियों को साथ-साथ रखने की इस प्रविधि में पूरा देश दिखाई दे जाता है जिसकी आख़िरी पंक्तियों में कवि कहता है:’खुसरो की बातों में संशय है/ खुसरो की बातों में डर है/ इसी रात में अपना भी घर है’. ‘माथुर साहब को नमस्कार’ भी ऐसी ही कम चर्चित कविता है, लेकिन वह दो व्यक्तियों के माध्यम से मनुष्यता की निरंतरता और उसमें कवि की अटूट आस्था को मर्म छूने वाले ढंग से रेखांकित कर जाती है.

इस प्रसंग में कवि को कहीं अचानक अपने गणित के दिवंगत अध्यापक माथुर साहब दिखाई दे जाते हैं, लेकिन बाद में पता चलता है कि वे कोई श्रोत्री जी हैं जिन्हें कवि ने माथुर सर समझकर नमस्कार किया है.

माथुर साहब की अनुपस्थिति श्रोत्री जी की उपस्थिति एक मार्मिक वक्तव्य निर्मित करती है: ‘लोगों में ही दीख जाते हैं लोग भी/ लोगों में ही वे बच रहते हैं/ किसी चमकदार सुघड़ मज़बूत विचार की तरह/ दीख जाते हैं कौंधकर जब लग रहा होता है ‘सब कुछ ख़त्म हुआ’/शुक्रिया श्रोत्रीजी माथुर सर शुक्रिया/याद रखूँगा मैं अपना सीखा गणित का एकमात्र सूत्र/ ‘शून्य ही है सबसे ताक़तवर संख्या/ हालाँकि सबसे नगण्य भी.’

वैचित्र्य-विरूप और कौतुक को, जिन्दगी के ऊटपटांगपन को देखने की वीरेन की क्षमता भी इस संग्रह की कई कविताओं में सामने आयी. मिसाल के लिए, यूनानी संगीतकार यान्नी की अगवानी में लिखी गयी ‘डीज़ल इंजन’. यान्नी ने कुछ वर्ष पहले ताजमहल के सामने अपना संगीत प्रस्तुत किया था. यान्नी संगीत के हमारे देसी माहौल में उसी तरह की उपस्थिति हैं जैसे कोयला इंजन के रूमान और रोमांच की दुनिया में बेसुरे भडभड करते डीज़ल इंजन का आगमन.

यह छोटी-सी कविता रेल में डीज़ल इंजन और संगीत में यान्नी का इस तरह एक साथ स्वागत करती है: ‘आओ जी, आओ लोहे के बनवारी/अपनी चीकट में सने-बने/यह बिना हवा की पुष्ट देह/यह भों-पों-पों/आओ पटरी पर खड़कताल की संगत में/विस्मृत हों सारे आर्तनाद /आओ, आओ चोखे लाल/आओ, आओ चिकने बाल/आओ, आओ दुलकी चाल/पीली पट्टी लाल रुमाल/आओ रे, अरे, उरे, उपूरे, परे, दरे, पूरे, दपूरे/के रे केरे?’ यह देखना दिलचस्प है कि वीरेन किस तरह डीज़ल इंजन और यान्नी के बीच एक संबंध बनाते हैं.

दोनों का संगीत हमारे अपने ध्वनि-सहचर्यों को दबा देता है और उस विसंगति को पैदा करता है जो हमारे अपने आर्तनाद को विस्मृत करती हुई जीवन में एक विरूपता को प्रविष्ट करा देती है. कविता की अंतिम पंक्तियाँ : आओ रे, अरे, उरे, उपूरे, परे, दरे, दपूरे, के रे, केरे के विन्यास में सतह पर कुछ अपरिचित शब्द हैं. ‘उरे, उपूरे, परे, दपूरे, केरे’ जैसे शब्द-समुच्चयों को हम उत्तर रेल, उत्तर पूर्व रेल, पश्चिम और दक्षिण रेल, पूर्व रेल और केंद्रीय रेल के अर्थ में ले सकते हैं, लेकिन यहाँ वे अपने अर्थों से विच्छिन्न संकेतकों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, ध्वनियों का एक विरूप पैदा करते हैं.

‘घोड़ों का बिल्ली अभिशाप’, ‘काम-प्रेम’ ‘गप्प-सबद’ और ‘कुछ नयी कसमें’ भी ऐसी रचनाएँ हैं जिनमें वीरेन शिल्पगत तोड़फोड़ करते हैं और अनुभवों के विद्रूप की चीरफाड़ भी करते हैं. ‘कुछ नयी कसमें’ विचित्र ढंग से ‘हल्दीराम भुजिया की कसम/ रिलायंस के तेल की कसम/ प्रमोद महाजन की कसम, कालू वितरण की कसम/ भाईचुंग भूटिया की कसम’ खाती हुई अंत में कुछ सुंदर-साधारण-सुखद चीज़ों की कसमें खाकर एक प्रतिरोधात्मक कविता बन जाती है: ’फिर भी लेता हूँ फूलमती तिराहे की कसम/ पुल बंगश की कसम/चमेली की बगिया की कसम/ दद ठंढ़ी रसमलाई की कसम/ सिविल लेंन इलाहाबाद की कसम/सेमल की रूई जैसे कुरकुरे कोहरे से भरे /नैनीताल की कसम/जो चीज़ तू है कोई और नहीं.’ ऐसी कविताओं का उद्देश्य सिर्फ भाषाई खिलवाड़ या कौतुक नहीं था.

इन कसमों के ज़रिये वीरेन यह भी बताते चलते हैं कि साधारण चीज़ों-जगहों के कसमें खाने में एक असाधारणता और वर्गीय विशिष्टता निहित है. इस अर्थ में वे कवि की राजनीतिक स्थापनाएं भी हैं.

एक और चर्चित कविता ‘सूअर का बच्चा’ वीरेन की बारीक निरीक्षण क्षमता, ब्यौरों की पकड़, छंद-प्रयोग और ठेठ देसी किस्म के सौंदर्यशास्त्र का सुन्दर उदाहरण है. पहली बारिश में ‘धुल-पुंछकर अंग्रेज़’ बना हुआ सूअर का बच्चा अपनी आँखों से सड़क के जो दृश्य देखता है, उनका इतना राग-भरा वर्णन एक दुर्लभ चीज़ है जो वीरेन के अलावा शायद नागार्जुन या त्रिलोचन या नगरीय प्रसंगों में रघुवीर सहाय के यहाँ ही मिल सकता है. ये एक कस्बे की सड़क के दृश्य हैं जिनमें आम तौर पर कोई आकर्षण नहीं होता, लेकिन वीरेन सूअर के बच्चे की आँखों से देखे गए इन दृश्यों को इतना सुंदर, कोमल और उदात्त बना देते हैं कि वह एक क्लासिकी अनुभव में बदलने लगता है: ‘पहले-पहल दृश्य दीखते हैं इतने अलबेले/आँखों ने पहले-पहले अपनी उजास देखी है/ठंडक पहुँची सीझ हृदय में अद्भुत मोद भरा है/इससे इतनी अकड़ भरा है सूअर का बच्चा.’

पहले इस कविता का उपर्शीर्षक ‘सूअर के बच्चे का प्रथम वर्षा दर्शन’ था. सूअर का बच्चा वीरेन की निगाह में किसी भी दूसरे मानवीय या मानवेतर शिशु जैसी ही, बल्कि शायद उससे भी अधिक कोमल-निश्छल उपस्थिति है. दरअसल मनुष्यों, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और खाद्य सामग्री का भी एक निम्न वर्ग, एक ‘सबॉल्टर्न’ होता है जिससे वीरेन को मनुष्यों जैसा ही लगाव है. ‘समोसे’ इस संदर्भ में एक प्रतिनिधि उदाहरण है.

इसमें एक आम निम्नवर्गीय दूकान का जि़क्र है जहाँ ‘कढ़ाई में सनसनाते समोसे’ बन रहे हैं: ‘बड़े झरने से लचक के साथ /समोसे समेटता कारीगर था/दो बार निथारे उसने झन्नफन्न/यह दरअसल उसकी कलाकार/ इतराहट थी/तमतमाये समोसों के सौंदर्य पर/दाद पाने की इच्छा से पैदा’, और फिर—’कौन अभागा होगा इस क्षण/जिसके मन में नहीं आएगी एक बार भी/समोसा खाने की इच्छा.’ जब कवि समोसे खाने के लिए लपकता है तब तक समोसे बनाता कलाकार और समोसे की कलात्मकता इतना स्वायत्त हो उठते हैं, इस तरह अपना सौन्दर्यशास्त्र निर्मित निर्मित कर लेते हैं कि उनके सामने समोसे खानेवाला कुछ अप्रासंगिक हो उठता है. वीरेन का हुनर यह है कि वे मनुष्य के उपभोग में आने वाली चीज़ों को मनुष्य इ अलग करके स्वतंत्र और स्वायत्त बना देते हैं.

वीरेन की संवेदना के एक सिरे पर नागार्जुन जैसे जनकवि की देसीपन और यथार्थवाद है तो दूसरे सिरे पर शमशेर जैसे ‘सौंदर्य के कवि’ हैं और दोनों के बीच कही निराला की उपस्थिति है.

तीनों मिलकर उनके काव्य- विवेक की त्रिमूर्ति निर्मित करते हैं और अपने वक़्त के अँधेरे से लड़ने की राह दिखाते हैं: ‘कवि हूँ मैं पाया है प्रकाश.’ ‘शमशेर’ कविता एक बड़े कवि के विकल जीवन को बहुत कम शब्दों में दर्ज करती है: ‘अकेलापन शाम का तारा था/ इकलौता/ उसे मैंने गटका/ नींद की गोली की तरह/ मगर मैं सोया नहीं.’ ‘पूर्वजों से लगातार संवाद करती वीरेन की कविता भाषा का भी एक नया देशकाल रचती है, जिसमें तत्सम-तद्भव आपस में घुले-मिले हैं और अक्सर तत्सम की जगह तद्भव है या इसका उलट है.

उनके राजनीतिक-नैतिक सरोकार और ठेठ देशज अनुभव क्लासिक और तत्सम आयामों से जुड़कर एक संश्लिष्ट काव्य-व्यक्तित्व बनाते हैं. यह अंतर्क्रिया तब भी दिखती है जब वे शमशेर जैसी सौंदर्य की ऊँचाई पर जाते हैं तो वहाँ एक नागार्जुन खड़े मिलते हैं और जब वे नागार्जुन के निपट निरलंकार यथार्थ को खोजते हैं तो वहाँ एक शमशेर मौजूद होते हैं. इन दो बड़ी परंपराओं के भीतर काम करते हुए भी वीरेन प्रचलित काव्य-प्रविधियों के भीतर एक ज़रूरी विखंडन पैदा करते हुए सौंदर्य, प्रेम और संघर्ष की निम्नवर्गीयता को कसकर थामे रहते हैं. इसके लिए वे भाषाई अराजकता को भी अपनाते हैं, कई प्रचलित देशज शब्दों का इस्तेमाल करते हैं या पुराने शब्दों को नयों की तरह बरतते हैं.

वीरेन का तीसरा संग्रह ‘स्याही ताल’ सन 2010 में प्रकाशित हुआ, जिसमें उनकी बेचैनी और बेफिक्री, तात्कालिक हताशा और बुनियादी उम्मीद के साक्ष्य मिलते हैं. ’कटरे की रुकुमिनी और उसकी माता की खंडित कथा’ जैसी कुछ लंबी कविता में वीरेन अपने भयावह समय को एक खंडित गद्यात्मक कथा में पढ़ते हैं. यह एक चिंतित मनुष्य की कविता है जो समाज के ‘सड़ते हुए जल’ में देखता है कि किस तरह ग्राम प्रधान, दारोगा और स्मैक तस्कर वकील का भ्रष्ट त्रिकोण एक गरीब विधवा की चौदह वर्ष की बेटी को अपना शिकार बनाना चाहता है. यह एक दुर्वह-दुस्सह यथार्थ की कविता है जिसके और भी बर्बर और भयावह रूप आज हमारे समाज में बढ़ रहे बलात्कारों और हत्याओं में दिखाई दे रहे हैं. ‘ऊधो, मोहि ब्रज’ में इलाहाबाद के ‘अमरूदों की उत्तेजक लालसा -भरी गंध’ को याद करते हुए वीरेन कहते हैं: ‘अब बगुले हैं या पंडे हैं या कउए हैं या वकील/…नर्म भोले मृगछौनों के आखेटोत्सुक सियार.’ यह सिर्फ मोहभंग नहीं है, बल्कि एक नये डरावने समय में आशंकित मन की मुक्तिबोधीय चिंता है.

‘स्याही ताल’ वीरेन के जीवन की दो त्रासद घटनाओं का दस्तावेज़ भी है: पिता की मृत्यु, और खुद की बीमारी, जो सारी उम्मीदों के खिलाफ असाध्य और अंततः प्राणघातक बनती गयी. ‘रॉकलैंड डायरी’ बीमारी के दौरान अस्पताल में देखे-सोचे गये दृश्यों की डरावनी फैंटेसी है जो अनायास मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता ‘अँधेरे में’ की याद दिलाती है: ‘विभ्रम/ दुःस्‍वप्‍न/कई धारावाहिक कूट कथाओं की रीलें/ अलग-बगल एक साथ चलतीं,/ जनता, हां जनता को रौंद देने के लिए उतरीं/ फौजी गाडियों की तरह/ हृदय में घृणा और जोश भरे/ साधु-सन्‍त-मठाधीश-पत्रकार दौलत के लिज-गिल-गिल/ पिछलग्‍गू /ललकारते जाति को एक नये विप्‍लव के लिए.’ चार कवितांश पिता की बीमारी, मृत्यु, अंतिम संस्कार और फिर स्मृति से सम्बंधित हैं और अंत में पिता स्मृति में इस तरह बच रहते हैं: ‘एक शून्‍य की परछाईं के भीतर/ घूमता है एक और शून्‍य पहिये की तरह/ मगर कहीं न जाता हुआ/ फिरकी के भीतर घूमती एक और फिरकी/ शैशव के किसी मेले की.’

लेकिन तमाम हताशाओं के बावजूद वीरेन उस उम्मीद को कभी ओझल नहीं होने देते जो यह मानती है कि ‘आदमी कमबख्त का सानी नहीं है/फोड़कर दीवार कारागार की इन्साफ की खातिर/तलहटी तक ढूंढता है स्वयं अपनी राह.’अपने जहाजी बेटे के लिए लिखी गयी इस कविता ‘उठा लंगर खोल इंजन’ में वीरेन कहते हैं: ‘हवाएं रास्ता बतलायेंगी/पता देगा अडिग ध्रुव/ चम्-चम्-चमचमाता/प्रेम अपना/ दिशा देगा/ नहीं होंगे जबकि हम तब भी हमेशा दिशा देगा/लिहाजा/उठा लंगर खोल इंजन छोड़ बंदरगाह.’

गंभीर बीमारी और सर्जरी के बावजूद वीरेन ने लिखना जारी रखा और उनकी अब तक असंकलित कविताएँ दो बदलावों का संकेत करती हैं: वे संवेदना और अनुभव के उन स्रोतों की ओर मुड रहे थे जिनमें या तो स्थानीयता और कुछ ‘पहाडीपन’ था या जिनसे ‘रामसिंह’ जैसी जुझारू कविता संभव हुई थी और शिल्प के स्तर पर भी उस रास्ते को अपना रहे थे जिसका ज़िक्र उन्होंने पिछले संग्रह में किया था: ‘इसीलिए एक अलग रस्ता पकड़ा मैंने/फितूर सरीखा एक पक्का यकीन.’ एक लम्बी नाटकीय रचना ‘परिकल्पित कथालोकांतर काव्य-नाटिका नौरात शिवदास और सिरीभोग वगैरह’ खास तौर से ध्यान खींचती है जो लोक-कथा की शक्ल में एक प्रतिभावान दलित ढोल-कलाकार और एक रानी के बीच प्रेम संबंधों और राजा द्वारा उसकी हत्या के षड्यंत्र के इर्दगिर्द बुनी गयी है, लेकिन ख़ास बात यह है कि इससे पहले ही दलित ढोलवादक राजा को पीटकर फरार हो जाता है. वर्षों बाद उस वादक का पोता शिवदास इस कथा के प्रसंग में एक नया गीत जोड़ता हुआ बड़े संघर्ष का आवाहन करता है:

‘राज्जों, वजीरों का, शास्त्रों-पुराणों का नाश हो
जिन्होंने हमें गुलाम बनाया
इन तैंतीस करोड़ देवताओं का नाश हो
जो अपनी आत्मा जमाये बैठे हैं
हिमालय की बर्फीली चोटियों में
किसने सताया तुम्हें-हमें
इन पोथियों-पोथियारों, ताकतवालों ने
इनका नाश हो.’

इस रास्ते पर आगे बढ़ते हुए वीरेन कविता के नये पडावों की ओर जा रहे थे, लेकिन असामयिक और दुखद मृत्यु ने उनके सफ़र को रोक दिया. उनकी आख़िरी कविताओं में यह एहसास विकल रूप में दिखता है हालाँकि उसके साथ उम्मीद का दामन भी नहीं छूटता: ‘ये दिल मेरा ये कमबख्त दिल/डॉक्टर कहते हैं ये फिलहाल सिर्फ पैंतीस फीसद काम कर रहा है/ मगर ये कूदता है शामी कबाब और आइसक्रीम खाता है/ भागता है/शामिल होता है जुलूसों में धरनों पर बैठता है/ इंक़लाब जिंदाबाद कहते हुए/या कोई उम्दा कविता पढ़ते हुए अब भी भर लाता है/इन दुर्बल आखों में आंसू/दोस्तों-साथियो मुझे छोड़ना मत कभी/कुछ नहीं तो मैं तुम लोगों को देखा करूंगा प्यार से/दरी पर सबसे पीछे दीवार से सटकर बैठा.’ इसी नाउम्मीद सी उम्मीद के भीतर वीरेन देश-समाज का जायजा लेने से नहीं चूकते: ‘हमलावर बढे चले आ रहे हैं हर कोने से/ पंजर दबता जाता है उनके बोझे से/मन आशंकित होता है तुम्हारे भविष्य के लिए/ ओ मेरी मातृभूमि ओ मेरी प्रिया/कभी बतला भी न पाया कि कितना प्यार करता हूँ तुमसे मैं.’

यह गौरतलब है कि वैचारिक प्रतिबद्धता और जनता के संघर्षों पर विश्वास वीरेन डंगवाल की कविता और व्यक्तित्व में अंत तक उनकी आरभिक प्रस्थापना की ताईद करते हुए बने रहे: ’एक कवि और कर भी क्या सकता है/ सही बने रहने के अलावा.’ या आकस्मिक नहीं है कि रघुवीर सहाय की प्रसिद्ध कविता का ‘रामदास’ वीरेन के आख़िरी दौर में अस्पताल में असाध्य बीमार पड़े हुए ‘रामदास-2’ के रूप में लौट आता है.

हर कवि की एक मूल संवेदना होती है जिसके इर्द-गिर्द उसके तमाम अनुभव सक्रिय रहते हैं. इस तरह देखें तो वीरेन के काव्य व्यक्तित्व की बुनियादी भावना प्रेम है. ऐसा प्रेम किसी भी अमानुषिकता और अन्याय का प्रतिरोध करता है और उन्मुक्ति की ओर ले जाता है.

ऐसे निर्मम समय में जब लोग ज़्यादातर घृणा ही कर रहे हों और प्रेम करना भूल रहे हों, मनुष्य के प्रति प्रेम की पुनर्प्रतिष्ठा ही सच्चे कवि का सरोकार हो सकता है. शायद इसीलिए वीरेन की कविता में वर्गशत्रु या अंधेरे की ताकतों से नफरत उतनी नहीं है, बल्कि यह बर्बर ताकतों का तिरस्कार है. यह कविता इसीलिए एक अजन्मे बच्चे को माँ की कोख में फुदकते, रंगीन गुब्बारे की तरह फूलते-पचकते, कोई शरारत भरा करतब सोचते हुए महसूस करती है या दोस्तों की बेटियों को एक बड़े भविष्य का दिलासा देती है.

एक पेड़ के पीले-हरे उकसे हुए, चमकदार पत्तों को देखकर वह कहती है: ‘पेड़ों के पास यही तरीका है/यह बताने का कि वे भी दुनिया को प्यार करते हैं.’ शायद यही वजह है कि वीरेन ‘कत्थई गुलाब वाले’ शमशेर के बहुत निकट हैं, वे उन्हें बार-बार याद करते हैं और शमशेर के जीवन का निचोड़ और खुद हमारे समाज का निर्मम हाल बतलाते हैं: ’मैंने प्रेम किया/इसी से भोगने पड़े/मुझे इतने प्रतिशोध.’

यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि ‘पूरे संसार को ढोनेवाली/ नगण्यता की विनम्र गर्वीली ताक़त’ की पहचान करती हुई वीरेन की कविता अपने कलेवर में इतने अधिक प्राणियों और वस्तुओं को, उनके विशाल धड़कते हुए असित्व को समेटती चलती है. वीरेन के दोस्तों और प्रशंसकों की दुनिया भी इतनी बड़ी थी जितनी शायद किसी दूसरे समकालीन कवि की नहीं होगी. उनके निधन पर असद जैदी ने मीर तकी ‘मीर’ की रुबाई का हवाला दिया था जिसमें किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने की ख्वाहिश ज़ाहिर की गयी है जो ‘सचमुच मनुष्य हो, जिसे अपने हुनर पर अहंकार न हो, जो अगर कुछ बोले तो एक दुनिया सुनने के लिए आये और जब वह खामोश हो तो लगे कि एक दुनिया खामोश हो गयी है.’ वीरेन की शख्सियत ऐसी ही थी जिसके खामोश हो जाने से लोगों और कविताओं की दुनिया में जो उदास खामोशी व्याप्त हुई, वह अब भी महसूस होती रहती है.

 

आइए याद करें कवि वीरेन को उनकी कुछ चुनिंदा कविताओं की मारफ़त

 

1. परम्परा

पहले उसने हमारी स्मृति पर डंडे बरसाये
और कहा—’असल में यह तुम्हारी स्मृति है’
फिर उसने हमारे विवेक को सुन्न किया
और कहा—’अब जाकर हुए तुम विवेकवान’
फिर उसने हमारी आँखों पर पट्टी बाँधी
और कहा—’चलो अब उपनिषद पढ़ो’
फिर उसने अपनी सजी हुई डोंगी हमारे रक्त की
नदी में उतार दी
और कहा—’अब अपनी तो यही है परम्परा’।

 

2. जलेबी

भारत को बचाकर रखेगी
जलेबी
यों ही नहीं बन गया
वह खमीर
उसके पीछे है
हज़ारों बरस की साधना और अभ्यास
जिसे रात-भर में अंजाम दे दिया गया
इतनी करारी पूर्णता के साथ।

तपस्वी विलुप्त हो गए
घुस गए धनुर्धारी महानायकों के दौर
गांधी जी तक हलाक कर दिये गये
जलेबी मगर अकड़ी पड़ी है थाल पर

सिंककर खिलीं
किसी फूल की
वह सुंदर और गर्मागर्म
पेचीदा सरसता।

 

3. फरमाइशें

कुत्ते मुझे थोड़ा सा अपना स्नेह दे
गाय ममता भालू मुझे दे दे यार,
शहद के लिए थोड़ा
अपना मर्दाना प्यार
भैंस दे थोड़ा बैरागीपन बन्दर फुर्ती
अपनी अक्ल से मुझे बख्शे रखना सियार।

 

4. पोदीने की बहक

सब्ज़ी ठेले की बगल से भी गुज़रो
तो तर कर देगी वह खुशबू
जो इतनी अलौकिक है
कि आँखों के रास्ते ही दिमाग में जा पहुँचती है
और फिर फेफड़ों से होती हुई
छा जाती है हस्ती पर।

जैसे ब्राह्मी आँवला केश तैल की स्वातंत्र्योत्तर सुगंध।

उन खुशबुओं से कोई ऐतराज़ नहीं मुझे
जो वैश्वीकरण के इन दिनों इतनी भरपूर है
कि ठसाठस भरी बसों में भी
गला दबोच लेती हैं
झूठ क्यों बोलूँ उनमें से कई तो काफी मनभावन भी हैं
सौम्य पाश्चात्य संगीत की तरह
लेकिन पोदीने की बात इस सबसे ज़रा अलग है
जिसे ये हिन्दुत्ववादी तो हरगिज़ नहीं समझ पाएँगे :

महीना जून का है
लू लपटाये ले रही है कचहरी में
पाकड़ के भारी दरख्त को
घनी छाँह में चिडिय़ों की सूखी-ताज़ा
दोनों तरह की बीट से रँगी
प्रागैतिहासिक काष्ठकला के निरभ्र नमूने सरीखी
तख्तों की बनी कुर्सी पर बैठ समोसा-चटनी खाते
सन पचहत्तर से प्रैक्टिस करते उन लगभग असफल वकील साहब को देखो—
मौसमों की मार खाये
काले कोट में
किसी पुराने छत्ते की तरह ललछौंहे और जर्जर
मुश्किल से हाथ हाये उस फटेहाल
मुवक्किल को पूरी तरह चबा जाने की
बेताबी है उनकी अन्यथा निरीह आँखों में
बेमेल चश्मे से मढ़ी ये आँखें
कभी भरी रहती थीं
समाजवाद राममनोहर लोहिया भारतीय संविधान
और न्यायपालिका आदि की
अजेय सर्वोच्चता की जगमग से।
फिलहाल उनमें मोतियाबिंद भर रहा है।

इस समय अगर वो कुछ चमकती दीख रही हैं
तो उसका कारण वह थोड़ा चटोरपन और थोड़ी तृप्ति है
जो उपजी उस चटनी से
जिसे तैयार किया अलस्सुबह के एकांत में
दस वर्षीय प्रशिक्षु कारीगर ने
महर्षि चरक की पसंदीदा इस सुगंधित शीतल बूटी के साथ
हरी मिर्चें इमली का गुदा और गुड़ पीसकर।

यह अलग बात कि प्रशिक्षणार्थी के
गालों की चुटकी भर रहा था
उस समय उद्दंड अधेड़ वरिष्ठ कारीगर बार-बार
जिससे ग्लानिग्रस्त उस असहाय बालक के
आँसू ढुलके पड़ रहे थे।
वे भी मिले हों शायद पोदीने की
इस चटनी में।
इस प्रसंग को पाद-टिप्पणी ही जानें।

 

5. इतने भले नहीं बन जाना साथी

इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कूवत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?

इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊँचे सन्नाटे में सर धुनते रह गये
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना

इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरकते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बगल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना

ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं जो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो, उस पर भी तो तनिक विचारो

काफी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती
अन्धकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी
(1984)

 

6. रामसिंह

दो रात और तीन दिन का सफर करके
छुट्टी पर अपने घर जा रहा है रामसिंह
रामसिंह अपना वार्निश की महक मारता ट्रंक खोलो
अपनी गन्दी जर्सी उतार कर कलफदार वर्दी पहन लो
रम की बोतलों को हिफाजत से रख लो रामसिंह, वक्त खराब है;
खुश होओ, तनो, बस में बैठो, घर चलो।

तुम्हारी याददाश्त बढिय़ा है रामसिंह
पहाड़ होते थे अच्छे मौके के मुताबिक
कत्थई-सफेद-हरे में बदले हुए
पानी की तरह साफ
खुशी होती थी
तुम कण्टोप पहन कर चाय पीते थे पीतल के चमकदार गिलास में
घड़े में, गड़ी हुई दौलत की तरह रक्खा गुड़ होता था
हवा में मशक्कत करते चीड़ के पेड़ पसीजते थे फौजियों की तरह
नींद में सुबकते घरों पर गिरा करती थीं चट्टानें
तुम्हारा बाप
मरा करता था लाम पर अंगरेज़ बहादुर की खिदमत करता
माँ सारी रात रोती घूमती थी
भोर में जाती चार मील पानी भरने

घरों के भीतर तक घुस आया करता था बाघ
भूत होते थे
सीले हुए कमरों में
बिल्ली की तरह कलपती हुई माँ होती थी बिल्ली की तरह
पिता लाम पर कटा करते थे
खिदमत करते चीड़ के पेड़ पसीजते थे सिपाहियों की तरह;
सड़क होती थी अपरिचित जगहों के कौतुक तुम तक लाती हुई
मोटर में बैठकर घर से भागा करते थे रामसिंह
बीहड़ प्रदेश की तरफ।

तुम किसकी चौकसी करते हो रामसिंह?
तुम बन्दूक के घोड़े पर रखी किसकी ऊँगली हो?
किसका उठा हुआ हाथ?
किसके हाथों में पहना हुआ काले चमड़े का नफीस दस्ताना?
जि़न्दा चीज़ में उतरती हुई किसके चाकू की धार?
कौन हैं वे, कौन
जो हर समय आदमी का एक नया इलाज ढूँढ़ते रहते हैं?
जो बच्चों की नींद में डर की तरह दाखिल होते हैं?
जो रोज़ रक्तपात करते हैं और मृतकों के लिए शोकगीत गाते हैं?
जो कपड़ों से प्यार करते हैं और आदमी से डरते हैं?
वे माहिर लोग हैं रामसिंह
वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं।

पहले वे तुम्हें कायदे से बन्दूक पकडऩा सिखाते हैं
फिर एक पुतले के सामने खड़ा करते हैं
यह पुतला है रामसिंह, बदमाश पुतला
इसे गोली मार दो, इसे संगीन भोंक दो
उसके बाद वे तुम्हें आदमी के सामने खड़ा करते हैं
ये पुतले हैं रामसिंह, बदमाश पुतले
इन्हें गोली मार दो, इन्हें संगीन भोंक दो, इन्हें…इन्हें…इन्हें…
वे तुम पर खुश होते हैं—तुम्हें बख्शीश देते हैं
तुम्हारे सीने पर कपड़े के रंगीन फूल बाँधते हैं
तुम्हें तीन जोड़ा वर्दी, चमकदार जूते
और उन्हें चमकाने की पालिश देते हैं
खेलने के लिए बन्दूक और नंगी तस्वीरें
खाने के लिए भरपेट खाना, सस्ती शराब
वे तुम्हें गौरव देते हैं और इस सबके बदले
तुमसे तुम्हारे निर्दोष हाथ और घास काटती हुई
लड़कियों से बचपन में सीखे गये गीत ले लेते हैं

सचमुच वे बहुत माहिर हैं रामसिंह
और तुम्हारी याददाश्त वाकई बहुत बढिय़ा है।

बहुत घुमावदार है आगे का रास्ता
इस पर तुम्हें चक्कर आयेंगे रामसिंह मगर तुम्हें चलना ही है
क्योंकि ऐन इस पहाड़ की पसली पर
अटका है तुम्हारा गाँव

इसलिए चलो, अब ज़रा अपने बूटों के तस्मे तो कस लो
कन्धे से लटका ट्रांजिस्टर बुझा दो तो खबरें आने से पहले
हाँ, अब चलो गाड़ी में बैठ जाओ, डरो नहीं
गुस्सा नहीं करो, तनो

ठीक है अब ज़रा आँखें बन्द करो रामसिंह
और अपनी पत्थर की छत से
ओस के टपकने की आवाज़ को याद करो
सूर्य के पत्ते की तरह काँपना
हवा में आसमान का फडफ़ड़ाना
गायों का नदियों की तरह रँभाते हुए भागना
बर्फ के खिलाफ लोगों और पेड़ों का इकट्ठा होना
अच्छी खबर की तरह वसन्त का आना
आदमी का हर पल मौसम और पहाड़ों से लडऩा
कभी न भरने वाले ज़ख्म की तरह पेट
देवदार पर लगे खुशबूदार शहद के छत्ते
पहला वर्णाक्षर लिख लेने का रोमांच
और तुम्हारी माँ का कलपना याद करो
याद करो कि वह किसका खून होता है
जो उतर जाता है तुम्हारी आँखों में
गोली चलाने से पहले हर बार?

कहाँ की होती है वह मिट्टी
जो हर रोज़ साफ करने के बावजूद
तुम्हारे भारी बूटों के तलवों में चिपक जाती है?

कौन होते हैं वे लोग जो जब मरते हैं
तो उस वक्त भी नफरत से आँख उठाकर तुम्हें देखते हैं?

आँखें मूँदने से पहले याद करो रामसिंह और चलो।
(1978)

 

7. पी.टी. ऊषा

काली तरुण हिरनी
अपनी लम्बी चपल टाँगों पर
उड़ती है मेरे गरीब देश की बेटी

आँखों की चमक में जीवित है अभी
भूख को पहचानने वाली विनम्रता
इसीलिए चेहरे पर नहीं है
सुनील गावस्कर की छटा

मत बैठना पी.टी.ऊषा
इनाम में मिली उस मारुति पर मन में भी इतराते हुए
बल्कि हवाई जहाज़ में जाओ
तो पैर भी रख लेना गद्दी पर

खाते हुए मुँह से चपचप की आवाज़ होती है?
कोई गम नहीं
वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता
दुनिया के सबसे खतरनाक खाऊ लोग हैं
(1988)

 

8. हमारा समाज

यह कौन नहीं चाहेगा उसको मिले प्यार
यह कौन नहीं चाहेगा भोजन-वस्त्र मिले
यह कौन न सोचेगा हो छत सर के ऊपर
बीमार पड़ें तो हो इलाज थोड़ा ढब से

बेटे-बेटी को मिले ठिकाना दुनिया में
कुछ इज़्ज़त हो, कुछ मान बढ़े, फल-फूल जायँ
गाड़ी में बैठें, जगह मिले, डर भी न लगे
यदि दफ्तर में भी जाएँ किसी तो न घबरायँ?
अनजानों से घुल-मिल भी मन में न पछतायँ।

कुछ चिंताएँ भी हों, हाँ कोई हरज नहीं
पर ऐसी नहीं कि मन उनमें ही गले घुने
हौसला दिलाने और बरजने आसपास
हो संगी-साथी, अपने प्यारे, खूब घने।

पापड़-चटनी, आँचा-पाँचा, हल्ला-गुल्ला
दो-चार जशन भी कभी, कभी कुछ धूम-धाँय
जितना संभव हो देख सकें, इस धरती को
हो सके जहाँ तक, उतनी दुनिया घूम आयँ

यह कौन नहीं चाहेगा?

पर हमने यह कैसा समाज रच डाला है
इसमें जो दमक रहा, शर्तिया काला है
वह कत्ल हो रहा, सरेआम चौराहे पर
निर्दोष और सज्जन, जो भोला-भाला है

किसने आखिर ऐसा समाज रच डाला है
जिसमें बस वही दमकता है, जो काला है?

मोटर सफेद वह काली है
वे गाल गुलाबी काले हैं
चिंताकुल चेहरा-बुद्धिमान
पोथे कानूनी काले हैं
आटे की थैली काली है
हर साँस विषैली काली है
छत्ता है काली बर्रों का
वह भव्य इमारत काली है

कालेपन की वे सन्तानें
हैं बिछा रहीं जिन काली इच्छाओं की बिसात
वे अपने कालेपन से हमको घेर रहीं
अपना काला जादू हैं हम पर फेर रहीं
बोलो तो, कुछ करना भी है
या काला शरबत पीते-पीते मरना है?

9. मार्च की एक शाम में आईआईटी कानपुर

मृत्यु का अभेद्य प्रसार।
इस उजाड़ झुटपुटे में कोई नहीं
रास्ता बतानेवाला।
दुमें साधे डगडगाकर भागते-भागते भी
मनहूस आवाज़ में बोलते हैं मोर
गर्वीली आवाज़ में बोलते हैं मोर
गर्वीली गरदनों वाले कितने किशोर
आये यहाँ
गुम हो गए।
मेधा उनकी
पुकारती रही
पुकारती रही विकल।

फिर उस्ताद हत्यारों ने उसे बदला
एक निश्छल लालच में।
अंत में बन जाएगी वह
बिल गेट्स का एक
निर्जीव किन्तु दक्ष हाथ
आत्ममुग्ध फुर्ती से घुमाता स्टीयरिंग
काटता खतरनाक मोड़।

दुनिया एक गाँव तो बने
लेकिन सारे गाँव बाहर रहें उस दुनिया के
यह कम्प्यूटर करामात हो।

कितने अभागे हैं वे पुल
जो सिर्फ गलियारे हैं
जिनके नीचे से गुज़रती नहीं
कोई नदी।

10. उजले दिन ज़रूर
(निराला को)

आयेंगे, उजले दिन ज़रूर आयेंगे

आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ
है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती
आकाश उगलता अंधकार फिर एक बार
संशय-विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती

होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार
तब कहीं मेघ ये छिन्न-भिन्न हो पायेंगे।

तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे
जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे
हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें
चीं-चीं, चिक्-चिक् की धूम मचाते घूम रहे

पर डरो नहीं, चूहे आखिर चूहे ही हैं,
जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पायेंगे।

यह रक्तपात, यह मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते में
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है।

सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसी
हम याद रखेंगे, पार उसे कर जायेंगे।

मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ
हर सपने के पीछे सच्चाई होती है
हर दौर कभी तो खत्म हुआ ही करता है
हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है।

आये हैं जब हम चलकर इतने लाख वर्ष
इसके आगे भी तब चलकर ही जायेंगे,
आयेंगे, उजले दिन ज़रूर आयेंगे।

 

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