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कहानी

साम्प्रदायिक राजनीति के ख़तरनाक खेल को बेनक़ाब करती है कहानी ‘गौसेवक’

28 अगस्त 2019 को सुप्रसिद्ध कथाकार अनिल यादव को उनकी ‘हंस’ में प्रकाशित कहानी ‘गौसेवक’ के लिए वर्ष 2019 के हंस कथा सम्मान से नवाजा गया। हम समकालीन जनमत टीम को ओर से उन्हें हार्दिक बधाई देते हैं। इस अवसर पर गौसेवक कहानी पर युवा आलोचक रामायन राम की समीक्षा आपके लिए प्रस्तुत है!

राजेन्द्र यादव ने कहानीकार को समाज की ‘संवेदनशील आत्मा’ कहा है। कहानियां अपने समय में समाज के सामूहिक विवेक का परीक्षण करती रहती हैं। इनके जरिए समाज की अभिरुचि, मनःस्थिति और दुरभिसंधियों की स्पष्ट पहचान होती रहती है। हर बड़ी और बहुपठित कहानी कभी महाकाव्यत्मक शैली में तो कभी अखबारी रिपोर्टिंग की तरह समाज की खबर रखती है।

कहानी मनुष्यता का मापक यंत्र है और इस लिहाज से कि  भारतीय समाज में राजनैतिक कारणों से जो समाज की सामूहिक चेतना बन रही है उसका एक विचलित कर देने वाला चित्र हमारे सामने रखती है कहानी ‘गौसेवक’। अपनी विशिष्ट शैली,भाषा व लेखकीय दृष्टि के लिए पहचाने जाने वाला कथाकार अनिल यादव की इस कहानी पर हिंदी समाज मे जितनी चर्चा होनी चाहिए थी उतनी नहीं हुई।

गौसेवक उत्तर भारत मे गौरक्षा की राजनीति को लेकर लिखी गई है, जो हंस के मार्च 2019 के अंक में प्रकाशित है। कहानी में पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक सीमावर्ती जिले की पृष्ठभूमि है। पूर्वांचल से ताल्लुक रखने वाले लोगों के लिए कहानी में वर्णित स्थान को पहचानने में दिक्कत नहीं आएगी। कहानी में वर्णित पात्र और स्थितियां भी सच के काफी नजदीक लगती हैं। कथाकार ने यह स्वीकार भी किया है कि इसमें कल्पना का तत्व काफी कम है।

आज हिंदी प्रदेशों की राजनीति दो तीन नारों के इर्द गिर्द घूम रही है। जिसमें एक महत्वपूर्ण नारा है गौरक्षा और गौसेवा का। 2014 के आम चुनावों के प्रचार अभियान में देश के वर्तमान प्रधानमंत्री ने ‘पिंक रेवोल्यूशन’ का मुद्दा उठाया था। इसके तहत गौमांस की बिक्री या तस्करी पर रोक लगाने और गौरक्षा की बात उठायी गई थी। वर्तमान प्रधानमंत्री के पहली बार सत्ता में आने के दो साल के अंदर ही देश की राजधानी से 50 किलोमीटर दूर एक गांव में एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या इस लिए कर दी जाती है क्योंकि बहुसंख्यक वर्ग की एक भीड़ को यह अंदेशा था कि उसके घर के फ्रिज में गौमांस रखा है। इस घटना को अंजाम देने वाले सभी आरोपी जमानत पर छूट चुके हैं लेकिन आज तक जांच एजेंसियां यह साबित नहीं कर पायीं कि वह मांस गौमांस ही था। उस घटना के बाद इस देश मे गौमांस या गौतस्करी पर रोक लगाने वाले स्वयम्भू गौरक्षकों की बाढ़ आ गई और गौरक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा किसी मुस्लिम को गौतस्करी के शक में संगसार कर देने की घटनाएं आम हो गईं। सिर्फ इतना ही नहीं। ऐसे मॉब लिंचिंग करने वाले लोगों को जेल से या तो जमानत या फिर बाइज़्ज़त बरी करवा लेने के बाद सत्ताधारी दल के नेता उनका फूल मालाओं से स्वागत भी करते हैं। ऐसे ‘गौसेवक’ जो कोई मुसलमान ‘गिराते’ हैं उन्हें दल में जरूर कोई बड़ा पद मिलता होगा। या शायद उनमें से सबसे तेज़ तर्रार गौसेवक को विधानसभा का टिकट मिलता हो!

अनिल यादव की कहानी गौसेवक इसी परिघटना को सामने लाती है, लेकिन सपाट तरीके से नहीं। अनिल यादव इस परिघटना के इर्द गिर्द तैयार पूरी जमीन को अपनी निगाह में रखते हैं। उन्होंने इस कहानी को अखबारी रिपोर्ट की तरह बरता है, लेकिन कहानी रपट की बजाय त्रासदी बनकर सामने आती है। कहानी में नैरेटर एक पत्रकार है जो उस इलाके में बन रहे डैम से जुड़ी हुई एक ख़बर के सिलसिले में झारखंड की सीमा से लगे उत्तर प्रदेश के उस सुदूर अंचल में पहुँचता है। यहाँ उसकी मुलाकात कहानी के मुख्य पात्र धर्मराज चेरो उर्फ धामा चेरो से होती है। धामा चेरो के जरिये वह पत्रकार यानी नैरेटर जिस सच्चाई से रु ब रु कराता है वह पाठक के लिए गौरक्षा के बहुप्रचारित राजनैतिक नारे की जमीनी हकीकत को सामने रखती है।

सामान्य जनता की निगाह में सफल राजनैतिक व्यक्तित्व कोई पवित्र और सदाचारी व्यक्ति नहीं होता। हर नेता के सफल होने के पीछे षड्यंत्रों और आपराधिक कृत्यों की एक कहानी होती है जो आम जन में किंवदंती की तरह प्रचलित होती है। धामा भी राजनीति में आगे बढ़ने के लिए ब्लॉक और तहसील में दलाली करने, फौज में भर्ती के नाम पर आदिवासी लड़कों से पैसे लेकर उस पैसे को सूद पर लगाने और एल्युमीनियम फैक्ट्री में मजदूरों की हड़ताल तुड़वाने के लिए प्रबंधन से पैसे लेकर आदिवासियों का तीर धनुष के साथ धरना प्रदर्शन तक करवाता है। लेकिन इससे आगे बढ़कर विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी का समर्थन लेने के के लिए जो करना चाहता है वह दिल दहला देने वाला है, यही हमारे समय की राजनीति का भयावह चेहरा है जो इस कहानी में उभर कर आया है। उसे सत्ताधारी दल के राजनैतिक पार्टी की ओर से विधानसभा का टिकट पाने के लिए एक मुसलमान ‘गिराने’ यानी हत्या करने को कहा गया है। कहानी में कथावाचक इस मुसलमान गिराने की असफल कोशिश का गवाह बनता है।

गौसेवक कहानी का ताना बाना उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में बुना गया है। कुछ साल पहले तक यह जिला नक्सल प्रभावित जिला माना जाता था। सोनभद्र जिले की राजनीति में नक्सलवाद के भूत का बड़ा ही महत्व है।नक्सली गतिविधि के जमाने में और उसके समप्त हो जाने के बाद भी नक्सल के नाम पर अपने विरोधी को निपटाना, दलितों आदिवासियों को चुप रखना आसान है। इसके अलावा नक्सल प्रभावित जिला होने के कारण यहाँ विकास के नाम पर अपार धन आता है जो अंततः अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच बंदरबांट हो जाता है।

धामा चेरो आदिवासी है। सोनभद्र व आस पास के अंचल में पाई जाने वाली चेरो जनजाति का सदस्य है। वह पुलिस प्रशासन व नक्सलियों के बीच पिसते हुए अपने वजूद के लिए संघर्ष करने वाले एक औसत आदिवासी युवक का प्रतिनिधि चरित्र है। स्कूल में पढ़ते हुए वह अपने आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए राशन कार्ड बनवाने का प्रयास करता है, ताकि नक्सल विरोधी पुलिसिया कार्रवाई के दौरान वे अपनी पहचान बता सकें अन्यथा पुलिस उनमे से किसी को भी आंध्रप्रदेश से आया हुआ नक्सली बता कर मार सकती है। उसकी इसी सक्रियता के कारण उसके विद्यालय के प्रधानाचार्य ने खुद के लिए सुरक्षा और पैसा पाने लिए धामा को चारा बनाता है और पुलिस नक्सलियों से सम्बन्ध रखने के संदेह में उसे हवालात में बन्द रखती है। किसी तरह वह छूट पाता है और आगे की पुलिसिया उत्पीड़न से बचने के लिए वह स्थानीय राजनीति का सहारा लेता है। अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने की लालसा में वह साम्प्रदायिक शक्तियों के हाथ की कठपुतली बन जाता है।गौशाला की आड़ में पुलिस द्वारा जब्त गायों को नदी पार कराकर झारखंड और वहां से पश्चिम बंगाल पहुंचाने का काम करने लगता है और अब चुनाव में टिकट की दावेदारी के लिए एक मुस्लिम की ‘लिंचिंग’ करनी है!

गौसेवक कहानी में कथाकार ने सोनभद्र के सामाजिक राजनैतिक परिस्थितियों को एक पत्रकार की निगाह से विश्लेषित किया है। उनकी नजर उस अंचल विशेष में हो रही हर सामाजिक गतिविधि पर है। नक्सलवाद दशकों तक इस जिले की मुख्य समस्या रही है। लेकिन नक्सलवाद के बहाने को यहां के रसूखदार लोगों ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया यह इस कहानी में बखूबी दिखाया गया है। नक्सलवादी और पुलिस दोनों के लिए आदिवासी आसान शिकार की तरह इस्तेमाल होते रहे हैं।नक्सलियों ने आदिवासियों के घरों को अपने शरणस्थली के रूप में इस्तेमाल किया, उनके पीछे पुलिस निर्दोष और भोले भाले आदिवासियों का उत्पीड़न करती थी। इसके अलावा स्थानीय सामन्तो ने पुलिस से सांठ गांठ कर आदिवासी और दलित युवकों की हत्या करवाना शुरू किया या फिर जेल में डलवाने लगे।

इस विषम परिस्थिति के बीच आम आदिवासी अपनी मानवीय संवेदना, जिसके लिए वे जाने जाते हैं, के साथ अपने अभावों व दुःखों के साथ जिंदा हैं।इस कहानी में धामा के खतरनाक साम्प्रदायिक मंसूबों को यही आम आसिवासी जन समुदाय चुनौती देता है।

इस कहानी का सबसे विलक्षण चरित्र है बैगा! जो धामा चेरो का पट्टीदार है लेकिन गांव की राजनीति में धामा का विरोधी और उसके कुकृत्यों का आलोचक है। उसे धामा की गौशाला से खेती के लिए बैल चाहिए, लेकिन पंचायत के चुनाव में विरोधी होने के कारण धामा उसे बैल नहीं देता। बैगा को धामा के ‘गौसेवा’ की हकीकत मालूम है।

कहानी अपने अंतिम दृश्य में बैगा की साहसिक पहलकदमी से एक मासूम मुसलमान लड़के की जीवनरक्षा के लिए प्रतिरोध के रूप में अपनी परिणति तक पहुंचती है। इस मुस्लिम लड़के को धामा के आदमी गौसेवा केंद्र पर गायों की देख भाल की नौकरी के बहाने से लाते हैं, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य गौतस्करी का आरोप लगाकर उसकी हत्या करने का है, ताकि धामा चेरो मुस्लिम ‘गिराने’ की परीक्षा को पास कर सके। लेकिन बैगा के साहस के कारण वे ऐसा करने में असफल हो जाते हैं।बैगा की ललकार देखिए-“बैगा भीड़ की ओर मुंह करके चिल्ला रहा था, गाय गोरु तक तो ठीक था लेकिन अब आदमी का बच्चा हतोगे तो कैसे बर्दाश्त होगा। कौन कहेगा कि ये ठीक काम है। कह दे कोई! हमारे रहते यह नहीं हो पायेगा।”
इस तरह कहानी गौसेवक आदिवासी समुदाय के बीच पैठ बना रही साम्प्रदायिक हिंसा की राजनीति की प्रविधि के ब्यौरों को महीनता से दर्ज करते हुए उन्हींं आदिवासी जनता के बीच से इस राजनीति का मानवीय प्रतिरोध की उम्मीद भी जगाती है। साम्प्रदायिक राजनीति की अमानवीयता और हिंसा का जवाब साधारण लोगों की, आम जन की मनुष्यता ही दे सकती है, और यह कहानी अपनी अंतर्वस्तु में इस बात के प्रति आश्वस्त करती है कि यह प्रतिरोध कोई यूटोपिया नहीं बल्कि आम आदिवासियों का जीवन सत्य है!

कथाकार अनिल यादव पेशे से पत्रकार हैं, उनका कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश और खासकर पूर्वी उत्तरप्रदेश रहा है। इसलिए शायद भाषा के बांकपन और बात कहने की अनोखी शैली के साथ साथ शैली में एक मरदानापन (मैस्कुलेनिटी) उनकी खासियत रही है। इस कहानी में यह विशेषता तब खटकती है जब वे उन महिलाओं का जिक्र करते हैं जिनके पास कथावाचक को धामा ले जाता है। यहाँ हम उन महिलाओं के लिए कथावाचक के विचार को लेखक के विचार न मानने की छूट का फायदा नहीं उठा सकते।
इस एक विवादास्पद प्रसंग को अगर छोड़ दें तो कहानी गौसेवक हमारे समय की राजनीति के खतरनाक खेल को बेनकाब करती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरह कहानी में बैगा और अन्य ग्रामीणों ने धर्मराज चेरो का खेल कामयाब नहीं होने दिया उसी तरह एक दिन इस देश के साधारण जन इस वक्त की राजनीति के खतरनाक खेल को कामयाब नहीं होने देंगे!

(डॉ. रामायन राम, शामली जिले के कांधला में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी अध्यापन, जन संस्कृति मंच उत्तर प्रदेश के सचिव, समकालीन जनमत, हंस, कथा इत्यादि पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित। ‘डॉ .अम्बेडकर: चिंतन के बुनियादी सरोकार’ पुस्तक प्रकाशित!)

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