समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

स्मृति

मैंने कैफ़ी आज़मी को देखा है, सुना है और जाना है

“बस इक झिझक है यही हाल ए दिल सुनाने में, कि तेरा जिक्र भी आएगा इस फसाने में।” जिस समय कैफ़ी साहब का इंतकाल (10...
कविता

कोरोना समय में कविता :  ‘लहू से सनी रोटियां दुनिया देख रही है ’

समकालीन जनमत
लखनऊ. यह समय अभिधा का है। जो व्यंजना में कविता की बात करते हैं, कहीं न कहीं उनके अवचेतन में डर है। सत्ता का आतंक...
कविता

उर्दू-हिंदी की साझा संस्कृति के शायर संजय कुमार कुंदन

समकालीन जनमत
ख़ुर्शीद अक़बर संजय कुमार कुन्दन उर्दू-हिन्दी के ऐसे एकमात्र कवि-शायर हैं , जो साझा- संस्कृति के सशक्त प्रतिनिधि ( नुमाइनदा) की हैसियत रखते हैं और...
सिनेमा

हिंदी सिनेमा में 1857 का विद्रोह

मुकेश आनंद
भारतीय इतिहास की इस महत्त्वपूर्ण घटना को सही इतिहास-दृष्टि और अपेक्षित कला कौशल के साथ हिंदी सिनेमा द्वारा व्यक्त किया जाना अभी शेष है....
कविता

‘ फ्री कालिंग है पर बातचीत के हालात नहीं हैं ‘

समकालीन जनमत
आठ मई की शाम समकालीन जनमत द्वारा आयोजित फ़ेसबुक लाइव में जब कवि पंकज चतुर्वेदी अपने कविता पाठ के लिए प्रस्तुत हुए तो काफ़ी देर...
पुस्तक

क्या हमें भी कोई शाहूजी महाराज जैसा शासक मिलेगा

समकालीन जनमत’ फेसबुक लाइव के जरिए आज सुधीर सुमन ने चर्चित कथाकार संजीव के उपन्यास ‘प्रत्यंचा’ के कुछ महत्वपूर्ण अंशों का पाठ किया। विशाखापट्टनम के...
स्मृति

शशिभूषण द्विवेदी का जाना एक बड़ी संभावना का असमय अंत है : जनवादी लेखक संघ

शशिभूषण जी अत्यंत प्रतिभाशाली और संभावनाशाली कहानीकार थे. उनकी ‘ब्रह्मह्त्या’, ‘एक बूढ़े की मौत’, ‘कहीं कुछ नहीं’, ‘खिड़की’, ‘शिल्पहीन’ जैसी कई कहानियां खूब पढ़ी और...
सिनेमास्मृति

रवीन्द्रनाथ और हिंदुस्तानी सिनेमा

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के जन्मदिवस पर प्रदीप दाश रवीन्द्रनाथ टैगोर ने साहित्य की सभी विधाओं में लिखा लेकिन सबसे पहले वह एक कवि ही थे....
चित्रकला

रवीन्द्र नाथ टैगोर की पेंटिंग्स

आज गुरुदेव के जन्मदिन के अवसर उनकी स्मृति को नमन करते हुए प्रस्तुत है उन्हीं की बनाई कुछ दुर्लभ पेंटिंग्स. ये पेंटिंग्स समकालीन जनमत के...
स्मृति

‘ गोरा ’ में खचित जटिल समय

उन्नीसवीं सदी की आखिरी चौथाई की समूची हलचल का साक्ष्य इस उपन्यास से हासिल होता है. समय को रवींद्रनाथ ने केवल तारीख के रूप में...
सिनेमा

बढ़ती साम्प्रदायिक कट्टरता के बीच एक विवेकशील समाज बनाने की अपील है ‘नसीम’

मुकेश आनंद
(महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्मों पर  टिप्पणी के क्रम में आज प्रस्तुत है मशहूर लेखक और निर्देशक सईद मिर्ज़ा की नसीम । समकालीन जनमत केेे लिए मुकेश...
जनमतसिनेमा

‘ चारुलता ‘ की मार्फ़त सत्यजित राय की सिनेमाई नज़र पर कुछ गुफ़्तगू

आशीष कुमार
सत्यजित राय की ' चारुलता ' को देखना, समझना और लिखना न सिर्फ सिनेमा की बारीकियों से वाक़िफ होना है बल्कि किरदारों के अन्तर्जगत में...
सिनेमा

टॉय लैंड: अमानवीयता के बर’अक्स लिखी गई विडम्बना की मार्मिक कविता

टॉय लैंड– (जर्मन Spielzeug Land) निर्देशक – योखें अलेक्सेंडर फ्रेयदंक समय-14 मिनट कलाकार– जूलिया ज्लेगा, सेड्रिक एइच, तमय बोलुट उज्त’वान आदि दूसरे विश्व युद्ध के...
स्मृति

कार्ल मार्क्स की एक नई जीवनी

 मार्क्स के बारे में पैदा हुई हालिया रुचि की नवीनता का एक नमूना उनकी एक नई जीवनी है । सितंबर 2011 में लिटिल ब्राउन एंड...
कवितापुस्तक

जीवन, मानवीय संबंध और संघर्षों की निरंतरता की कविताएँ

डॉ. अली इमाम खाँ बलभद्र का कविता-संग्रह ” समय की ठनक ” को पढ़ने, समझने और महसूस करने का मौक़ा मिला। इन कविताओं से गुज़रते...
कविता

कोरोना काल में कविता संवाद : पहले चार लाठियां मिलती हैं / फिर दो रोटियां / सुन्दरपुर दूर है अभी

लखनऊ. जन संस्कृति मंच की ओर से फेसबुक पर चलाये जा रहे ‘कविता संवाद’ लाइव कार्यक्रम के तहत 3 मई को  आठ रचनाकारों की कोरोना...
कविता

कथाओं में जीवन को बुनता कवि वसंत सकरगाए

संजीव कौशल कविता कुछ ना कुछ बचाने की कोशिश है कोई आँसू कोई मुस्कान कुछ उम्मीद कुछ निराशा कुछ दर्द ताकि मुश्किल वक्त में कुछ...
साहित्य-संस्कृति

चिंताएँ और सरोकार एक से हों तो मिलकर रचते हैं बड़ा कैनवास

दीपक सिंह
मई दिवस के अवसर पर समकालीन जनमत के फेसबुक पेज द्वारा आयोजित लाइव कार्यक्रमों की तीसरी कड़ी में 1 मई मजदूर दिवस शाम 7 बजे...
स्मृति

मार्कण्डेय की कहानियों में भूख और अकाल के चित्र

दुर्गा सिंह
मार्कण्डेय के जन्मदिन 2 मई पर यूँ तो भारत में उदारीकरण की नीतियों को स्वीकार करने के बाद से ही कृषि सर्वाधिक तबाही झेलने वाला...
कविता

चंद्र की कविताएँ बोलती भी हैं और भेद भी खोलती हैं

“चंद्र मेरी आज तक की जानकारी में पहले ऐसे व्यक्ति हैं जो खेती-बाड़ी में, मजूरी में पिसते अंतिम आदमी का जीवन जीते हुए पढ़ना-लिखना व...
Fearlessly expressing peoples opinion