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स्मृति

शशिभूषण द्विवेदी का जाना एक बड़ी संभावना का असमय अंत है : जनवादी लेखक संघ

जनवादी लेखक संघ ने कहानीकार शशिभूषण द्विवेदी के असामयिक निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा है की उनका जाना एक बड़ी संभावना का असमय अंत है.

जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और संयुक्त महासचिव राजेश जोशी व संजीव कुमार द्वारा जारी ने कहानीकार शशिभूषण द्विवेदी को श्रद्धाजंलि देते हुए कहा कि महज़ 45 वर्ष की आयु में कहानीकार शशिभूषण द्विवेदी की अप्रत्याशित मृत्यु से हिन्दी का साहित्यिक समाज स्तब्ध है. कल, 7 मई की शाम 5 बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और तमाम कोशिशों के बावजूद वे बचाए न जा सके.

1975 में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे शशिभूषण जी अत्यंत प्रतिभाशाली और संभावनाशाली कहानीकार थे. उनकी ‘ब्रह्मह्त्या’, ‘एक बूढ़े की मौत’, ‘कहीं कुछ नहीं’, ‘खिड़की’, ‘शिल्पहीन’ जैसी कई कहानियां खूब पढ़ी और सराही गयीं. प्रगतिशील अंतर्वस्तु का विसर्जन किये बगैर वे अपनी कहानियों में लगातार प्रयोगधर्मी बने रहे. पुराने, पारंपरिक कथास्वाद के बल पर उनकी सराहना कर पाना संभव नहीं. इसके बावजूद उनके चाहने वालों की संख्या बहुत कम न रही, यह बात हिन्दी में नयेपन के अभिग्रहण को लेकर आश्वस्त करती है.

‘ब्रह्मह्त्या तथा अन्य कहानियां’ शीर्षक अपने पहले संग्रह के लिए शशिभूषण जी को पहला ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार मिला था. ‘कथाक्रम’ और ‘सहारा समय कथाचयन’ से भी उनकी कहानियां पुरस्कृत हुईं.

उन्हें अभी बहुत कुछ करना था. उनके जाना एक बड़ी संभावना का असमय अंत है. जनवादी लेखक संघ शशिभूषण द्विवेदी के परिजनों, उनके साहित्यिक हित-मित्रों और उनके चाहनेवालों के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करते हुए उन्हें सादर नमन करता है.

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