स्मृति

मार्कण्डेय के जन्मदिन 2 मई पर

यूँ तो भारत में उदारीकरण की नीतियों को स्वीकार करने के बाद से ही कृषि सर्वाधिक तबाही झेलने वाला सेक्टर बन गया। किसान दुर्घटना, आकस्मिकता, अनिश्चितता, आशंका से भरी एक ऐसी दुनिया का नागरिक बनने लगा, जो इसके पहले तक उसके लिए ज्यादा परिचित नहीं था।

खेती-बारी पर टिका ग्रामीण जीवन विश्रृंखल और विघटित हुआ। किसान और ग्रामीण मजदूर भी आत्मनिर्वासित होने लगा। वर्ण-विभाजन और जाति दंश से पीड़ित जो ग्रामीण मजदूर, गरीब समुदाय जन्म-भूमि, परिवार के जिस एक नेह-मोह के धागे के सहारे सब कुछ बर्दाश्त कर जाता था(मार्कण्डेय की कहानी- मधुपुर के सीवान का एक कोना, इसी पर केन्द्रित है) उदारीकरण के बाद के समाज का नागरिक बनने के बाद, उसका वह धागा भी उससे छूटने लगा, कमजोर होने लगा, टूटने लगा।

ग्रामीण समाज के संपन्न धनी किसानों के लिए तो यह मौकों का विस्तार लेकर आया। उनकी ताकत में, और इजाफा हुआ। उनमें वर्णवादी सांस्कृतिक मूल्य और अधिक अमानवीय हुए। इतने, कि खुद उनके भीतर झूठ, फरेब, धोखा, साजिश नित जीवन की नैतिकता और कर्म होने लगे। लेकिन, अधिकांश मध्यवर्ती, छोटी, सीमांत किसान जातियां या समुदाय उदारीकरण की मृगमरीचिका के शिकार बने। उनके हिस्से ज्यादा दुर्घटनाएं, ज्यादा निराशा आयी। इनका बहुत छोटा हिस्सा ही धनी, सम्पन्न हुआ। लेकिन अधिकांश के हिस्से आत्महत्या और अनिश्चितता तथा मेहनत और मौके से भाग्य बदल जाने की झूठी आशा ही आयी। इनके हिस्से जो छोटे-मोटे फायदे आये थे, वे भी हाथ से रेत की तरह फिसलने लगे। अब ये आत्महंता से हत्यारी भीड़ में बदलने लगे। पिछले छः साल इसके गवाह हैं। अभी हाल ही का दिल्ली दंगा इसका सबसे ताजा उदाहरण है।

इतनी भूमिका का आशय यह, कि इतना कुछ कोरोना वायरस के हमले से पहले हो चुका था।
अब जब कोरोना वायरस का हमला हुआ तो उदारीकरण के द्वारा खड़ा किया गया नकली और खोखला महल अचानक से ढह गया। वह झूठ तो क्या, सच बोलने की भी हैसियत में भी नहीं रहा। लेकिन इसके ढहने से पूरे भारत की समग्र ग्रामीण संरचना बदल जाने वाली है। गाँवों से निकल कर काम-धंधे के लिये, आजीविका के लिए निकले लोग घर वापसी कर रहे हैं या व्याकुल हैं कि कब लाॅकडाउन खुले और वे घर भागें। यह घर वापसी कोरोना और भूख के ही डर से सिर्फ नहीं हो रहा, बल्कि इसलिए भी है कि अब उसे उदारीकरण की व्यवस्था या मोटे तौर पर कहे तो शहर सुरक्षा नहीं दे सकता। उसका विश्वास उठ गया है। रौशनी और चमक-दमक के बीच का बड़ा सा काला धब्बा, उसकी सच्चाई उसे दिख गयी। उसके निजी अनुभव में शामिल चीज हो गयी।

जिन लोगों को लग रहा है कि औद्योगिक गतिविधियां चालू कर देने से सब सही हो जाएगा, वे बहुत ज्यादा भ्रम में और आत्मलीन, रेत में गर्दन गाड़े लोग हैं। गांव का आदमी अब रुकने वाला नहीं। तब फिर!!

कृषि पर एक विशाल आबादी के पालन पोषण का नया चक्र शुरू होगा। लेकिन, इसे तो पहले ही ढहा दिया गया है, फिर क्या होगा!! भूख की समस्या और विकराल होगी! और भी बहुत कुछ हो सकता है, क्या होगा; यह स्पष्ट नहीं!
पर इन्हीं सबके बीच आजादी के ठीक बाद के ग्रामीण समाज में भूख और अकाल को लेकर लिखे गये दो किस्सों के ऊपर ध्यान गया। दोनों किस्से मार्कण्डेय के रचे हैं।

आजादी के बाद के ग्रामीण जीवन के रचनाकारों में वे अग्रणी रहे हैं। प्रसंगवश उनकी ‘दाना-भूसा’ व ‘बादलों का टुकड़ा’ की चर्चा मौजूं लगी। दाना-भूसा की शुरुआत का वर्णन कुछ इस तरह है-
“कितनी देर हुई!” राजी ने अनमने भाव से कहा और गोंद से चिपके बच्चे को अलग करते हुए उठने को हुई, पर फिर दीवार से पीठ सटाकर अध लेटी हो गई। दूसरा दिन होता तो वह मोहन को अपनी छातियों से अलग करते-करते दो-चार मोटी-मोटी बातें सुनाती, मसलन, “कहां का अमृत भरा है, जो हाड़ चूस रहा है या खा क्यों नहीं जाता मुझी को जो जान के पड़ा है।” पर वह कुछ न बोली और बाँकी ने भी बाप की पूछताछ करके गालियां सुनने का काम आज एक बार भी नहीं किया। बेचारी चुपचाप पूरब के घर के द्वार में बैठी अपने लसिआये झोटे को दोनों हाथों से खुझलाती और बीच-बीच में बालों से जूँ निकाल, एक अंगूठे के नख पर रख दूसरे से चट् से मारकर कुछ देर अपने नाखूनों को देखती और फिर सिर खुजलाने लगती।

घर चारों ओर ऐसा चिकना, साफ-सूफ कि लगता है, कई दिन पहले लीप-पोत कर छोड़ दिया गया हो या चौका-बासन करके घर के प्राणी हफ्तों पहले कहीं चले गए हों। चारों ओर सघन शांति सिर्फ एक भूरी बिल्ली जिसके पेट पीठ सट कर एक हो रहे हैं; पूँछ नीचे किए इधर-उधर रोती हुई घूम रही थी। पहले जो गौरैयों का झुंड उतर कर बार-बार राजी का सुखवन खाया करता था और उड़ाने पर फुर् से उड़कर बखरी की खपरैल पर गुथ जाया करता था, जाने किस देश चला गया। दो दिन से एक नन्हीं सी गौरैया का बच्चा आंगन में उतरकर चूँ-चूँ करता और उड़ जाता था, पर आज वह भी कहीं दिखाई नहीं पड़ता। नाबदान के बगल की ऊंची डेहरी, जो उबसन और राख से सनी रहती थी, एकदम धुली और साफ पड़ी थी। कहीं-कहीं एकाध मक्खियां दिखाई पड़ती थीं,फिर उड़कर ऐसा लोप हो जाती थीं, जैसे उनके बैठने लायक यहां कुछ है ही नहीं और बखरी के कोने में बंधी बकरी आम की कई दिनों की बासी कउचियों को कूचने का प्रयास करके थक जाने पर मेंऽऽ करके एक अजीब स्वर में मिमियाती और फिर चुप होकर टहनियों के टुनगों के मुरझाए छिलके को कूँचने लगती।”

कोरोना के प्रकोप से जो हालात हुए हैं, उसमें अब गांव में ऐसे दृश्य आम हो सकते हैं। खेती पूरी तरह से टूट चुकी है। छोटे, मझोले किसान जो खेती चला भी पा रहे थे वह शहरों में की गई मजदूरी या छोटी-मोटी नौकरी के पैसे से चल रहा था। ऐसे में जब खेतिहर मजदूरों का दबाव या भार खेती पर पड़ेगा तो कैसे-कैसे मानवीय संकट से गुजरना होगा उसका कुछ-कुछ संकेत इस कहानी से पा सकते हैं।

“राजी दीवार के सहारे अधलेटी हो गयी। उसकी सूखी छातियाँ आँचल से बाहर लटक आयीं। मोहन ने धीरे-धीरे सिर झुका कर उन्हें एकाएक होठों से पकड़ लिया। मशीन की तरह राजी का उल्टा हाथ उसके मुंह पर भरपूर बैठ गया। वह धड़ाक से दूर जा गिरा। बच्चे की चीख इतनी जोर से उठी कि कराह का आधा तनाव निःशब्द हो उठा। बाँकी पल भर को अपना एक हाथ सिर पर रखे, गरदन मोड़ पर मोहन की ओर देखने लगी। फिर गुम-सुम-सी मुँह फेर कर अपने काम में लग गयी।”

आपसी संबंध और बेहद अपनेपन के रिश्ते तथा कोमल भाव गरम तवे पर पड़ी पानी की बूंद की तरह छनक कर भाप में बदल सकते हैं।

बंसन परमेसर बाबू के यहां से थोड़ा सा गुड़ लाया है। यह गुड़ चींटों से भरा है। लेकिन इतना राहत भरा भी है, कि बंसन ऐसे गुड़ के लिए भी परमेसर बाबू को भले मानुस बताता है। बंसन इसे पानी में घोलकर शरबत बनाता है। एक कटोरा बाँकी को और दूसरा मोहन को देता है। बाकी शरबत राजी गट-गट पी गयी। बंसन के लिए कुछ न बचा- “बंसन के हाथ भारी हो गये, वह गिलास के शरबत को पल भर देखता रह गया…”

“पल ही भर में उसका रंग लुट गया। वह धीरे-धीरे चल कर बकरी के पास पहुँचा और आम की एक पतली डाल उठा कर एक कउची को तोड़ा तो चट की आवाज निकली- यह सूखी है। उसने दूसरी कउची उठायी, उसे तोड़ा और मुँह में ले कर कूँचने लगा।”

इसी तरह बादलों का टुकड़ा, कहानी का एक प्रसंग इस तरह है- दो दिन पहले की आटे की बनी लपसी सूखी होकर बर्तन में पड़ी है जिसे बकरी के बच्चे के लिए घोलकर गृहस्वामी देना चाहता है लेकिन खुद उसकी भूख इतनी प्रबल हो जाती है की उस आटे की लपसी को पानी में घोलकर वह खुद पी जाता है और अपने बीमार बच्चे की तरफ ध्यान दिये बिना बाहर जाकर चारपाई पर पड़ जाता है-
“यह आग पानी से नहीं बुझेगी-उसने सोचा, लेकिन पानी पीने का बहाना करने में क्या हर्ज़ है, आखिरकार तो जीना है, चाहे किसी भी बहाने और वह हाथ का गिलास लिए फिर रसोई घर में लौट गया। बैठ कर गगरी से पानी उड़ेलते हुए उसका ध्यान चूल्हे की तरफ गया, जिसमें मुट्ठी भर अधजला रहट्ठा पड़ा हुआ था और जस्ते के बड़े कटोरे में कुनाई के लिए पकाई गयी कल की लप्सी का जलन-जुलन सूख कर चिपक गया था। उसने पल भर उस कटोरे को देखा और सोचने लगा, इसे साफ करने में जसमा को कितनी मसक्कत करनी पड़ेगी! थोड़ा पानी डाल देती तो लप्सी फूली रहती और धोते ही साफ हो जाती। उसने खिसक कर कटोरा पास खींचा और गिलास का पानी उसमें डाल दिया फिर गिलास रख कर जाने क्यों उस कटोरे को देखता रहा।”

“इस बार पेट भर पानी पीने की तीव्र इच्छा उसके मन में हुई और उसके जी में आया कि वह पूरी गगरी उठाकर मुंह से लगा ले। उसने तेजी से गगरी की तरफ हाथ बढ़ाया कि कुनाई फिर रोने लगा और बाहर से बकरी की में-में करने की आवाज आयी। वह पल भर को रुक गया और फिर कटोरे और गिलास के पानी को देखने लगा। कटोरे में अब आटा नीचे बैठ रहा था और ऊपर पानी की सतह साफ होने लगी थी। उसे अपने पेट की जलन का ख्याल आया- दर्द नीचे बैठ रहा था और आंखों की रोशनी साफ हो रही थी लेकिन दर्द कहीं गया थोड़े ही है, ठीक इस नीचे बैठते आटे की तरह। उसे ऐसी घबराहट महसूस होने लगी कि थोड़ी देर पहले जिस दिमागी बहलाव के कारण उसे आराम महसूस हो रहा था, वही अब उसे सबसे दुखद मालूम होने लगा। उसने अपने दांत कसकर भींच लिए और कुछ भी न सोचने का निश्चय करते हुए एक उंगली से कटोरे के पानी को चलाने लगा। जब घोल अच्छी तरह बन गया तो उसने दोनों हाथ से कटोरा उठाया और एक सांस में गट्-गट् सारा घोल पी गया। फिर गिलास का भी पानी पीकर रसोई से निकला और झिंलगे में पड़े हुए कुनाई को देखे बिना बाहर निकल गया।”

दाना भूसा के बंसन और बादलों का टुकड़ा के गृहस्वामी की सामाजिक-आर्थिक हैसियत एक जैसी है। इसलिए भूख और अकाल की मार भी उन पर एक जैसी है। बंसन की कुल सम्पदा का हाल यूं है-

“बंसन धू-धू कर जलते हुए सिवान को एक नजर देख कर अपनी नंगी चौपाल की ओर मुड़ गया, जिसमें एक ओर उसका एक बूढ़ा बैल और दूसरी ओर दान में पाई हुई बछिया बंधी हाँफ रही थी। जाने कितने दिन से आम-महुए की पत्तियों पर गुजारा करने वाले इन पशुओं को अब पत्तियां भी नसीब नहीं होतीं और इस समय तो जैसे पानी का भी उन्हें अकाल पड़ गया है। बंसन सब कुछ समझ कर भी अपनी टूटी चारपाई में बैठ, पल भर को आंखें मूंदकर पड़ गया। उसका शरीर धीरे-धीरे सिकुड़ कर छोटा और हल्का हुआ जा रहा था- एक सूखे पत्ते की तरह हल्का और सब कुछ, यहां तक कि वह, उसकी चारपाई और बैठक आसमान में उड़ रहे थे। वह उड़ता रहा, उड़ता रहा और धीरे-धीरे ऐसी जगह पहुंच गया, जहां रोटियों का एक बहुत बड़ा ढेर लगा हुआ था, इतना बड़ा कि कई बांस की सीढ़ियां लगाकर भी उसके ऊपरी हिस्से को छूना मुश्किल था और लोगों की एक बहुत बड़ी भीड़ उसे मनमाना लूट रही थी। बंसन झटके से लपका, पर खाट बहुत गहरी थी और पाटियों पर उसके हाथ अड़ कर रह गये।”

बादलों का टुकड़ा कहानी के गृह स्वामी की स्थिति, कहानी का प्रारंभ ही व्यक्त करता है-
“बकरी अपने मालिक को देखकर दुम हिलाने लगी और मेमना उसके थन को छोड़कर कुलांचे भरता उसके पास जा, उसके पांवों से अपना सिर टकराने लगा। वह रुका नहीं, न कुछ बोला ही और दहलीज के किनारे खूंटी से बंधी बकरी के पास जा कर हाथ के मोथे को उसके सामने फेंकते हुए, कंधे का गमछा उतार कर अपने माथे का पसीना पोंछने लगा। बकरी दो ही गाल में गप्-गप् सारा मोथा निगल गई और उसकी ओर टुकुर-टुकुर ताकने लगी। उसने भी आंख बचा कर उसके धँसे हुए पेट को एक बार देखा और घर के भीतर चला गया। कुनाई एक खाट पर नंग धड़ंग चित्त लेटा था। उसका फूला हुआ पेट और उसकी उभरी हुई नीली नसें ही सबसे पहले उसे दिखाई पड़ी क्योंकि उसका सिर पेट के अनुपात में बहुत छोटा था। उसे देख कर कुनाई अपनी निरंतर रोने वाली एक पतली और रेंघती हुई आवाज़ में रोने लगा। जसमा घास के लिए गयी होगी- उसने सोचा और ओरी के नीचे से उढ़का हुआ अलमुनियम का गिलास उठा कर गगरी के पास तक गया लेकिन उसमें पानी नहीं था। उसे तनिक चिढ़ हुई, तभी उसका ध्यान रसोई की दूसरी तरफ गया। वह घूम कर छप्पर में घुसा और आधा गिलास पानी लेकर कुनाई के पास लौट आया। सिर के नीचे हाथ लगाकर उसे किसी प्रकार अधलेटा किया और मुंह को गिलास लगाया ही था कि कुनाई गट्-गट् सारा पानी एक ही साँस में पी गया, फिर उसे चारपाई पर लिटाने लगा तो उसके मुंह के कोनों से थोड़ा पानी इधर-उधर बह गया।”

बंसन के जैसों से मिलकर गांव की एक बड़ी आबादी बनती है। छोटे, मझोले किसान और खेतिहर मजदूर फिर से गांव की हकीकत का हिस्सा बनेंगे। लेकिन जो कुछ हकीकत कोरोना के बाद निर्मित होगा, वह पहले जैसा नहीं रहेगा! कैसा होगा, उसका बस आभास पाया जा सकता है!
अकाल के दौरान मनुष्य के निजी व्यवहार में जो बदलाव होते हैं, वह तो है ही। लेकिन, इसमें सामाजिक संबंधों में जो तनाव और वर्णवादी दबाव है, वह क्या रूप लेगा, किस तरह दिखेगा, उसे बता पाना अभी मुश्किल है, लेकिन जब खेती से बंधे सामाजिक संबंध ही भारत के गाँव का यथार्थ थे, तब इसका क्या रूप था और अकाल में यह किस कदर जीवन पर असर डाल रहा था उसे इन दोनों कहानियों में देखा जा सकता है। दाना-भूसा कहानी में सूदखोरी का कोई प्रसंग नहीं है लेकिन बादलों का टुकड़ा में वह मुख्य है। अकाल के समय सूदखोर और अधिक अमानवीय, निष्ठुर होकर सामने आता है।

अभी के सत्ता संरचना में जिस तरह की सामाजिक शक्तियां निर्णायक हैं, वह अकाल और महामारी के समय का उपयोग पिछड़ी हुई सामाजिक नैतिकता और वर्णवादी मूल्यों को स्थापित करने के प्रयास के लिए करेंगे, लेकिन यह जो गांव को वापस लौटते मजदूर हैं, वह वही नहीं हैं, जो वे गांव छोड़ते समय थे। इसलिए अब जब बादलों का टुकड़ा में आए प्रसंग दोहराये जाएंगे तो उसमें पात्रों का व्यवहार क्या होगा, इसका बस अंदाजा लगाया जा सकता है!

दाना भूसा कहानी में सामाजिक तनाव का एक प्रसंग कुछ इस तरह है- “वह गुस्से से तिलमिला कर बोला- ‘दिन भर पैर में मेहंदी लगी रहती है, जो बाँकी छेंर भी नहीं छोड़ सकती।’
‘कहां लेकर जाए! अगवार-पिछवार तो परायी धरती है। बाग-बगीचा में रखवार बइठे हैं। आम की पत्ती भी नोहर है, इस टाले में।’ राजी उठती हुई बोली, ‘कल गनेस बाबू के डिहवा से एक कउची तोड़ लिया तो उनके लड़के ने बेचारी को मारा ही नहीं, हाथ उमेठ कर कउची भी छीन ली।’
‘गनेस बाबू के लड़के ने?’ बंसन का ध्यान बँट गया, वह अपने से ऊपर उठा। यद्यपि उसकी देह अब भी सनसना रही थी और माथा अपरंपार फट रहा था। ‘अच्छा तो अब उसकी यह मजाल कि मेरी लड़की के हाथ से…’ बंसन का चेहरा तमतमा आया, ‘मैं देख लूंगा एक-एक को!’

बादलों का टुकड़ा कहानी का गृह स्वामी महाजन का कर्जदार है और उस कर्ज के बदले में उसके यहां बेगारी खटता है।

क्या फिर से भूख, बेगारी गाँव की हकीकत में शामिल होने जा रहा है। दोनों कहानियाँ पचास के दशक में लिखी गयीं हैं। लेकिन कोरोना वायरस के जाने के बाद गाँव पचास के दशक जैसे ही व्यवहार में रहेंगे या तनाव और संघर्ष से भर जाएंगे, अभी से कहना मुश्किल है! फिर भी, संकेत तो साफ है; कि गाँव एक नयी रणस्थली में बदल सकते हैं। फिलहाल बादलों का टुकड़ा कहानी का तनावभरा एक प्रसंग- “जसमा आ कर पल भर को उसकी(गृहस्वामी) खाट के पायताने खड़ी हुई, फिर भी उसने उसकी ओर नहीं देखा। आंचल की दो मुट्ठी घास बकरी के आगे गिराते हुए, वह गुस्से में बोली,

‘खोल लो और ले जाओ। मरेंगे, जिएंगे लेकिन यह करज का खटका तो छूटा। मजूरी न धतूरी, जब देखो दरवाजे पर ठढ़क्कर की तरह खड़े हैं कि यह कर दो, वह कर दो। दिन-दिन भर खटो और सरबउला एक रोरा गुर- पानी तक को नहीं पूछता।… पचास रूपया करज क्या ले लिया, जिंनगी बेच दी।… ले जाओ, खड़े-खड़े मुंह क्या ताक रहे हो। आज से उरिन हुई उस कलमुंहे से।’
‘कैसा उरिन?’ अबकी वह आदमी बोला जो हाथ में एक लाठी लिए जसमा के पीछे-पीछे आया था। ‘अभी तो तुम्हीं ने तय किया है कि मूर में बकरी और उसका बच्चा दोगी और सूद में काम करोगी।’
‘कैसा सूद और कैसा मूर? सूद में बकरी का बच्चा जो दे रही हूं।’ जीभ से च्…च् की आवाज करते हुए वह आदमी जैसे समझाने के स्वर में बोला, ‘भुलाय रही हो कुनाई की माई…।’
‘यहां चुवाने की जरूरत नहीं है पंडित जी महाराज… सीधे से बकरी का पगहा खोलो और जाओ…।’
महाजन के कारिंदे ने थोड़ी देर इंतजार किया लेकिन वह(गृहस्वामी) उसी तरह गुमसुम लेटा रहा, जबकि उसे चारपाई से तुरंत उतर जाना चाहिए था। पहले उसे डर लगा कि बात क्या है, आज इसे हो क्या गया है। कहीं ऐसा तो नहीं, कि वह बकरी लेकर चले तो वह कूद कर हमला कर देगा लेकिन थोड़ी ही देर में फिर उसका साहस वापस आ गया। ये साले छोटी जात के लोग, इनकी इतनी हिम्मत है!- उसने अपनी लाठी पर एक बार मूठ कसी फिर लाठी को ढीला छोड़ दिया।

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