समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

कविता

स्त्री जीवन के यथार्थ को दर्शाती मंजुला बिष्ट की कविताएँ

समकालीन जनमत
सोनी पाण्डेय   मैं अक्सर सोचती हूँ कि पुरुषवादी समाज में हमेशा से औरतों का आंकलन ऐसा क्यों रहा कि वह कहने को विद्या की...
सिने दुनिया

सिने दुनिया: कैफ़रनॉम (लैबनीज, अरबी): इन बच्चों की हँसी किसने चुराई है…

फ़िरोज़ ख़ान
आपको एलन कुर्दी याद है। नाम भूल गए होंगे शायद, लेकिन उसकी सूरत और वह हादसा कोई कैसे भूल सकता है। 2 सितंबर, 2015 की...
स्मृति

वरिष्ठ कन्नड़ दलित साहित्यकार सिद्धलिंगय्या को विदाई सलाम

समकालीन जनमत
हीरालाल राजस्थानी वरिष्ठ कन्नड़ दलित साहित्यकार माननीय सिद्धलिंगय्या (1954 से 11 जून 2021) का जाना एक युग का बीत जाना है. कन्नड़ के जाने माने...
जनमतपुस्तकसाहित्य-संस्कृति

सेवासदनः नवजागरण, हिन्दी समाज और स्त्री

दुर्गा सिंह
हिन्दी भाषा में  प्रेमचंद ने पहला उपन्यास ‘सेवासदन’ लिखा। उर्दू भाषा में यह ‘बाज़ारे हुश्न’ नाम से लिखा गया था। हिन्दी में ‘सेवासदन’ नाम से...
स्मृति

अज़ीम कवि एवं फ़िल्मकार बुद्धदेव दासगुप्ता

समकालीन जनमत
प्रशांत विप्लवी जब फ़िल्मों का बहुत ज्यादा इल्म नहीं था तब भी बहुत सारी महत्त्वपूर्ण फिल्में देखने की क्षीण स्मृति है। विकल्पहीनता कई बार वरदान...
स्मृति

दीघा घाट पर नम आंखों से कॉमरेड रामजतन शर्मा को अंतिम विदाई 

समकालीन जनमत
पटना। भाकपा-माले की केंद्रीय कमिटी व पोलित ब्यूरो के पूर्व सदस्य, केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के पूर्व चेयरमैन और बिहार समेत कई राज्यों के पूर्व राज्य सचिव...
चित्रकला

वक्त की जटिलता को जीवंतता के साथ अभिव्यक्त करने वाले चित्रकार हैं प्रमोद प्रकाश

कुछ ही ऐसे कलाकार होते हैं जो बगैर किसी आर्थिक या महत्वकांक्षी समर्थन के लंबे समय तक निरंतर सक्रिय रह पाते हैं | ऐसा तब...
स्मृति

शुक्ला चौधुरी : प्रकृति से प्रेम करने वाली रचनाकार का जाना

समकालीन जनमत
मीता दास कवि व कथाकार शुक्ला चौधुरी नहीं रहीं। उनका जाना एक ऊर्जावान रचनाकार का जाना है। कोरोना से जंग थी। उनका इसे न जीत...
कविता

रामेश्वर प्रशान्त की कविताएँ जनता के रिसते ज़ख्मों का दस्तावेज़ हैं

समकालीन जनमत
राणा प्रताप ________________________________________ ‘भविष्य उन लोगों का होगा जिन्हें आधुनिक समाज की आत्मा की पकड़ होगी और अत्यंत परिशुद्ध सिद्धांतों को छोड़कर जीवन की अपेक्षाकृत...
सिने दुनिया

सिने दुनिया: परफ़्यूम(जर्मन): एक मरा हुआ पैगंबर..

फ़िरोज़ ख़ान
नायक-खलनायक, देवता-राक्षस, पैगंबर और शैतान, जीवन के सिर्फ दो ही शेड नहीं होते। किसी पैगंबर या देवता या ईश्वर का कोई ऐसा शेड भी हो...
कविता

तनुज की कविताएँ

समकालीन जनमत
प्रशांत विप्लवी “कविता की नब्ज़ को छूकर हम महसूस कर सकते हैं कि उसमें हमारा कितना रक्त, कितने ताप और दबाव का प्रवाह दौड़ रहा...
जनमतसाहित्य-संस्कृति

निराला की कहानियाँ: राष्ट्र-निर्माण, शिक्षा और संस्कृति

निराला ऐसे रचनाकार हैं, जिन्हें भारतीय प्रबोधन  या नवजागरण के तत्वों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। यह प्रबोधन वैयक्तिक स्वतंत्रता की चेतना...
स्मृति

शक़ील अहमद ख़ान: होठों पर हँसी, आँखों में प्यार बसा था जिसके…

फ़िरोज़ ख़ान
  शक़ील अहमद ख़ान को सुपुर्द-ए-आग कर दिया गया। जी हाँ, ठीक सुना- सुपुर्द-ए-ख़ाक नहीं। लखनऊ के इलेक्ट्रिक शव दाह गृह में उनकी करीब 30...
कविता

फ़िरोज़ की कविताएँ इस राजनीतिक सन्निपात में एक सचेत बड़बड़ाहट हैं

समकालीन जनमत
प्रभात मिलिंद फ़िरोज़ खान की ये कविताएँ फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ आक्रोश की कविताएँ है। काव्य-वक्रोक्ति की अनुपस्थिति में ये अपने लहज़े में थोड़ी खुली हुई...
स्मृति

मेरी मातृभूमि का कोई मुआवज़ा नहीं हो सकता: सुंदरलाल बहुगुणा

समकालीन जनमत
मई 1995 में वर्तमान में उत्तराखण्ड में शिक्षक नवेंदु मठपाल टिहरी बांध आंदोलन और वहाँ के डूब क्षेत्र के गाँवों की स्थितियों को नज़दीक से...
स्मृति

प्रो. लाल बहादुर वर्मा: वे एक साथ अध्यापक और दोस्त दोनों थे

समकालीन जनमत
धर्मेंद्र सुशांत लाल बहादुर वर्मा नहीं रहे.. करीब 20–21 साल पहले पटना में उनसे पहली बार मुलाकात हुई थी गोकि जान उन्हें पहले चुका था....
स्मृति

प्रो. लाल बहादुर वर्मा: एक प्रोफ़ेसर जिसने विविधता का मतलब बताया

समकालीन जनमत
सविता पाठक ये माना जिन्दगी है चार दिन की बहुत होते हैं यारों ये चार दिन भी -फ़िराक़  प्रो लालबहादुर वर्मा नहीं रहे। ये ख़बर...
स्मृति

प्रो. लालबहादुर वर्मा : अप्रतिम आवयविक बुद्धिजीवी के रूप में एक प्रकाश-स्तम्भ

प्रणय कृष्ण
( अप्रतिम जनबुद्धिजीवी प्रो. लालबहादुर वर्मा अब हमारे बीच नहीं हैं। आज उनका निधन हो गया। समकालीन जनमत उनको श्रद्धांजलि देते हुए प्रो. प्रणय कृष्ण का...
स्मृति

मेरी नींद मत लो मेरे सपने लो: मंगलेश स्मृति

समकालीन जनमत
मिथिलेश श्रीवास्तव दिल्ली शहर मंगलेश डबराल की कविता ‘मत्र्योश्का’ की तरह है ( मत्र्योश्का रूस की एक लोकप्रिय गुड़िया है जिसमें लकड़ी की बनी क्रमशः...
कविता

पहाड़ों की यातनाएं संजोते मंगलेश दा

अर्पिता राठौर मंगलेश डबराल का रचना कर्म उस सफर सरीखा है जो अपना समस्त जीवन मानवीय विडंबनाओं में संभावना तलाशते हुए गुज़ार देना चाहता है।...
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