Tuesday, May 17, 2022
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शक़ील अहमद ख़ान: होठों पर हँसी, आँखों में प्यार बसा था जिसके…

 

शक़ील अहमद ख़ान को सुपुर्द-ए-आग कर दिया गया। जी हाँ, ठीक सुना- सुपुर्द-ए-ख़ाक नहीं। लखनऊ के इलेक्ट्रिक शव दाह गृह में उनकी करीब 30 साल की साथी, जीवन संगिनी प्रियंका, बेटी लहर और कुछ परिजनों की मौजूदगी में उन्हें आखिरी विदाई दी गई। प्रियंका जी ने बहुत भारी मन से बताया कि हमने वही किया, जैसा शकील चाहते थे।

शकील चाहते थे कि उनकी खाक उस समंदर में बहा दी जाए, जिससे इंसान वजूद में आया और जिसकी लहरों का उनकी तरह कोई मजहब नहीं। 23 मई को लखनऊ में शकील ने आखिरी सांस ली थी और 26 मई की सुबह हम लोगों ने बम्बई के उनके पसंदीदा अक्सा बीच पर उनकी ख़ाक को लहरों के हवाले कर दिया। प्रियंका और लहर के अलावा इस मौके पर शकील के सबसे करीबी दोस्तों में फिल्मकार अविनाश दास, स्वर्ण कांता, रीना और मैं मौजूद थे।

अक्सा बीच पर आज सुबह शक़ील की अस्थियाँ विसर्जित करते परिजन और मित्र

शकील लेखक नहीं थे और न कोई सोशल ऐक्टिविस्ट। लेकिन जितना मैंने देखा और जाना है, शकील का भरोसा हमेशा इंसानों में रहा, किसी ख़ुदा में नहीं। धर्मों से लेकर इतिहास और साहित्य तक उनकी गहरी समझ थी। वे वैज्ञानिक चेतना से भरे हुए इंसान थे। अपने शरीर को जलाने और दफनाने का तरीका बुरा नहीं है, लेकिन अब तक का जो आधुनिक तरीका यहाँ संभव था, शकील ने वही इच्छा जताई। बिजली का स्विच दबाते ही कुछ देर में शरीर का धुआं हो जाना जिस शख्स ने चुना, उसकी यादें न जाने कितने लोगों के जेहन में प्यार बनकर दहकती रहेंगी। वे कभी धुआं नहीं होंगी।

मैंने अपनी देखी दुनिया में शकील जितने प्यारे और सच्चे लोग किस्से-कहानियों में ही देखे-सुने हैं। हमारी दोस्ती कोई बहुत ज्यादा पुरानी नहीं थी। लेकिन शकील के जीवन में आने के बाद जाना कि पुरानी चीजें ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद हों, यह जरूरी नहीं। लंबे समय तक हमारी सिर्फ फोन पर बात होती थी। फिर एक दिन दिल्ली से फोन आया कि अशोक भाई (अशोक कुमार पांडेय) ने आपके लिए भगत सिंह के आयोजन वाली टी-शर्ट भेजी है। दो दिन बाद आता हूं, इस बहाने मुलाकात भी हो जाएगी। मैं मिलने-जुलने में बहुत संकोची हूं, लेकिन देखता हूं कि दो रोज बाद हमेशा हंसते रहने वाला एक बेहद प्यारा और चाॅकलेटी चेहरा सामने है।

वे ऐसे मिल रहे थे, जैसे लंबे समय बाद किसी बिछुड़े दोस्त से मिल रहे हों। बाद में मैंने देखा कि यह शख्स तमाम हमख्याल लोगों को अपना ही अक्स समझता था। वह उनकी जिंदगी में सारे दरवाजे-खिड़कियां खोलते हुए ही नहीं, बल्कि तोड़ते हुए प्रवेश करता था। ऐसे कि वे दरवाजे-खिड़कियां कभी बंद ही न हों और वह साधिकार कभी भी आ-जा सके।

वह तमाम रिश्तों में दोस्ती के रिश्ते को अव्वल मानता था। मेरे लिए वह पुरुष धन्य है, जिसकी तारीफ महिलाएं (मां, बहन, बुआओं को छोड़कर) करती हों। महिला मित्रों के बीच शकील हमेशा एक आश्वस्ति जगाते थे कि स्त्री और पुरुष बहुत सहज दोस्त हो सकते हैं। उनके जाने के बाद कई महिलाओं ने फेसबुक पर इस सहजता के बारे में लिखा है।

एक बटा दो उपन्यास की लेखिका और जेंडर पर गहरी समझ रखने वाली सुजाता शकील के लिए लिखती हैं कि वह एक ऐसे अकुंठ, सहज और निश्छल पुरुष थे, जिससे मैं निर्द्वन्द्व गले लग सकती थी। बिल्कुल यही बात मुंबई में स्वर्ण कांता भी कहती हैं।

मैं इस बात की तस्दीक कर सकता हूं कि जो भी शकील से एक बार मिला, वह उनका हो गया। अपने विरोधियों से भी वह मुस्कराकर मिलते थे और हमेशा किसी भी मसले का हल संवाद ही बताते थे। सांप्रदायिकता और तमाम मसलों पर वे उन लोगों को भी बात करने के लिए आमंत्रित कर लेते थे, जिन्हें सोशल मीडिया की शब्दावली में घनघोर भक्त कहा जाता है और जिनसे तर्कों के आधार पर पार पाना आसान नहीं होता। बाद में मैंने जाना कि शकील की इस बात की बहुत पुरानी ट्रेनिंग है। यह ट्रेनिंग प्रियंका जी से मोहब्बत हो जाने के बाद से शुरू होती है।

प्रियंका जी दिल्ली के एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती हैं, जिनके घर में कुछ लोग आरएसएस और हिंदू महासभा से जुड़ हुए थे। यह उन दिनों की बात है, जब राम मंदिर आंदोलन चरम पर था। शायद बाबरी ढहा दी गई थी। ऐसे में कल्पना कीजिए कि एक हिंदू-मुसमलान प्रेमी-प्रेमिका को एकसाथ जीवन शुरू करने के लिए घर वालों की रजामंदी हासिल करना कितना मुश्किल रहा होगा। लेकिन संघर्षों के साथ ही सही, लेकिन इस हंसते हुए चेहरे ने प्रियंका जी की हिम्मत और मोहब्बत के भरोसे वे सारी मुश्किलें आसान बना ली थीं। प्रियंका के पापा और मम्मी ने शकील से जब कहा कि आप मुसलमान हैं, हम समाज वालों से क्या कहेंगे। इस पर शकील ने यही कहा कि मेरे मुसलमान होने और आपके हिंदू होने में मेरी और आपकी कोई भूमिका नहीं है। ऐसा होना हमने और आपने नहीं चुना है। लेकिन फिर भी अगर आपको मेरे मुसलमान होने से दिक्कत है तो मैं हिंदू धर्म स्वीकार कर लेता हूं। बहरहाल, एक पारंपरिक हिंदू परिवार के लिए यह आसान नहीं था, बावजूद इसके कि प्रियंका जी की मां का विरोध धीरे-धीरे कम होता जा रहा था। एक बार तो उन्होंने शकील से कहा भी कि आप चार शादियां तो नहीं करेंगे। शकील ने वादा तो कर दिया, लेकिन अपनी सास से किया यह वादा उन्होंने तोड़ दिया। उन्होंने चार शादियां कीं। यह अलग बात है कि चारों शादियां एक ही लड़की प्रियंका से कीं।

हुआ यूं कि जब शकील और प्रियंका को लगा कि घरवाले उन्हें जुदा कर सकते हैं तो उन्होंने छुपकर आर्य समाज मंदिर में यह सोचकर शादी कर ली कि बाद में घर वालों को मना लेंगे। बाद में जब प्रियंका के घर वाले मान गए तो उन्होंने हिंदू रीति-रिवाज से दोनों की शादी कर दी। शकील जब अपने घर पहुंचे तो उनके मम्मी-पापा ने दोनों की शादी मुस्लिम रीति-रिवाज से करवा दी। इन शादियों के काफी साल बाद जब इन दोनों की बेटी लहर थोड़ी बड़ी हुई तो इन्होंने अपने वास्तविक नामों के साथ कोर्ट मैरिज की, जिसमें एक गवाह लहर भी बनी।

फ़िरोज़ ख़ान
फ़िरोज़ ख़ान कवि और पत्रकार हैं. देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाॅग्स पर कविताएँ और सिनेमा पर कुछ लेख-साक्षात्कार प्रकाशित। इनकी कुछ कविताओं का मराठी में अनुवाद हो चुका है। नवभारत टाइम्स, बम्बई के एडिटोरियल विभाग में कार्यरत। सम्पर्क: 7303745705 ई मेल: firojwriter2013@gmail.com
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