समकालीन जनमत
कविता

तनुज की कविताएँ

प्रशांत विप्लवी


“कविता की नब्ज़ को छूकर हम महसूस कर सकते हैं कि उसमें हमारा कितना रक्त, कितने ताप और दबाव का प्रवाह दौड़ रहा है.” – मलयज

एक किसी विशिष्ट शैली के समानांतर चलती हुई कविताएँ हैं। एक छटपटाहट और अधीरता महसूस कराती हुई कविताएँ । एक युवा कवि की विकलता उसकी रचनाधार्मिता की उर्वरता की ओर संकेत देती हैं। तनुज की अधिकांश कविताओं में कवि और कविताओं का अत्यधिक ज़िक्र दर्शाता है कि वे अपने रचनात्मक जीवन में निमग्न हैं। उन्हें अवधारणाओं और मान्यताओं के किस्सों की ख़बर तो हैं लेकिन उन्हें सचेत होना होगा कि भाषाई तौर पर बदली हुई पंक्तियों के भाव नहीं बदलते हैं। अमूमन अवचेतन मन में घुमड़ने वाली कविताओं की बुनावट और उसके भाव बेहद स्पष्ट होते हैं। कविता चकित करने की विधा नहीं है। अद्यतन जब मानवीय संवेदना नष्ट होती जा रही है और मनुष्य फूहड़ता के संसर्ग में जकड़ा हुआ है , एक कविता प्रेम पर या देश काल पर कही जा रही है – यह बहुत मायने रखता है।

तनुज की कविताएँ उनके कविता के प्रति अनुराग का प्रस्फुटन है। उनकी रचनात्मकता उनकी संवेदना पर ज्यादा हावी दिखती है। प्रयोगधर्मी कवियों ने कविताओं के आत्मा को लील लिया है इसलिए मैं सशंकित हूँ कि तनुज जिस शैली की ओर आगे बढ़ रहे हैं वो शैली उन्हें उसी एकात्म में छोड़ आएगी। वे बेशक़ एक प्रतिभाशाली संभावित कवि हैं किन्तु उनकी चेष्टा अपने मौलिकता को बचाए रखने की होनी चाहिए।

समकालीन कविताओं का वितान युवा कवियों के कारण विस्तृत हुआ है। तनुज जैसे युवा कवियों ने एक नया विमर्श रखने की कोशिश की है। आज का सामाजिक परिवेश जो देश दुनिया के राजनैतिक उथल-पुथल के कारण बहुत बदल चुका है, वहाँ से अपने अनुभव बटोरने होंगे। युवा कवियों को अपनी दृष्टि से दुनिया देखनी होगी। अगर वो एक घिसी-पिटी लीक को पकड़ कर चलेंगे तो कविता का उत्थान संभव नहीं है। वैश्विक चिंताओं के प्रति उनके खुले विचार ही उनकी वैचारिक मनःस्थिति की पड़ताल देगी। आज जब देश पूंजीवादी सत्ता के हाथों दमघोंटू समय झेल रहा है , युवा कवियों को अपने इस समय को अपनी कविताओं में जगह देनी पड़ेगी। एक स्वतंत्र नजरिया जिससे समय सही से निरूपित हो रहा हो।

तनुज की इन कविताओं में उनकी गंभीर पाठकीयता साफ परिदृश्य हो रही है। जब दुनिया महज़ उंगलियों पर संवेदना को समेटकर बैठी हुई है वहाँ एक युवा की पाठकीयता बहुत आश्वस्त करती है। शैली, कथ्य, बिम्ब, संरचना, इन तमाम मापदंडों की प्राथमिकतायें बाद में आती हैं, मौलिकता और नयापन सर्वोपरि है। उम्मीद है तनुज आने वाले समय में अपने फ़लक को और भी बड़ा करेंगे।
तनुज की एक कविता जो मुझे बेहद पसंद है , उसके इस अंश को पढ़कर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनकी चिंता कितनी गहन और अवलोकन दृष्टि कितनी सूक्ष्म है।
“एक कमरे में
क्षमा चाहता हूं ! एक कविता में
किसान पेड़ पर फंदा लटका कर
यूं झूल रहा
जैसे झूलता है
तुम्हारी मुख्यधारा से वंचित आदिवासी ‘ कवि ‘
जो छोड़ आया
गाँव, खेत , नदी, किसानी,
महज तुम्हारी भाषा सीखकर
तुमसे अपनी बात कहने”

(“किसान पर कविता” शीर्षक कविता से उद्धृत अंश)

तनुज की कविताएँ

1. अब कभी होगा नहीं किसी से प्रेम

मध्य रात्रि यातना शिविर में
बेकल प्रेमियों को मिल रही है
छटपटाने की खुली छूट

एक जहाज अंधकार के आतंक से
रुका हुआ है
तुम्हारीं इन्हीं आँखों के सागर के मध्य

कविता क्यों बचाने जाएगी अब
दीपशिखा पर पसरी रौशनी की इस अंतिम लौ को

कवि जन त्याग रहे हैं
इन अदिम प्रतिक्षाओं में
लहूलुहान
मृत देह

प्रेमिकाएं यौन कामना की आपूर्ति में निगल रहीं हैं चाँद के गोले

पूर्णिमा का वह वयस्क चंद्रमा , जो लौट आता था-
अपने भीतर की अमावस्या का हर बार दमन कर,

गुम गया है अंतरिक्ष की उलझी हुईं राहों में

क्योंकि भूल जाना है अब सदा लिए ईश्र्वर का रूप
और फूलों का स्पर्श

कर्मण्य सारे छू रहे हैं पिस्तौल
और अकर्मण्य अपने-अपने गुप्तागों को

अब कभी होगा नहीं किसी से प्रेम !

2. आधी बात सच

पूर्णतः नहीं मिलने से अधिक सार्थक

होता –
मेरा और तुम्हारा कभी नहीं मिलना.

जब जब छुआ, अपूर्ण रह गयी मेरी –
स्पर्श की आदिम कामना.

तुम्हारी पूरी बात में
आधी बात
सच
और आधी बात झूठ.

जैसे बाकी का आधा सच
चला गया हो
अमूर्तन दूसरे एकांत में सुरक्षित.

जैसे एक साथ
कितनी ही स्मृतियों को सुपुर्द
लिखी गयी है
मेरी यह कविता.

सिर्फ़ मुझे ही नहीं
तुम्हें भी छल गया है वसंत.

3. कविता के लिए

कविता के लिए
जटिल समय था

जो सब रहे थें रचनात्मक
सारे के सारे निकलें अवसरवादी

जिन जिन को इतिहास ने
‘कठमुल्ला’ घोषित किया
वे सब, जीवनपर्यंत – रहे थें प्रतिबद्ध

4.टूथपिक

अब जब विरेचन हो चुका है पूर्णतः

और आतिश को मैं भूलने में हो गया हूं कामयाब
मालूम नहीं कहाँ से निकलेंगी कोई भी नयी कविता

मेरे भीतर प्रवास की पीड़ा में
दब रहे हैं प्रतीक, बिंब , उत्स सारे
जैसे कवि की यह देह , दूसरी देह बन चुकी हैं

जंगल हुआ करता था हृदय
जैसे प्रेम नहीं , किसी बाज शिकारी ने
हाथी दौड़ाया था भीतर
उसके बाद उथल-पुथल …

याद में नहीं जानवरों , फूलों और दरख़्तों के नाम…

अब , जब विरेचन हो चुका है पुर्णतः
कहां से निकलेंगी फांस
किस कुँए में जाकर फैलाऊंगा इन हथेलियों को.
पानी की कमी से नहीं , शर्म की अधिकता से मर जाएंगी कविता

तलाशना होगा हमें साथ
उस व्यक्ति का , उस हादसे का
अविरल उस कवि की स्मृति का

स्मृति , जिनके गत्ते के भीतर से
उगेगी कविता की नयी किताब…

कहां गईं वें ‘टूथपिक’?

5. मुक्तिबोध की बीड़ी

मैं पी रहा हूँ
विभागाध्यक्ष की अनुपस्थिति में
विभागाध्यक्ष के कमरे में
मुक्तिबोध की वे बीड़ियाँ
जो वह छोड़ गए थे
दशकों पहले –
(क्षमा याचना,
नहीं आ पाऊंगा कविता पाठ के लिए ) की तरह…!

मुक्तिबोध जो
भाषा में बीड़ी मांगने के लिए,
घूमते रहे होंगे उस दुनिया में…
जहाँ सभ्यताएं बीड़ी पीकर
कविताएँ लिख दिया करती थीं।

कितनी सरल होगी
उस यायावर की मुखाकृति,
जब कविता न कहने के एवज़ में-
किसी भी सड़क चलते चालक कुली, बावर्ची, भांड, भिखारी, या रंडियों से –
वो मुखाकृति
अधीर होकर मांग लेती होगी
मुफ़्त में
बीड़ी और माचिस…

कविता न कहने के एवज़ में
वे किसी भी लैंप-पोस्ट के नीचे
सुनसान पगडंडियों पर बैठकर
कश- दर – कश, कश्मकश
फूंकते होंगे फंतासियां…

आंखें तलाशती होंगी
वह पार्टनर जिसे मालूम होगा
उसकी पॉलिटिक्स क्या है।
एक अनुकरणीय अभ्यार्थी…
जिसके साथ वे बांट सकते थे
कभी न ख़त्म होने वाली बीड़ियाँ …

इस तरह सोचने के क्रम में
मैं यथास्थिति में पहुंच जाता हूं
उनके पास उनकी फंतासी
उनकी भाषा उनके आचरण में,

कि तभी
कमरे में टंगी मुक्तिबोध की तस्वीर
धू-धू करके जल उठती है
जैसे जला देंगी यह मठ,
जैसे ही फूंकता हूँ
विभागाध्यक्ष के कमरे में
मुक्तिबोध की बीड़ियाँ।

6. मैं जब उससे बहुत दिन बाद मिला

एक देह प्रकाश की तरफ़

पुनः अचानक कौंध पड़ी
जिसको एक टक देखने तक की ,
लंबी मियाद हुआ करती थी

तितलियां जिसे हिंसक बच्चे की तरह
उड़ा कर चली गई थी तुम , वर्षों वर्षों पहले
वे सब बैठ गईं वापिस मेरी धमनियों के फूल पर

मैं उसे बताना चाहता था कि
उसकी अनुपस्थिति ने मेरी छवि तराशी है

उसे भूलने के लिए नहीं
बार-बार करने के लिए उसका पुनर्पाठ
प्रेम के इस बीच अनगिनत प्रसंग रचें

समय के दो भिन्न ध्रुवों के बीच हम-तुम
और बीच के सारे प्रसंग एक पूल
जो हिज़्र की इस लंबी नदी को
सोख लेगा एक दिन

मगर यह बतकही महज़ बतकही ही तो थी

और वह लड़की जो सबसे पहले सिखा गयी
मुझे जुनून की भाषा की ‘वर्णमाला’

वह तो अब भी डूबी हुई लगी मुझे
नाज़िम हिकमत की रोटी सी
किसी गर्म चाय में
जो अनंत काल तक खौलती रहेगी
जिसने उसे अधिक आकर्षक बना दिया है

चूमने को स्थगित कर
मैं बिना बात किए लौट आया.

7. दुखों का दोहराव

देह थी या फूलों से लदी हुई कोई क़ब्र

इतनी सम्मोहक कि
बार-बार नए तरीके से बहकने
के लिए
बार-बार करनी पड़ती थी
प्रेम की अंत्योष्टि
और फ़िर मेरी याचनाएं
उसी रति क्रिया का एक हिस्सा
जो उसकी एड़ियों पर
घिसता हुआ अपना सिर
दुनिया की सबसे निर्दोष विनती-
जो कभी आई ही नहीं तुम
तुम्हे जाते हुए नहीं देख सकता
सत्य को बना रहने दो व्यवहारिक

8. किसान पर कविता

कविता में

किसान का होना
किसान का भाषा में होना नहीं
अपितु
किसान में भाषा का होना है

क्योंकि
जब लिखते हो तुम
किसान पर कविताएं
लिख देते हो तुम
कविता में ‘ किसान’..

कवि तुम्हारा बदलता है सौंदर्यबोध
जब तुम्हारी भाषा में
जंगल, गांव , खेत, नदी, नहर, तालाब आदि
का होता है प्रतिनिधि कारोबार
तुम बिखेरते हो
एक अदृश्य गंध
अनाज का , वनफूल का ,
वनसुंदरियों का , वनपुरुषों का

तुम होना चाहते हो
अधिक से अधिक मनुष्यता के पक्ष में
और कम से कम कविता के पक्ष में
जब
लौटते हो रोजनामचे की दोपहरी से
मेहनतकशों की शाम में
जहां धान रोपते
थके हुए हैं
आदिश्रमिक…

तुम्हारी सभ्यता में
‘ किसान’ बनकर सुंदर हो चुके हैं।

सानते हो अपनी मानक शब्दावली की मिट्टी
उनके पसीने से .
बनाते हो भव्य कमरा
जो तुम्हारे संग्रहनुमा महल का
एक ज़रूरी कक्ष है
….

एक कमरे में
क्षमा चाहता हूं ! एक कविता में
किसान पेड़ पर फंदा लटका कर
यूं झूल रहा
जैसे झूलता है
तुम्हारी मुख्यधारा से वंचित आदिवासी ‘ कवि ‘
जो छोड़ आया
गाँव, खेत , नदी, किसानी,
महज तुम्हारी भाषा सीखकर
तुमसे अपनी बात कहने .

अफ़सोस कि
मैं तुम्हारे इस प्रचलित परिसीमन से हूं पूर्व परिचित
तुम लिख दोगे,
किसानों पर कविता
लिखोगे किसानों की
‘ आत्म-हत्याओं ‘ पर कविता
मगर नहीं सुनोगे
अब तक भी
किसानों के द्वारा
लिखी गई कोई कविता

 

 

(कवि तनुज वर्तमान में विश्वभारती विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातक कर रहे हैं। विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में लगातार से यह सक्रिय रहे हैं। मार्क्सवादी, लेनिनवादी सैद्धांतिक समीक्षा में इनकी  दिलचस्पी रही है।

संपर्क : email : [email protected] com, Phone no : 9693867441

टिप्पणीकार प्रशांत विप्लवी
मूलतः कवि एवं भारतीय समानांतर सिनेमा / रिजनल सिनेमा का प्रसंशक और टिप्पणीकार
पत्र-पत्रिकाओं एवं कुछ ब्लॉग्स में कविताएं छपी हैं
फ़ेसबुक पेज़ : फ़िलिम-विलिम की बातें (फ़िल्म से जुड़ी हुई समीक्षा, टिप्पणी और अन्य जानकारियाँ)
शिक्षा : स्नातक
संपर्क : 404, साईं एन्क्लैव, प्रोफेसर कॉलोनी, पटना – 800023
ईमेल : [email protected])

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