समकालीन जनमत
कविता

फ़िरोज़ की कविताएँ इस राजनीतिक सन्निपात में एक सचेत बड़बड़ाहट हैं

प्रभात मिलिंद


फ़िरोज़ खान की ये कविताएँ फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ आक्रोश की कविताएँ है। काव्य-वक्रोक्ति की अनुपस्थिति में ये अपने लहज़े में थोड़ी खुली हुई प्रतीत होती हैं लिहाज़ा क्राफ्ट की दृष्टि से ये ज़रा प्रोज़ैइक कविताएँ हैं।

लेकिन जब पूरे मुल्क की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सियासी आबोहवा इतनी प्रतिगामी, संवेदनाशून्य, नृशंस, ग़ैरज़िम्मेदार और प्रतिशोधपूर्ण हो जाए तो पोएटिक लक्ज़री से डिटैच हो जाना कविता की ज़िम्मेदारी है, और यह एक ज़रूरी ज़िम्मेदारी है। इसलिए ये आक्रोशपूर्ण होने के साथ-साथ आक्रामक और साफ़गो कविताएँ भी हैं। नाइजेरियाई कवि और उपन्यासकार बेन ओकरी लिखते हैं :

“हमारी दुनिया में, जहाँ बंदूक़ों की होड़ लगी हुई है, बम-बारूदों की बहसें जारी हैं, उस उन्माद को पोसता हुआ विश्वास फैला कि सिर्फ़ हमारा पक्ष, हमारा धर्म, हमारी राजनीति ही सही है, दुनिया युद्ध की ओर एक घातक अंश पर रुक गई है। ईश्वर जानता है कि किसी भी समय के मुकाबले हमें कविता की ज़रूरत आज कहीं ज़्यादा है। कविता हमारे भीतर एक अंतरसंवाद पैदा करती है। यह हमारे सत्य के प्रति एक निजी यात्रा का प्रस्थान होती है।”

फ़िरोज़ पेशे से पत्रकार हैं और मेरे देखे उन गिने-चुने युवा कवियों में एक हैं जो पत्रकारिता की स्थूल भाषा और कविता की अंतर्भूत भाषा के बीच ज़रूरी और विवेकपूर्ण संतुलन साधने में समर्थ हैं। विश्व सिनेमा के बारे में उनकी विश्लेषणात्मक समझ का मैं कायल रहा हूँ, और यह कह सकता हूँ कि सजग सिनेमा और संजीदा साहित्य की पारस्परिकता ने उनके कवि और पत्रकार दोनों को ही समृद्ध किया है। ‘फासिस्ट’ कविता पढ़ कर कात्यायनी की कविता ‘गोएबल्स’ अनायास ज़ेहन में कौंध जाती है। बेशक इन दोनों कविताओं के कंटेंट में एक साम्यता है लेकिन संदर्भों को ध्यान में रखें तो दोनों का डिक्शन पूरी तरह भिन्न है। जम्हूरियत की केंचुली में गोएबल्स होता तो शायद वह भी ऐसे ही परिभाषित होता :

‘वो चलता है चल पड़ते हैं मुल्क तमाम
उसे गुमान है कि ऐसा हो रहा है
उसे गुमान है कि वो ख़ुदा होने को है
वो अपने भाषणों में अक्सर रोता भी है
जहाँ गिरते हैं उसके आँसू
वहाँ फिर कभी घास नहीं उगती’

मैंने कहीं पढ़ा था, और बहुत हद तक यह सच भी है कि कवि जितनी तादाद में भी कविताएँ अपने जीवन में लिखता है, वे सभी वस्तुतः एक ही लंबी कविता की आनुषंगिक होती हैं। यह अन्तरस्वर हमें फ़िरोज़ की कविताओं में भी सुनाई देता है। उन सब में विषय की विविधताएँ हैं लेकिन अपने-अपने प्रयोजन में, कथ्य के किसी न किसी अक्षांश पर वे सभी एक-दूसरे से मिलती हुई दिखती हैं। ये अनिवार्य रूप से पोलिटिकल कविताएँ हैं। कश्मीर, प्रेम, नागरिकता, संबंध, औरत, समाज, पलायन, उम्मीद वग़ैरह इसके मुख्तलिफ़ विषय हो सकते है, लेकिन अपनी परिणति में ये अंततः नाराज़गी की कविताएँ हैं।

ऐसे अनेक अपराध हैं जो संविधान में सूचीबद्ध नहीं होने के बाद भी मानवीय दृष्टि से संगीन हैं, और ऐसे भी अपराध हैं जिनको सायास इसलिए सूचीबद्ध किया जाता है ताकी उनका कॉन्स्टिट्यूलाइजेशन और सोशलाइजेशन किया जा सके और उनको वैलिड बनाया जा सके। ये दोनों स्थितियाँ ख़तरनाक हैं। फ़िरोज़ की कविताएँ इन दोनों ख़तरों के ख़िलाफ़ आगाह करने की एक कोशिश हैं। ‘रक्त सने समय में कवि’ वे इसीलिए पूछते हैं :

‘जो सोते-सोते कार के नीचे मर जाते हैं
जो बनाते हैं सड़कें, गलियाँ, महल-अटारी
चौकीदारी करते हैं जो
दफ़्तरों में क्लर्की करते-करते जो मर मर जाते हैं
वे सब तुम्हारी कविता में हैं लेकिन
कविता आकर पूछेगी कवि से
वे सब तुम्हारी कविता में क्यों हैं’

अनुच्छेद 370 की समाप्ति न सिर्फ़ जातीय राष्ट्रवाद का एक अधिनायकवादी कृत्य है, बल्कि बहुसंख्यक विचार द्वारा एक पंथ-विशेष के सदस्यों को मार्जिनलाइज करने, उसे दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर रिड्यूस करने और भारतीय संघ की समावेशी आत्मा के साथ बुनियादी छेड़छाड़ करने की भी कवायद है। ‘कश्मीर’ कविता में यह इशारा करने करने की कोशिश बहुत शाइस्ता मेटाफ़र के साथ की गई है। इतिहास की प्रयुक्ति हमारे बेहतर आज के लिए एक सबक के रूप में होनी चाहिए, न कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के एक टूल की तरह। ऐसे भी जातीय राष्ट्रवाद का उद्देश्य ही पूंजीवाद को प्रोत्साहित करना है। यहाँ यह रेखांकित करना मुनासिब होगा कि कश्मीर के तथाकथित ‘विलय’ का समर्थन करने वालों में एक बड़ा तबका उनका था जिनको देशप्रेम का ककहरा भी नहीं मालूम है। अलबत्ता उनकी दिलचस्पी कश्मीरी औरतों में और घाटी में ज़मीन के टुकड़ों में ज़्यादा थी। ये आंकड़े गूगल सर्च ने मुहैया कराए हैं। लेकिन मानवाधिकारों का माखौल उड़ाने वालों की कंडीशनिंग में मजलूमों, बच्चों और औरतों के नज़रिए से सोचने का रिवाज कहाँ रहा ! अदरिंग के तरीके उनको ज़रूर आते हैं।

‘हर सोलह लोगों पर एक फौज़ी था
जिनपर बन्दूक़ तनी थी
उनमें से चार बच्चे थे
बच्चों के दिमाग़ों में दहक रही है आग
जन-गण-मन में नहीं आते ये बच्चे’

नवपूंजीवाद का बीजांकुरण निःसन्देह भूमंडलीकरण-संस्कृति की उर्वर भूमि में हुआ है। अनेक नवविकसित देशों में वर्तमान सर्वसत्तावादी राजनीति उसी बीज से निकली विष-कोपल है। आर्थिक ग़ैर बराबरी और राष्ट्रीय अस्मिता की जड़ों की तलाश के बहाने हिटलर से लेकर मुसोलिनी और तोजो से लेकर फ्रांको जैसे फासिस्ट सत्ता में आए। और, इसकी ज़द से फ़िलहाल भारत भी बहुत दूर नहीं दिखता। ज़ाहिर है, ऐसे मुल्क और समाज में विचार और साहित्य भी इस आशंका, असुरक्षा और आक्रोश से अछूते नहीं रह सकते। भारत की मौजूदा पुरपेंच राजनीति का प्रस्थान-बिंदु यही है। फ़िरोज़ की काव्य-भाषा में भी इन्हीं प्रवृत्तियों का इन्टरनलाइज़ेशन दिखता है। ये पंक्तियाँ ग़ौरतलब हैं :

‘रीना को भ्रम हो गया है कि
बहुत प्यार करता हूँ मैं उन्हें
हमेशा सोता हूँ उन्हें बाहों में समेट कर
अब कैसे बताऊँ कि डरता हूँ मैं
इस डर में कोई कैसे प्यार कर सकता है’

या फिर :

‘यह जो रात है
जाने कितनी रातों का अंधेरा शामिल है इसमें
यह रात
जिसने दिन को भी डस लिया है’

बतौर एक कवि फ़िरोज़ की ये नागरिक-चिंताएँ मुझे बरबस मुनीर नियाज़ी के एक शे’र की याद दिला जाती हैं :

‘वो काम शाह-ए-शहर या शहर से हुआ
जो काम भी हुआ है वो अच्छा नहीं हुआ’

‘लाइट हाउस’ कविता में पलायन और अन्तर्विस्थापन की त्रासदी से गुज़रे हज़ारों मेहनतकशों के अकथ दर्द का बयान इन पंक्तियों में देखा जा सकता है :

‘जानते थे वे लौटने का सुख/अम्मा की इंतज़ार करती बूढ़ी आँखों को वे जानते थे/ड्योढ़ी पर बैठे बाबा की उकताहट को पहचानते थे’

और अंतिम पंक्तियाँ :

‘दिल्ली से पटना की दूरी पैदल-पैदल कितनी दूर होगी
क्या कोई मील का पत्थर माप सकेगा इस दूरी को’

वीरेन डंगवाल ने स्मृतिविहीनता की सज़ा को सबसे बड़ा रोग बताया था। इत्तेफ़ाक़ से फ़िरोज़ के मनुष्य और कवि ने भी ख़ुद को स्मृतिविहीन होने से बचाए रखा है। उनकी कविताई में कुछेक अरबी और अफ़्रीकी कवियों की एक धनक सुनाई देती है, और हिंदुस्तान के मौजूदा सियासी निज़ाम में यह धनक सुनाई पड़ना लाज़िम भी है। बर्टोल्ट ब्रेष्ट बेसाख़्ता याद आते हैं :

“जिन्होंने नफ़रत फैलाई, क़त्ल किए/और ख़ुद ख़त्म हो गए/नफ़रत से याद किए जाते हैं।/जिन्होंने मुहब्बत का सबक दिया और कदम बढ़ाए/वो ज़िंदा हैं/मुहब्बत से याद किए जाते हैं।/जिन्होंने सही वक़्त का इंतज़ार किया/और शक करते रहे/वे आख़िर तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे/शक के कमजोर किलों में क़ातिलों का इंतज़ार/उनकी क़िस्मत बन गया।/रास्ते अलग-अलग और साफ़ हैं।/तुम्हें चुनना होगा/नफ़रत, शक और मुहब्बत के बीच/तुम्हारी आवाज़ बुलंद और साफ़ होनी चाहिए/और कदम सही दिशा में।”

फ़िरोज़ खान की ये कविताएँ भी फ़ेक राष्ट्रप्रेम, मोरल पुलिसिंग, पुलिस राज और संविधान-प्रदत्त स्वतंत्रता और अधिकारों में राज्य के ग़ैरज़रूरी हस्तक्षेप के जटिल परिप्रेक्ष्य में पढ़े जाने की तलबग़ार हैं।

 

फ़िरोज़ ख़ान की कविताएँ

1. डर की कविताएँ
सपनों में अक्सर पुलिस आती है
महीनों से
नहीं, नहीं… शायद सालों से
घसीट कर ले जा रही होती है पुलिस
धकेल देती है एक संकरी कोठरी में
और जैसे ही फटकारती है डंडा
मैं चीख पड़ता हूं
जाग कर उठते हुए
कब से जारी है यह सिलसिला
मां के खुरदरे और ठंडे हाथ
हथकड़ी से लगते थे उस वक्त माथे पर
सर्दियों में भी माथे की नमी से जान गया था कि
डर का रंग गीला और गरम होता है
जलता हुआ चिपचिपा रंग
सपना देखा कोई?
मां पूछती तो अनसुना कर
टेबुल पर रखी घड़ी की ओर लपकता
दादी कहती थी कि भोर के सपने सच होते हैं
मां से कहता था कि मेरे ऊपर हाथ रखके सोया करो
रथ परेशान करते हैं मुझे
मां कहती थी कि टीवी पर महाभारत मत देखा करो
अब मैं मां को कैसे समझाता कि
रथ में मुझे अर्जुन नहीं दिखते
कृष्ण के हाथ लगाम नहीं होती रथ की
पुलिस दिखती है
जहां-जहां से गुजरता है रथ
पुलिस ही पुलिस होती है चारों ओर
मेरी तरफ दौड़ती है
नाम पूछती है और दबोच लेती है मुझे

2.
रीना को भ्रम हो गया है कि
बहुत प्यार करता हूं मैं उन्हें
हमेशा सोता हूं उन्हें बाहों में समेटकर
अब कैसे बताऊं कि डरता हूं मैं
इस डर में कोई कैसे प्यार कर सकता है

3.
अकेला हूं इन दिनों
नहीं, नहीं
सपनों के डर के साथ हूं
घर के दरवाजे से नेम प्लेट हटा दी है मैंने
घर में कोई कैलेंडर भी नहीं
सारे निशान मिटा दिए हैं
मेरे नाम को साबित करने वाले
फिर भी आती है पुलिस
सपनों में बार-बार
कई रोज हुए, मैं सोया नहीं हूं

4.
डर का रंग सफेद होता है
नहीं, नहीं! भूरा होता है
बड़े-बूढ़ों से यही सुना था मैंने
लेकिन मेरे घर में तो कई रंगों में मौजूद है डर
कल रात की बात है
जब किसी ने जोर-जोर से पीटा था दरवाजा
मैं समझ गया था
डर खाकी रंग में आया है

 

2. फासिस्ट

1.
जब बच्चे दम तोड़ रहे थे सरकारी अस्पतालों में
या कि मसला जा रहा था उनका बचपन वातानुकूलित स्कूलों में
स्कूल तिजारत की मंडियों में तब्दील हो रहे थे जब
जब माएं रो रही थीं जार-जार
अपने फूल से बच्चों के लिए
तब वो अट्टाहास कर रहा था
जब वो मुस्कुराता था
तो डर जाते थे कितने ही लोग
सहम जाते थे अपने ही घरों में घुसते हुए
सहमे हुए ये लोग इन दिनों
बदल रहे हैं अपना जायका
ये लोग जिनकी रसोइयों में घुस गया है कोई दादरी
जिनके सीनों पर जम गई है मनों बर्फ
और जिनके घरों के ऊपर सदियों नहीं उगता कोई सूरज
ये लोग इन दिनों
आपस में भी कम बोलते हैं
2.
वो बोलता है तो कमल खिलते हैं
हाथ हिलाता है तो हिल जाती हैं दिशाओं की कोरें
वो चलता है तो चल पड़ते हैं मुल्क तमाम
उसे गुमान है कि ऐसा हो रहा है
उसे गुमान है कि वो खुदा होने को है
वो अपने भाषणों में अक्सर रोता भी है
जहां गिरते हैं उसके आंसू
वहां फिर कभी घास नहीं उगती

 

3. कश्मीर

उसने फरमान सुनाया
फिर हुक्म जारी किया गया
एक सरकारी कागज पर लिखा कर्फ्यू
और मुल्क के नक्शे पर सबसे ऊपर चिपका दियाइस हुक्म से बर्फ दहक उठी
और सूनी हो गईं सड़कें, गालियां, बाजार
दुकानों में ताले पड़ गए
किसी मस्जिद से नहीं आई किसी मुअज्जिन की आवाज
किसी मंदिर में कई रोज से नहीं बजी घंटियां
बेवश अल्लाह मियां करता रहा बन्दों का इंतजार
भोले बाबा घाटी की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़कर दिन-रात देखते रहे दिल्ली की ओर
घरों में पसरा रहा सन्नाटा
उसने संसद की छत पर चढ़कर नक्शे के उस हिस्से को देखा
वह मुस्कुराया और कहा
अब शांति है
सब शांति है इस साल बकरों ने, ऊंटों ने और दुम्बों ने मिलकर जश्न मनाया
सबसे ज्यादा हरियाये मैदानों में चरी बर्फ से धुली हुई घास
इस साल कुर्बानी की इन नस्लों की सच में ईद हो गई
वे सब कुलांचें मारते रहे यह जानते हुए कि
वे जायका तो बनेंगे ही किसी इंसानी जात का
या कि भूख मिटायेंगे किसी शेर, चीते या भेड़िए की
उन्हें मालूम था कि कुदरत का यही नियम है
लेकिन वे खुश थे कि इस बार उनकी मौत पर सामूहिक जश्न नहीं मनाया जाएगा
भूख को नहीं ओढ़ाई जाएगी किसी मजहब की चादर3उसने छाती पीटते हुए कहा
क्या बात करते हो तुम
जान दे देंगे हम
लोगों तक पहुंचते-पहुंचते यह बात एकदम उल्टी हो चुकी थी
या कि कहने वाला जानता था
कि कह रहा है वह किसी आईने से
और यह भी कि वह जानता था प्रतिबिंब का विज्ञान
जो लोग ऑन्छते हैं बाल बाईं ओर से
तस्वीरों में दिखते हैं उन्हें दाईं ओर
तो लोगों ने सुना कि जान ले लेंगे हम
और एक भीड़ ने निकाल लिए अपने हथियारउसने कहा कि सब शांति है
फौजी मुल्क की हिफाजत के लिए भेजे गए थे वहां
एक मुल्क सरहद के उस पार था
सरहद के इस पार थे कई मुल्कहर 16 लोगों पर एक फौजी था
जिनपर बंदूक तनी थी
उनमें से चार बच्चे थे
बच्चों के दिमागों में दहक रही है आग
जन-गण-मन मे नहीं आते ये बच्चेउसने पैलट पर शांति लिख दी है
बंदूकों को लिख दिया सफेद कबूतर
मैं बच्चों को क्या लिखूं

 

4. एक रोज लड़के ने उसकी आँखों में नमी देखी

उसने पूछा
वहां क्या है
क्या छुपा रखा है तुमने
वह मुस्कराई और बेख़याली में बोली
होगा कोई दरया, मुझे क्या पता
लड़के को इतिहास के भटकते हुए वे लोग याद आए
जिन्होंने कहीं किसी जमीन से फूटता कोई सोता देखा
पता नहीं वे लोग चिल्लाए थे ‘यूरेका‘ या नहीं
लेकिन उन्होंने जमीन पर अपने कान लगाए
एक औरत थी, एक आदमी, दोनों मुस्कराए
दोनों ने जमीन को कुरेदना शुरू किया
वहां एक दरया निकला, वे चिल्लाए
दरया के लबों को चूमा और इठलाए
दिन बीते, कई साल गए
उन्होंने वहां शहर बसाए
धान बोई, नए गीत गाए
लड़के ने इतिहास का पन्ना वर्तमान में खोला
लड़की अब भी मुस्करा रही थी
उसकी आंखों में नमी थोड़ी और बढ़ गई थी
लड़का करीब आया
उसने वहां कुरेदना शुरू किया
वह कुरेदता रहा, कुरेदता रहा
कई दिन हुए, महीने गुजरे, कई साल गए
न भूख थी, न प्यास की कोई शिद्दत
एक वक्त आया जब लड़के को लगा कि
बस फूटने ही वाला है कोई चश्मा
निकलने वाला है कोई दरया
लड़का कुरेद रहा था
लड़की उसकी आंखों में देख रही थी दरया किनारे बसा दुनिया का सबसे बड़ा शहर
लड़की उदास हो गई
एक रोज लड़का चिल्लाया
तुम झूठी हो
हर नम जमीन दरया का घर नहीं होती
लड़का थक-हारकर बैठ गया
लड़की की आंखों से आंसू बह निकले
लड़के को फिर उम्मीद बंधी
उसने फिर कुरेदना शुरू किया
लड़की ज़मानों रोती रही
लड़का सदियों कुरेदता रहा
वह भीतर, और भीतर, और भीतर धंसता गया
एक सैलाब उमड़ा आंसुओं का
पहले लड़की का दिल बहा उसमें
फिर नजर
और फिर अपने दिल और नजर को बचाए रखने के लिए
वह लड़की भी उसी सैलाब में बह गई
लड़के के नाखूनों में रेत भर गई
उसने और कुरेदा तो रेत का सैलाब दिखा
वह लौटना चाहा तो बवंडर में फंस गया
सदियां बीत गईं
लड़के ने उस बवंडर में एक शहर देखा
दुनिया का सबसे बड़ा शहर
दुनिया के सारे लड़के उस वीरान शहर में
अपने नाखूनों को देखते हैं
और रोते हैं
अगर पवित्रता जैसा कुछ होता है
तो मर्दों का रोना सबसे पवित्र माना जाए
मगर रोने से दरया नहीं बनते
दरया के लिए नमी का होना जरूरी है

 

5. और ईश्वर मर जाएगा

दिन डूबते-डूबते डूबने लगता है मन
खिड़की से बाहर दरख्त डूबने लगते हैं अंधेरों में
सूरज समंदर में डूब जाता है
और उजाले की उम्मीद डूब जाती है
सबसे दूर न दिखाई देने वाले तारे में
मन पर बर्फ की सिल्ली रखी हो तो रात ठंडी हो जाती है
जैसे कि ठंडा है
मेरा जिस्म
ठंडी चीजें मर जाती हैं
मैं भी मर जाऊंगा एक रोज
मेरे मरते ही मर जायेगा
ये शहर
ये वतन
ये दुनिया मर जाएगी मेरे मरते ही
स्मृतियां मर जाएंगी
मर जाएंगी मेरी प्रेमिकाएं
मेरी मां मर जाएगी
जिसके मरने का सताता रहा है डर
वो पिता मर जायेगा
मेरे मरते ही
वे सब मर जायेंगे
जिनके जीने की दुआएं की थीं
मैं एक खंडहर हूं
या कि हूं एक ईश्वर
ढह जाऊंगा एक रोज मैं
मर जाऊंगा
मेरे मरते मर जायेगा
ईश्वर भी

 

6.एक कविता बेटी शीरीं के नाम

(1)
मेरी आंखों का अधूरा ख्वाब हो तुम
आंधी नींद का टूटा हुआ सा ख्वाब
मेरे लिए तो तुम वैसे ही आई
जैसे मजलूमों की दुआएं सुनकर
सदियों के बाद आए
पैगम्बर
या कि मथुरा की उस जेल में
एक बेबस मां की कोख
में पलता एक सपना
पैवस्त हुआ हो
मुक्ति के इंतजार में
मैं जानता हूं कि
तुम्हारे पास न कोई छड़ी है पैगम्बरी
और न ही कोई सुदर्शन चक्र
दुनिया के लिए
तुम होगी सिर्फ एक औरत
एक देह
और होंगी
निशाना साधतीं कुछ नजरें
तुम्हारे आने की खुशी है बहुत
दुख नहीं, डर है
कि पैगम्बर के बंदे अब
ठंडा गोश्त नहीं खाते

(2)
मैंने देखा
तुम आई हो
आई हो तो खुशआमदीद
आधी दुनिया तुम्हारी है
जबकि मैं जानता हूं कि
इस आधी दुनिया के लिए
तुम्हें लड़ना होगी पूरी एक लड़ाई
तुम्हारी इस आधी दुनिया
और मेरी आधी दुनिया का सच
नहीं हो सकता एक
तुम आई हो तब
जबकि खतों के अल्फाज
दिखते हैं कुछ उदास
कागज पर नहीं दिखता
चेहरा
हंसता, उदास, गमगीन या कि इंतजार में
पथराई हुई आंखें लिए
आई हो तो खुशआमदीद
लेकिन तब आई हो
जबकि नहीं खुलते दरवाजे कई
एक आंगन में
नहीं लौटते परिंदे किसी पेड़ पर
पेड़ इंतजार में हुआ जाता है बूढ़ा
मेरा समय
तुम्हारे समय से बेहतर है
यह न मैं जानता हूं
और न तुम बता पाओगी लेकिन
मैंने सुना है
जमीन पर
तीन हिस्सा पानी है और
सुना तो यह भी है कि
आदमी भी
तीन हिस्सा पानी ही तो है
अपनी आंखों का पानी
बचाए रखना तुम
तुम आई हो तो खुशआमदीद

 

7. युद्ध के खि़लाफ़ एक कविता

भले मुझे निष्कासित कर दो
इस मुल्क, इस दुनिया-जहान से
लेकिन मैं एक अपराध करना चाहता हूँ
मैं चाहता हूँ
बगैर हथियारों वाली एक दुनिया
मैं चाहता हूँ
हज़रत नूह की तरह मैं भी एक नाव बनाऊँ
दुनिया के तमाम हथियार भर दूँ उसमें
और बहा दूँ किसी बरमूड़ा ट्राइंगल की जानिब
मैं बेदख़ल कर देना चाहता हूँ
दुनिया भर की तमाम पुलिस फोर्स को
छीन लेना चाहता हूँ फौजियों के मेडल
जो सरहदों पर किन्हीं के ख़ून का हिसाब हैं
मैं सरहदों को मिटा देना चाहता हूँ
या कि वहाँ बिठा देना चाहता हूँ
फौजियों की जगह दीवानों को
मीरा को, सूर, कबीर, ख़ुसरो, फरीद, मीर, गालिब, फैज, जालिब और निदा को
इतिहास की किताबों से पोंछ देना चाहता हूँ
जीत की गाथाएँ
हार की बेचैनियाँ
ध्वस्त कर देना चाहता हूँ
किलों, महलों में टँके जंग के प्रतीक-चिह्न
संग्रहालयों में रखे हथियारों की जगह रख देना चाहता हूँ
दुनिया भर के प्रेम-पत्र
मैं लौट जाना चाहता हूँ हजारों साल पीछे
और मिटा देना चाहता हूँ
तमाम धर्मग्रंथों से युद्ध के किस्से
छीन लेना चाहता हूँ राम के हाथ से धनुष
राजाओं, शहंशाहों के हाथ से तलवार
मिटा देना चाहता हूँ
कर्बला की इबारत
मैं कुरुक्षेत्र, कर्बला और तमाम युद्धस्थलों को लिख देना चाहता हूँ
खेल के मैदान
मैं कविताओं से सोख लेना चाहता हूँ वीर रस
एक कप चाय के बदले सूरज की तपिश को दे देना चाहता हूँ
तमाम डिक्शनरियों के हिंसक शब्द
हिंसा के ख़िलाफ कहे और लिखे गए
मैं अपने हिंसक शब्दों के लिए माफी चाहता हूँ!

 

8. लव जेहाद

(एक)
वे घने ऊँचे लहराते दरख्तों वाले शहर थे
टोलों और मुहल्लों वाले
मुहल्लों में घर थे
घरों की छतें थीं
छतों पर मुंडेरें
मुंडेरों के दरमियाँ से उठती थीं पतंगें
और आसमान में बना देती थीं कोई इंद्रधनुष
माँजों की बाहें थामे तैरती रहती थीं आसमानों में
देर तलक
पतंगें दोस्त थीं
दुश्मन भी
दुश्मनी ऐसी न थी कि काट दें किसी का मांजा तो धड़ाम से गिरा दें नीचे
हारी हुई पतंगें ऐसे लहराके गिरती थीं
जैसे कोई मीरा अपने किशन की मूरत के सामने तवाफ करती आती हो

(दो)
शहर में मुहल्ले थे
मुहल्लों में जातियाँ थीं, धरम थे
मस्जिदें थीं, मंदिर थे मुहल्लों में
घर थे, घरों की छतें थीं
छतों पर मुंडेरें थीं
लेकिन मुंडेरों के कोई मजहब नहीं थे
मुंडेरों पर थे दीवाने
और थीं सपनीली आँखों वाली लड़कियाँ
लड़कियों की मुंडेरों पर गिरती थीं पतंगें
और जब चूम लेती थीं उनके कदम
तो जीत जाते थे हारे हुए दीवाने पतंगबाज
पतंगें जो बन जाती थीं प्रेमपत्र
प्रेम में इस तरह गिरने को ही शायद कहते होंगे
फॉल इन लव
गिरना हमेशा बुरा नहीं होता

(तीन)
वे अब झुलसे हुए वीरान दरख्तों वाले शहर हैं
शहरों में मुहल्ले हैं
हिन्दू मुहल्ले हैं
और मुसलमान मुहल्ले
मुहल्लों में घर हैं
घरों में हिन्दू हैं या मुसलमान
छतों पर मुंडेरें हैं
मुंडेरों पर पतंगों का खून
माँजों से बंधी हैं तलवारें
और आसमानों में चल रहा है कत्लेआम
माशूक लड़कियों की आंखों में अब चमकीले बेखौफ सपने नहीं हैं
दीवाने बदहवास हैं
वे जेहादी हैं या हैं रोमियो
लड़कियों के लिए ये दुनिया अब कत्लगाह है

(चार)
इससे पहले कि मेरी गर्दन आपकी कुल्हाड़ी के निशाने पर हो
तड़प रही हो धड़ से अलग किसी विडियो में
इससे पहले कि आपकी नफरत
मेरे मरे जिस्म की बोटी करदे
नारों के बीच आपकी राष्ट्रभक्ति जला दे मुझको
इससे पहले कि हरी घास लहू में डूबे
मेरी चीख तैर जाए फिजा में
तुम्हारा अट्टहास सुने और सहम जाए भेड़िया भी
इससे पहले कि तुम दौड़ो मेरी ओर कुल्हाड़ी लेकर
मैं बता देना चाहता हूँ कि मेरी पार्टनर का नाम रीना है
मैं बता देना चाहता हूँ कि रीना हिंदू नहीं हैं

 

9. रक्त सने समय में कविता आकर पूछेगी कवि से

कैसे तुम इतना खुश रह लेते हो भाई
नेता, मंत्री, पुलिस का अफसर, सेठ-व्यापारी, जेलर चाचा
सबको खुश रख लेते हो कैसे
ये हुनर कहाँ से सीखा तुमनेकविता आकर पूछेगी कवि से
जिन जिस्मों पर फटे-पुराने कपड़े-लत्ते माँगे के हैं
दुख की पपड़ी होंठ पर जिनके जमी हुई है
जिनके घर फुटपाथ हैं और डामर जिनके पैखाने हैं
जो सोते-सोते कार के नीचे मर जाते हैं
जो बनाते हैं सड़कें, गलियाँ, महल-अटारी
चैकीदारी करते हैं जो
दफ्तरों में क्लर्की करते-करते जो मर जाते हैं
वे सब तुम्हारी कविता में हैं लेकिन
कविता आकर पूछेगी कवि से
वे सब तुम्हारी कविता में क्यों हैं
कविता केवल करुणा है क्या
और वह पूछेगी कि
जिनकी वजह से हालात हैं ऐसे
उनसे तुम क्यों कुछ नहीं कहतेकविता ये पूछेगी कवि से
किसकी तरफ है चेहरा तुम्हारा
किसकी तरफ से पीठ घुमाए
सवाल तुम्हारे किन से हैं और
कितने तुमने खतरे उठाए
कविता पूछेगी कवि से
कैसे तुम इतना खुश रह लेते हो भाई

 

10. राजेंद्र यादव की याद में मर्सिया

जो अब चला गया तो अफसोस क्यों है
किसलिए ये मर्सिये
गमजदा हो किसलिए तुम्हारी महफिल में था जो बैठा
शाम ढलते, रात होते
तुम्हारे ताने, तुम्हारे फिकरे
सुन रहा था वो सब मुस्कुरा के
हजार उँगलियाँ थीं उसकी जानिब
काले चश्मे की जिल्द से वो
यूँ देखता था कि कुछ कहेगा उतरते चाँद तक जो था साथ तुम्हारे
भोर होने से पहले उठा अचानक
सोचा कि कहे ये सभा बर्खास्त होती है
फिर ये सोचकर चुपचाप चल दिया होगा
कि फैसले हाकिम सुनाते हैं इस बीच टूटा होगा कोई तारा
और टूटती साँसों के बीच शायद कहा होगा उसने
इस महफिल को रखना आबाद साथी
या फिर
कहते-कहते वो रुक गया होगा
क्योंकि फैसले हाकिम सुनाते हैं

 

11. यह प्रेम का समय नहीं

क्या कोई सोच सकता है कि एक ऐसा वक्त आएगा
जब प्रेम अपराध की तरह आत्मा पर हो जाएगा काबिज
जब लिखना चाहूंगा कोई प्रेम कविता
अंतस धिक्कारेगा इस अश्लील हरकत के लिएजब नफरत का सूरज बहुत करीब हो
आंसू आंख में आने से पहले ही जब भाप बनकर उड़ जाएं
मैं तुम्हारी नर्म हथेलियों को किस तरह याद करूं
जब एक भीड़ हाथों में पत्थर लिए बढ़ी आ रही होतुमने कहा था कि मेरी आंखों में करुणा की डोर दिखती है
होंठ देखूं तो लगता है कि खुलेंगे और कर बैठेंगे प्रणय निवेदन
मैं तुमसे सीखना चाहता था कि
कैसे किया जाता है प्रणय निवेदन
कैसे देखा जाता है स्त्रियों को
मैं सीखना चाहता थामुझे तुमसे बहुत कुछ सीखना था
लेकिन फिलहाल तो तुम मुझे यह बताओ
क्या तुम मुझे सिखा सकती हो
इस जलते हुए सूरज को धकेलना
इस नफरत भरे समय में प्रेम को उगाना

 

12. नागरिकता

मैं हव्वा की औलाद हूं
मेरे जिस्म में जो नाखून हैं वे हव्वा के हैं
मेरा पसीना हव्वा के पसीने से बहुत जुदा नहीं होगा
मुझ में जो प्रेम है
उसका सोता हव्वा की आंखों में था
मुझमें वासना हव्वा से आई हैयह दुनिया का पहला झूठ था कि
हव्वा को आदम की पसली से बनाया गया
हव्वा के कहने पर आदम ने की थी खुदा की नाफरमानी
यह किस्सा औरत के खिलाफ दूसरी साजिश थाऔर यह किस्सा आकर सीधा मेरी दादी से जुड़ता है
और फिर मेरी मां से, मेरी पत्नी से
दादा से, पिता से और मुझसे जो भी भूलें हुईं
वे मेरी दादी, मां और पत्नी के बहकावे में हुईं
मैं आदम का वंशज
दादा और पिता की तरह हमेशा निर्दोष रहामैं उस साजिश का हिस्सा हूं
अमेजन, नील, वोल्गा, हडसन से लेकर गंगा तक
तमाम सभ्यताओं के मुहाने पर जो स्त्री खड़ी थी
उससे एक-एक कर सारे हथियार छीन लिए एक पुरुष ने
उस पुरुष ने जो राम हुआ, महावीर हुआ, ईसा, मूसा या मुहम्मद हुआ
और जिसने बताया कि ईश्वर पुरुष रूप हैइतिहास में जो स्त्रियां शामिल हो गईं इस साजिश में
जिन्होंने किए समझौते
वे कही गईं देवियां
उन्हें मिली द्वितीय नागरिकताहजारों साल बाद जब तुम आई
तुम, तुम और तुम
सुनो बिट्टो बुआ
रमा काकी तुम भी सुनो
शहीदा चच्ची तुम भी आओ
एक बात पूछूं, सच्ची बताओ
गांव जो तुमने देखा है
शहर तुम्हारा परदेसा है
जात तो तुम पहचाने हो
मुलुक को भी क्या जाने होछोड़ो-छोड़ो सारी बातें
बस इतना बतलाओ तुम
राजा एक दिन आएगा
लिस्टें वो बनाएगा
तुम लिस्टों में शामिल होकर
क्या ईश्वर बन जाओगी
राम, महावीर, ईसा, मूसा, हजरत तुम कहलाओगी?एक औरत जो जज थी सुन लो
एक औरत थी पुलिस की अफसर
एक थी वो जो जहाज उड़ाती
एक औरत जो मीठा गाती
घर में थीं सब मिसेज फलाने
नेम प्लेट पर उनके नाम नहीं थे
या थे भी तो द्वितीय नाम की तरहजिनका घर नहीं होता
मुल्क उनके लिए एक भ्रम है
मैं अनागरिक होते हुए भी सोशल साइंस में एक नागरिक रहूंगा
किसी रजिस्टर में नाम आ जाने के बाद भी
तुम सेकंड सेक्स मत रह जाना बिट्ओ बुआ

 

13. जाना

जो आज गया
वह आज गया ऐसा तो नहीं है
जो आज गया
वह जा चुका था बहुत पहले
किसी के जाने और न जाने के बीच
खड़ा होता है एक भरम
वह गिरता है एक रोज
जाने की घोषणा से ठीक पहले
कवि केदार ने भले ही कहा है कि
जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है
लेकिन
रुके रहना भी कम खौफनाक नहीं है
रुके रहना जाकर भी
बेदम शरीर के साथ रुके रहना
ढह चुकी दीवारों से बात करना
और रुके रहना अपनी-अपनी चुप्पियों में
परंपराओं को ढोने के लिए रुके रहना तो और भी खौफनाक है
जाओ
जाओ कि जाने से बनी रहती है लौटने की उम्मीद

 

14. लाइट हाउस

यह जो रात है
जाने कितनी रातों का अंधेरा शामिल है इसमें
यह रात
जिसने दिन को भी डस लिया है
मैं कितनी जोर से चिल्लाऊं
कि कोई सुन ले यहां
स्याह रात की चीखें
क्या तुम तक पहुंचती हैं
वादा तो ये था कि मैं गाऊंगा और दरख्त तवाफ करेंगे
चांदनी छिटक आएगी हर आंगन में
दरख्तों के लंबे-लंबे साये लिए
गेहूं की पकी बालियों को देख मुस्कराएगा चैत का सूरज
ये वादा था
मैं बाहें फैलाऊंगा
और बढ़े आएंगे कई हाथ मुहब्बत वाले
हाथ, जिनकी उंगलियों के पोरों से निकलेंगे जुगनू लाखों
हाथ, जिनके चेहरे नहीं होंगे
हाथ, जिनकी जबीं पर नहीं लिक्खा होगा कोई सजदा
हाथ, हाथ से मिलकर लिखेंगे नई भोर का अफसाना
मैं कितनी जोर से चीखूं
कि मेरी आवाज का कोई सिरा तुम तक पहुंचे
मैं इस स्याह रात में इस टापू पे फंस गया हूं
रात सदियों तवील लगती है
और नहीं गुजरता कोई जहाज इधर से
मैं कितनी तेज बिजलियां फेंकूं
कि जल उठें समंदर की लहरें
कि वे टकरा जाएं किसी लाइट हाउस से
तुम किसी लाइट हाउस में बैठी मेरे जहाज का इंतजार करना
मैं फंस गया हूं इस आदमखोर टापू पर
यहां सभी बहरे हैं
आखों पर कई रंग के चश्मे तो हैं मगर
झूठे हैं, ये अंधे हैं
इनके शरीर पर बस दांत हैं लंबे
या कि बस पंजे हैं
मेरा यकीन डूब रहा है
मेरा जहाज बचा लो तुम
मैंने कुछ ख्वाब अपने खीसों में भर लिए हैं
तुम मिलो तो इनसे एक सवेरा उगाएंगे

 

15. अभिशप्त देश के नागरिक

सभ्यताओं के निर्माण में वे सबसे आगे थे
इतिहास में वे कहीं नहीं थे
(हैं तो वे वर्तमान में भी नहीं)
उन्हें इतिहास में होने की कोई गरज भी न थी
वे अभिशप्त नागरिक थे
ऐसे नागरिक जिनका कोई मुल्क नहीं होता
कोई गांव, कोई शहर, कोई खल्क नहीं होता
वे एक ही समय में दुनियाभर में मौजूद होते हैं
वे हड़प्पा में बसा रहे होते हैं कोई शहर
मिस्र में खड़ा कर रहे होते हैं किसी फैरो का साम्राज्य
वे सान रहे होते हैं गारा अपने पसीने से
अपनी सांसों में भर रहे होते हैं बूचड़खानों में बहते लहू की गंध
अपनी हड्डियों के गट्ठर से बना रहे होते हैं चीन की दीवार
कुतुबमीनार, ताजमहल, किले, महल, शहर, गांव-जवार
अब तक की दुनिया में जो भी आप देखते हैं जनाब
उसमें सबसे आगे वही थे
जहां भी जरूरत थी उनकी, वे थे
वे किसी की जरूरत नहीं थे
जरूरत खत्म होने के बाद

2
देखो वे लौट रहे हैं
हां नफरत से ही देखो उनको
जब कहा गया है कि कोई न लौटे
वे लौट रहे हैं दिल्ली से
बंबई, लखनऊ की हर गल्ली से
आप सरकारी हुक्म की तामील करो
घर में बैठो, फिल्में देखो, विडियो चैट पर बात करो
तुम पर कोई आंच न आए
सरकारों से मांग करो
धो दो उनको केमिकल से
चैपायों-सा हाल करो
वे कुछ न कहेंगे, चुप ही रहेंगे
सदियों से वे चुप ही तो थे

3
वे इससे पहले भी लौटे थे
जानते थे वे लौटने का सुख
अम्मा की इंतजार करती बूढ़ी आंखों को वे जानते थे
ड्योढ़ी पर बैठे बाबा की उकलाहट को पहचानते थे
गुड्डी जानती थी बकरी के मैमने की गंध
राजू जानता था काकी की आंखों की चमक
खैर ये भले दिनों की बात थी
जब वे लौटे इस बार तो घनघोर अंधेरी रात थी
इस बार उन्होंने पैदल ही तय कीं हजार कोस की दूरियां
इस बार वे लौट रहे हैं
जैसे कभी नहीं लौटे थे
उनके पांव में छाले हैं
सिर पर एक पोटली है
थोड़े से चावल और खाली दूध की बोतल है
एक बच्चा गोद में सुबक रहा है
एक उंगली थामकर घिसट रहा है
उसने छाती कसके बांध रखी है
आंखों की कोरें गीली हैं
क्या आंखों में करुणा है
नहीं, नहीं! करुणा-वरुणा आपका मुखौटा है
फिर क्या है आंखों में उनकी
कोई बेवशी, गुस्सा, नफरत, प्यार या खला कोई
नहीं! मेरे वश में नहीं उन आंखों का भाव पकड़ना
चलते-चलते राजू की हूक का उठना
गिरते-गिरते गुड्डी का कीक मारकर रो पड़ना
क्या है ये
कोई दुख है तो पैमाना क्या है
कैसे इसको माप सकोगे
मील के पत्थर सबके लिए क्या दूरी का पैमाना हैं
राजू जिसके सिर पर उसका संसार रखा है
दिल्ली से पटना की दूरी पैदल-पैदल कितनी होगी
क्या कोई मील का पत्थर माप सकेगा इस दूरी को

(फ़िरोज़ ख़ान कवि और पत्रकार हैं. देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाॅग्स पर कविताएँ और सिनेमा पर कुछ लेख-साक्षात्कार प्रकाशित। समकालीन जनमत पर ‘सिने दुनिया’ नाम के चर्चित कॉलम के स्तंभकार। इनकी कुछ कविताओं का मराठी में अनुवाद हो चुका है। नवभारत टाइम्स, बम्बई के एडिटोरियल विभाग में कार्यरत। सम्पर्क: 7303745705 ई मेल: [email protected]

टिप्पणीकार प्रभात मिलिंद का पहला कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. की अधूरी पढ़ाई। हिंदी की सभी शीर्ष पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, डायरी अंश, समीक्षाएँ और अनुवाद प्रकाशित।स्वतंत्र लेखन।
संपर्क: [email protected])

 

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