समकालीन जनमत
कविता

पहाड़ों की यातनाएं संजोते मंगलेश दा

अर्पिता राठौर

मंगलेश डबराल का रचना कर्म उस सफर सरीखा है जो अपना समस्त जीवन मानवीय विडंबनाओं में संभावना तलाशते हुए गुज़ार देना चाहता है। उनके व्यक्तित्व पर पहाड़ों की संवेदनशीलता और महानगरीय बोध की गहरी पैठ है। उनका समूचा रचना संसार आदमीयत को बचाए रखने की पैरवी करता है। इसी के चलते उनकी कविताओं में लगातार एक बेचैनी का स्वर सुना जा सकता है जिसमें कई बेआवाज़ हो गए किस्सों का दर्द छुपा है। इसी दर्द की तह में दबा उनका काव्य संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन” बहुत कुछ कह जाता है। किस्से, कहानियों, दास्तानगो, घटनाओं इत्यादि को दर्ज करते हुए मंगलेश डबराल की कविताएं आम जन से बात करती हैं।

मंगलेश डबराल की कविताओं का कैनवस अपने समय के संकटों को निहायती सच्चे ढंग से प्रस्तुत करता है। उनकी कविताओं के रोशनदान से झांकते हुए कटु सत्य वास्तव में काफी व्यापक है। पहाड़ों के लिए इनमें एक खास तरह का ‘स्पेस’ है। मंगलेश जी ने कई दफे अपने साक्षात्कारों एवं वक्तव्यों में ब्रेख्त की यह पंक्ति उद्धृत की है, “पहाड़ों की यातनाएँ हमारे पीछे हैं, मैदानों की हमारे आगे।” इसके साथ ही वे कहते हैं, “शायद यही वह अनुभव था जो भीतर इतने समय से घुमड़ता था और जिसे मैं समझा या व्यक्त नहीं कर पाता था। तब से मेरे पीछे पहाड़ों की यातनाएँ फैलती गई हैं जिन्हें जब कभी मैं पहचान पाता हूं तो एक नई कविता बन जाती है और इस तरह मैं कविता का एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता होने की इच्छा लिए हुए इसका अंशकालिक कार्यकर्ता बना रहता हूं।” मंगलेश जी के रचना संसार और जीवन के इस मर्म को बेहतरीन ढंग से उनकी यह कविता कुछ इस प्रकार कहती है-

“परछाईं उतनी ही जीवित है

जितने तुम

 

तुम्हारे आगे-पीछे

या तुम्हारे भीतर छिपी हुई

या वहाँ जहाँ से तुम चले गये हो ।”

मंगलेश डबराल की बेबाक लेखनी एक नई बहस खड़ी करती है। उनके लिए कविता लिख देने भर से दायित्व नहीं निभा जाता। वे कविता की सार्थकता को बहुत जरूरी मानते हैं। एक फ्रेंच कवि आलोचक हुए हैं ईव बोनफुआ जिनका मानना है, “सृजनात्मक कार्य लिखने में नहीं है, वह हर चीज को नाम देने में और होने के रहस्य को सुनने में है जो उसमें अनियत रूप से संपादित हो रहा है।” मंगलेश डबराल के लिए भी प्रमुख प्रश्न यही है, “कविता क्या कर सकती है। वह क्या बचा सकती है।” अतः इस प्रश्न के इर्द-गिर्द मंगलेश डबराल बहुत सी अनखुली परतों को खोलते चलते हैं। पहाड़ पर लालटेन संग्रह में संकलित उनकी कविता ‘वसंत’ काबिले गौर है जिसमें स्मृति को बचाए रखना, गुजरे वक़्त को दर्ज करना और इच्छाओं को मरने न देना ही प्राथमिकता है-

इन ढलानों पर वसन्त

आएगा हमारी स्मृति में

ठंड से मरी हुई इच्छाओं को फिर से जीवित करता

धीमे-धीमे धुंधवाता ख़ाली कोटरों में

घाटी की घास फैलती रहेगी रात को

ढलानों से मुसाफ़िर की तरह

गुज़रता रहेगा अंधकार”

 

रोज़नामचे की हरकतों को बचाए रखना और उनमें सृजन बौद्ध के नवीन आयाम खोजने का दायित्व मंगलेश डबराल ने बखूबी पूरा किया है। उनका सौंदर्यबोध सतही नहीं है, इसके भीतर छिपी है सांस्कृतिक संकट की भयावहता की मारक अभिव्यक्ति। नवीन सौंदर्य बोध को बयां करते हुए सांस्कृतिक संकट को लगातार महसूस करना, इस दोहरी प्रक्रिया के बीच कविता में ग्रे शेड्स की मौजूदगी को न भूलना, यही तो हैं मंगलेश दा। यह भाव कवि की कविताओं में पहाड़ी संवेदना की एवज आता है। व्यस्तताओं और मजबूरियों ने उन्हें पहाड़ों से दूर तो कर दिया मगर उनके भीतर पैठी पहाड़ी संवेदना आज भी जीवित है, पहाड़ी जीवन बोध की यात्राओं को वे प्रत्येक पाठक मन के ह्रदय तक पहुंचाना चाहते हैं। इसलिए कहना न होगा कि उनकी कविता में मौजूद जिजीविषा भी पहाड़ों की ही भांति दृढ़ है। सन 1975 की उनकी कविता ‘पहाड़’ उल्लेखनीय है जिसमें पहाड़ी जीवन की विडंबना, इतिहास, विद्रोह, चीत्कार, मौन की ध्वनि एक साथ सुनाई पड़ती है-

“पहाड़ पर चढ़ते हुए

तुम्हारी साँस फूल जाती है

आवाज़ भर्राने लगती है

तुम्हारा क़द भी घिसने लगता है

 

पहाड़ तब भी है जब तुम  नहीं हो ।”

मंगलेश डबराल का यह काव्य संग्रह कई मर्मस्पर्शी घटनाओं की क्रूरताओं को दर्ज करता चलता है। इसे दर्ज करने के दरमियान आग उगलते बिंब गौरतलब हैं। 70 से 80 के दशक में नक्सल आंदोलन के दौरान उठी बहुत सी आवाज़ को मंगलेश डबराल ने अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया है। विश्व के ध्रुवीकरण की प्रक्रिया में भारत में आए नव सामंती चरित्र को भी वे भली-भांति समझ रहे थे। इसके चलते सभ्यता के अदृश्य संकट की तरफ अपनी बेचैनी को व्यक्त करते हुए वे लिखते हैं-

“अंधकार में से आते संगीत से

 

थरथर एक रात मैंने देखा

 

एक हाथ मुझे बुलाता हुआ

 

एक पैर मेरी ओर आता हुआ

 

एक चेहरा मुझे सहता हुआ

 

एक शरीर मुझमें बहता हुआ”

न सिर्फ पहाड़ पर लालटेन में बल्कि अपने अन्य कविता संग्रहों में भी मंगलेश जी इन विमर्शों की तरफ गहराई से विचार करते हैं। इस दिशा में उनकी कविता आदिवासी देखिए-

“कुछ समय पहले तक वह अपनी तस्वीरों में

एक चौड़ी और उन्मुक्त हंसी हंसता था

उसकी देह नृत्य की भंगिमाओं के सहारे टिकी रहती थी

एक युवक एक युवती एक दूसरे की ओर इस तरह देखते थे

जैसे वे जीवन भर इसी तरह एक दूसरे की ओर देखते रहेंगे

युवती बालों में एक फूल खोंसे हुए

युवक के सर पर बंधी हुई एक बांसुरी जो अपने आप बजती हुई लगती थी”

 

90 के दशक तक आते-आते सोवियतविहीन होती दुनिया और तीसरी दुनिया की दशा का सच किससे छिपा सका था! इस एकध्रुवीय दुनिया में वैश्विक अवधारणा की आड़ में न जाने कितने ही नव स्वाधीन राष्ट्रों की थर्राई अनुगूंज को खामोश कर दिया गया था। इन खामोश आवाज़ों को लेखनी बद्ध किया मंगलेश डबराल ने। अपने कई यात्रा संस्मरण एवं कविताओं के माध्यम से उन्होंने न केवल भारत बल्कि अन्य अफ्रीकी-एशियाई देशों की स्थिति को दर्ज करने का जिम्मा उठाया। उनकी एक कविता है ‘नया बैंक’ जिसमें वर्चस्वकारी शक्तियों ने नवीन आर्थिक नीतियों के नाम पर षड्यंत्रकारी चरित्र को उजागर किया है-

“नया बैंक पुराने बैंक की तरह नहीं है

उसमें पुराने बैंक की कोई छाया नहीं है

उसका लोहे की सलाख़ों वाला दरवाज़ा और उसका अंधेरा नहीं है

लॉकर और स्ट्रांगरूम नहीं है

जिसकी चाभियां वह खुद से भी छिपाकर रखता है

वह एक सपाट और रोशन जगह है विशाल कांच की दीवार के पार

एअरकंडीशनर भी बहुत तेज़ है

जहाँ लोग हांफते पसीना पोंछते आते हैं

और तुरंत कुछ राहत महसूस करते हैं”

 

ताकत के बदलते समीकरणों को मंगलेश डबराल की कविताओं में बारीकी से महसूस किया जा सकता है। इन बदलते समीकरणों ने हमें हमारा परिचय यातना की संस्कृति से कराया। मनुष्य ही मनुष्य की यातना का कारण बनता है। उनकी कविता ‘निकोटीन’ पर यदि गौर किया जाए तो उसकी प्रत्येक पंक्ति यातना की कई जानी-अनजानी परतों को उघाड़ती हुई चलती है। निकोटिन जो उस सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का प्रतीक था जिसका प्रभाव भौतिक तल पर न तो महसूस होता और न ही दिखाई पड़ता था- “अर्ध-निमीलित आँखें निकोटिन की उम्मीद में पूरी तरह खुल जाती हैं। अपने अस्तित्व से और अतीत से भी यही आवाज़ आती है कि निकोटिन के कितने ही अनुभव तुम्हारे भीतर सोए हुए हैं। सुबह की हवा, ख़ाली पेट, ऊपर धुला हुआ आसमान जो अभी गन्दा नहीं हुआ है, बचपन के उस पत्थर की याद जिस पर बैठकर मैंने पहली बीड़ी सुलगाई और देह में दस्तक देता हुआ महीन माँसल निकोटिन।”  यातना की इसी संस्कृति से निकलने के लिए मंगलेश डबराल छोटी-छोटी संभावनाओं का सहारा लेते हैं। वे इसीलिए कविताओं में स्थान देते हैं परछाई और स्पर्श को

“मैं चाहता हूँ कि स्पर्श बचा रहे

वह नहीं जो कंधे छीलता हुआ

आततायी की तरह गुज़रता है

बल्कि वह जो एक अनजानी यात्रा के बाद

धरती के किसी छोर पर पहुँचने जैसा होता है”

 

 मंगलेश डबराल उन कवियों में से हैं जिन्होंने उत्तर शीत युद्ध के समय का बौद्धिक विवेचन किया। इस प्रक्रिया में उन्होंने तीसरी दुनिया के समाजशास्त्र को बारीकी से समझने का प्रयास किया है। इसी के साथ शीत युद्ध के बाद सोवियतविहीन दुनिया के अंजाम से वे भलीभांति वाकिफ थे। 21वी सदी तक आते-आते इस त्रासदी को दर्शाने की एवज उनकी कविताओं का स्वर और पैना होता गया। उनकी एक कविता देखिए ‘अत्याचारियों की थकान’। शीतयुद्ध समाप्त होने को था, नव साम्राज्यवादी शक्तियों के चेहरों की एक एक लकीर स्पष्ट दिखने लग गई थी। इस लकीर को मंगलेश डबराल ने कुछ इस प्रकार शब्दबद्ध किया है-

“अत्याचार करने के बाद

अत्याचारी निगाह डालते हैं बच्चों पर

उठा लेते हैं उन्हें गोद में

अपने जीतने की कथा सुनाते हैं

 

कहते हैं

बच्चे कितने अच्छे हैं

हमारी तरह नहीं हैं वे अत्याचारी

 

बच्चॊं के पास आकर

थकान मिट जाती है उनकी

जो पैदा हुई थी करके अत्याचार ।”

 

एक तरफ जहां मंगलेश दा की कविताएं साम्राज्यवादी ताकतों और उसके सांस्कृतिक औपनिवेशिक जुमलों के समक्ष चुनौती का कार्य कर रही थीं वही उनके भीतर से एक नम हृदय भी झांक रहा था जो इस कठिन दौर में किसी को डिगने नहीं दे रहा था। वे चाहते थे कि जिसमें संभावना है, वह सब बचा रहे। हर एक क्षण अपनी सुंदरता में खूबसूरत बना रहे। आलोक धनवा ने भी उनकी कविताओं के इस पक्ष के विषय में लिखा है, “मंगलेश फूल की तरह नाजुक और पवित्र हैं।” वे चाहते हैं कि विशाल चीजों की भीनी से भीनी संवेदनाएं बची रहे, स्मृतियों को बचाने के वे हमेशा से पक्षपाती रहे हैं। उनकी इस तरह की कविताएं संवेदनात्मक ज़रूर हैं लेकिन कहीं भी कवि इनसे कमजोर नहीं होता। पहाड़ों की संवेदनाओं को वे मैदानों पर इन कविताओं के जरिए ही उतारते हैं। उनकी कविताओं में जो व्यापक पहाड़ी लय मौजूद है उसकी एक धुन प्रेम में विद्यमान है जो जाहिर सी बात है सतही तो कतई नहीं है। उनके यहां प्रेम यातना की बरक्स अभिव्यक्त होता है। यहां यह कहना न होगा कि मंगलेश दा की कविताओं में प्रेम और विचार के बीच कोई फांक नहीं है। पहाड़ी लोकगीत से प्रेरित अपनी कविता ‘तुम्हारा प्यार’ में वे प्रेम को लड्डूओं के थाल में, लाल रुमाल में, पेड़ में, झील में, पूरे गांव में बचाए रखना चाहते हैं-

“तुम्हारा प्यार लड्डुओं का थाल है

जिसे मैं खा जाना चाहता हूँ

 

तुम्हारा प्यार एक लाल रूमाल है

जिसे मैं झंडे-सा फहराना चाहता हूँ”

 

उनकी कविताओं में सांस्कृतिक साझेदारी का स्वर मुखरित होता है। नव साम्राज्यवादी व्यवस्था में पश्चिमी सभ्यता के विरोधी नहीं थे; बल्कि उसके एकाधिक वर्चस्व से चिंतित थे। उसके कारण स्थानीय संवेदनाओं को यूं ही मरने नहीं दे सकते थे। उनकी कविताओं में जो छोटी-छोटी मानवीय हरकतें दर्ज की गई हैं उसका मूल कलेवर सांस्कृतिक साझेदारी में ही छिपा हुआ है; और इसी राह पर चलकर वे कविता के कवितापने को भी संजोकर रख लेना चाहते हैं। यही है मंगलेश डबराल का विश्वबोध। कवि का यही अंदाज उसको साहित्य जगत में अनोखा बनाता है। पहाड़ीपन को वे प्रत्येक कण में तलाश करते हैं, उनका यह सौंदर्य बोध कहीं-कहीं पाब्लो नेरुदा के ‘रेसिडेंसिया ला तिएरा’ यानी पृथ्वी पर घर के काफी नजदीक दिखाई पड़ता है, उनकी यह कविता ‘अंतराल’ देखने योग्य है-

“हरा पहाड़ रात में

खिसककर मेरे सिरहाने खड़ा हो जाता है

शिखरों से टकराती हुई तुम्हारी आवाज़

सीलन-भरी घाटी में गिरती है

और बीतते दॄश्यों की धुंध से

छनकर आते रहते हैं तुम्हारे देह-वर्ष”

 

मंगलेश डबराल मानते हैं, “कविता जीवन और मृत्यु के आस पास रहती है।” दूसरी तरफ वे यह भी लिखते हैं, “कविता अपने समय के संकटों को पूरी सच्चाई से कभी व्यक्त नहीं कर पाती, इसलिए उसमें हमेशा से संकट बना रहता है। लेकिन यह उसके लिए दोहरे संकट का, दोहरे आपातकाल का समय है जब बाहर से महाबली बहुराष्ट्रीय निगम और उनका जगमगाता बाजार और भीतर से सांस्कृतिक फ़ासीवाद की शक्तियाँ समाज को अपने-अपने तरीकों से विकृत कर रही हैं।” मंगलेश डबराल इस दोहरे आपातकाल को न सिर्फ महानगरों की तर्ज पर बयां कर रहे थे, बल्कि वे इसे गांव-देहात-पहाड़-क़स्बों इत्यादि की एवज भी अभिव्यक्त करते रहे थे। उनकी कविताओं के बीच छिपी यह दो पंक्तियां जितनी मारक है उतनी ही त्रासद-

“मैंने शहर को देखा और मैं मुस्कुराया

वहां कोई कैसे रह सकता है

यह जानने में गया और वापस न आया”

 

मंगलेश डबराल की कविताएं संरचना के स्तर पर भी बारीक से बारीक संवेदनाओं को बटोरती चलती हैं। उनकी कविताओं के भीतर शब्दों का एक अलग रूप मौजूद है जिनमें प्रत्येक घटना, दृश्य, वस्तुएं इत्यादि की हज़ार-हज़ार वर्षों तक संजोई हुई संवेदनाएं मौजूद हैं। इन संभावनाओं से घिरा होने के बावजूद भी कवि कई दफ़ा हिंदी कविता की तरफ उदास भी हो जाता है। इस उदासी का एक कारण यह है कि हिंदी कविताओं में अधिकांशतः भीषण रूप से अतिरिक्त विपन्न समाज जो शिक्षा से कोसों दूर है, जिसका जिक्र अक्सर कविताओं में किसी न किसी रूप में मिल ही जाता है, कविता उन तक कभी पहुंच ही नहीं पाती। कविता की पहुंच; पाठक और सहृदयों के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता के विषय में कोई विरला कवि ही सोच सकता है; मंगलेश डबराल उन्हीं में से हैं जिनकी कविताओं का एक-एक शब्द पहाड़ों से मैदानों तक की यात्रा को पाट देता है।

मंगलेश डबराल, कभी विस्मृत न होने वाली कविता की भांति हैं। उनकी कविताओं के वजूद से आदमीअत का वजूद बुना गया है। मुझे याद आता है वह दिन जिस दिन एक साक्षात्कार के दौरान अपनी पुस्तक के विषय में बता रहे थे, बता क्या रहे थे ऐसा लग रहा था मानो कविता कर रहे थे। उनके एक-एक वाक्य, शब्द, अक्षर, श्वांस और चेहरे की स्वेद बिंदुओं से कविता फूट रही थी। उस कविता में संघर्ष की वह चमक मौजूद थी जो वर्षों बाद भी ऐसे ही बनी रहेगी। आज वे हम सबके बीच नहीं हैं लेकिन वे अपने पीछे संभावनाओं से गूंथा हुआ जो रचना संसार छोड़कर गए हैं वह हमेशा से हमें मंगलेश दा की मौजूदगी का अहसास कराएगा। आज भी जब मंगलेश जी को याद करती हूं तो याद आता है उनका वह पहाड़ी चेहरा जो हल्की-सी शिकन चढ़ाए मुस्कुराता हुआ कह रहा हो-

मैं चाहता हूँ निराशा बची रहे

जो फिर से एक उम्मीद

पैदा करती है अपने लिए

शब्द बचे रहें

जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते

प्रेम में बचकानापन बचा रहे

कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा …

 

(अर्पिता राठौर इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय में एम. ए हिंदी की छात्रा हैं.)

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