Wednesday, May 18, 2022
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सिने दुनिया: परफ़्यूम(जर्मन): एक मरा हुआ पैगंबर..

नायक-खलनायक, देवता-राक्षस, पैगंबर और शैतान, जीवन के सिर्फ दो ही शेड नहीं होते। किसी पैगंबर या देवता या ईश्वर का कोई ऐसा शेड भी हो सकता है, जो उन्हें एक सामान्य आदमी बना दे। कोई ऐसा शेड जिसे आप नहीं जानते और आप अपने अहसास-ए-गुनाह से दबे होकर किसी पैगंबर के द्वार पर अपनी मगफिरत चाहते हों। हो सकता है कि वह पैगंबर अपनी मगफिरत के लिए अपने ही मन के तहखानों में भटकता हो। एक वक्त में बहुत छोटे-छोटे ‘पापों’ को छुपाना भी आसान था और उस वक्त में दुनिया के तमाम कोनों में ज्यादा देवता हुए, ज्यादा पैगंबर और ज्यादा बेदाग इंसान। एक समाज के तौर पर आगे के समाज अपने पिछले समाजों से ज्यादा बेहतर और उदार हुए। आगे के पैगंबर अपने पिछले पैगंबरों से ज्यादा इंसानों जैसे हुए। बीसवीं सदी के आखिरी हिस्से से इक्कीसवीं सदी के बारह-तेरह सालों तक करोड़ों घरों में आसाराम बापू एक पैगंबर की तरह था। वह बस ईश्वर होने ही वाला था कि एक लड़की की तनी मुट्ठी ने उसकी मूर्ति ढहा दी। वह लाखों लोगों के लिए शैतान हो गया, जबकि लाखों घरों में वह अब भी ईश्वर है। उसके किए-धरे को ये मासूम (धूर्त) लोग लीला कहते हैं। यह शब्दावली उन्होंने तमाम ईश्वरों की लीलाओं से ली है। करीब ढाई सौ साल पहले फ्रांस का एक हत्यारा नौजवान जीन-बैपटिस्ट ग्रेनोइल भी बस पैगंबर बनने ही वाला था कि वह आत्महंता बन गया या कि कहें भस्मासुर बन गया।
जर्मन उपन्यासकार और पटकथा लेखक पैट्रिक ज्यूसकिन (Patrick Süuskind) ने 35 साल की उम्र में एक उपन्यास लिखा ‘दास परफ्यूम’ (Das parfum).

यह उपन्यास आधा सच्चा और आधा गल्प है। इससे पहले वे एक उपन्यास और लिख चुके थे और इसके बाद भी उन्होंने कुछ उपन्यास लिखे, लेकिन दास परफ्यूम उनका सबसे बेहतर काम माना जाता है। जर्मन फिल्मकार टॉम टायकर (Tom Tykwer) ने 2006 में इस उपन्यास पर एक सायकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म ‘परफ्यूम: द स्टोरी ऑफ अ मर्डरर’ बनाई। यह कहानी 18वीं सदी के पैरिस की है, जो 1738 में पैदा होने वाले जीन-बैपटिस्ट ग्रेनोइल के जीवन पर आधारित है। फ्रेंच में इस नाम का मतलब मेढ़क भी होता है। ग्रेनोइल की मां पैरिस के मछली बाजार में काम करती थी। मछलियों की दुर्गंध वाले इस इलाके के ज्यादातर लोगों ने अपनी लगभग पूरी जिंदगी सिर्फ एक तरह की दुर्गंध में गुजार दी। ग्रेनोइल अपनी मां की चौथी संतान थी। इससे पहले की तीन संतानों को भी उसने उसी मेज के नीचे जन्म दिया था, जिस मेज पर वह लोगों को मछलियां बेचा करती थी। ग्रेनोइल से पहले की तीनों संतानें मरी हुई पैदा हुई थीं, तो उसकी मां ने उसे भी मरा हुआ समझकर मछलियों के खराब मांस के बीच यह सोचकर फेंक दिया कि शाम को काम के बाद इस मांस के साथ उसे भी नदी में बहा देगी। लेकिन मछलियों की दुर्गंध से परेशान होकर ग्रेनोइल रोने लगा और लोगों ने उसकी मां को उसे मारने की कोशिश में ‘पुलिस’ को दे दिया। उसकी मां को तुरंत फांसी दे दी गई। उसे लावारिस घर में एक औरत ने पाला, जिसने 13 साल की उम्र में उसे पशुओं की खाल उतारने और बेचने वाले एक आदमी को बेच दिया। जैसे ही उसने उसे बेचा, कुछ लुटेरों ने उसकी हत्या कर दी।
ग्रेनोइल की दो खासियत थीं, जो उसे एक असामान्य इंसान बनाती थीं। ऐसी खासियतें जो किसी इंसान को देवता या पैगंबर बनाती हैं। ग्रेनोइल के पास दुनिया की सबसे खास नाक थी। वह आंख बंद करके मिट्टी, दूब, पत्थर, पानी, पानी के अंदर के घास और गीले पत्थरों की खुशबू को महसूस कर सकता था और अलग-अलग करके उन्हें पहचान सकता था। उसकी दूसरी खासियत थी कि जो भी व्यक्ति उसे छोड़ता था, उसकी मौत हो जाती थी। यह एक संयोग भी हो सकता है, जैसे कि तमाम दैवीय लोगों के बारे में हुए और वे किस्से बन गए।

ग्रेनोइल पैदा होने के बाद 5 साल तक कुछ भी नहीं बोला था। इस दौरान वह तमाम खुशबुओं को महसूस करता था। बहुत दूर-दूर से आती खुशबुओं को भी। उसका असली सफर 18 साल की उम्र के बाद शुरू होता है, जब पशुओं की खालें बेचने वाला आदमी उसे पैरिस के एक बड़े बाजार में लेकर जाता है और जहां वह पहली बार मछलियों और फिर पशुओं की दुर्गंध से बाहर खुली हवा और महकती खुशबुओं के बीच पहुंचा था। वहां उसने एक ऐसी खुशबू को महसूस किया, जिसने उसे दीवाना बना दिया। उसने पीछा किया तो पाया कि वह खुशबू फल बेचने वाली एक लड़की के जिस्म की खुशबू थी। उस लड़की ने उसे भूखा समझकर फल उसकी तरफ बढ़ाए तो ग्रेनोइल ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे सूंघने लगा। लड़की डरकर भाग जाती है, लेकिन उसकी खुशबू ने ग्रेनोइल को बेतरह परेशान कर रखा था। ग्रेनोइल शहर के एक बड़े परफ्यूमर के पास जाता है, जिसने एक जमाने में ‘अमोर ऐंड सायकी’ नाम का परफ्यूम बनाया था और जिसकी दूर देशों में भी बड़ी धूम थी। लेकिन यह परफ्यूम अब सड़कों-गलियों में भी बिकता है और अब इस परफ्यूमर को कोई पूछता भी नहीं है। यह परफ्यूमर जिन तेलों, एल्कोहल और खुशबुओं को उनके डिब्बों पर लिखे नामों से पढ़कर बता सकता था, उन्हें ग्रेनोइल सूंघकर ही बता देता है और कुछ खुशबुओं को मिलाकर वह अमोर ऐंड सायकी की उन्नत खुशबू वाला परफ्यूम तैयार कर देता है। एक ऐसी खुशबू, जिसे सूंघकर परफ्यूमर को बचपन की अपनी प्रेमिका याद आ जाती है। इसके बाद परफ्यूमर ग्रेनोइल को उस खाल बेचने वाले आदमी से खरीद लेता है और उस आदमी की नदी में पैर फिसलने से मौत हो जाती है।


ग्रेनोइल फूलों, तेलों, एल्कोहल आदि पारंपरिक तरीके से बनाए जाने वाले परफ्यूम से अलग यहां नए तरह के प्रयोग करता है। वह परफ्यूमर की बिल्ली को प्रयोगशाला की भट्टी में उबालकर कोई नई खुशबू ईजाद करना चाहता है। वह नाकाम रहता है। वह परफ्यूमर से कहता है कि परफ्यूम बनाने के बारे में वह जो भी जानता है, अगर उसे सिखा दे तो वह दुनिया का सबसे शानदार परफ्यूम बनाकर उसे दे सकता है। परफ्यूमर उसे बारह शीशियों वाला एक बॉक्स दिखता है और कहता है कि यही 12 खुशबुएं दुनिया में हैं। सारी खुशबुएं इन्हीं से मिलकर बनती हैं। वह कहता है कि पुराने जमाने में इजिप्ट के लोगों का मानना था कि इन 12 खुशबुओं के अलावा अगर कोई 13वीं खुशबू खोज ले तो वह जन्नत की खुशबू होगी। एक ऐसी खुशबू जिसको बयान नहीं किया जा सकेगा। इसके बाद ग्रेनोइल को उस फल बेचने वाली लड़की से आ रही खुशबू याद आती है। वह शहर में उसे ढूंढने निकल पड़ता है और एक घर से आ रही उसी खुशबू का पीछा करते हुए वह उस तक पहुंच जाता है। लड़की उसे देखकर डर जाती है और चीखती है। कोई सुन न ले, इसलिए ग्रेनोइल कुछ देर उस लड़की का मुंह दबाए रहता है। वह लड़की मर जाती है। थोड़ी देर में ग्रेनोइल पाता है कि अब उसके जिस्म से कोई खुशबू नहीं आ रही थी। वह परेशान हो जाता है और उसके कपड़े उतारकर शरीर के हर हिस्से को सूंघता है और शरीर को रगड़कर खुशबू लेना चाहता है, लेकिन नाकाम रहता है। फिल्म का यह बहुत सिंबॉलिक दृश्य है। यह सिंबल की खुशबू जिंदगी का नाम है। इसके बाद परफ्यूमर उसे चर्बी से परफ्यूम बनाने की विध बताता है और कहता है कि इसके लिए तुम्हें ग्रास जाना पड़ेगा। वह ग्रेनोइल को इस शर्त पर गुलामी से भी आजाद कर देता है कि वह ग्रास से लौटकर उसे सौ तरह के परफ्यूम का नुस्खा देगा।


ग्रेनोइल ग्रास के लिए निकल पड़ता है। यह एक आजाद इंसान के तौर पर उसकी पहली यात्रा थी। वह पेड़ों, नदियों, घासों, यहां तक कि हवा की भी खुशबू महसूस करता है। ग्रास के लिए उसे दो रास्ते मिलते हैं। गांव-कस्बों से होकर एक आसान रास्ता और दूसरा पहाड़ों से होकर दुर्गम रास्ता। वह पहाड़ों का रास्ता चुनता है और एक ऐसी गुफा में पहुंचता है, जिसकी कोई खुशबू नहीं थी। वहां वह महसूस करता है कि उसके शरीर की भी अपनी कोई खुशबू नहीं है। वह दंग रह जाता है। वहां झरने के नीचे नहाता है और अपने शरीर को रगड़-रगड़कर खुशबू सूंघता है, लेकिन वहां कुछ नहीं है। याद कीजिए वह फलों वाली लड़की, जिसके मरने के बाद उसके शरीर की खुशबू भी जाती रहती है। यहां हमें लगता है कि एक मरा हुआ शख्स सालों से सफर पर है। या कि वह पैगंबर है। मुसलमानों का बड़ा हिस्सा मानता है कि मुहम्मद साहब की परछाई नहीं बनती थी। ग्रेनोइल इस गुफा में कई दिन ठहरता है और फिर ग्रास पहुंचता है। परफ्यूमर के बताए पते पर वह यहां परफ्यूम बनाने लगता है। लेकिन उसे तो 13वीं खुशबू ईजाद करनी होती है। वह कुआंरी लड़कियों के कत्ल करना शुरू करता है और उससे पहले उनके जिस्म से एक खास विधि अपनाकर खुशबुएं इकट्ठी कर लेता है। उसने शहर के सबसे अमीर आदमी की बेटी के जिस्म की खुशबू को तेरहवीं शीशी में उतारा है और उसका कत्ल किया है कि तभी वह पकड़ा जाता है। उसे जेल में डाल दिया जाता है। इससे पहले वह परफ्यूम की तेरहवीं शीशी तैयार कर लेता है।


फिल्म का पहला दृश्य है, जहां ग्रेनोइल को कैदखाने के दालान में लाया जाता है और बाहर मैदान में शहर के हजारों लोग मौजूद हैं। उसे सजा सुनाई जाती है कि दो दिन बाद लोहे की रॉड से पहले उसके शरीर के सारे जोड़ तोड़े जाएंगे और इसके बाद उसे फांसी पर लटकाया जाएगा। लोग बहुत खुश हैं। दो दिन बाद उस मैदान में फिर से हजारों लोग जमा हैं। ग्रेनोइल को मैदान के बीच एक चबूतरे पर लाया जाता है, जहां जल्लाद उसके हाथ-पैर तोड़ने के लिए खड़ा है। ग्रेनोइल को नए कपड़े पहनाए गए हैं। मैदान में आने से पहले वह अपने ईजाद किए गए परफ्यूम से थोड़ा-सी खुशबू रुमाल पर डालता है और थोड़ी-सी अपने जिस्म पर लगाता है। मैदान में चर्च का प्रमुख पादरी और अदालत से जुड़े तमाम लोग मौजूद हैं। ग्रेनोइल जैसे ही चबूतरे पर पहुंचता है, जल्लाद उसके पैरों में गिर जाता है। वह चिल्लाता है कि यह अपराधी नहीं है, यह तो देवता है। इसके बाद ग्रेनोइल अपना रुमाल निकालता है और उसे लहराते हुए लोगों के ऊपर खुशबुएं फेंकने लगता है। थोड़ी देर पहले जो लोग एक-दूसरे से झगड़ रहे थे, उन सब पर एक नशा तारी हो जाता है। वे सारे दुख-तकलीख, अमीरी-गरीबी, छोटा-बड़ा भूलकर एकदूसरे को प्यार करने लगते हैं। तमाम नैतिकताओं को दरकिनार कर सब एकदूसरे के कपड़े उतारते हैं और वहीं मैदान में एकदूसरे में खो जाते हैं। इनमें चर्च का पादरी भी शामिल होता है और तमाम सरकारी अफसर भी। जिस अमीर आदमी की बेटी का कत्ल हुआ था, वह तलबार लेकर ग्रेनोइल के पास आता तो है, लेकिन आते ही तलवार फेंक देता है और उसके पैरों में गिर पड़ता है। लोगों को एकदूसरे से प्यार करते हुए देखकर गेनोइल को फलों वाली लड़की याद आती है। वह रोता है और अपने ख्यालों में उससे प्यार करता है। तमाम लड़कियों की हत्याओं से उसे मुक्त कर दिया जाता है। चूंकि हत्यारा कोई तो होगा, इसलिए जिस आदमी की शिकायत पर ग्रेनोइल पकड़ा गया था, उसे लड़कियों का हत्यारा मान लिया जाता है और उसे फांसी पर लटका दिया जाता है। 14 घंटे के टॉर्चर के बाद वह भी कुबूल कर लेता है कि हत्याएं ग्रेनोइल ने नहीं कीं, बल्कि उसी ने की हैं। हजारों सालों से अब तक अदालती दस्तावेज में ऐसे तमाम कुबूलनामे नत्थी हैं और तमाम हत्यारे पैगंबर बनने की राह पर हैं। एक आखिरी सीन है, जिसमें ग्रेनोइल पैरिस की उसी मछली मार्केट में लौट रहा है, जहां वह पैदा हुआ है। वह सोच रहा है कि वहां पहुंचकर वह चर्च को पत्र लिखेगा और अपने पैगंबर होने का दावा करेगा। वह पहुंचता है और फिर ऐसा हुआ, जो किसी देवता, किसी पैगंबर के साथ न हुआ होगा।

फ़िरोज़ ख़ान
फ़िरोज़ ख़ान कवि और पत्रकार हैं. देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाॅग्स पर कविताएँ और सिनेमा पर कुछ लेख-साक्षात्कार प्रकाशित। इनकी कुछ कविताओं का मराठी में अनुवाद हो चुका है। नवभारत टाइम्स, बम्बई के एडिटोरियल विभाग में कार्यरत। सम्पर्क: 7303745705 ई मेल: firojwriter2013@gmail.com
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