समकालीन जनमत

Author : समकालीन जनमत

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कविता

रेखा चमोली की कविताएँ हाशिए की आवाज़ हैं

समकालीन जनमत
आशीष कुमार कविता अपने बचाव में हथियार उठाने का विचार है साहस की सीढ़ियां है कविता उमंग है उत्साह है खुद में एक बच्चे को...
जनमत

सरकार प्रायोजित अफ़वाहों का सामना करता किसान आन्दोलन

समकालीन जनमत
जगन्नाथ केंद्र सरकर द्वारा हालिया बनाये गए तीन कानूनों – किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) क़ानून-2020, कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन...
कविता

भारत की कविताएँ कोमलता को कुचल देने वाली तानाशाही कठोरता का प्रतिकार हैं

समकालीन जनमत
 विपिन चौधरी अपना रचनात्मक स्पेस अर्जित करने के बाद हर युवा रचनाकार पहले अपनी देखी, समझी हुई उस सामाजिक समझ को पुख्ता करता है जिससे...
कविता

हर्ष की कविताएँ रचनात्मक आश्वस्ति देती हैं

समकालीन जनमत
हर्ष अपनी कविताओं के जरिए एक रचनात्मक आश्वस्ति देते हैं बेहतर भविष्य को बुनने का. उनका दखल केवल विषयों के सटीक चयन तक ही नहीं...
ख़बर

बिहार चुनाव में जनता का एजेंडा आया सामने, बंगाल और अन्य चुनावों के लिए बनेगा उदाहरण: दीपंकर भट्टाचार्य

समकालीन जनमत
    ◆ चुनाव परिणाम की तुलना भाजपा-जदयू 2015 की बजाए 2010 से करे, साफ दिखेगा एनडीए के खिलाफ है यह जनादेश. ◆ जनता ने...
भाषा

उर्दू की क्लास : मुलज़िम और मुजरिम का फ़र्क़

( युवा पत्रकार और साहित्यप्रेमी महताब आलम की शृंखला ‘उर्दू की क्लास’ की बारहवीं          क़िस्त में मुलज़िम और मुजरिम के फ़र्क़...
कविता

रोमिशा की कविताओं में मैथिल स्त्री का अंतर्जगत बहुत मुखर है

समकालीन जनमत
रमण कुमार सिंह हाल के वर्षों में जिन युवा कवयित्रियों ने मैथिली साहित्य के क्षितिज पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की है, उनमें रोमिशा प्रमुख...
शख्सियतसाहित्य-संस्कृति

मुक्तिबोध की कविताः जमाने का चेहरा भी, भविष्य का नक्शा भी

समकालीन जनमत
प्रणय कृष्ण मुक्तिबोध ने बहुत तरह से अपनी कविता को व्याख्यायित करने की कोशिश की है. वह कालयात्री है, वह जन चरित्री है, लेकिन मेरी...
कविता

दीपक जायसवाल की कविताएँ अतीत और वर्तमान की तुलनात्‍मक प्रतिरोधी विवेचना हैं

समकालीन जनमत
कुमार मुकुल अतीत और वर्तमान के तुलनात्‍मक प्रतिरोधी विवेचन और वैचारिक जद्दोजहद दीपक जायसवाल की कविताओं में आकार पाते हैं। समय के अभेद्य जिरहबख्‍तर को भेद...
स्मृति

एक नाराज़ सूरज डूब गया

समकालीन जनमत
अच्युतानंद मिश्र प्रगतिशील धारा से सम्बद्ध वरिष्ठ लेखक विष्णुचंद्र शर्मा(1/4/1933-2/11/2020) का 2 नवम्बर को निधन हो गया। सोचता हूँ वे अगर इस वाक्य को सुनते...
कविता

जोराम यालाम नाबाम की कविताएँ जीवन की आदिम सुंदरता में शामिल होने का आमंत्रण हैं

समकालीन जनमत
बसन्त त्रिपाठी जोराम यालाम नाबाम की कविताओं में आतंक, भय, राजनीतिक दाँव-पेंच, खून-खराबे से त्रस्त जीवन को आदिम प्रकृति की ओर आने का आत्मीय आमंत्रण...
जनमत

मियों का मोहल्ला- एक

समकालीन जनमत
मोहम्मद उमर ‘उखड़ी हुई खोड़हीं सी सड़कें, ये बारिशों में नदी होने का हुनर रखती हैं। चौराहे के एक तरफ गोश्त की दुकान तो एक...
कविता

उपासना झा की कविताएँ स्त्री वेदना से स्त्री चेतना के सफ़र की अभिव्यक्ति हैं

समकालीन जनमत
सोनी पाण्डेय जब भी स्त्री कविता से गुजरती हूँ मन कविता की आत्मा में कान लगा उसकी धड़कने(कहन) सुनने की कोशिश करने लगता है।मुझे याद...
जनमतसाहित्य-संस्कृति

रामलीला : राजनीति के नागपाश में जकड़ी संस्कृति

समकालीन जनमत
रामलीला : राजनीति के नागपाश में जकड़ी संस्कृति * अनिल शुक्ल   दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर इन दिनों सरयू नगरी से ‘अयोध्या की रामलीला’...
भाषा

उर्दू की क्लास : “ज़ौक़” और “जौक़” का फ़र्क़

( युवा पत्रकार और साहित्यप्रेमी महताब आलम की शृंखला ‘उर्दू की क्लास’ की ग्यारहवीं     क़िस्त में ज़ौक़ और जौक़ का फ़र्क़ के बहाने उर्दू...
कविता

सविता पाठक की कविताएँ पितृसत्तात्मक चलन और पाखंड को उजागर करती हैं

समकालीन जनमत
रुपम मिश्र सविता पाठक मूल रूप से कहानीकार हैं । कहानी की गद्यात्मकता उनकी कविताओं में भी बनी रहती है । सविता की कविताएँ एक...
भाषा

उर्दू की क्लास : ज़ंग और जंग का फ़र्क़ ?

समकालीन जनमत
( युवा पत्रकार और साहित्यप्रेमी महताब आलम की शृंखला ‘उर्दू की क्लास’ की दसवीं    क़िस्त में ज़ंग और जंग का फ़र्क़ के बहाने उर्दू...
शख्सियत

अर्नेस्तो ‘चे’ ग्वेराः नये मनुष्य के निर्माण का स्वप्न

समकालीन जनमत
संजय कुंदन बीते नौ अक्टूबर को महान क्रांतिकारी अर्नेस्तो चे ग्वेरा की शहादत को दुनिया भर में याद किया गया। इस मौके पर बीस वामपंथी...
कविता

मृदुला की कविताएँ व्यवस्था की चमक के पीछे पसरे हुए अंधकार को उजागर करती हैं

समकालीन जनमत
कामिनी त्रिपाठी स्वभाव से सरल-सहज मृदुला सिंह छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल सरगुजा के एक कॉलेज में पढ़ाती हैं | यूँ तो उनका जन्म और पढ़ाई–लिखाई...
शख्सियत

राजनीति में एक सूफ़ी

समकालीन जनमत
( 28 सितम्बर 1920 को इलाहाबाद के जमींदार मुस्लिम परिवार में पैदा हुए ज़िया –उल-हक़ ने अपने जीवन के सौ साल पूरे कर लिए हैं....
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