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कविता

हर्ष की कविताएँ रचनात्मक आश्वस्ति देती हैं

हर्ष अपनी कविताओं के जरिए एक रचनात्मक आश्वस्ति देते हैं बेहतर भविष्य को बुनने का. उनका दखल केवल विषयों के सटीक चयन तक ही नहीं है बल्कि भाषा और मुहावरों के सटीक इस्तेमाल की कला भी इस युवा की कविताओं में देखी जा सकती हैं.

‘पिताजी की दी हुई घड़ी’, ‘ये नया समय है पार्टनर’ और मजदूर जीवन पर लिखी गई इनकी कविताओं को सामाजिक-आर्थिक संबंधों के बीच बनती नई परिभाषाओं में मनुष्यता की खोज के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए.

हर्ष की कविताओं में किसी भी तरह के शोषण की चुप्पी पर आलोचनात्मक भाव साफ़ तौर पर दिखता है जो कविसुलभ असंतोष से जन्मा है. इनकी कविताएँ तमाम खोखली सामाजिक परिभाषाओं के ध्वंस हो जाने की बानगी भी देती है. खासतौर से स्त्री जीवन की विडंबनाओं को संबोधित करती कविताएँ.

परिवार,विवाह और समाज की तमाम मान्यताओं को ढोने को विवश व्यक्तित्व के भीतर निर्मित होने वाली स्वाभाविकता का दायरा भी एक अस्वाभाविक चुप्पी के रूप में हमारे सामने आता है.

जीवन भर चलने वाली एक उदासी की जहाँ से शुरू होती है उसके प्रति आक्रोश का होना दरअसल सत्य को बचा लेने की दिशा में अपनी पक्षधरता को जाहिर भी करना है.

“सारी सारी रात की चिट्ठी/जख्म और जहर की /मेरी सहेलियों ने भी लिखकर जला दिए /और वो आवारा सांप /किसी का भी हो सकता था- /चाचा,दादा,बाप या फूफा,कोई भी !

समाज के भीतर के लैंगिक भेदभाव की शुरुआत दरअसल परिवार से होती है. पारिवार के भीतर भेदभाव के बारीक रेशे ताउम्र हमारे साथ रहते हैं.स्त्री मुक्ति के स्वप्न को सजोने में इन संस्थाओं के प्रति किसी भी संवेदनशील व्यक्ति में असंतोष का होना स्वाभाविक है.अपने सामाजिक संबंधों के बीच स्त्री होना क्या है ?

एक मार्मिक अभिव्यक्ति देखिए . ‘गाँव की लड़कियाँ ‘ कविता की लाइनें हैं –“खून की आदत होना ही/क्या स्त्री होना है?/स्त्री होना,असल में/ जख्मी होना है/उस बस्ती में जहाँ/ दूर दूर तक कोई दवाखाना न हो/स्त्री होना/असल में उस दवाखाने की तलाश है /जिसके न मिलने पर /अपने अपने जाँघों के जहर को /हमें खुद चूसकर,/रह रह थूकना होता है.” इस तरह के माहौल के बीच से किसी स्त्री के लिए गर परिवार संस्था एक घिनौना शब्द भर बन जाए तो क्या आश्चर्य?

स्त्री की सामाजिक निर्मिती को शहर और गाँव के दो समूहों में देखने के आदी समाज के लिए कविताओं के भीतर आजादी के जो सपने हैं वे इस तरह के किसी भी विभाजन को अस्वीकार करते हैं.

स्त्री इयत्ता की खोज के साथ इन कविताओं में बाजार, शहर और तथाकथित झूठी आधुनिकता की भी आलोचना है जो अपने तमाम दिखावे के बावजूद अंदर ही अंदर लड़कियों के लिए एक सीमित दायरे का निर्माण करती चलती है.

हर्ष भारद्वाज की कविताओं में इसके खिलाफ़ भी एक स्वर सुनाई देता है . ‘शहर की लड़कियाँ’ कविता में सामाजिक बंदिशों की जकड़बंदी को कुछ इस तरह देखने की कोशिश की है – मैंने उसके डर को सिर्फ देखा है;/इसलिए मैं उसकी तरह लड़ नहीं सकता /अपने डरों से,अपनी हदों से/मैं नहीं हँस सकता/जैसे वो हँसती है/किसी और की घड़ी में भी समय देखकर खिलखिलाते हुए!

आधी दुनिया के सवालों पर बातचीत बगैर पूरी दुनिया के विमर्श को समझे नहीं हो सकती. स्त्री जीवन की निर्मिती और उसके अच्छे-बुरे स्वभाव की तमाम दशाएं यह समाज तैयार करता है.

जब जकड़न सामाजिक और सांस्कृतिक रूप में निर्मित होती है तो फिर मुक्ति कि तलाश अकेले कैसे संभव है? स्त्री मुक्ति के स्वप्न बुनने के साथ जो चीज हमारे जेहन में आती है वह कि स्त्रियों के सवाल इस व्यापक समाज के सवाल हैं.

सीमोन दि बोउवार का यह कथन कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बना दी जाती है’ केवल स्त्रियों की सामाजिक निर्मिती को ही बयां नहीं करता है बल्कि पुरुषों के बनते सामाजिक व्यक्तित्व से गुम होते न्यूनतम मानवीय व्यवहार की खोज यानि आत्मालोचन की ओर भी इशारा करता है.

किसी समाज में होने वाला स्त्री का शोषण उस समाज में पुरुषों की होने वाली सामाजिक निर्मिती का नतीजा होता है. ‘मैं बलात्कारियों के बीच बड़ा हुआ हूँ’ कविता इस बात की तह तक जाती है जहाँ से व्यक्ति के जेहन में सामाजिक और सांसकृतिक आवरण के बीच चुक जाते स्त्री जीवन की स्वाभाविक छवियों की हत्या हो जाती है. बलात्कार,शोषण,चरित्रहीनता और इज्जत के हवाले जिस तरह से एक लड़की की परवरिश एक परिवार में होती है.वह उस समुदाय के मर्दवादी नजरिये को भी निर्मित करती चलती है.

स्त्री विमर्श के सारे सवाल बेमानी हैं जब तक स्त्रियों की दशा के लिए खुद आत्मावलोकन न करे.पारिवारिक संबंधों के बीच खुद के बनते नजरिये पर कवि की यह स्वीकारोक्ति महत्त्वपूर्ण है कि-मैं किसी भी सभा में शामिल होने के लिए तब बहुत छोटा था/जब उन्होंने मुझे/औरतों को नंगा करना सिखाया./मैं,जो बलात्कारियों के बीच बड़ा हुआ हूँ/खुद से किसी और झूठ की उम्मीद नहीं कर सकता अब/आप मुझसे सीधी नफरत कर सकते हैं.

 

1.मैं, जो बलात्कारियों के बीच बड़ा हुआ हूँ

मैं जिस कमरे में लेटा हूँ

उसके बगल वाले कमरे में मेरी बहन
अपने दुपट्टे के खो जाने पर रो रही थी।
मैं जिस कमरे में नहीं लेटा हूँ
उस कमरे के बगल वाले कमरे में
मेरी बुआ ने खुद को आग लगाने से पहले
चीख कर कहा था कि वो किसी लड़के से प्यार करती है।
मुझे जिस कमरे में बुलाया गया
उसमें बलात्कारियों की एक बैठक में
बलात्कार की परिभाषा तय की गई
और चरित्रहीनता के इल्जाम में मेरी माँ को भंसाघर में बंद करके
मेरी दादी पर मिट्टी तेल छिड़क दिया गया।

मेरी माँ
जब चीखना भूल गई और किचन से बाहर निकली
तब मेरी दादी की देह की छटपटाहट भी खत्म हो चुकी थी
और मेरी बड़ी बहन अपने दुपट्टे को भूल कर
मेरी बुआ की लाश खोज रही थी।
मेरी छोटी बहन को उसके कोई दादा
जांघ पर लिखना सिखा रहे थे ए बी सी डी
और मेरी छोटी बुआ के कलाई पर
खून की कोई ताज़ा परत सूख रही थी।

मैं अपनी बहन को बहन कह पाता
उससे पहले ही
मुझे बता दिया गया कि वो मेरे लिए मर चुकी है हमेशा के लिए
मैं जब तक अपनी बुआ से पूछ पाता प्यार का सही मतलब,
उसकी आत्महत्या की खबर
सिलिंडर ब्लास्ट के आग की तरह सभी कमरों में फैल चुकी थी
मैं जब तक अपनी माँ से पूछ पाता
कि हम सपने क्यूँ देखते हैं,
वो गूंगी हो चुकी थी
मैं जब तक अपनी दादी से पूछ पाता
कि उसे दादा की तरह डाढ़ी क्यूँ नहीं आते
वो किसी नदी किनारे दुबारा से जला दी जा चुकी थी।

मैं किसी भी सभा में शामिल होने के लिए तब बहुत छोटा था
जब उन्होंने मुझे
औरतों को नंगा करना सिखाया।
मैं, जो बलात्कारियों के बीच बड़ा हुआ हूँ
खुदसे किसी और जूठ कि उम्मीद नहीं कर सकता अब
आप मुझसे सीधे सीधी नफरत कर सकते हैं

 

2. गाँव की लड़कियाँ
मैंने गाँव की लड़कियों को देखा है,

अक्सर
शहर के उदास कोनों में
चुपचाप बैठे हुए

उनके किताबों से भी
मिट्टी की ही गंध उठती है
और सटीक शब्दों की कमी में
वो कम कम कहना सीख जाती हैं
हर कुछ!

वह खून को
खून कहना नहीं जानती थी
नाहिं देह को देह
तब, जब उसने बहुतकर इतनी हिम्मत जुटाई
कि मुझसे गले मिल
हंस नहीं, तो कम से कम
रो सके।

“तुमने कभी.. खुद को चिट्ठियां लिखी हैं?
हमारे शब्दों की कमी को
हमारे सिवा कोई नहीं समझता
इसलिए
हम बहुत कम उम्र से
खुद को चिट्ठियां लिखना सीख जाते हैं।
मन हीं मन सही,
हम गाँव की लड़कियां..”

उनके ज़िन्दगी के पन्नों पर
गुलाबी रंग से कई गहरा जमा होता है
नमक का रंग।
उनकी डायरी में होते हैं अक्सर
बहुत से गोजे हुए पन्ने
जिनमे कभी दर्ज़ थी वे बातें
जो वो खुद से भी नहीं कहना चाहती

“मेरे जाँघों पर एक
नीले रंग का दाग है।
मेरे घरवालों ने जिसे पालतू कहा
असल में वो एक आवारा सांप था,
मेरे भाई का,
जिसने मुझे मेरी जाँघों पर
कई कई रात डसा
और हर बार मैं
मरने का ढोंग करती रही
जैसा कि माँ ने सिखाया था।
तुम कभी.. बिना चीखे मरे हो?
..हमारे शब्दों की कमी को
हमारे सिवा किसी ने
कभी जानना भी न चाहा
और हम खुद ही खुद को चिट्ठियां
लिखते रहे
लिखकर, चुप चाप मरते रहे!

“सारी सारी रात की चिट्ठियां
ज़हर और ज़ख़्म की
मेरी सहेलियों ने भी लिखकर जला दिए
और वो आवारा सांप
किसी का भी हो सकता था-
चाचा, दादा, बाप या फूफा,कोई भी!

“..खून की आदत होना ही
क्या स्त्री होना है?
स्त्री होना, असल में
जख़्मी होना है
उस बस्ती में जहाँ
दूर दूर तक कोई दवाखाना न हो।
स्त्री होना
असल में उस दवाखाने की तलाश है
जिसके न मिलने पर
अपने अपने जाँघों के ज़हर को
हमें खुद चूसकर,
रह रह थूकना होता है।”

मेरे गले लिपटकर
जो उस दिन रोई-
वो गाँव की लड़की-
मुझे हर स्त्री के चेहरे में दिखती रही
जो बहुत तलाश के बाद
आखिरकार उस दवाखाने तक पहुँच गई
जो कि असल में
एक पुस्तकालय था।

“तुम मेरी एक कविता सुनोगे? मेरी एकमात्र.. संपूर्ण कविता?”

कहो

“परिवार
एक घिनौना शब्द है।

बस!”

 

3.शहर की लड़कियाँ

खिलखिलाना

सड़कों पर
या किसी फुटपाथ के कोर पर बैठे
रोते हुए भी,
कभी सिगरेट जलाते
कभी सिगरेट की तरह जलते हुए,
धुआं होते हुए उठना
और आकाश के रंग से मिलाना
अपनी नेलपॉलिश का रंग
या तंग आ के उधेड़ देना
नाखून के नीचे की चमड़ी को
फिर उंगलियों का खून चूसते हुए
मेट्रो में धक्का मुक्की करते हुए
या चलती बस पे दौड़कर चढ़ जाना-
नोचती आंखों के बीच
किसी हाथ को अपनी जांघ पर टटोलकर
मोड़ देना
या सांसों की तरह फूलकर
अगले स्टॉप पर उतर जाना
और अपने पर्स से खुदरे निकाल जोड़ना
ओला करने लायक पैसे,
घर लौटना भी
तो देर रात की सी चुप-चुप
माँ या वार्डन के डर से!

उसके डर को मैंने
सिर्फ देखा है;
मैं उसे जानने का दावा कभी नहीं कर सकता!
वह शहर की लड़की
जिसको खबर भी नहीं
कि उसकी घड़ी किसी पब में गिर पड़ी है
या किसी लाइब्रेरी में छूट गया है उसका मोबाइल
घर या होस्टल लौटने के ख़याल से कई अधिक
चाहती है लड़ना
अंधेरे और सड़क की असुरक्षा के ख़िलाफ़
वह किसी नारे सा उछलना चाहती है,
किसी गीत में चाहती है ढलना
वह अपनी, अपनी खुद की आवाज़ बनकर
हमें बताना चाहती है
कि आज़ादी सिर्फ तब ही आज़ादी होती है
जब वह सब की होती है
एक साथ, एक जैसी
वरना कुछ भी नहीं होती!

मैंने उसके डर को सिर्फ देखा है;
मैं उसे जीने की बात नहीं कर सकता
और इसीलिए नहीं जान सकता कभी भी
कि “फ्रीडम फ्रॉम पेट्रिआर्कि” के किसी सेमिनार में
पाश या माया की कोई कविता गाकर
घर लौटती हुई लड़की
सुसाइडल क्यूँ हो जाती है
जब वह अपनी गली के शुरुआत से
अपने घर के गेट तक
एक सीधी रेखा में चलने पर
मजबूर हो जाए
किसी जाने पहचाने भय से!

“तुम्हारी डर की क्या सीमाएं हैं?
हमारे लिए यह जानना है
कि कमर में एक छुरी होते हुए भी
मुसीबत में
उससे सबसे अधिक हम
सिर्फ अपनी जान ले सकते हैं”

मैंने उसके डर को सिर्फ देखा है;
इसीलिये मैं उसकी तरह लड़ नहीं सकता
अपने डरों से, अपनी हदों से।
मैं नहीं हँस सकता
जैसे वो हँसती है
किसी और कि घड़ी में समय देख कर भी
खिलखिलाते हुए!

“पापा पूछेंगे
कि इतनी रात तक कहाँ बौख रही थी,
तो क्या बोलोगी?”

“बोलूंगी कुछ नहीं…
बस अपने जीन्स के फोल्ड्स खोलूंगी
और सारी रेत
उनके हाथों पर झाड़ दूंगी”

मैं हँसा।
वो हँसी।
हम दोनों पे रात हँसकर, सितारे बुनने लगी!

 

4. गाँव और शहर के बीच की लड़की

गाँव से निकलकर

जो नहीं पहुँच पाती कभी शहर
वे लड़कियाँ
नहीं रह जाती लड़कियाँ
और पेट के लिए
ताउम्र जवान दिखने की शर्त पर
वे अपने बुढ़ापे से बहुत पहले ही
मर जाती हैं
भूख या किसी अनजान बीमारी से

वे जो अपनी जाति
या इच्छाओं के मलबे में दबकर
चुनती जाती हैं ज़िन्दगी
नैतिकता के भूसे से,
समाज का आईना बन जाती हैं
जिसमें हर आदमी झाँकता तो है
मगर न सिर्फ इनकार करता है
खुद को पहचानने से
बल्कि पत्थरों का सौदागर भी बन जाता है
और तलाशने लगता है
शुद्धता के पैमाने
मच्छरदानियों या मंदिरों में घुसकर

लेकिन जो औरतें
सुहागिन होने की अपनी ख्वाहिशों को
देह से उतार उतार कर थक चुकी हैं
और नग्नता जिनकी इच्छा से कई अधिक
ज़रूरत बन चुकी है
वे भले ही
कभी न चुनी जाएँ हमारी देवियों के तौर पर
फिर भी वे
हमारी देवियों से
अधिक भूखी और
सुंदर होती हैं!

 

5. पिताजी की दी हुई घड़ी
मैं बरामदे में बैठा होता हूँ अक्सर

पिताजी की दी हुई घड़ी के साथ
वक़्त उदास है जिसमें-
माँ की आँखों सा-
छप्पड़ के नीचे से गुज़र रहे बाँस में ठुके किसी कील से लटक रहा है।
पिता जी वहीँ से उतारे गए थे एक सुबह,
जब इक रात ज़िन्दगी की गाँठें
इतनी कस गयी थी उनके गर्दन पर
कि वह जान गए थे
कि उन्हें खोलने के सभी प्रयास अब व्यर्थ हैं
और वह उसके साथ हीं सो लिए।

वह इतिहास के विद्यार्थी रह चुके थे
पर उन्होंने
इतिहास पर कभी कुछ भी नहीं बोला।
वह मिट्टी की बातें किया करते थे,
किसी भी आम किसान की तरह
वह धूप और बारिश की बातें किया करते थे।
वह भूख को समझते थे
जैसा हर किसान समझता है,
वह देश पर बहस नहीं करते
आम लोगों की तरह,
वह अपनी खेतों में कविताएँ गाते
अपनी फसलों को बांसुरी सुनाते,
और हर ठंढ में
धान के किनारे सरसों सा उग आते ।
पर यह बहुत पहले की बात थी;
आम किसान की तरह
वक़्त ने उन्हें भी
मकई बना दिया था
बाद के दिनों में।

मैंने उनकी गली हुई एड़ी पर मरहम लगाया
उनके आँखों की चोट को
बेहद करीब से जाना है,
उनके घुट्टी के दर्द को भी।
मैंने उन्हें ऐसे मरता हुआ देखा
इस दौर के हर किसान को मरना है जैसे,
नींद में हिंचकियाँ लेते हुए
वह जागते रहे
और सपनों का क़र्ज़ बढ़ता रहा बढ़ता रहा,
और एक रात
उनके गले में एक रस्सी डालकर
उन्हें नीच फ़ेंक दिया गया
उसी धरती की ओर
जिसके प्रेम में वो जीते रहे,
जीते रहे थे
आखिर तक।

पर
कभी कभी
बहुत अँधेरे में
आँखें हक़ीक़त को लांघ जाती हैं
और मेरे सिरहाने पड़ी घड़ी
उलटी तरफ को चलने लगती है।
मैं उनके हाथों को पकड़ के
सोया होता हूँ।
वह मुझे सपनों की खेत में
अपनी कन्धों पर बिठा कर ले जा रहे हैं;
वहाँ जहाँ नीली जमीन पर सरसों उगी है
चलने को कोई आयर नहीं है
पिताजी पाश का कोई गीत गाते हुए
आगे आगे,
खेत के बीचों बीच, बढ़ रहेे हैं
किसी बस्ती की ओर।

 

6. “ये नया समय है, पार्टनर”
पछुआर में देखा आज
एक आधे सड़े कबूतर के गले में
अटका हुआ एक प्लास्टिक का छोटा सा ढ़क्कन
तो याद आया कि विश्वयुद्ध खत्म हो चुका है।
जर्मनी दोनों बार हारी, जापान भी हारा
मगर जीता कौन मैं नहीं जानता

नहीं, मैं अभी भी
सिर्फ एक मामूली कवि ही हूँ,
इतना पागल नहीं हुआ अभी तक
कि अनेरे कबूतरों को विश्वयुद्ध से जोड़ दूँ।

अस्ल में
पहले विश्वयुद्ध के दौरान
इस्तेमाल किये गए
एक पॉइज़नस गैस फॉसजीन का
सबसे शुरुआती परीक्षण
कबूतरों ने ही
मरकर सफल किया था।

बहुत से सैनिकों को उस गैस ने
चुपचाप मार दिया
बिना किसी शोर के
और दोनों ओर के युद्ध-विशेषज्ञ
इस बात का दम भरते रहे
कि हवा सिर्फ दुश्मनों की होती है।
मगर ये मिट्टी किसकी है?
और धरती?
और नदियाँ?
और कोयला? तेल? अनाज? जंगल? सोना?
किसका है ये सब?

ये नया समय है, पार्टनर
यहाँ जमा करने लायक जो भी होता है
सिर्फ कुछ गिने चुने मनुष्यों का होता है
और ढोने लायक जो भी होता है
वो बचे हुए इंसान समेत
सारी प्रकृति का।

बात कबूतरों से आगे नहीं बढ़नी थी!
विश्वयुद्ध से आगे तो बिलकुल नहीं!
लेकिन कविता है
कि इस समूचे ढाँचे से नफरत करती है
और मैं इतना मामूली कवी हूँ
कि इसकी शक़्ल बदलने की हैसियत नहीं रखता

 

7.तुमने कभी फूल को नहीं देखा 

तुमने कभी फूल को नहीं देखा है
फूल के देह पर ही खिला हुआ
क्योंकि तुम्हारे नज़रिये में
भौरों का डंक है।
तुम नहीं जान सकते
कि एक कुएँ में
एक कुआँ किस तरह उतरता है
क्योंकि तुम्हारी प्यास
इक हद में बंद है
ठीक तुम्हारे समाज की तरह।

मैंने एक समतल भूमि को
एक समतल भूमी पर खिसकते देखा है
मैंने पहाड़ों को
पहाड़ों से मिलते देखा है
मैंने देखा है
कि किस तरह दो हथौड़े
एक दूसरे से सटकर,
थककर सोते हैं।

मैंने एक सैनिक को
एक दूसरे सैनिक के होठों पर उतरते देखा है
मैंने जो कुछ भी देखा है अबतक
उसमे सबसे सुंदर
मैंने एक स्त्री को
किसी दूसरे स्त्री का घाव भरते देखा है।

तुम्हारे लिए काला सफ़ेद का विलोम है
हमारे लिए बस दो रंग
जो जब चाहे घुल जाए
काले से काला, सफ़ेद से सफ़ेद
जो जब चाहे बन जाए सामूचा इंद्रधनुष!

 

(कवि हर्ष भारद्वाज की कलम नई है, इनका जन्म अगस्त, 2000 में बिहार के एक गाँव परवाहा, अररिया में हुआ,और शुरुआती पढ़ाई भी यहीं हुई। दसवीं तक की पढ़ाई पास के एक शहर फारबिसगंज से हुई और 11th-12th पटना के लोयोला हाई स्कूल से। फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कर रहे हैं। कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में हर्ष की कविताएँ प्रकाशित हुई हैं और चर्चित भी।

टिप्पणीकार दीनानाथ मौर्य ने इलाहाबाद और जेएनयू से अपनी पढ़ाई पूरी की है। इलाहाबाद में लाइब्रेरी आंदोलन से जुड़े हुए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।)

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