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बिहार चुनाव में जनता का एजेंडा आया सामने, बंगाल और अन्य चुनावों के लिए बनेगा उदाहरण: दीपंकर भट्टाचार्य

 

 

◆ चुनाव परिणाम की तुलना भाजपा-जदयू 2015 की बजाए 2010 से करे, साफ दिखेगा एनडीए के खिलाफ है यह जनादेश.

◆ जनता ने हमारी पार्टी पर भरोसा किया, उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने का हरसंभव होगा प्रयास

◆ बिहार की जनता, महागठबंधन के सभी घटकों और पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति जताया आभार

 

15 नवम्बर को पटना में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए माले महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि बिहार विधानसभा 2020 का जो परिणाम सामने आया है, उससे साफ जाहिर होता है कि जनता के अंदर बदलाव का जबरदस्त संकल्प था. सरकार को बदलने के लिए बिहार की जनता और खासकर मतदाताओं की नई पीढ़ी का आक्रोश पूरे चुनाव दिखा. भाजपा-जदयू की लाख कोशिशों के बावजूद बेरोजगारी, प्रवासी मजदूरों के मुद्दे, स्कीम वर्करों-शिक्षकों के स्थायीकरण आदि सवाल चुनाव के केंद्र में रहे. इस बार जनता ने चुनाव का एजेंडा सेट किया, जो इस चुनाव की सबसे बड़ी उपलब्धि है.

आगे कहा कि कुछ सीटों पर बहुत कम मार्जिन से हार के कारण परिणाम हालांकि एनडीए के पक्ष में चलाया गया, लेकिन आज की तारीख में इतना मजबूत विपक्ष कहीं नहीं दिखेगा. भाजपा की विपक्ष मुक्त लोकतंत्र बनाने की जो साजिश है, उसके खिलाफ बिहार की जनता ने इस चुनाव में एक जबरदस्त दावेदारी जतलाई है. कोरोना, लाॅकडाउन और अत्यंत विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए बिहार ही जनता ने इस चुनाव को एक जनांदोलन में बदल दिया. आने वाले दिनों में बंगाल, असम व अन्य सभी चुनावों में यह एक महत्वूपर्ण प्रेरक का काम करेगा. बिहार की जनता ने पूरे देश को मुद्दों पर चुनाव लड़ना सिखाया है. अब इन सवालों को अन्य दूसरे राज्यों के चुनाव का भी एजेंडा बना देना होगा.

काॅ. दीपंकर ने कहा कि भाजपा के लोग अब यह प्रचारित करने की कोशिश कर रहे हैं कि आक्रोश केवल नीतीश जी के खिलाफ था. लेकिन यह तथ्यात्मक गलत है. विगत 15 साल की सरकार में भाजपा बराबर की साझीदार है. केंद्र में उन्हीं की सरकार है. लाॅकडाउन जैसे प्रोजेक्ट भी केंद्र सरकार के ही प्रोजक्ट हैं. यदि सुरक्षित रोजगार का सवाल बिहार सरकार से मांग थी, तो रेलवे का निजीकरण भी उतना ही बड़ा मुद्दा था. इस चुनाव ने नीतीश सरकार के साथ-साथ केंद्र की भाजपा सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया है.

2020 के चुनाव परिणाम की तुलना 2015 के चुनाव से करने की बजाए 2010 के परिणाम से करना चाहिए. 2010 में केंद्र में यूपीए की सरकार थी, मोदी-अमित शाह जैसी कोई परिघटना नहीं थी. तब भाजपा-जदयू ने सर्वोच्च प्रदर्शन किया था. और आज 2020 में वे किसी प्रकार सरकार बना रहे हैं. इससे स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा व नीतीश के खिलाफ कितना जनता में गहरा आक्रोश है.

इस चुनाव में महागठबंधन के खिलाफ एनडीए के लोगों का अनाप-शनाप का हमला हम सबने देखा, लेकिन सबसे ज्यादा हमला माले पर केंद्रित था. लेकिन हमने अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन किया. इस उदाहरण से भी भाजपा के चुनाव प्रचार के असर की असलियत का अंदाजा लगाया जा सकता है.

जो एजेंडे तय हुए हैं, उस पर विधानसभा के अंदर से लेकर बाहर तक अब जबरदस्त लड़ाई छिड़ेगी. 26 नवंबर को देश के तमाम ट्रेड यूनियन की साझी हड़ताल है. श्रम कानूनों को बदल देने और उन्हें गुलाम बना देने के खिलाफ यह हड़ताल है. इसमें हम मजबूती से उतरेंगे और आंदोलनों को तेज करने की दिशा में बढ़ेगे.

अंत में उन्होंने बिहार की जनता, महागठबंधन के सभी घटक दलों और पार्टी कार्यकर्ताओं का धन्यवाद करते हुए कहा कि जो कसर इस बार रह गई है, उसको आगे आने वाले दिनों में मुकम्मल करना है.

राज्य सचिव कुणाल ने कहा कि जनता ने हमारी पार्टी पर भरोसा जताया है. हमारी पार्टी व हमारा विधायक दल उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा. विधानसभा के अंदर हो या बाहर की बात, हम अपने आंदेालनों को तेज करेंगे. यह भी कहा कि 16 नवंबर को पोलित ब्यूरो और 17 नवंबर को राज्य कमिटी की बैठक पटना राज्य कार्यालय में होगी. बैठक में विधायक दल का गठन व आगे की कार्ययोजनाओं पर चर्चा होगी.

कविता कृष्णन ने कहा कि भाजपा-जदयू के द्वारा यह झूठा प्रचार चलाया जा रहा है कि महिलाओं का मत महागठबंधन की तुलना में एनडीए को अधिक मिले हैं, यह तथ्यात्मक रूप से गलत है. महिलाओं का रूझान उसी अनुरूप रहा है जैसा अन्य मतदाताओं का था. ठीक उसी प्रकार से प्रवासी मजदूरों के संबंध में भी भाजपा का दावा गलत है. सीएसडीएस के पोस्ट पोल सर्वे से यह स्पष्ट है कि प्रवासी मजदूरों का झुकाव महागठबंधन की ओर था. इसलिए महिलाओं और प्रवासी मजदूरों ने एनडीए को ग्रीन सिगनल दे दिया, ऐसा सोचना पूरी तरह गलत है.

पश्चिम बंगाल के बड़े सांस्कृतिक हस्ती सौमित्रा चटर्जी को उनके निधन पर श्रद्धांजलि भी दी गई.

 

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