दलितों के घर भोजन: मकसद क्या है, वोट या कुछ और?

जिस समय दलितों के घर भोजन की यह नौटंकी चल रही है उसी समय एससी/एसटी एक्ट को कमजोर किया जा रहा है।उसी समय विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर भर्ती में आरक्षित तबकों को बाहर करने की साजिश चल रही है।चन्द्रशेखर रावण जैसे युवा दलित आंदोलनकारी को छल-प्रपंच के जरिये जबरन जेल में रखा गया है। पूरे देश भर में दलितों के खिलाफ हिंसा की बाढ़ आई हुई है।

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हरम सरा नहीं कविता चाहिए

‘ जेंडर बाइनरिज़्म ’ दोनों ध्रुवों के बीच पड़ने वाली सारी चीज़ों को परिधि पर फेंक देता है. यह स्थापित करता है कि स्याह और सफ़ेद के बीच दूसरे रंग नहीं होते. यह यौनिकता को तमाम रंगों की एक पट्टी मानने के बजाय दो स्थायी रंगों में कील देता है. सौंदर्यबोध के स्तर पर यह समान्य व्यवहार का हिस्सा है और कवि समय की तरह प्रचलित है. पूरा सौंदर्यशास्त्र इस दो-ध्रुवीय युग्म को मज़बूत करता है.

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दलितों का भारत बंद : दलित आन्दोलन का नया दौर और नया रूप

  पिछले चार सालों में भारत में दलित आन्दोलन नए रूप में विकसित होना प्रारम्भ कर चुका है.रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या,गुजरात का ऊना आन्दोलन,सहारनपुर में भीम आर्मी का आन्दोलन,महाराष्ट्र के भीमा कोरे गांव का संघर्ष और 2 अप्रैल का दलितों द्वारा किया गया स्वत:स्फूर्त भारत बंद,इन सभी आंदोलनों ने यह साबित किया है कि भारत में दलित आन्दोलन अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है. आज के समय में दलित आन्दोलन ज्यादा व्यापक मुद्दों,विस्तृत नजरिये और उग्र तेवर के साथ सामने आया है. लोकतंत्र पर बढ़ते फासीवादी हमले और…

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देश विरोधी व्यावसायिक मंसूबा है लाल किला को डालमिया समूह की गोद में देना

हमारी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित करना न केवल सरकार की संस्थाओं की जिम्मेदारी है बल्कि हम नागरिकों का भी दायित्व है। सरकार के इस देश विरोधी व्यावसायिक मंसूबो को सफल होने से रोकना चाहिए। इस पूरे मामले पर संस्कृति कर्मियों और लेखकों को ‘ सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासत को बचाओ, सरकार के जन विरोधी व्यावसायिक मंसूबों को हराओ ‘ जैसा व्यापक अभियान चलाना चाहिए।

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लाल किला को नीलाम करने की इजाजत नहीं दी जा सकती : दीपंकर भट्टाचार्य

भाजपा को देश व बिहार से भगाना कितना जरूरी हो गया है, यह इससे भी साबित हो रहा है कि इस सरकार ने लाल किला नीलाम कर दिया है. 15 अगस्त को जिस लाल किले पर प्रधानमंत्री झंडा फहराते हैं, उसे डालमिया ग्रुप के हवाले कर दिया गया है. यह वहीं डालमिया ग्रुप है जिसने बिहार को लूटकर बर्बादी की गर्त में धकेल दिया था.

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एससी /एसटी एक्ट : दुरुपयोग की चिंता या कानून की जड़ ही खोदने की कोशिश

उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989  के संदर्भ में फैसला दिए जाने के बाद पूरे देश में इस फैसले के पक्ष और विपक्ष में बहस-मुबाहिसे का माहौल गर्म है. फैसले का विरोध करने वाले मानते हैं कि यह फैसला,अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम को और कमजोर कर देगा. इससे इन जातियों को, जो थोड़ी बहुत कानूनी सुरक्षा हासिल है, उसका भी क्षरण हो जायेगा. इस फैसले का विरोध करने के लिए अनुसूचित जाति के संगठनों ने दो अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया, जिसका समर्थन वामपंथी पार्टियों समेत…

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उदारमना संस्कृति का सामर्थ्य

  पंकज चतुर्वेदी: मशहूर कथन है कि ”Interpretation depends on intention.” यानी व्याख्या इरादे पर निर्भर है। अगर आपकी नीयत नफ़रत और हिंसा फैलानेे की है, तो आप इतिहास से वे ही तथ्य चुनकर लायेंगे, जिनसे ऐसा किया जा सकता हो। ऐसा नहीं है कि वे तथ्य नहीं हैं, लेकिन समग्र सत्य की सापेक्षता में देखे जाने पर तथ्य सत्य नहीं रह जाते। इसलिए किसी ख़ास मक़सद या निहित स्वार्थ की नज़र से इतिहास का चयनधर्मी इस्तेमाल इतिहास नहीं है। सत्य से न्याय तभी हो सकता है, जब तथ्यों के…

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यूनिवर्सिटी और हाज़िरनामा

चिंटू कुमारी हाल ही में देश के सबसे बेहतरीन शैक्षणिक संस्थानों में से एक जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में 80 प्रतिशत हाज़िरी को अनिवार्य करने का आदेश जारी किया गया है . जेएनयू के सन्दर्भ में अगर हम बात करें तो इसके स्थापना काल से ही इस यूनिवर्सिटी को अपने अकादमिक परफॉरमेंस के लिए ‘अटेंडेंस ’ का मोहताज नहीं रहना पड़ा है. अब तक तो यहाँ के खुले वातावरण , आम तौर पर शोधार्थी और अध्यापक के बीच अनौपचारिक, मित्रतापूर्ण माहौल ने ही जेएनयू को एक बेहतरीन यूनिवर्सिटी बनाया है. ‘लड़ो…

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मातृभाषा की नागरिकता

  सदानन्द शाही   जाने कब से लोकमन कहता चला आ रहा है-कोस कोस पर पानी बदले नौ कोस पर बानी. जैसे धरती के भीतर छुपा पानी एक कोस पर बदल जाता है ,वैसे ही नौ कोस की दूरी तय करने पर भाषा बदल जाती है. भाषा का यह बदलाव स्वाभाविक और प्राकृतिक है. इसीलिए भाषाई बहुलता और विविधता भारत का वैभव है लेकिन इसके उलट तीन सौ साल की औपनिवेशिक गुलामी हमें यह समझाने में सफल रही है कि विभिन्न भाषाओं का होना अभिशाप है. हमारे औपनिवेशिक प्रभु हमको…

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देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अच्छे दिन कब आएंगे ?

जाहिद खान ‘‘देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुए हमलों की भरोसेमंद जांच कराने या उन्हें रोकने में मोदी सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है।’’ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ ने हाल ही में साल 2018 की ‘वल्र्ड रिपोर्ट’ जारी करते हुए ये बात की है। 643 पन्नों की वल्र्ड रिपोर्ट के 28वें संस्करण में ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ ने 90 से ज्यादा देशों में मानवाधिकारों की स्थिति का जायजा लिया और इस नतीजे पर पहुंचा कि सभी भारतीयों के बुनियादी अधिकारों की कीमत पर सत्तारूढ़ बीजेपी के कुछ…

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भारतीय राजनीति का हिंदुत्व काल

  2014 के बाद से भारत की राजनीति में बड़ा शिफ्ट हुआ है जिसके बाद से यह लगभग तय सा हो गया है कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियों को अपनी चुनावी राजनीति हिंदुत्व के धरातल पर ही करनी होगी. इस दौरान उन्हें अल्पसंख्यकों के जिक्र या उनके हिमायती दिखने से परहेज करना होगा और राष्ट्रीय यानी बहुसंख्य्यक हिन्दू भावनाओं का ख्याल रखना पड़ेगा. 2014 के बाद का कुल जमा हासिल यह है कि भारत में एक अलग तरीके के राष्ट्रवाद को स्वीकृति मिल गयी है जिसका आधार धर्म है…

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चार लाख पद ख़त्म और ‘ माननीयों ’ की वेतन वृद्धि

बजट से ठीक एक दिन पहले अखबारों में खबर छपी कि केंद्र सरकार लगभग 4 लाख ऐसे पद खत्म करने जा रही है,जो पांच सालों से खाली हैं.आज बजट आया तो पता चला कि राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,सांसदों आदि के वेतन में अच्छी खासी बढ़ोतरी की गयी है.इन दोनों बातों का आपस में कोई सम्बन्ध भले ही न हो,लेकिन ये दोनों ही केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं की अभिव्यक्ति तो हैं ही. सोचिये कि यदि राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति या सांसदों का वेतन बढाने का प्रस्ताव बजट में नहीं शामिल होता तो क्या इनमें से किन्ही महानुभाव…

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