Tuesday, May 17, 2022
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पांच राज्यों के चुनाव: लोकतंत्र और गणतंत्रात्मक भारत के समक्ष खड़े यक्ष प्रश्न

जयप्रकाश नारायण 

2022 में हुए 5 राज्यों के चुनाव के परिणाम आ गये हैं। पंजाब में आप, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भारतीय जनता पार्टी जीत चुकी है। उत्तर प्रदेश  में भाजपा ने भारी जीत दर्ज की है।

चुनाव के दो वर्ष पहले से ही भारत गंभीर संकट में फंसा था। कोविड19 महामारी काल में  आर्थिक संकट से अर्थव्यवस्था का डूबना, युवा बेरोजगारी, लोकतांत्रिक संस्थाओं का खुला दुरुपयोग और सरकार की कारपोरेट परस्त नीतियां मुख्य कारक रही थी। जिसने भारतीय जनजीवन को झकझोर  दिया था।

सरकार की नग्न कारपोरेट परस्ती, कानूनों का दुरुपयोग और उत्तर प्रदेश में सरकारी तंत्र की अराजकता के कारण वातावरण  तनाव और घुटन से भरा था। जिस कारण से सरकार विरोधी माहौल बन रहा था।

महामारी के काल में किसान विरोधी कानून लाये गये।  कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आक्रोश फूट पड़ा और दिल्ली की सीमा पर ऐतिहासिक किसान आंदोलन खड़ा हो गया। जिस कारण मोदी सरकार  को 8 वर्षों के कार्यकाल में सबसे बड़ी चुनौती मिली।

महामारी काल में शिक्षा, स्वास्थ्य के ढांचे के ध्वस्त होने और बेरोजगारी  के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने के कारण युवा-छात्र आक्रोश चरम पर था। जिसकी अभिव्यक्ति  महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र प्रयागराज से हो चुकी थी।

स्कीम वर्कर्स, जैसे आंगनबाड़ी, आशा, रसोईया,  पैरा शिक्षक, मनरेगा और दिहाड़ी मजदूरों सहित  विभिन्न समूह जीवन के संकट और रोजगार के अमानवीय  स्थितियों के कारण आंदोलन के रास्ते पर उतर पड़े थे।
इस पृष्ठभूमि में पांच राज्यों में चुनाव हुए। उम्मीद थी कि चौतरफा राजनीतिक आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक संकट के विस्तार के कारण भारतीय समाज में पल रहे आंतरिक अंतर्विरोध के संकेत चुनाव परिणाम में जरुर दिखेंगे।

लेकिन प्रथम दृष्टया चुनाव परिणामों से ऐसे संकेत नहीं मिलते। जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि भारतीय समाज  किसी गहरे आंतरिक संकट से गुजर रहा है।

चुनाव परिणाम और कांग्रेस   

परिणाम से कांग्रेस को फिर बड़ी चोट पहुंची है और उसके अस्तित्व के समक्ष प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है।

महामारी प्रबंधन में आपराधिक लापरवाही, आर्थिक संकट, महंगाई और भाजपा के कट्टर हिंदुत्ववादी नीतियों के चलते  संकट झेल रहा समाज अगर भाजपा के पक्ष में खड़ा दिख रहा है, तो इसके मूल कारण की खोज के लिए हमें भारत के उदारवादी जनतांत्रिक राजनीति और उदारीकरण से बने समाज और बाजारवादी अर्थ नीति की  निर्मम चीरफाड़ करनी होगी।

पंजाब की पहेली अपने आप में एक जटिल प्रश्न है। किसान आंदोलन में पंजाब के किसानों के सभी श्रेणियों के जुझारूपन, लोकतांत्रिकता, सामूहिकता और अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध संघर्ष की एक झलक देखी जा चुकी है।पंजाब निश्चित तौर पर चल रही परंपरागत राजनीति से बदलाव का रास्ता तलाश रहा था।

दलित मुख्यमंत्री को आगे करने के बावजूद कांग्रेस अपनी सत्ता गंवा चुकी है तो इसके कारणों के लिए हमें भूतपूर्व कांग्रेसी पटियाला नरेश अमरेंद्र सिंह के साथ भाजपा  अकाली दल के खुले गठजोड़ को अवश्य देखना होगा।

आप ने जिस तरह की विजय हासिल की है, हालिया पंजाब के इतिहास में शायद ऐसा देखने को नहीं मिला था।
इस  पर विश्लेषकों की नजर अवश्य जा रही होगी कि भाजपा, अकाली दल और अमरिंदर सिंह ने मिलकर क्या कोई बड़ी राजनीतिक खेल राष्ट्रीय परिदृश्य से कांग्रेस को बाहर करने के लिए तो नहीं खेला है।

फासीवाद, उदारवादी जनतांत्रिक  राजनीतिक संस्थाओं के ध्वंस पर ही खड़ा होता है । साध ही राजनीतिक संस्थाओं की ढहती साख उसको  आगे बढ़ने का नया अवसर देती है ।

अपने इतिहास के सबसे बुरे वक्त के बावजूद कांग्रेस राष्ट्रीय फलक पर राजनीतिक दल के रूप में  फासीवादी राजनीति का मुकाबला करते हुए दिखने की कोशिश कर रही थी। लेकिन कांग्रेस की बुरी तरह पराजय राष्ट्रीय राजनीति से उसको बेदखल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी। आने वाले समय में  कांग्रेस की  स्थिति पर राजनीतिक विश्लेषक विचार-विमर्श करेंगे।

उत्तराखंड  भयानक प्राकृतिक त्रासदी, सरकार की अक्षमता,  बेरोजगारी और तराई क्षेत्र में पसरे गहरे कृषि संकट के बावजूद बीजेपी के पक्ष में समर्थन देता हुआ दिखा तो इसके पीछे कांग्रेस की आंतरिक कमजोरियों और बदलते हुए आर्थिक राजनीतिक संघर्षों में आगे बढ़कर कदम उठाने की उसकी कमजोरियों में निहित है। जहां, उसके क्षेत्रीय क्षत्रप एक बड़ी बाधा बने हुए हैं।

फासीवाद, धनबल और छोटे राज्य

भाजपा और संघ भारतीय राष्ट्र की आंतरिक कमजोरियों का दोहन करने और सामाजिक, धार्मिक, भौगोलिक भिन्नताओं और अंतर्विरोधों से खेलने में दक्ष हैं।

मणिपुर में यही खेल देखा गया। राष्ट्रीय अखंडता, एकता का माला जपते हुए भाजपा ने विद्रोही गुटों के साथ आंतरिक रिश्ते मजबूत किए हैं। चुनाव के मध्य में सोलह करोड़ विद्रोही गुटों को उपहार स्वरूप चुनावी शांति बनाए रखने के लिए आवंटित किए गए हैं। जो भविष्य  के बड़े खतरे के संकेत हैं। इसके बदले में  अलगाववादी संगठनों ने अदृश्य रुप में भाजपा को मणिपुर की सत्ता पर वापस लाने का कर्तव्य निभाया।

किसी विशाल क्षेत्रफल वाले संघात्मक राष्ट्र में फासीवाद के लिए छोटे राज्यों यानी प्रशासनिक इकाइयों का होना बहुत उपयोगी होता है। जिसे कारपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के धनबल और सत्ता बल से बहुत आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

अतीत में हमने देखा है कि छोटे राज्यों में भाजपा आसानी से सरकार बनाने में सफल  रही है। उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, मीजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, छत्तीसगढ़, झारखंड और  गोवा जैसे राज्यों की हालिया अतीत की घटनाएं इस बात को प्रमाणित करती हैं।

छोटे राज्यों के क्षेत्रीय दलों को सरलता से केंद्र की ताकत का प्रयोग कर पक्ष में किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश का महत्व भारतीय राजनीति में  सभी को पता है। जो राष्ट्रीय पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होती है, उसके लिए दिल्ली  पहुंचना सरल हो जाता है।

चुनाव परिणाम और उत्तर प्रदेश 

इसलिए 2022 के चुनाव का मुख्य रणक्षेत्र उत्तर प्रदेश को बनना ही था। जहां पहले से ही अयोध्या, काशी, मथुरा, कैराना, मुजफ्फरनगर और हिंदुत्व के प्रतीक भगवा मुख्यमंत्री का बुलडोजर काम कर रहा था । चारों दिशाओं से हिंदुत्ववादी ताकतों की गर्जना, हुंकार और आक्रामकता दिखाई दे रही थी

चुनाव की घोषणा के बाद लंबे समय से सरकार विरोधी आक्रोश (जिसे किसानों की राजनीतिक विजय से नया आवेग मिला था)  सड़कों पर दिखने लगा था। जो विकसित होकर जन मुद्दों के रूप में सरकार के विरोध में संघनित होने लगा था।

महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य की दुर्दशा, कानून व्यवस्था की  बदतर हालत और दलितों,  महिलाओं, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों पर सरकारी अमलों और भगवा गुंडों के हमले चुनाव का मुद्दा बन गये थे।

योगी आदित्यनाथ की उद्दंडता भरी भाषा, बॉडी लैंग्वेज और कानून की धज्जियां उड़ाते हुए इनकाउंटर और पुलिस राज्य में बदलते प्रदेश को ज्वालामुखी के मुहाने पर ला दिया था। जहां किसी भी समय जन संघर्ष के  विस्फोट की संभावनाएं मौजूद थीं।

गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश को हिंदुत्व की प्रयोगशाला में बदलकर राजनीतिक विमर्श अल्पसंख्यक और प्रगतिशील वैज्ञानिक मूल्यों के विरोध में केंद्रित कर दिये गये हैं।

प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सीधे हिंदुत्व के प्रतिनिधि के बतौर उत्तर प्रदेश में लगातार सक्रिय थे। ये लोग काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, अयोध्या में मंदिर बनाते और भगवा वस्त्रों में लिपटे हवन-पूजन करते हुए गंगा में डुबकी लगा रहे थे। विमर्श की भाषा हिंदुत्ववादी शैली और शिल्प में बदली जा चुकी थी।

चुनाव की घोषणा के बाद ज्योंही  तरल वातावरण मिला उत्तर प्रदेश में नागरिकों की सक्रियता सड़कों पर दिखने लगी और जनता के बुनियादी सवाल चुनाव का एजेंडा बनने लगे ।

विविधता मूलक समाज में विभिन्न राजनीतिक,  सामाजिक,  इथानिक समूह और आर्थिक वर्ग  सक्रिय रहते हैं। तेज होते लोकतांत्रिक संघर्षो के दौर में उनकी गतिविधियां भी तीव्र हो जाती हैं। इसलिए भारत जैसे देश में गठबंधनों, मोर्चा के बनने-बिगड़ने  की गति चुनाव के समय  तीव्र हो जाती है ।

भारतीय समाज वर्ण व्यवस्था आधारित समाज बना हुआ है। नागरिक समाज के निर्माण के ठहराव के दौर में जातियां अपने पुराने स्वरूप में न होते हुए भी सक्रिय राजनीतिक ईकाई में तब्दील कर दी गई हैं ।

पूंजी के विस्तार के साथ जातियों में  वर्गों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई । वर्चस्वशाली जातियों द्वारा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा करने के कारण वंचित रह गये जातियों के नये मध्यवर्गीय समूहों से सत्ता के लिए टकराव होना लाजमी है।

चूंकि नये  वर्गों में सामाजिक, राजनीतिक बराबरी की महत्वाकांक्षा  होना स्वाभाविक है। इसलिए, ये राजनीतिक सत्ता में अपनी हिस्सेदारी, भागीदारी के लिए आगे आये ।

उत्तर प्रदेश इस तरह की राजनीतिक समूहों के खेल का मैदान बना हुआ है। चुनावी पिच पर इन समूहों की भूमिका बहुत उन्नत स्तर पर देखने को मिली।

उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति धर्म और पहचान को केंद्रित कर विगत 30-32 वर्षों से संचालित हो रही है।

जब से सोशल इंजीनियरिंग की नयी टेक्नोलॉजी लोकतांत्रिक राजनीति में विकसित हुई । तब से जातियों के नेतृत्व की महत्वाकांक्षा बहुत बढ़ गयी। वे दबाव और सौदेबाजी के समूह से आगे बढ़कर सत्ता के खेल के खिलाड़ी बन के उभरे हैं।

लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता के अभाव और सत्ता में  हिस्सेदारी की विकृत राजनीतिक समझ के कारण अवसरवादी राजनीति का बेशर्मी भरा खेल उत्तर प्रदेश के देवभूमि में लम्बे समय से चल  रहा है ।

वर्षों से चली आ रही अवसरवादी त्रिकोणीय  राजनीति  हिंदुत्व-कारपोरेट गठजोड़ के लिए  सरल और सहज दुर्ग प्रमाणित हुई। जिस दुर्ग को ध्वस्त कर अमित शाह जैसा राजनीति और अपराध के गठजोड़ का माहिर भारतीय राजनीति का चाणक्य बन गया।

2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद जाति विभाजित समाज की विकृतियों, बीमारियों और लोकतंत्र विरोधी प्रवृत्तियों को चरम पर ले जाने का अवसर संघ-कारपोरेट गठजोड़ को मिल गया।

5 वर्षों में उत्तर प्रदेश को  गुजरात के नये  मॉडल में रूपांतरित किया जा चुका है । जिससे 2022 आते-आते उत्तर प्रदेश की राजनीति  दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गयी, जहां से उसे आगे ले जाना था।

2022 का चुनाव दो रणनीति पर खड़ा होकर लड़ा गया

एक, किसान, बेरोजगार, नौजवान-छात्र, मजदूर, दलित, अल्पसंख्यकों के लोकतांत्रिक और जीवन से जुड़े सवालों रोजगार, महंगाई, भ्रष्टाचार, भुखमरी, कृषि संकट आदि पर।

दूसरा, जातियों और सामाजिक समूहों के गठबंधन के आधार पर।

इन्हीं दो रणनीतियों द्वारा उत्तर प्रदेश में  भाजपा को  चुनवी चुनौती दी गयी।

किसान आंदोलन की उपलब्धियों ने उत्तर प्रदेश को एक नयी दिशा दे दी थी। पश्चिम उत्तर प्रदेश का सांप्रदायिक विभाजन लगभग नेपथ्य में जा चुका था।

यहां से चली आंदोलन की आंधी ने खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश और आमतौर पर संपूर्ण  प्रदेश के छात्रों-नौजवानों, मजदूरों, स्कीम वर्करों ने  भाजपा सरकार विरोधी आंदोलनों को नयी ऊंचाई दी। इसलिए राजनीति की दिशा, इबारत, परिभाषा व मुहावरा थोड़ा बदला।

चुनाव घोषणा के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी के भाजपा छोड़ने और सपा में जाने के बाद चुनाव और राजनीति की दिशा ही मुड़ गयी ।

संघ के समरसता और समन्वय की नीतियों के अनुसार अमित शाह द्वारा गढ़ी गयी भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग दरकती दिखी। जिसे लपक लेने में अखिलेश यादव ने तनिक भी देरी नहीं की।

इस कारण उत्तर प्रदेश के चुनाव की दिशा संघ द्वारा बिछायी गयी पुरानी बिसात पर वापस लौट गयी  ।

जनान्दोलन और सपा

प्रदेश में बन रहे जनजीवन के बुनियादी मुद्दे एक बार पुनः चुनाव का मुख्य एजेंडा बनते-बनते रह गये।

जीवन के लिए चल रहे कठिन, कठोर जन संघर्षों की लोकतांत्रिक  राजनीति के प्रति अगर सपा में प्रतिबद्धता होती तो वह गठबंधन की पुरानी राजनीतिक दिशा की तरफ न जाकर, जन आंदोलनों से उपजी राजनीतिक उर्जा से निर्मित एजेंडे को आगे बढ़ाती और संघर्षशील ताकतों को साथ लेकर विस्तारित गठबंधन की दिशा में आगे बढ़ती।

सरल सामाजिक विभाजनों, समीकरणों को साधते हुए आगे बढ़ना सपा की ऐतिहासिक मजबूरी व कमजोरी है। जिस कारण वह पुराने समीकरणों पर ही विश्वास कायम रखी। जिस कारण किसान आंदोलन की बड़ी उपलब्धियों को जाट, मुस्लिम, यादव, सैनी समीकरण तक सीमित कर दिया गया।

मध्य व पूर्वी उत्तर प्रदेश में छात्रों-नौजवानों के व्यापक आक्रोश को न देख कर मुस्लिम, यादव, कुशवाहा, चौहान, राजभर आदि जाति समीकरणों को ही वरीयता दी गयी।

यह सहज और सरल मार्ग था । इसके लिए  कठिन, कठोर परिश्रम और नयी राजनीति के एजेंडे पर पिच खड़ी करने की जरूरत नहीं थी ।अब इस समीकरण के परिणाम सामने आ गये हैं।

आधे से ज्यादा चुनाव गुजरने के बाद अखिलेश यादव ने किसानो के साथ छात्रों, नौजवानों, महिलाओं और कानून व्यवस्था के सवालों को भी संबोधित करना शुरू किया। यही नहीं पुरानी पेंशन का बड़ा सवाल खड़ा कर उन्होंने राजनीतिक संघर्ष  की स्टेरिंग अपने हाथ में लेने की कोशिश की।

लेकिन शायद तब तक देर हो चुकी थी और उनका यह सकारात्मक प्रयोग पूर्वांचल से बाहर बहुत प्रभाव नहीं दिखा पाया।

किसान आंदोलन के गुरुत्व केंद्र सहित तराई में भाजपा ने सपा के समीकरण को ध्वस्त करते हुए अधिकतम सीटों पर विजय हासिल कर ली ।वही बसपा के आधार को जीतते हुए उसनेे आगरा से लेकर बुंदेलखंड तक अपना विजय अभियान जारी रखा।

लखीमपुर, उन्नाव, हाथरस और फर्रुखाबाद सहित 20 जिलों  की सभी सीटों पर भाजपा की विजय ने किसान आंदोलन सहित सभी आंदोलनों की उपलब्धियों पर पानी फेर दिया है।

संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति 

पिछले आठ वर्षों में भाजपा ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को  धीरे-धीरे खोखला कर  उनकी विश्वसनीयता, स्वायत्तता को समाप्त कर दिया है।  संविधान कानून के  प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को  तिलांजलि दे दी गयी है । संसद, न्यायपालिका, ईडी, सीबीआई, रिजर्व बैंक, पुलिस, नौकरशाही का सांप्रदायिकीकरण और संघीकरण  पहले ही देखा जा चुका था।

इस चुनाव में लोकतंत्र के आवश्यक स्तंभ चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पूरी तरह धूल में मिल गयी।  हालांकि भाजपा सरकार आने के बाद ही यह क्रम शुरू हो गया था।

इस चुनाव में चुनाव आयोग ने लोकतांत्रिक, संवैधानिक नैतिकता को ताक पर रखकर हर तरह से भाजपा को मदद पहुंचाई और उसे बेहतर स्थिति में बने रहने की स्थितियां तैयार की।

जिस कारण 7 तारीख के बाद जनाक्रोश प्रदेश के कई इलाकों  में फूट पड़ा और  ईवीएम टैंपरिंग, चुनाव रिंगिंग के सवाल को लेकर लोग हजारों की तादात में सड़कों पर उतर आए । काउंटिंग स्थलों की घेराबंदी  करने लगे। कई जगह तो लगा कि स्थिति विस्फोटक हो जाएगी और टकराव अनियंत्रित हो जाएगा।

जिला निर्वाचन अधिकारियों की हठधर्मिता, निरंकुशता और भाजपा के प्रति प्रतिबद्धता ने जन आक्रोश का सृजन किया है। जो आने वाले समय में चुनाव का मुद्दा बन सकता है ।

चुनाव अभियान के दौरान भाजपा द्वारा चुनाव आचार संहिता का बार-बार उल्लंघन, मीडिया का खुला दुरुपयोग और नौकरशाही की खुली भाजपाई पक्षधरता को नजरअंदाज करते हुए विपक्ष की शिकायतों को चुनाव आयुक्त ने कहीं भी संज्ञान में नहीं लिया ।

मोदी सरकार द्वारा लाये गये इलेक्टोरल बांड ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। पूर्णतया अपारदर्शी किसी जांच और निगरानी के दायरे से बाहर चुनावी चंदा इकट्ठा करने की कानूनी सुरक्षा ने चुनाव में काले धन की भूमिका को बढ़ा दिया है।

खुलेआम वोटरों को खरीदने और प्रभावित करने में पूंजी की भूमिका बढ़ जाने से लोकतंत्र पर कारपोरेट नियंत्रण की पटकथा पूरी हो गयी  है।

पहचान की राजनीति और बसपा 

पहचान की राजनीति की सबसे बड़ी खिलाड़ी बसपा इस बार के चुनाव में कहीं नहीं दिखी। जिस समय भारत में कमजोर वर्गों पर कारपोरेट हिंदुत्व गठजोड़ का आक्रमण निरंतर जारी हो, मायावती की पार्टी का चुप रहना सामान्य विश्लेषक के समझ से बाहर है।

बसपा द्वारा प्रधान राजनीतिक विरोधी की शिनाख्त न कर पाना कांशीराम मार्का दलित बहुजन राजनीति की सीमा को उजागर करता है । इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा का वोट शेयर 13 % तक लुढ़क गया है और कारपोरेट पूंजी के केंद्रीकरण के दौर में  2022 तक आते-आते बहुजन से सर्वजन  की राजनीति ने दम तोड़ दिया है ।

उत्तर प्रदेश की विधानसभा में बसपा की उपस्थिति एक बड़े कांट्रैक्टर तक सीमित हो गयी है।
स्वयं मायावती जी ने स्वीकार किया दलित वोट भाजपा के पक्ष में सपा के अत्याचारों के कारण चला गया। यह अधूरा सच है। वस्तुतः लाभार्थी की जिस श्रेणी को बार-बार प्रधानमंत्री  चिन्हित कर रहे थे। वही बसपा का मूल जनाधार था।

संघ-भाजपा ने उसे लाभार्थी की श्रेणी में ले जाकर अपनी तरफ खींच लिया। जाति और पहचान की राजनीति पर धन की विजय।

सपा के कार्यकाल के समय के खौफ ने भी दलित वोटरों को भाजपा की तरफ जाने में एक भूमिका निभायी।

दलित मतदाताओं के भाजपा-संघ की तरफ स्थानांतरण के भारतीय राजनीति में दूरगामी प्रभाव होने जा रहे हैं।
अतीत में पिछड़ी जातियों से निकले फायर ब्रांड नेताओं  ने संघ के विध्वंसक एजेंडे को आगे बढ़ाया था। 1990 के दौर में ओबीसी पृष्ठभूमि के नेताओं को थोड़ा याद कीजिए। बाबरी मस्जिद के विध्वंस से गुजरात नरसंहार तक।

रोटी, रोजगार, नौकरी और आरक्षण पर हो रहे हमले के कारण उन्नत हो रही राजनीतिक चेतना दलित राजनीति को रेडिकल दिशा की तरफ ले जाएगी। निश्चय ही भविष्य में दलित राजनीति के नये मुद्दे, नारे, चेहरे, समीकरण व संयोजन आकार लेंगे।

2022 में सपा ने जन आंदोलनों की ताकतों और जातीय समीकरणों के साधने के क्रम में अपनी सीटों को काफी बढ़ा लिया है । उसके मतों में तेरह प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि और सीटों में ढाई गुना का उछाल आया। लेकिन सरकार न बन पाने के कारण समाजवादी पार्टी के जनाधार के शासक वर्गीय समूहों में निराशा और कुंठा बढ़ेगी।

जिससे भविष्य में समाजवादी पार्टी के जनाधार में भी नये तरह के परिवर्तन होंगे और वहां राजनीति की नई दिशाएं निश्चित ही उभर कर सामने आएगी। जो भविष्य के लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए नयी संपदा होगी।

भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग ने जाति आधारित पार्टियों को छोटा पार्टनर बनाकर पूंजी के अधीन ला दिया है।
कारपोरेट पूंजी नियंत्रित राजनीति, नैतिकता, आदर्श, जन पक्षधरता और सामाजिक जन पक्षधरता से  मुक्त होती है। जिसका लक्षण  कम संख्या वाली जातियों के नेताओं में बहुत साफ-साफ परिलक्षित हो रहा है। इस चुनाव में प्रत्याशियों और मतदाताओं की खरीद-फरोख्त का व्यापार उन्नत स्तर पर रहा।

भाजपा के पास पूंजी का अपार भंडार है । जिससे चुनावी राजनीति में उसकी बरतरी  सुनिश्चित हो जाती है। कारपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ में चुनाव का अपहरण कर लेने की क्षमता होती है ।

भारतीय लोकतंत्र की संस्थाएं इतनी कमजोर और भुरभुरी होंगी कि इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक पार करते ही पूंजी की दासता के पक्ष में जा खड़ी होंगी । यह शायद भारत में लोकतंत्र की आधारशिला रखने वालों के  चेतना में नहीं रहा होगा।

2022 के चुनाव परिणाम ने राजनीति के परंपरागत दिशा और चरित्र को बदल दिया है। भारतीय समाज और लोकतंत्र पिछले 30 वर्षों के राजनीतिक विमर्श से बाहर आ चुका है। उदारीकृत समाज  आधुनिक टेक्नोलॉजी के उन्नत होते दौर में प्रवेश कर रहा है।

जहां व्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों की संवैधानिक मान्यता,  नागरिक और व्यक्ति की निजता सब तकनीकी आंख के दायरे में खींच लायी गयी है ।

सत्ता के शीर्ष पर बैठे शासक किसी भी नागरिक के जीवन में हस्तक्षेप कर उसकी संवैधानिक सुरक्षा का अपहरण कर  नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों को निरस्त कर सकते हैं। उसकी निजी सामाजिक राजनीतक योजना  पर निगरानी रख सकते  हैं ।

इसलिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहचान और जाति आधारित राजनीतिक पार्टियों, गठबंधनों के लिए भविष्य के  रास्ते अंधकार भरे हैं। उन्हें आधुनिक तकनीकी विकास और उदारीकरण के बाद बने समाज के नये मूल्यों और आदर्शों को समझने की जरूरत है ।

साथ ही उदारीकरण के बाद बने वैश्विक परिदृश्य में लोकतंत्र की बदलती और सिकुड़ती हुई सीमाओं को भी समझने की  जरूरत है। आम तौर पर विश्व में लोकतंत्र  पर फासीवादी खतरों की आहट सुनाई दे रही है। भारत  में संघात्मक गणतंत्र  के लिए यह खतरा यथार्थ  बन गया है।

उदारीकरण ने श्रम और पूंजी के अंतर्विरोध को चरम पर ला दिया है।
इस नयी अनुभूति पर आधारित भविष्य की  राजनीतिक दिशा का निर्धारण करना होगा ।

एक तरफ पूंजी के केंद्रीकरण, दूसरी तरफ श्रम के मध्य युगीन शोषण के बीच में झूलता हुआ भारतीय समाज अब अपने बुनियादी जीवन के सवालों की तरफ लौट रहा है।

उदारीकरण के बाद बनी अर्थव्यवस्था ने श्रमिकों के अधिकार को कुचलना शुरू कर दिया है।

इसलिए ये समूह जाति, धर्म की राजनीति के प्रभा मंडल से निकलकर रोटी, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की जद्दोजहद में उतर रहे हैं । जिसका संकेत पांच राज्यों के चुनावों में छात्रों-नौजवानों, महिलाओं, किसानों की सक्रिय भागीदारी से मिल चुका है।

लोकतंत्र पर फासीवाद की जकड़न के खिलाफ जन संघर्षों की लंबी कतारें  कच्चे-पक्के रास्तों, सड़कों, खेतों-खलिहानों, कारखानों, विश्वविद्यालयों में दिखने लगी हैं ।

उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे हिंदुत्व कारपोरेट गठजोड़ की राजनीति परवान चढ़ेगी और हिंदूवादी प्रतीकों, उपासना पद्धतियों, देवी -देवताओं, तीर्थ स्थलों को भारत की मिली-जुली संस्कृतियों पर, संघी दबाव में थोपा जाएगा  तो, विरोध बढ़ेंगे।

हिंदुत्व के सांस्कृतिक एजेंडे को कानूनी तौर पर लागू किया जाएगा  तो, भारत में आंतरिक टकराव बढ़ेगा।
इससे उप महादेश भारत के संघीय चरित्र पर गहरी चोट होगी। यह चोट भारतीय लोकतंत्र और भारत की एकता के लिए खतरनाक परिस्थिति पैदा करेगी ।

उत्तर प्रदेश की विजय संघ और भाजपा को उन्मत्त और आक्रामक बनाएगा। वे अपने हिंदुत्ववादी एजेंडा को भारत के अन्य क्षेत्रों में भाषाओं, संस्कृतियों, विचारों पर थोपने की  कोशिश करेंगे।

इसके अलावा आक्रामक ढंग से  राज्य की शक्तियों का केंद्रीकरण केंद्र सरकार के हाथ में जाएगा l राज्यों में भाजपा-संघ का दखल बढ़ेगा, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन और तनाव में वृद्धि होगी और भारत के गणतांत्रिक स्वरूप को भारी क्षति पहुंचेगी।

वाम जनवादी शक्तियों की भूमिका 

संघात्मक भारत के चरित्र की रक्षा का सवाल आने वाले समय में लोकतंत्र की लड़ाई का बड़ा मुद्दा बन सकता है।

हाल में चले जनता के संघर्षों के अनुभव पर खड़ा होकर ही आने वाले समय में हमें  भविष्य की योजना और जन राजनीति की दिशा तैयार करना है।

2022 के चुनाव परिणाम के बाद बनी विपरीत परिस्थितियों  के बावजूद इसके अंदर छिपे संकेत बहुत स्पष्ट हैं, कि भविष्य में जनवादी और लोकतांत्रिक राजनीति के लिए विशाल मैदान खाली होने जा रहा है।

वाम जनवादी ताकतों ने इस चुनाव में भाजपा हटाओ, देश बचाओ नारे के साथ सक्रिय भागीदारी निभायी । किसान आंदोलन और छात्रों, युवाओं, मजदूरों के सवालों को आगे करते हुए चुनाव का राजनीतिक एजेंडा  बनाने की कोशिश की।

लेकिन भाजपा के आक्रामक सांप्रदायिक  चुनावी अभियान के चलते चुनाव के दो ध्रुवी हो जाने से उन्हें मतों के स्तर पर अच्छी सफलता नहीं मिल सकी। फिर भी उनके एजेंडे, नारों और भाजपा को दंडित करो के अभियान को व्यापक जनसमर्थन मिला है।

इसलिए साहस के साथ आगे के राजनीतिक संघर्ष के मैदान में कूदना होगा और अपने एजेंडे और नीतियों को सूत्रबध्द करना होगा।  तभी जनता के वास्तविक  मोर्चे का निर्माण और संघर्षरत ताकतों का बड़ा महाज बन सकेगा।
हाल में संपन्न हुए चुनाव का यही वास्तविक संदेश है।

(जयप्रकाश नारायण मार्क्सवादी चिंतक तथा अखिल भारतीय किसान महासभा की उत्तर प्रदेश इकाई के प्रांतीय अध्यक्ष हैं)

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