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नंदकिशोर नवल : हिन्दी आलोचना की एक असमाप्त यात्रा 

(स्कैच-भास्कर रौशन )

 

शब्दों की सक्रियता परखने वाली आलोचना से कृति से साक्षात्कार की ‘आस्वादपरक आलोचना’ तक की लम्बी यात्रा करनेवाले हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक डॉक्टर नन्दकिशोर नवल ने गत बारह मई को पटने में अपनी जीवन नैया विसर्जित कर दी. नैया विसर्जित करने के मुहावरे का इस्तेमाल उन्होंने एक चर्चित साक्षात्कार में अपनी आलोचकीय यात्रा के सन्दर्भ में किया था.

नवल जी हिन्दी की साहित्यिक सम्वेदना और सुरुचि को उत्पीडित साधारण-जन के संघर्ष की जरूरतों के मुताबिक़ ढालने वाले आलोचकों में अग्रणी रहे हैं.  संघर्ष के लिए सुरुचि का और सुरुचि के लिए संघर्ष का परित्याग उन्हें मंजूर न था.

हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना की आतंरिक बहस में वे खुद को स्थूल समाजशास्त्रीय धारा के बर-अक्स उस गतिशील सामाजिक-सौन्दर्यशास्त्रीय धारा से सम्बद्ध करते रहे हैं, जिससे  मुक्तिबोध और नामवर सिंह सरीखे मूर्धन्यों के नाम जुड़े हुए हैं.

इसके बावज़ूद, अपने कर्ममय जीवन के उतरार्ध में वे ‘मार्क्सवादी आलोचना’ और ‘प्रगतिशील साहित्य’ के प्रकल्प से खासे असहज महसूस करने लगे थे. उन्हें यकीन हो चला था कि यह प्रकल्प एक ऐसी आलोचना को बढ़ावा देता है, जो रचना से विच्छिन्न होकर महज कुछ वैचारिक सरलीकरणों के आधार पर चल रही है .

मार्क्सवादी आलोचना के परिचित दायरों में इन सरलीकरणों के सहारे चलने वाली आलोचना की कमी सचमुच नहीं थी,  लेकिन प्रेमचंद और मुक्तिबोध के उन जैसे अध्येता से बेहतर कौन जानता था कि उसका  प्रगतिशील आन्दोलन की समृद्ध विरासत से कुछ लेना-देना न था ?

सन दो हज़ार तीन में आई ‘ हिन्दी साहित्यशास्त्र ’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक के सम्पादक के तौर पर  वे साहित्य को न केवल राजनीति के आगे चलने वाली प्रेमचंदीय मशाल के रूप में मान्यता देते हैं , बल्कि अज्ञेय सरीखे राजनीति-विक्षुब्ध लेखकों के ‘ अमूर्त मानवतावाद ’ का जोरदार खंडन भी करते हैं.

इसी प्रसंग में वे किसी विद्वान् के इस कथन की याद दिलाते हैं कि मानवता को प्यार करने की बात वही करते हैं, जो किसी को प्यार नहीं करते.

इसी पुस्तक के सम्पादकीय में वे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उस लेख को भी अपना भरपूर समर्थन देते हैं, जिसका शीर्षक है- ‘मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है.’ इस लेख में साहित्य के लक्ष्य के रूप में द्विवेदी जी ने उस पीड़ित मानवता की ओर इशारा किया है, जिसे लोग ‘ चमार-धीवर-कोरी-कुम्हार’ के रूप में पहचानते हैं.

नवल जी अक्सर आलोचना में उस नजरिए के हामी रहे हैं, जो साहित्य को जीवन-संग्राम की रणभूमि के रूप में देखता आया है.

उनके सामने यह भी स्पष्ट रहा आया है कि इस जीवन संग्राम में साहित्य अपनी सुन्दरता हमेशा उत्पीडित के पक्ष में अपनी भागीदारी से हासिल करता है.

इसी सम्पादकीय में वे नामवर सिंह के निबंध ‘साहित्य की मुक्ति या कछुआ धर्म‘ के हवाले से वे  साहित्य की शुद्धता और स्वायत्तता के हामियों की भी अच्च्छी खबर लेते हैं. इस निबंध में नामवर सिंह ने तुलसीदास की पंक्ति “मुक्ति निरादर भगति लुभाने” के सहारे यह स्थापित किया था कि जैसे जीवन में वैसे ही कविता में मुक्ति बिना भक्ति (प्रतिबद्धता) के नहीं मिल सकती.

इसी निबंध में नवल जी ने तुलसीदास को हिन्दी के अपने साहित्य-शास्त्र का पहला प्रस्तावक भी बताया  है. लिखा है – “ तुलसीदास ने सम्पूर्ण भारतीय काव्यशास्त्र को दरकिनार करते हुए कविता की भाषा ( ‘का भाखा का संन्स्कृत भाव चाहिए सांच’ ) और उसके प्रयोजन ( ‘सुरसरी सम सब कंह हित होई’ ) को ही नए ढंग से परिभाषित नहीं किया है, उसकी नई रचना -प्रक्रिया भी बतलाई (‘जो बरसई बर बारि विचारू’).”

जाहिर है, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह की तरह नवल जी भी किसी समय मार्क्सवादी सौन्दर्य -दृष्टि के पक्ष में  तुलसीदास का इस्तेमाल करने की कला में पारंगत थे. आगे चलकर, अपने आलोचकीय जीवन के अंतिम चरण में, जब उन्होंने ‘तुलसीदास’ पुस्तक लिखी, तब उन्होंने नौजवानों की आलोचना की, जो सिर्फ़ वर्णाश्रम-समर्थन के कारण तुलसीदास को नापसंद करते हैं.

चंद प्रतिक्रियावादी विचारों के बावजूद कोई बड़ा कवि या लेखक महत्त्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन तब क्या ‘शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध जैसे कवि एक खास विचारधारा की पक्षधरता की जकड़न ’ के कारण कम महत्वपूर्ण हो जाते हैं ? यह बात नवल जी ने अपने ७५ वें जन्मदिन पर ‘सत्याग्रह’ को दी गए एक साक्षात्कार में कही थी .

इसी साक्षात्कार में उन्होंने वर्ण-व्यवस्था पर भी इस ढंग से विचार करने की चुनौती दी थी कि वो अपने समय के अनुसार सही थी या नहीं !

इससे स्पष्ट है कि मार्क्सवादी आलोचना में सरलीकरण की प्रवृत्ति से उपजा असंतोष खुद मार्क्सवादी दृष्टि से असहमति में बदलता हुआ इस विचार तक जा पहुंचा था कि वर्णाश्रम धर्म भी किसी जमाने के लिए उपयोगी वस्तु रही हो सकती है.

पाठ-आधारित आलोचना के मुरीद रहे नवल जी के लिए रचना में निहित विचारधारा एक ऐसी गंभीर चुनौती थी, जिससे वे जीवन भर जूझते रहे.

क्या तुलसीदास की कविता का ‘आस्वाद’ लेने के लिए उनकी विचारधारा को परे कर देना चाहिए और मुक्तिबोध या नागार्जुन की कृतियों  का साक्षात्कार करते समय उनकी विचारधारा की कथित  ‘ जकडन ’ को खोलने पर विशेष ध्यान देना चाहिए ?

नवल जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनके इन अंतर्विरोधों से कतरा कर निकल जाना ठीक न होगा, क्योंकि वे स्वयं अपने विचारों के इस बदलाव से कभी कतराए नहीं , न उसे छुपाने की कोशिश की.

नब्बे के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया भर के अनेक मार्क्सवादी विद्वानों का मार्क्सवाद से मोहभंग हुआ. इनमें सबसे बड़ी संख्या उन शीतयुद्धकालीन मार्क्सवादी बौद्धिकों की थी, जिनकी  राजनैतिक और वैचारिक प्रेरणाओं के केंद्र में सोवियत संघ की उपस्थिति तब स्वाभाविक लगती थी.

अस्सी के दशक में भारत में प्रगतिशील लेखक संघ का जो ढांचा बचा हुआ था, उसकी कमोबेश यही स्थिति थी. नवल जी उन्ही दिनों बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के आधार स्तम्भों में थे.

सोवियत संघ पर उनकी आस्था उन दिनों इतनी गहरी थी कि सोवियत संघ की कुछ नीतियों की आलोचना करने के कारण प्रसिद्द प्रगतिवादी कवि नागार्जुन को भी उनकी राजनीतिक आलोचना का सामना करना पड़ा.

विडम्बना यह कि सोवियत संघ में राजनीतिक लाइन के हर बदलाव का सामान उत्साह से स्वागत करने वाला प्रगतिशील लेखक संघ भी नागार्जुन  जैसे सर्वमान्य प्रगतिशील कवि की इस सार्वजनिक आलोचना को सहन न कर सका और उन्हें संगठन से बाहर कर दिया गया.

हालांकि नवल जी ने मार्क्सवाद से अपने ‘ मोहभंग ’ के लिए इन घटनाओं को जिम्मेदार नहीं ठहराया है, लेकिन ये हिन्दी के मार्क्सवादी इदारे के भीतर के अन्तर्विरोधों की ओर हमारा ध्यानं खींचती हैं.

मार्क्सवाद की ‘जकड़न’ से मुक्त होने के बाद उन्होंने रचना को सौन्दर्य की एक ‘अखंड’ इकाई मानकर उसका आस्वाद्परक साक्षात्कार करने की रीति अपनाई. यह रीति रचना के भीतरी तनावों, द्वन्द्वों और संघर्षों  के बजाय उसकी ‘मूल सम्वेदना’ की खोज पर ध्यान केन्द्रित करती है.

इस रीति से ‘ अँधेरे में ’ फासीवाद का एक राजनीतिक आख्यान और ‘राम की शक्तिपूजा’ शुद्ध दाम्पत्य-प्रेम का एक गीत बन कर रह जाता है. इन दोनों कविताओं में आत्मसंघर्ष की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, जो लगभग अदेखी रह जाती है .

इस सब के बावजूद मुक्तिबोध की कविताओं में प्रेम-सम्वेदना की क्रांतिकारी भूमिका और निराला के करुण गीतों में भी ‘अपराजेयता’ के बोध की पहचान उनके आलोचना-कर्म की मौलिक उपलब्धियां हैं.

नवल जी हिन्दी आलोचना के कर्म-योगी रहे हैं. उन्होंने विस्तृत अकादमिक-आलोचनात्मक कार्य किया है , जो कि विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और साहित्यिको के अलावा हिन्दी के आम पाठको के लिए भी बहुत काम का है .

उनके द्वारा सम्पादित निराला रचनावली हिन्दी साहित्य की अनमोल थाती है. उनकी आलोचना पुस्तकों की सूची बहुत लम्बी हैं, जिनमें से कुछ सर्वाधिक चर्चित नाम इस प्रकार हैं- हिन्दी आलोचना का विकास, प्रेमचंद का सौदर्य-शास्त्र, , शब्द जहाँ सक्रिय हैं, , समकालीन काव्य-यात्रा, मुक्तिबोध-ज्ञान और संवेदना, निराला और मुक्तिबोध: चार लंबी कविताएँ, निराला: कृति से साक्षात्कार, कविता के आर-पार, कविता: पहचान का संकट, उत्तर-छायावाद और रामगोपाल शर्मा ‘रूद्र’, मैथिलीशरण, तुलसीदास, दिनकर, आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास, सूरदास और रीतिकाव्य.

इनके अलावा दिनकर रचनावली और मैथिलीशरण गुप्त संचयिता का सम्पादन भी उन्होंने किया. रामगोपाल शर्मा रुद्र , राम इकबाल सिंह ‘राकेश’ और रामजीवन शर्मा ‘जीवन’ की कविताओं का भी.

वे एक सिद्ध सम्पादक थे . ‘ध्वजभंग’ , ‘सिर्फ़’, ‘धरातल,’ ‘उत्तरशती,’ ‘आलोचना’ और ‘कसौटी’ वे पत्रिकाएँ हैं , जिनका उन्होंने समय समय पर सम्पादन किया और इन सभी ने समय पर अपनी छाप छोडी है .

आलोचक, सम्पादक, शिक्षक, संगठनकर्ता – हर रूप में नवल जी से सीखने के लिए बहुत कुछ है . इनमें सबसे ज़्यादा मूल्यवान है आलोचना और बहस-मुबाहिसे की संस्कृति से उनका अथाह प्रेम और विचार की स्वतंत्रता के लिए कोई भी कीमत चुकाने की उनकी आजीवन तत्परता.

 

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