Tuesday, May 17, 2022
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भारतीय फासीवाद, पांच राज्यों का चुनाव और दलित राजनीति की जटिलता- दो

जयप्रकाश नारायण 

कारपोरेट हिंदुत्व गठजोड़ की ताकत से 2014 में मोदी के नेतृत्व में केन्द्र में संघ-भाजपा की  सरकार बनी। भाजपा सरकार बनते ही  कमजोर वर्गों पर हमले बढ़ गये। इन हमलों की जद में सबसे ज्यादा दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज के लोग आये। दलितों पर हमले का चरित्र सामंती, जातिवादी  के साथ आर्थिक और सामाजिक भी था।
भाजपा और संघ के नैरेटिव में निम्नलिखित  तत्व महत्वपूर्ण रहे हैं-
पहला, हिंदू समाज की सामाजिक एकता यानी जाति व्यवस्था को कायम रखना।
दूसरा, कृषि उपयोगी पशु गाय को माता की श्रेणी में ले जाकर धार्मिक भावनाओं से जोड़ देना।

तीसरा, हिंदू देवी-देवताओं को राष्ट्र के केंद्रीय विचार-विमर्श में लाना। जिससे हिंदू राष्ट्र का आभास दिया जा सके।

हम दलितों पर हमले की घटनाएं तीन संदर्भों पर खासतौर से देखते हैं। पहला, प्रेम विवाहों के कारण।  दूसरा, दलितों के समाज में बराबरी के साथ सर उठा कर खड़ा होने या जीने के सवाल पर। तीसरा, उनके खान-पान भोजन और कारोबार के सवाल पर।

इस संदर्भ में  कुछ घटनाओं की चर्चा आवश्यक है।

गुजरात में मरी हुई गाय का चमड़ा छीलने के कारण संघ द्वारा तैयार किए गये गो रक्षक दलों द्वारा दलितों को बांधकर पीटते हुए चमड़ी उधेड़ दी गयी। जिससे गुजरात में दलित समाज आक्रोशित और आंदोलित हुआ। इस घटना ने  हिंदुत्व के लौह जबड़े में फंसे दलितों में नये जागरण को जन्म दिया। जिससे साहसिक आंदोलनकारी नेतृत्व उभरा। गांधीनगर से ऊना तक की पदयात्रा के क्रम में दलित मुस्लिम एकता का एक नया मॉडल दिखायी दिया।

इस आंदोलन ने जमीन आवास और रोजगार के सवाल को अपना एजेंडा बनाया। जिससे उम्मीद जगी कि गुजरात सहित शेष भारत में दलित आंदोलन के बीच से मुद्दा आधारित  रेडिकल धारा आगे बढ़ेगी।

मोदी के नेतृत्व में गुजरात हिंदुत्व की सबसे जटिल प्रयोगशाला है। इसलिए इस तरह के आंदोलन को बहुत दूर तक ले जाने में जटिल संकट से गुजरना था। आंदोलन की सर्वोच्च उपलब्धि थी जिग्नेश मेवानी जैसा एक  नौजवान नेतृत्व का उभरना। गुजरात में नागरिक समाज और जनवादी आंदोलनों का आधार फासीवादी सरकार से लड़ते हुए अभी भी व्यापक नहीं हो पाया है।

इसलिए इस आंदोलन ने कांग्रेस को  पुनर्जीवन तो दिया। लेकिन, सत्ता के खेल का कड़ा मुकाबला करने के बावजूद आंदोलन की धारावाहिकता नहीं बचायी जा सकी। दलित आंदोलन के संभावनामय भविष्य के रहते हुए भी ( जिसे विकसित करना था)  जिग्नेश मेवानी को अंततोगत्वा कांग्रेस के साथ खड़ा हो जाना पड़ा।

दलितों में शिक्षा और सामाजिक चेतना के प्रसार से वर्णवादी समाज बहुत घबराता है। इसलिए शिक्षित और शिक्षा पा रहे छात्रों, नौजवानों पर फासिस्ट शक्तियों के हमले लगातार चलते रहते हैं।

मोदी सरकार बनने के बाद हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला जैसे मेधावी छात्र को आत्महत्या करनी पड़ी। जो एक सांस्थानिक हत्या थी।

रोहित की आत्महत्या से छात्रों, नौजवानों, दलितों और नागरिक समाज में आक्रोश का जन्म हुआ। जिस कारण हैदराबाद से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, जामिया और जादवपुर यूनिवर्सिटी तक छात्र नौजवान आंदोलन फैल गया। जहां  पहले से ही यूजीसी की शिक्षा विरोधी नीतियों के खिलाफ आंदोलन चल रहा था।

छात्रों, युवाओं के आंदोलन ने पहली बार मोदी सरकार को सशक्त चुनौती दी। जिससे संघ-भाजपा सरकार द्वारा जेएनयू, जामिया, अलीगढ़ को केंद्रित करते हुए वैचारिक और प्रशासनिक दमन तेज हो गया।

छात्रों युवाओं पर हमले के प्रतिरोध के क्रम में भगत सिंह, अंबेडकर के सपनों के भारत के नारे ने एकता का नया मंच तैयार किया। जिसने आंदोलन में नयी वैचारिकी के साथ ऊर्जा और आवेश पैदा किया था।

आंदोलन के वेग ने दलित और वाम क्रांतिकारी छात्रों के बीच में एकता के नये सूत्र पैदा किया। जो भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए सुनहरा संकेत है।

दलित और वाम क्रांतिकारी छात्रों की आंदोलनात्मक वैचारिक एकता से परंपरागत दलित नेतृत्व को सचेत कर दिया है। इसलिए दलित नेताओं ने प्रतीकात्मक समर्थन से ज्यादा आगे जाने की कोई जरूरत नहीं समझी। बल्कि,  वह दमन के मौन समर्थक बने रहे।

उ.प्र. में  मुजफ्फरनगर के आसपास के क्षेत्रों में सामंती वर्चस्व और उत्पीड़न के खिलाफ दलित नौजवानों की एक नयी पीढ़ी सामने आयी। जो दलित समाज में शिक्षा के साथ  सामंती हमलों के खिलाफ प्रतिरोध के लिए शैक्षणिक प्रयास चला रही थी। एक विद्यालय में दलित छात्रों के साथ भेदभाव के खिलाफ  भीम आर्मी ने आंदोलन शुरू किया। जिस पर राजपूत जाति के दबंगों ने हमला किया। दलितों के पक्ष में खड़े होने की जगह‌ योगी सरकार ने सवर्ण-सामंती वर्चस्व को कायम रखने के लिए नौजवानों पर  दमन तेज कर किया।

शिक्षा के लिए अभियान  चलाने वाले प्रमुख कार्यकर्ताओं में चंद्रशेखर आजाद रावण को निवारक नजरबंदी कानूनों में कैद कर दिया गया। उन पर जुल्म ढाया गया। लेकिन इस जुल्म से नौजवानों की आंदोलनकारी क्षमता, जन प्रतिबद्धता और मजबूत हुई।

इस घटना के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित नौजवानों में आत्म सम्मान, शिक्षा, रोजगार को लेकर आंदोलनात्मक उभार आ चुका था। चंद्रशेखर रावण उसके आईकन बन गये। इन युवाओं की आंदोलनात्मक गतिविधियों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों में भी बदलाव ला दिया।

2013 के मुस्लिम विरोधी दंगों से अलगाव में पड़े मुस्लिमों और दलित समाज के साथ संबंध में  बदलाव शुरू हुआ। जिससे आगे चलकर दलित-मुस्लिम एकता का नया प्लेटफार्म तैयार हुआ।

जामा मस्जिद में चंद्रशेखर का संविधान लेकर खड़ा होना और सीएए-विरोधी आंदोलन की  मजबूत आवाज बनना एक नया विकास था।इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील समाज में बदलाव आना शुरू हुआ।

आगे चलकर चंद्रशेखर रावण ने आजाद समाज पार्टी का गठन किया।  लोकतांत्रिक मूल्यों और समाज परिवर्तन के मुकम्मल वैचारिक, व्यावहारिक प्रतिबद्धता और जन पक्षधर एजेंडे के अभाव के कारण शीघ्र ही वे  समझौतावादी सियासत की दिशा में आगे बढ़ गये हैं।

अब वह प्रतीकात्मक विरोध के एक मॉडल में सीमित होते जा रहे हैं। कभी ऐसा लगता था, कि उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर रावण नये तरह के दलित आंदोलन के प्रणेता बनाएंगे जो बसपा के समझौतावादी और सत्ता केंद्रित राजनीति की काट पेश करते हुए रेडिकल दलित राजनीति का दिशा निर्देशक होंगे। लेकिन 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव तक आते-आते उसकी संभावना क्षीण हो गयी है।

हिंदी क्षेत्र में बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में वाम क्रांतिकारी धारा के नेतृत्व में दलितों, कमजोर वर्गों के बुनियादी सवालों पर संघर्ष लंबे समय से चल रहा है। बिहार के आंदोलन की बहुत सारी उपलब्धियां हैं। जो सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों तक फैली हुई है। जिसने सृजन-संघर्ष और समाज में नये सपने और संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं। जिससे समाज में हाशिए की सामाजिक शक्तियां मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी है।

सामंती वर्चस्व से लड़ते लंपट, निजी, हत्यारी सेनाओं से टकराते हुए  लोकतांत्रिक मूल्यों और संघर्षों की नयी-नयी दिशाओं का सृजन करते हुए आज हिंदुत्व कारपोरेट गठजोड़ के उभार के दौर में आंदोलन नयी ऊंचाई पर पहुंचा है।

अस्मितादीवादी राजनीति के उभार के दौर में आक्रामक  सवर्ण वर्चस्ववादी सामाजिक विचारों से लड़ते हुए दलितों, कमजोर वर्गों को नयी राजनीतिक शक्ति के रूप में खड़ा किया है। यह धारा एक-एक इंच लोकतांत्रिक जगह को छीनते हुए आगे बढ़ रही है। गरीब-गुरबों की जनबंदी, गोलबंदी का बिहार मॉडल दलितों सहित समग्र मेहनतकश वर्ग के जनतंत्र और जीवन के सभी सवालों को समेटे हुए भारत के लोकतंत्र के लिए विराट संभावनाए लिये हुए है।

आज संघर्ष का यह मॉडल सड़क से लेकर संसद तक दलितों, कमजोर वर्गों की आवाज बनता जा रहा है। भारत के लोकतांत्रिक और दलित आंदोलन का दुर्भाग्य है, कि इस आंदोलन की सकारात्मक उपलब्धियों से सीखने की जगह वे इससे दूरी बनाए रखते हैं।

जबकि दलितों के आंदोलन के बिहार माॅडल के अंदर फासीवाद और वर्चस्ववादी हिंदुत्व-कारपोरेट गठजोड़ के खिलाफ लड़ने की पर्याप्त ऊर्जा मौजूद है।

बिहार के कमजोर वर्गों के आंदोलन से पहले जितने भी दलित अस्मितावादी आंदोलन चले हैं, वह मूलतः मध्यवर्गीय  दायरे के अंदर ही रहे हैं। इसलिए वे अपनी वर्गीय सीमा के बंदी बने रहे। पहचान और अस्मिता वाली राजनीतिक धारा ने आरक्षण, सम्मान और सत्ता में भागीदारी  से आगे जाकर रोटी, रोजी, आवास, भूमि के सवाल को संबोधित करने से अपने को अलग रखा। भूमि सुधार जैसे तीक्ष्ण अंतर्विरोध वाले सवालों से तो कभी उन्होंने अपने को जोड़ा ही नहीं।
इसीलिए  उत्तर प्रदेश सहित अन्य जगहों के दलित आंदोलन और पार्टियां अग्रगति की एक मंजिल के बाद पूंजीवादी, सामंती राजनीति के सत्तावादी खेल का शिकार बनकर लोकतांत्रिक आंदोलन के लिये अप्रासंगिक हो कर अपना आवेग खो बैठी। आरपीआई, बसपा, जनता दल, जस्टिस पार्टी, दलित पैंथर, शोषित समाज दल सहित अनेक दलितवादी राजनीतिक दल बने थे। लेकिन वह सत्ता के खेल से ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके। आज के दौर में वे सौदेबाजी के अलावा कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं हैं।
दक्षिण भारत के दलित आंदोलन से  उत्तर भारत के दलित और अस्मितावादी आंदोलन में गुणात्मक फर्क है। वहां सामाजिक सुधारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता वाले आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। दक्षिण भारत के दलित आंदोलन में जीवन के सभी सवाल समाहित रहते रहे हैं ।दलित पैंथर ने एक दौर में भूमि सुधार और रोटी, रोजगार, मजदूर आंदोलन के  सवाल उठाये थे।
कर्नाटक, महाराष्ट्र यहां तक कि तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश तक दलित, आदिवासी आंदोलनों की एक समृद्ध परंपरा रही है। जिनकी जनतांत्रिक प्रतिबद्धता असंदिग्ध थी।वहां मजदूरों और गरीब भूमिहीन किसानों के सवाल भी दलित और अस्मितावादी आंदोलन के अंदर शामिल रहे हैं।
महाराष्ट्र के वाम क्रांतिकारी आंदोलनों के साथ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर से लेकर नामदेव ढसाल और राजा ढाले तक के यहां सकारात्मक नजरिया देखने को मिलता है। वहां रोटी, रोजी, जमीन के संघर्षों व अस्मितावादी राजनीति के नये अनुभवों पर आधारित  प्रवृत्ति है। जिस कारण से दक्षिण भारत के दलित आंदोलन में आज भी एक गति और आवेग बना हुआ है । रामदास अठावले जैसे इक्का-दुक्का दलित नेताओं को छोड़कर अभी तक दलित राजनीति की मुख्यधारा का कोई भी धड़ा हिंदुत्व कारपोरेट गठजोड़ का पिछलग्गू नहीं हुआ  है।

आप देखेंगे कि महाराष्ट्र सहित अन्य क्षेत्रों में दलित आंदोलन के बहुत सारे बौद्धिक  सत्ता के कोप के शिकार बने हैं और जेलों में सड़ाये जा रहे हैं। उनका अपराध सिर्फ इतना था, कि वे दलित व वाम आंदोलन की वैचारिकी को  साथ लाने और लोकतांत्रिक संघर्षों के साथ समायोजन और समन्वय के लिए वैचारिक राजनीतिक संघर्ष चला रहे थे।

इसलिए भीमा कोरेगांव  में दलितों के पेशवा शाही पर विजय के इतिहास के साथ अपनी अस्मिता की तलाश कर रहे दलित समाज के बुद्धिजीवी और कार्यकर्ताओं तथा  कबीर कला मंच जैसे सांस्कृतिक, सामाजिक संगठनों के आंदोलन पर संघ-भाजपा  की सरकार का दमन जारी है।

लेकिन उत्तर भारत के दलित नेताओं और उनकी पार्टियों  का इससे कोई सरोकार नहीं है। आनन्द तेलतुम्बड़े, सुरेंद्र गाडगिल जैसे दलित विचारक, जिन पर किसी समाज को नाज हो सकता था, जेलों में सड़ रहे हैं। वाम क्रांतिकारी जनवादी और मानवाधिकार संगठनों के अलावा इनके पक्ष में किसी भी दलित धारा के तरफ से उत्तर भारत में कोई आवाज नहीं उठ रही है।
पिछले 7 वर्षों में येन केन प्रकारेण  संघ-भाजपा सरकार ने आरक्षण सहित नौकरियों और दलितों के मिले संवैधानिक अधिकारों में छेड़छाड़ की है। आरक्षण और दलितों को मिलने वाली संवैधानिक सुविधाओं को केंद्र कर  दलित समाज के खिलाफ सामाजिक गोलबंदी का हर संभव प्रयास किया है । जिससे नौकरियों से लेकर अन्य जगहों जैसे आवास, रहवास आदि पर भी दलितों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। दलित बेटियों, महिलाओं और मजदूरों पर नृशंस हमले भी हुए हैं।

हिंदुत्व-कारपोरेट गठजोड़ के हमलावर समय में उत्तर भारत के दलित तथा पहचानवादी राजनीतिक बौद्धिक संघ-भाजपा सरकार के साथ सौदेबाजी, लेन-देन और सत्ता के खेल में मशगूल हैं। इसलिए निश्चित ही इन सभी राजनीतिक दलों  को इतिहास की किसी अंधेरी गुहा में जाकर विलीन हो जाना है।

फासीवाद कारपोरेट पूंजी के विकास की एक मंजिल की उत्पत्ति है । पूंजीवादी समाज जब वित्तीय पूंजी द्वारा श्रम की बर्बर लूट, सामान्य शासन प्रणाली से सुनिश्चित नहीं कर पाता तो  फासिस्ट तानाशाही की तरफ बढ़ता है।

इसके लिए  सामाजिक विविधताओं, धार्मिक-सांस्कृतिक पहचानों और पिछड़े सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को आगे करके समाज  में विखंडन और टकराव पैदा करता है। राष्ट्र के संदर्भ में वह बर्बर, आक्रामक, हत्यारे राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करता है। राष्ट्रीय और सामाजिक पूंजी और संपदा को चंद निजी हाथों में संकेंद्रित कर देता है। इसके साथ ही  मानव विकास के पूंजीवादी  सभ्यता के ही  विशिष्ट दौर के लोकतांत्रिक समाज के समस्त उपलब्धियों को मटियामेट करते हुए वैज्ञानिक चेतना का बिध्वंस कर अंततोगत्वा समाज को पिछड़े जीवन मूल्यों का बंदी बना देता है।

वित्तीय पूंजी के मुनाफे को सुनिश्चित करने के लिए यह समाज के सबसे कमजोर, गरीब, मेहनतकश वर्ग को गुलाम बनाने की एक पूरी परियोजना के साथ आगे बढ़ता है। आज भारत इस परियोजना की गिरफ्त में है।

कोई भी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आंदोलन इस परियोजना के खिलाफ  संघर्ष में ही अपनी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को सुदृढ़ कर अपनी अस्मिता को सुरक्षित रख सकता है। वह वैचारिकी जो फ़ासिज़्म के खिलाफ समझौता विहीन संघर्ष में मुब्तिला होगी, वही प्रासंगिक रह जाएगी।

चुनाव जीते जा सकते हैं और कुछ राज्यों में सरकार भी बनायी  जा सकती हैं, लेकिन फासीवाद के खिलाफ  मुकम्मल लोकतांत्रिक जन-आंदोलन और राजनीतिक रूप से सचेत जन गोलबंदी खड़ा किये बिना भारत या दुनिया में किसी भी देश में लोकतंत्र को बचाया नहीं जा सकता।

2014 के बाद कारपोरेट हिंदुत्व फासीवाद के  हमले के खिलाफ श्रृंखलाबद्ध संघर्ष  आगे बढ़ रहा है। छात्र, नौजवान, दलितों, महिलाओं की जिंदगी और रोजगार पर हमलों के खिलाफ आंदोलन संगठित हुए हैं। संविधान और नागरिकता की सुरक्षा के लिए सीएए के विरोध में अल्पसंख्यक महिलाओं के जुझारू ऐतिहासिक आंदोलन चले हैं।

कोविड-19 महामारी की आड़ लेकर किसानों पर लादे गये कृषि विरोधी तीन कानूनों और मजदूर विरोधी श्रम कोड के खिलाफ भारतीय समाज में किसान, मजदूर, बौद्धिक और नागरिक समाज का संयुक्त आंदोलन चल रहा है। दिल्ली की सीमा पर 13 महीने तक चले कृषि और किसानी को कारपोरेट के हाथों में जाने से रोकने के लिए  इतिहास के सबसे बड़े लोकतांत्रिक आंदोलन ने भारत में फासीवाद के खिलाफ संघर्ष की नयी दिशा सुनिश्चित कर दी है। संघर्षों की जमीन से उपजा संघर्षशील शक्तियों का एक नया मंच भारत में आकार ले चुका है।

इतिहास का यह वह समय है, जब कोई भी लोकतांत्रिक विचारधारा इस मंच के साथ अगर सकारात्मक संबंध विकसित नहीं करेगी तो वह इतिहास में अप्रासंगिक होने के लिए तैयार रहे।

आज भारत का दलित, अस्मिता या वाम जनवादी ताकतों का लोकतंत्र के लिए चलने वाला हर संघर्ष इसी एकता के रास्ते से आगे बढ़ेगा। उम्मीद है, कि भारत के लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और संविधान के लिए चलने वाले संघर्ष  के अगुआ  समय की नजाकत को समझेंगे और फासीवाद  के खिलाफ चल रहे संघर्ष में अपनी भूमिका सुनिश्चित करेंगे!

(जयप्रकाश नारायण मार्क्सवादी चिंतक तथा अखिल भारतीय किसान महासभा की उत्तर प्रदेश इकाई के प्रांतीय अध्यक्ष हैं)

फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार

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