नेहरू की छवि के साथ खिलवाड़ छद्म इतिहास निर्माण की कोशिश है

रमा शंकर सिंह यह इतिहास की बिडम्बना है कि जिस जवाहरलाल नेहरु ने जीवन भर इतिहास पढ़ा, लिखा और इससे बढ़कर इतिहास बनाने का काम किया, उसी नेहरु को हमारे समय में निरादृत होना पड़ा है, विशेषकर उसके अपने देशवासियों से ही- उन देशवसियों से जिन्हें वे बेपनाह मोहब्बत करते थे. उनकी यह मोहब्बत उनके पूरे जीवन, कर्म और विचार में व्याप्त है. नेहरु ने जो कुछ भी लिखा, बोला और किया- वह सब प्रकाशित है. इस सबके बावजूद उन्हें दुष्प्रचार का सामना करना पड़ा है. पहले तो उनके व्यक्तित्व…

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एक तरफ ‘ स्वच्छ भारत ‘ का ढोंग दूसरी तरफ हर 3 दिन में एक सफाईकर्मी की मौत

उर्मिला चौहान पूरे देश मे सफाई कर्मचारियों की हालत दिन पर दिन और खराब होती जा रही है। विडम्बना तो ये है कि 2014 में जब मोदी सरकार द्वारा ‘स्वच्छ भारत मिशन’ की घोषणा की तब से अब तक सैकड़ों मजदूर सीवरों और गटर की भेंट चढ़ चुके हैं। ‘सफाई कर्मचारी आन्दोलन’ द्वारा किये गये सर्वे के अनुसार, हर तीसरे दिन पर एक मजदूर की मौत होती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अकेले 2017 में 300 सफाई कर्मचारियों की जाने गयी। पिछले सितंबर-अक्टूबर में दिल्ली शहर के ही सीवर के…

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मोदी सरकार द्वारा किसानों के साथ धोखाधड़ी के खिलाफ किसानों का “ दिल्ली मार्च ” 29-30 नवम्बर को

अखिल भारतीय किसान महासभा नई दिल्ली. 2014 के लोकसभा चुनाव में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा ने देश के किसानों से कर्ज माफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुरूप फसलों का डेढ़ गुना दाम देने का वायदा किया था. यही नहीं उन्होंने देश के लोगों को अच्छे दिन लाने का वायदा भी किया था. पर अपने साढे चार साल के शासन में इस सरकार ने न सिर्फ देश के किसानों के साथ खुला धोखा किया बल्कि अपनी कारपोरेट परस्ती के कारण आज देश को आर्थिक कंगाली…

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भारतीय संवैधानिक अदालतें और धर्मनिरपेक्षता (भाग-1)

 इरफान इंजीनियऱ   पिछले कुछ वर्षों से, परंपराओं और रीति-रिवाजों के नाम पर, भारत में धर्मनिरपेक्षता को पुनर्परिभाषित करने और उसकी सीमाओं का पुनः निर्धारण करने का चलन हो गया है। संविधान निर्माताओं ने एकमत से न सही, परंतु बहुमत से धर्मनिरपेक्षता को संविधान का अविभाज्य और अउल्लंघनीय हिस्सा बनाया था। स्वाधीनता के बाद के वर्षों में इस सिद्धांत का लगभग पूर्णतः पालन किया गया और धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक नेताओं के प्रभाव और उनकी शक्तियों में शनैः-शनैः कमी लाई गई। सुधार हुए और समुदायों पर धार्मिक नेताओं और संस्थाओं…

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मुक्तिबोध मेरे लिए -अच्युतानंद मिश्र

अच्युतानंद मिश्र फ़िराक ने अपने प्रतिनिधि संग्रह ‘बज़्मे जिंदगी रंगे शायरी’ के संदर्भ में लिखा है, जिसने इसे पढ़ लिया उसने मेरी शायरी का हीरा पा लिया .इस तरह की बात मुक्तिबोध के संदर्भ में कहनी कठिन है. इसका बड़ा कारण है कि मुक्तिबोध का समस्त लेखन किसी भी तरह की प्रतिनिधिकता के संकुचन में फिट नहीं बैठता. मुक्तिबोध सरीखे लेखकों को जब हम प्रतिनिधि रचना के दायरे में रखकर देखने की कोशिश करते हैं तो एक बड़ा आयाम हमसे छूटने लगता है. यही वजह है कि स्वन्तान्त्रयोत्तर हिंदी लेखन…

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मुक्तिबोध आस्था देते हैं मुक्ति नहीं

प्रियदर्शन मुक्तिबोध और ख़ासकर उनकी कविता ‘अंधेरे में’ पर लिखने की मुश्किलें कई हैं। कुछ का वास्ता मुक्तिबोध के अपने बेहद जटिल काव्य विन्यास से है तो कुछ का उनके मूल्यांकन की सतत चली आ रही कोशिशों से, जिनमें कुछ बहुत सरल हैं कुछ बहुत जटिल, कुछ बहुत साधारण हैं कुछ वाकई असाधारण। मुक्तिबोध के निधन के बाद उनके समकालीनों और समानधर्मा लेखकों ने जिस आत्मीयता, अधिकार और प्रामाणिकता से उन पर लिखा है, वह भी किसी नए लिखने वाले की एक मुश्किल है। और जो सबसे बड़ी मुश्किल है,…

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अंतःकरण और मुक्तिबोध के बहाने

(मुक्तिबोध के जन्मदिन पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय का आलेख) 2017 में मुक्तिबोध की जन्मशताब्दी गुज़री है और 2018 मार्क्स के जन्म की द्विशाताब्दी है। मुक्तिबोध की रचना और विश्वदृष्टि का मार्क्स की विश्वदृष्टि से गहरा नाता है। यह जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि मार्क्स को गुज़रे 200 वर्ष हो गए, दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई, वे अब पुराने पड़ गए। अब मार्क्सवाद प्रासंगिक नहीं रहा। भारत में तो सत्तारूढ़ दल उन्हें यह कह कर भी नकार रहे हैं कि मार्क्स विदेशी थे…

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आधुनिक सभ्यता-संकट की प्रतीक-रेखा (मुक्तिबोध और स्त्री-प्रश्न)

मुक्तिबोध जयंती पर विशेष   स्त्री स्वाधीनता और उस स्वाधीनता की अभिव्यक्ति के प्रश्न को जितनी गहनता और विस्तार मुक्तिबोध-साहित्य में मिला वैसा हिन्दी साहित्य के पुरुष रचनाकारों में अन्यत्र दुर्लभ है. मुक्तिबोध ‘ अस्मिता-विमर्श ’ के दायरे में इस प्रश्न को संबोधित नहीं करते या कहें कि उनके लिए ऐसा करना संभव न था, लेकिन स्त्री-अस्मिता को उन्होंने कहीं भी अन्य किसी महाख्यान का अधीनस्थ भी नहीं बनने दिया. हिन्दी समाज और साहित्य में स्त्री को न केवल पारम्परिक रिश्तों और आदर्शों के खांचों में खुद को ढाल कर…

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जनसंवाद चौपाल में जोशीमठ नगरपालिका चुनाव के प्रत्याशियों ने रखी अपनी बात

उत्तराखंड में नगर निकायों के चुनावों का प्रचार चल रहा है. 18 नवंबर को तीन नगर निकायों – श्रीनगर(गढ़वाल), रुड़की और बाजपुर को छोड़ कर, प्रदेश के अन्य निकायों में चुनाव होंगे. इन तीन निकायों में चुनाव न होना राज्य सरकार की दक्षता और कुशलता का एक और नमूना है. इस पर विस्तार से अन्यत्र बात होगी. आम तौर पर प्रचार तो ऐसी ही चल रहा है कि सबको देखा बारी-बारी,अबकी बार फलाने भाई की बारी या फिर सारे ही प्रत्याशी-सुयोग्य,कर्मठ,ईमानदार हैं- उनके भौंपुओं के शोर में. लेकिन भौंपुओं के…

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घर की सांकल खोलता हुआ कवि हरपाल

बजरंग बिहारी   कविता जीवन का सृजनात्मक पुनर्कथन है। इस सृजन में यथार्थ, कल्पना, आकांक्षा, आशंका और संघर्ष के तत्व शामिल रहते हैं। रचनाकार अपनी प्रवृत्ति, समय के दबाव और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप इन तत्वों का अनुपात तय करता है। विचार जीवन से आगे बढ़े हुए होते हैं। जीवन की गति स्वाभाविक रूप से धीमी होती है। कवि भावों के लेप से विचार और जीवन में सामंजस्य बैठाने का प्रयास करता है। यह कवि के विवेक पर निर्भर करता है कि वह जीवन और विचार में किसे प्रमुखता दे। ऐसा…

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वो सूरतें इलाही किस मुल्क बसतियाँ हैं , अब जिनके देखने को आंखें तरसतियाँ हैं

15वीं बरसी पर कॉ मंजू देवी की यादें   संतोष सहर   वो सूरतें इलाही किस मुल्क बसतियाँ हैं अब जिनके देखने को आंखें तरसतियाँ हैं (अखिल भारतीय खेत ग्रामीण मजदूर सभा का  6वां राष्ट्रीय सम्मेलन आगामी 19-20 नवम्बर को जहानाबाद में आयोजित होगा।15 साल पहले 14-15 नवम्बर 2003 को आरा में इसका स्थापना सम्मेलन हुआ था। कॉ. मंजू देवी उस सम्मेलन की जोरदार तैयारियों में दिन-रात लगी हुई थीं। उसी दौरान आज ही के दिन जहानाबाद के पुराण गांव में रणवीर हत्यारों ने गोली मारकर इनकी हत्या कर डाली…

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सातवाँ कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान में ‘सामाजिक सौहार्द की चुनौतियाँ ‘ पर बोलेंगे प्रो राजीव भार्गव

नई दिल्ली. सातवाँ कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान 17 नवम्बर को शाम 5 से नई दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान ( दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आई टी ओ ) में आयोजित किया गया है. प्रति वर्ष जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में  इस बार का व्याख्यान सामाजिक सौहार्द की चुनौतियाँ विषय पर राजनीतिक दार्शनिक प्रो. राजीव भार्गव देंगे. इस अवसर पर आलेख प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कुबेर दत्त के लेखों के संग्रह ‘जनवाद का तीसरा नेत्र – रामविलास शर्मा ’ का लोकार्पण भी होगा. यह जानकारी जन संस्कृति…

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राफेल डील : कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

जाहिद खान राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर मोदी सरकार की लाख पर्देदारी और एक के बाद एक लगातार बोले जा रहे झूठ के बीच, इस विमान सौदे के सभी राज खुलते जा रहे हैं। ताजा खुलासा फ्रांस के पूर्व राट्रपति फ्रास्वां ओलांद ने खुद किया है। एक फ्रेंच अखबार को दिए इंटरव्यू में ओलांद ने स्पट तौर पर कहा है कि राफेल लड़ाकू विमान निर्माता कंपनी ‘डसल्ट’ ने ऑफसेट भागीदार के रूप में अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को इसलिये चुना, क्योंकि भारत सरकार ऐसा चाहती थी। उस समय उनके…

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‘ जनता बेरोजगारी से त्रस्त, योगी सरकार नाम बदलने में मस्त ’

लखनऊ. फैज़ाबाद और इलाहाबाद का नाम बदले जाने के खिलाफ लखनऊ स्थित पिछड़ा समाज महासभा कार्यालय में बैठक हुई. बैठक में एक स्वर में इसे मूलभूत समस्यओं से भटकाने की ओछी राजनीति कहा गया. इसके खिलाफ जन अभियान चलाए जाने का प्रस्ताव आया. वक्ताओं ने कहा कि नाम बदलने और मूर्तियों की राजनीति जनता के धन का दुरूपयोग कर रही है. जिलों के नाम बदलने में आने वाले खर्च से उद्योग, बेरोजगारी, शिक्षा एवं चिकित्सा जैसी मूलभूत जरूरतों को पूरा किया जा सकता था. पर सरकार का मानसिक दिवालियापन है…

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बदरपुर थर्मल पावर स्टेशन की बंदी के खिलाफ अनुबंध कर्मियों का मंडी हाउस से संसद मार्ग तक मार्च

नई दिल्ली: बदरपुर थर्मल पावर स्टेशन (बीटीपीएस) के सैकड़ों अनुबंध-कर्मियों ने मजदूर एकता कमेटी की अगुवाई में अपनी मांगों को लेकर 8 नवम्बर को मंडी हाउस से लेकर संसद मार्ग तक मार्च किया। ये कर्मचारी बीटीपीएस को गैर-कानूनी तरीके से बंद करने, बिना किसी नोटिस, मुआवज़ा और पुनर्स्थापन के रोजगार से निकाले जाने का विरोध कर रहे हैं। इनकी मांग है कि बीटीपीएस को बंद करने का नोटिस और पर्याप्त मुआवज़ा दिया जाए, एनसीआर में वैकल्पिक रोजगार देकर उनका पुनर्वास किया जाए, सभी देय मजदूरी और अन्य बकाया राशि का…

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नोटबंदी से काले धन पर प्रहार भी एक जुमला ही था

  दो वर्ष पूर्व आज ही के दिन यानि 8 नवंबर को रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी की घोषणा की गयी थी. इसके अंतर्गत 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद कर दिया गया था.तब इसे काले धन के खिलाफ एक मास्टरस्ट्रोक बताया गया था. परंतु दो साल बाद इस बारे में सरकार में बैठे लोगों ने एक अप्रत्याशित खामोशी अख़्तियार कर ली है. पिछले दिनों सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी वर्षगांठ मनाने के लिए तो देश के सभी विश्वविद्यालयों को बाकायदा सर्कुलर जारी किया गया. पर…

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विकास, विस्थापन और साहित्य (संदर्भ झारखंड)

आज इस बात में किसी को कोई संदेह नहीं रह गया है कि ग्लोबल पूंजीवाद के लाभ-लोभ के चलते दुनिया में गरीबी और पर्यावरण का संकट बढ़ता जा रहा है। अपनी लालच के सिवा उसके सामने आदमी और प्रकृति की चिंता का कोई मायने नहीं रह गया है। विकास की पूंजीवादी अवधारणा या रास्ता विनाश का रास्ता बन गया है। वह जीवन और प्रकृति के विनाश का स्रोत बन गया है। आज दुनिया भर में कुलीन आर्थिक संस्थाओं- आइएमएफ़, वर्ल्ड बैंक, एनएफटीए, डब्यूटीओ आदि के खिलाफ़ विेद्रोह हो रहे हैं। विकास के वैकल्पिक रास्ते पर, न्यायोचित और टिकाऊ मानवीय विकास (Equitable and sustainable human development) के रास्ते का सवाल बहस के केंद्र में आ गया है। यहां इस पर बहस में जाने का अवसर नहीं है लेकिन विकास के इस विनाश की पूरी तस्वीर देखनी हो तो हमें आदिवासी क्षेत्रों की ओर रुख करना चाहिये, जहां सबकुछ साफ-साफ अपनी पूरी नग्नता के साथ मौजूद है।

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1984 के सिख क़त्ले-आम के मुजरिमों की तलाश का 34 साल लम्बा पाखंड !

1984 के सिखों के क़त्लेआम के मामले में आरएसएस/भाजपा अपने आप को कांग्रेस से भिन्न साबित करने के लिए चाहे जो भी दावे करे लेकिन दोनों में तनिक भी अंतर नहीं है। इन दोनों से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। मुजरिमों की खोज और उनको उचित सज़ा दिलाने का मक़सद तभी पूरा हो सकता है, जब हम भारतीय एक साथ 34 साल से चल रहे ‘न्याय के पाखंड’ के खिलाफ लामबंद होंगे। यह लड़ाई सिखों को इन्साफ दिलाने के लिए ही नहीं है बल्कि एक प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष देश को बचने की भी है।

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वित्तमंत्री ने अर्थव्यवस्था की ऐसी-तैसी कर दी है : यशवन्त सिन्हा

 भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के 26 अक्तूबर के सम्बोधन ने सरकार और केन्द्रीय बैंक के बीच के गम्भीर मतभेदों को सतह पर ला दिया है। डाॅ0 आचार्य ने अपने तीखे सम्बोधन में कह दिया था कि, ‘‘जो सरकारें केन्द्रीय बैंक की स्वायत्तता का सम्मान नहीं करतीं उन्हें देर-सवेर वित्तीय बाजारों के गुस्से का सामना करना ही पड़ता है, अर्थव्यवस्था ख़ाक हो जाती है और फिर सिर्फ उस दिन के लिये पश्चात्ताप करने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता जब इस नियामक संस्था की अनदेखी की…

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मामूली दृश्यों से जीवन का विचलित करने वाला वृत्तान्त तैयार करतीं शुभा की कविताएँ

मंगलेश डबराल   शुभा शायद हिंदी की पहली कवि हैं, जो अभी तक कोई भी संग्रह न छपवाने के बावजूद काफ़ी पहले विलक्षण  कवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी थीं. कई लोग उन्हें सबसे प्रमुख और अलग तरह की समकालीन कवयित्री मानते हैं, और इंतज़ार करते हैं कि कभी उनका संग्रह हाथ में ले सकेंगे. स्वाभाविक रूप से शुभा नारीवादी हैं, लेकिन यह नारीवाद बहुत अलग तरह का, वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध और वामपंथी है. लेकिन उसके अंतःकरण की तामीर एक ऐसे ‘अतिमानवीय दुःख’ से हुई है, जिसे न…

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