समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

स्मृति

असाधारण का वैभव और साधारण का सौंदर्य : बासु चटर्जी

आशीष कुमार
अनायास नहीं, कुछ संबंध सायास भी जुड़ते हैं । मुकम्मल याद नहीं मुझे, लेकिन पहली बार टेलीविजन पर ‘रजनीगंधा’ देखा था। उस समय तक मैं...
सिनेमा

लाभ-लोभ की प्रवृत्ति पर जीवन की सहज वृत्ति को स्थापित करती है मणि कौल की ‘दुविधा’

मुकेश आनंद
(महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्मों पर  टिप्पणी के क्रम में आज प्रस्तुत है मशहूर निर्देशक मणि कौल की दुविधा । समकालीन जनमत केेे लिए मुकेश आनंद द्वारा...
पुस्तक

उन्नीसवीं सदी के विदेशी अखबारों में कबीर

कबीर के बारे में ब्रिटेन के अखबारों में जितना छपा है उतना शायद तब, किसी अन्य समाज सुधारक के बारे में नहीं छपा. कबीर के...
पुस्तक

औपनिवेशिक भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन

गोपाल प्रधान
2020 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से अली रज़ा की किताब ‘रेवोल्यूशनरी पास्ट्स: कम्युनिस्ट इंटरनेशनलिज्म इन कोलोनियल इंडिया’ का प्रकाशन हुआ । लेखक को एक मुखबिर...
पुस्तक

टिकटशुदा रुक्का: अंत ही शुरुआत है

समकालीन जनमत
ममता सिंह नवीन जोशी द्वारा लिखित टिकटशुदा रुक्का उपन्यास पर बात करने के लिए जाने क्यों पहले अंत की बात करने का मन होता है,...
कहानी

एक कहानी-‘आली’

दुर्गा सिंह
आली धान की फसल लदरी हुई फैली थी। पीली धरती, पीली धूप। शाम के वक्त इस क्षेत्र का दृश्य देखने लायक होता है। ताल का...
कविता

‘जॉर्ज फ्लॉयड हम भी साँस नहीं लेे पा रहे हैं’

समकालीन जनमत
25 मई 2020 को अमेरिका मिनेपॉलिस शहर में अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय के 46 वर्षीय जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद के बाद पूरा अमेरिका सुलग उठा...
कविता

राजेन्द्र देथा की कविताओं में सहज मनुष्‍यता के उत्‍प्रेरक चित्र हैं

समकालीन जनमत
कुमार मुकुल शिशु सोते नहीं अर्द्धरात्रि तक विश्राम भी नहीं करेंगे वे थोड़ा और हँसेंगे अभी और बताएंगे तुम्हें कि हँसना क्या होता है? सोते...
सिनेमा

कीचड़ में खिल रहे गुलाब की कहानी जहाँ दिमाग को दिल में घोलकर प्रेम किया गया

पंकज पाण्डेय
एक डॉक्टर की मौत (1990) :- कीचड़ में खिल रहे गुलाब की कहानी जहाँ दिमाग को दिल में घोलकर प्रेम किया गया . निर्देशक– तपन...
सिनेमा

सामंती और पूँजीवादी शोषण के अंतर्संबंधों की पड़ताल करती ‘पार’

मुकेश आनंद
(महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्मों पर  टिप्पणी के क्रम में आज प्रस्तुत है मशहूर निर्देशक गौतम घोष की पार । समकालीन जनमत केेे लिए मुकेश आनंद द्वारा...
ज़ेर-ए-बहसस्मृति

नेहरू और फासीवाद : संघ विरोध के मायने

मुकेश आनंद
स्मृति दिवस पर विशेष 1917 ईस्वी में रूस में सम्पन्न हुई मजदूरों की क्रांति ने सारी दुनिया के समाजों के प्रतिक्रियावादी तत्वों को भयभीत, चौकन्ना...
कविता

‘ पांव में छाले आंख में आंसू पीड़ा भरी कहानी लिख/मजदूरों के साथ हुई जो सत्ता की मनमानी लिख ’

समकालीन जनमत
लखनऊ.  कोरोना काल में बड़ी मात्रा में कविताएं रची जा रही हैं। मानव संकट सृजन के लिए आधार बनता है। आज की रचनाओं में भावों...
साहित्य-संस्कृति

नक्सलबाड़ी आंदोलन और भारतीय साहित्य

गोपाल प्रधान
भारतीय साहित्य के इतिहास में नक्सलवादी आंदोलन का एक विशेष स्थान है. सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के साथ साहित्य में भी नक्सल धारा की उपस्थिति बनी हुई...
पुस्तक

इंडोनेशिया का कत्लेआम

गोपाल प्रधान
2020 में पब्लिक अफ़ेयर्स से विनसेन्ट बेविन्स की किताब ‘ द जकार्ता मेथड : वाशिंगटन’स एन्टीकम्युनिस्ट क्रूसेड & द मास मर्डर प्रोग्राम दैट शेप्ड आवर...
कविता

कविता कृष्णपल्लवी की कविताएँ बाहरी कोलाहल और भीतरी बेचैनी से अर्जित कविताएँ हैं

समकालीन जनमत
विपिन चौधरी साहित्यिक एक्टिविज्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाने वाली पोस्टर-कविता, हमेशा से विरोध प्रदर्शनों का अहम् हिस्सा रही हैं. सबसे सघन समय में...
सिनेमा

आदिवासी समाज के उत्पीड़न और आक्रोश की कहानी

मुकेश आनंद
(महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्मों पर  टिप्पणी के क्रम में आज प्रस्तुत है मशहूर निर्देशक गोविंद निहलानी की आक्रोश । समकालीन जनमत केेे लिए मुकेश आनंद द्वारा...
स्मृति

राजीव गांधी से एक मुलाकात

नेहरू ने जिस आत्मनिर्भर एवं समाजवादी भारत की परिकल्पना की थी, राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में उसे मूर्त रूप प्रदान करने की कोशिश...
व्यंग्य

आख़िर क्यों? दी नेशन वॉन्ट्स टू नो!

समकालीन जनमत
( एक तरफ़ महामारी और दूसरी तरफ़ सरकारी तंत्र की नाकामी के कारण मानव जीवन की हाड़ कंपा देने वाली ऐसी भयानक बेक़दरी को उसके...
साहित्य-संस्कृति

हिंदी में प्रगतिशील आंदोलन

गोपाल प्रधान
हिंदी में प्रगतिशील आंदोलन की स्थिति को समझने के लिए उसके जन्म के समय की राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों पर ध्यान देना जरूरी है । सन 1929...
कविता

‘मजदूर थे वो जब तक सबके ही काम आए/मजबूर हो गए तो सबको ही खल रहे हैं’

समकालीन जनमत
लखनऊ। लोग कोरोना की चपेट में ही नहीं हैं बल्कि लाॅक डाउन से पैदा हुई अव्यवस्था के भी शिकार हुए हैं, हो रहे हैं। लोगों...
Fearlessly expressing peoples opinion