कहानी

आली


धान की फसल लदरी हुई फैली थी। पीली धरती, पीली धूप। शाम के वक्त इस क्षेत्र का दृश्य देखने लायक होता है। ताल का पानी लगभग सूख चुका था और नहर में कई जगह मेड़बन्दी करके मछलियाँ मार ली गयीं थीं। छोटी मछलियाँ अब भी आशा के साथ शेष थीं कि बगुले नहीं आएँगे, मेढक नहीं आएँगे और पानी नहीं सूखेगा। बनारस और सोनभद्र के रास्ते में पड़ने वाले इस गाँव, नरायनपुर में; अप्रवासी पक्षियों का मेला अब नहीं लगता। अब तो केवल लेदी-तलैया आदि ही दिखती हैं। टिटिहिरी तो खैर रहेगी ही। स्थानीय लोग बड़े चाव के साथ बताते हैं कि कैसे इनका शिकार होता था!
मिंकू आजकल इधर ही आया है। तीन साल पहले आया था किसी मौके पर। तब उसने बीएचयू के पत्रकारिता विभाग में प्रवेश लिया था। उसका कोई रिश्ता इधर ही किसी गाँव में है। पता नहीं कौन सा गणना का काम उसने लिया है। उसके रिश्तेदार उससे जानना चाहते हैं, तो वह मुस्कराकर टाल देता है।
‘‘अरे कुछ नहीं, बस ऐसे ही एक पत्रिका ने एक लेख माँगा था, उसी के लिए यह सब कर रहा हूँ।’’ तभी से लड़के बोलते हैं, ‘‘भइया लेखक हैं।’’
वह अगर चुपचाप बैठा है, तो हजार सवाल उछल जाते हैं।
भइया क्या लिखते हो…तो भइया लिखकर क्या होगा…  भइया वो सब पैसा भी देते हैं…‘नहीं’ सुनने पर वे तिक्त हो जाएँगे और ‘हाँ’, कहते ही उनके चेहरे खिल जाते हैं, हाँ हो; पढ़ाई-लिखाई क कदर जे जानी ते त देबे करी!
मिंकू इन सब प्रश्नों से बचने के लिए, लाखों प्रश्न लेकर बैठता है और खुद के ऊपर होने वाले सवालों से बच जाता है। यहाँ अब पक्षी नहीं आते… नहर कब आया… खेती पर क्या प्रभाव, क्या बदलाव…अच्छा वो इण्टर कॉलेज के प्रबन्धक के लिए जो बवाल हुआ था… और तब इस पर एक अन्तिम बहस-बात।
फिर वह अपने से दो-तीन वर्ष छोटे लोगों की जमात में जाता है, तो वहाँ वह क्रिकेट की बात छेड़ देता है या फिर उनकी दुखती रग को। एक युवक की दुखती रग क्या हो सकती है? सभी खुद बचते हुए, दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं और उसके प्रेम को हास्य का चोंचला बनाकर रख देते हैं। उसी में से कोई भुनभुनाता है, ‘भइया तोहरो मलवा त आज कल आइल हउवे’, मिंकू सुनता है, लेकिन अनसुनी कर देता है।
***
अब मिंकू एकान्त चाहता है, और आज वह दिन भर की खाक छानकर थक भी गया है। उसके सर में रह-रहकर दर्द उठ रहा है। वह बेसुध सा होने लगता है।

…कोई लड़की उसका सर दबा रही है… वह बैठ जाता है, उसकी पूरी देह तपने लगती है, वह लड़की के जंघों को कस लेता है और लड़की भी उसके सर को अपने वक्षों के बीच में कस लेती है। वह हड़-बड़ाकर उठता है…

वह खिन्न सा हो उठता है। उसका सर बहुत तेज दर्द कर रहा है। वह चाय पीना चाहता है, उठकर आँगन में आता है और चाय के लिए बोलता है।

वह पुन: उसी अपराधबोध से घिर जाता है, जिसे तीन साल से टालता आया है। वह उस लड़के को ढूढ़ता है, जिसने वह बात कही थी।
‘‘चंदू, आली क्या सच में आयी है?
‘‘हाँ, भइया सच बोल रहा हूँ।’’
‘‘चलेगा?’’
‘‘अरे भइया, मुँह की बात छीन ली आपने।’’
वह रास्ते भर सोचता जा रहा था, कैसे सामना करूँगा उसका। फिर, वह खुद को तैयार करता है।

दोनों एक कमरे में बैठे हैं। चंदू चिल्लाता है, आली को बुलाओ भाई! हम उन्हीं से मिलने आए हैं। चंदू की मौसी का घर है यह। वह फिर से चिल्लाता है, कहाँ गायब हो गये हैं सब! पूरा घर खाली है, लूट पड़ जायेगी, फिर मत कहना!
आली बगल के घर से भागती आती है, मिंकू देखता रह जाता है, बिलकुल पहचान में नहीं आती। चंदू ही बोलता है, ‘‘कहाँ घूम रही हो? देखो, मैं तुम्हीं से मिलने आया हूँ, कितना बेचैन हूँ!’’ आली मुस्कराती है, ‘चुप्प बउरहा’ फिर बैठ जाती है। ‘सब लोग पाही पर हैं’, चंदू को बताती है। फिर वह मिंकू की तरफ देखती है और सामने दीवार पर नजर अड़ा देती है, ‘‘मैं पता पा चुकी थी, कि…आए हैं।’’ उसने मिंकू का नाम इतनी उलझन में लिया कि वह स्पष्ट न हो सका।
‘‘तभी तो लेकर आया हूँ’’, चंदू ने उछलते हुए कहा।
‘‘अच्छा सलकले बइठ पहिले।’’
‘अरे चाय-नास्ता पूछेंगी!’’
‘‘हाय दइया अभी कुछ मिला नहीं!’’ आली चौंकी, मिंकू अब भी चुप था। आली ने अपनी बहन की तरफ देखा, “चाय-नास्ता नहीं कराया?”
“आ तो गयी हो, करा दो!” पहली ने नाक चढ़ाते हुए कहा
दूसरी ने कहा, ‘‘इनको, तुम्हारे हाथ की चाय ही भाती है।’’
आली उठती है, तो बहनें बोलती हैं, ‘‘रहने दो हाथ गीले हो जाएँगे। ससुराल में बहुत सुख भोग के आयी हो। पापा जी के हाथ का दूध पीकर आयी हो।’’ आली उसके ऊपर झपटती है, लेकिन वह हाथ नहीं आती।
‘‘आली दी, बहुत मोटी हो गयी हो, किस चक्की का आटा खाती हो?’’

उसकी बहन रसोई से चिल्लाती है—‘‘चंदू भइया, आटे से नहीं, पापा जी के दूध से मोटी हुई है।’’
आली आँख मटकाती हुई बोलती है, ‘‘अच्छा कितनी दुष्ट हो गयीं हैं ये लड़कियाँ।’’
मिंकू अब भी चुप बैठा है। आली उसकी तरफ इशारा करके चंदू से पूछती है, ‘‘कुछ बोल नहीं रहे हैं, बड़े शान्त हैं।’’
‘‘पकर-पकर तुम्ही तो बोले जा रही हो।’’
‘‘दत बउरहा, मैं कहाँ बोल रही हूँ!’’
‘‘गनीमत है, अगर बोलती तो क्या होता!’’ मिंकू ने चुप्पी तोड़ी। आली ने उसे तिरछे चितवन से निहारा और होंठों पर उभर आयी मुस्कान को छिपाने का ठौर ढूढ़ने लगी।

गाँव की लड़कियाँ एक-एक कर इकट्ठी होने लगीं और कॉलेज में लड़कों द्वारा की जाने वाली बद्तमीजियों को बयान करने लगीं। मिंकू चुप था, आली चुप थी और चंदू उन लड़कियों से जूझा हुआ था।
उसको पस्त होते देख मिंकू ने सम्भाला और जुमला उछाला, ‘‘लड़कियाँ भी तो चाहतीं हैं कि लड़के उनकी तरफ आकर्षित हों; कोई लड़की है जो यह न चाहती हो कि कोई लड़का उसकी तरफ देखे ही न!’’
सभी चुप हो गये। आली ने उस चुप्पी को भेदना चाहा, ‘‘लड़कियाँ ये तो नहीं चाहतीं कि लड़के उन्हें गंदे कमेन्ट करें, भद्दी-भद्दी गालियाँ दें!’’

मिंकू कुछ न बोला।
‘‘नहीं भइया, आप नहीं जानते हम लोग किस तरह कॉलेज की सनद प्राप्त करते हैं’’ उन्हीं में से एक ने अपने दर्द को यूँ समेटा।
चंदू चौंचिआया, ‘‘लड़कियाँ भी दूध की धुली नहीं होतीं’’
‘‘चंदू चुप हो जाओ, वो सही कह रहीं हैं।’’

मिंकू ने टोका तो चंदू चुप हो गया।

एक बार फिर से चाय की तलब लगी मिंकू को, तो आली ने पूछा, दूध पियेंगे? हुआ कि दूध खतम है, लेकिन आली पुन:-पुन: पूछती, दूध पियेंगे। उसकी बातों में शरारत थी। मिंकू ने देखा कि आली सहज है, करीब जाकर धीरे से बोला, मैं पियूँगा। एक पल को दोनों की आँखें शरारती हो आयीं। आली के चेहरे पर लज्जा तिर आयी, उसने गर्दन झुका ली।
***
अब बारी प्रेम और शादी की थी। सभी लड़कियों की राय थी कि प्रेम किसी एक से होता है और जिससे प्रेम हो, उसी से शादी भी हो। मिंकू ने फिर जुमला उछाला, ‘‘जिससे प्रेम हो, शादी उससे कतई नहीं करनी चाहिए।’’

चारों ओर से लड़कियों ने हल्ला सा बोल दिया। हाव-हाव होने लगा। मिंकू ने अपनी बात समझाने की कोशिश करनी चाही लेकिन लड़कियाँ सब शान्त नहीं हुईं। वह ही शान्त हो गया, तो आली बोली, ‘‘चुप रहो, बोलने भी दो, जानकार हो जाती हो सब!’’
‘‘हेऽहेऽ चुप हो जाओ सब, अब जानकार बोलेंगी, पापा जी की…’’
आली पुन: चिढ़ी और चुप मार गयी, सभी हँस पड़े।
लड़कियों में से आग्रह भरा वाक्य आया, ‘‘भइया आप कुछ कह रहे थे!’’
‘‘नहीं तो!’’
‘‘कह तो रहे थे कि जिससे…’’
‘‘वह तो अब भी कह रहा हूँ।’’
‘‘कैसे?’’
क्योंकि प्रेम और शादी अलग-अलग चीजें हैं। प्रेम का मतलब होता है कि दोनों के पास समान अधिकार हो, सह-अस्तित्व की भावना हो, शादी में वही अधिकार नहीं होते। सह अस्तित्व खत्म हो जाता है। तुम्हारा समाज अभी ऐसा हो ही नहीं पाया है, कि वह प्रेम और शादी को एक ही व्यवस्था में रख सके। प्रेम आज भी चोरी-छिपे की चीज है। प्रेम का अर्थ है कि जब आप स्वतन्त्र निर्णय के साथ किसी को चुनते हैं। एक अपरिचित के साथ शादी हो जाने के बाद का प्रेम तो विवशता का प्रेम है। इस समाज में तो सम्भव ही नहीं है, कि शादी और प्रेम को एक माना जाय!
सभी को कुछ न सूझ रहा था। मिंकू ने जब देखा कि आली सहज है तो वह भी थोड़ा सहज होने लगा। उसने विषय परिवर्तित कर दिया—
‘‘आली को देखकर मैंने एक बात महसूस की, कि ससुराल से लौटकर लड़कियाँ बोलने बहुत लगतीं हैं। इसके पहले मैं इनकी आवाज सुनने को तरसता था और अभी देखो…’’
आली कुछ बुदबुदाकर चुप मार गयी। तभी आवाज आयी, ‘‘सभी नहीं भइया बस, जिसके ससुर पप्पा जी होते हैं।’’

आली तेजी से झपटी और न पाकर तिलमिलायी, ‘‘तुम पिटोगी मेरे हाथ से।’’ और फिर मिंकू की तरफ देखने लगी, तो वह फिर करीब आकर फुसफुसाया, ‘‘यह सब पुरुष को चख लेने का नतीजा है।’’ आली ने पुन: तिरछे निहारा और मुस्कान को जमीन में छिपा दिया।
सभा उठ गयी। बच गये मिंकू, आली और उसकी सहेली। तीनों चुप थे। आली ने चुप्पी भंग की, ‘‘क्या कर रहे हैं इस समय।’’
‘‘कुछ नहीं’’
‘‘बताइये न!’’ आली ने मान जैसा किया
‘‘किस अधिकार से?’’ आली पिछले कदम पर वापस लौट गयी।
‘‘हम लोगों के पास अधिकार कहाँ होता है भइया! आप लोग ही जितना दे देते हैं बस’’! सहेली ने असहजता को बीच-बीच में हँसी के साथ दूर किया और बात पूरी की या अधूरी की!

मिंकू भी अब पिछले कदम पर खड़ा था, वह बोलती रही—
‘‘यहाँ समाज ही ऐसा है, क्या किया जाय! सामान्य ढंग से जीने का हक छीनकर थम्हाया जाता है शुचिता, शुद्धता…लड़कियों की पवित्रता एक ऐसी चीज है, जो हमेशा संकट में रहती है।’’
सहेली की बात पर मिंकू चौंक सा गया और उसकी आँखें अबूझ सी उस पर टिक गयी। गाँव में रहने वाली लड़की और इस तरह की बातें।
‘‘तुम पढ़ती हो?’’
‘‘नहीं, बस किसी तरह हाईस्कूल तक। वह भी छूट गया। इच्छा होती है पर…सोचती हूँ ब्यूटी पार्लर खोलना, उसकी ट्रेनिंग भी लेना चाहती हूँ पर…
‘‘यहाँ तो सम्भव नहीं…!’’
‘‘तभी तो…एक दिन शादी हो जाएगी फिर ससुराल…’’
‘‘अगर पति समझदार है तो शादी के बाद भी हो सकता है।’’
‘‘हम लोगों की किस्मत…!!’’ सहेली ने अपनी आँखें छत पर टाँक दी बटन की तरह, लेकिन हँसते हुए खुद को सहज किया, ‘‘भइया, आप की शादी आली दी से हो गयी होती तो कितना अच्छा रहता!’’
‘‘नहीं, इसका तो ठीक है, अच्छा घर मिल गया है।’’
‘‘हाँ, वो तो है, लेकिन…’’
मिंकू ने उसकी तरफ प्रश्न-भंगिमा से देखा तो उसने आली को और बात वहीं थम्ह गयी।
‘‘भइया, आपने बताया नहीं, आप कुछ लिखते हैं। मिंकू ने आली को देखा—आली की ढींठ-सी आँखें उस पर टिकीं थीं। उसने नजर हटा ली और सहेली पर कर दी।
‘‘हाँ, लड़कियों के बारे में।’’
‘‘आप भी भइया…’’
‘‘रहने दे, मुझे पता है अड़भंगी हैं ये’’ आली ने बिस्तर के तागे उधेड़ते हुए कहा।
‘‘और क्या-क्या जानती हो?’’ मिंकू और करीब हो आया। इस बार आली आँख चमकाते हुए बोली, ‘‘सब’’ और मिंकू को हाथ से पीछे ठेल दिया।
‘‘अरे आली दी, आप तो बहुत ढींठ हो गयी हैं।’’
‘‘तू चुप रह’’, आली ने सहेली को झिड़का।
‘‘देख लिया और तुम कहती हो कि शादी हो गयी होती…अच्छा हुआ जो नहीं हुई।’’
‘‘अरे नहीं भइया, आली दी ऐसी नहीं हैं।’’
‘‘वो तो दिख रहा है, कैसी हैं?’’
‘‘कुछ लेंगे?’’ आली ने जैसे जगते हुए पूछा।
‘‘‘क्या?’’
‘‘जो इच्छा हो!’’ आली अब भी हया से सूत उधाड़ रही थी। मिंकू करीब हो आया ‘‘दूध है?’’
आली ने परिचित पलकों को उठाया और बेअन्दाजी की नजर को नजर से अड़ा दिया।
‘‘भइया, रुकिए अबकी मैं आपके लिए चाय बनाती हूँ।’’ कहते हुए सहेली बाहर चली गयी।
मिंकू और आली पूर्ववत थे। आली ने भरपूर दृष्टि डाली उस पर और उसके शर्ट के कालर को कुरेदते हुए पूछा—‘‘रात में रुकेंगे?’’
‘‘आली क्या अब भी’’
‘‘प्रेम एक से ही होता है।’’ उसकी नजर कॉलर पर, खुद के हाथों की नजाकत को पहचान रही थी या पढ़ रही थी।
‘‘सच तो यह है आली कि मैं तुमसे मिलने से डर रहा था। मुझे लगता था मैंने तुम्हारे साथ छल किया, तुम्हें झूठे सपने दिखाए, मुझमें तुम्हारा सामना करने की हिम्मत नहीं थी। मैं सोचता था, कि तुम मुझे कोसती होगी। चंदू ने ही बताया था कि तुम बीमार हो गयी हो। मुझे लगता, मैं ही कारण हूँ, पर अब तुम्हें इस तरह बात करते देख अच्छा लग रहा है। जैसे कोई बोझ उतर गया। जी करता है, कि खूब बातें करूँ तुमसे, ऐसे ही…’’
“कभी याद किया!”
“रोज!”
“झूठ!”
मिंकू की सीने में गड़ी किरिच ने फिर से दर्द उठा दिया। वह जज्ब कर गया। आली ने जैसे समझ लिया।
“मैं दोष नहीं देती तुम्हें!”
दर्द जैसे कुछ घटा। उसने लम्बी सांस बाहर ढकेली
“तुम लड़कियाँ इतनी क्षमादायी क्यों होती हो!”
आली कुछ न बोली बस जमीन देखने लगी और वैसे ही बोली,
“इस लगी को मत छोड़ना कभी! मेरे लिए इतना ही बहुत होगा।” आली ने नजर उठा दी और मिंकू ने उसकी हथेली थाम्ह ली।
‘‘भइया, लोग कहते हैं कि जोड़ियाँ भगवान के यहाँ बनती हैं, अगर ऐसा होता तो क्या आपकी जोड़ी नहीं बनती और फिर भगवान क्या राक्षस है जो अच्छी जोड़ियाँ नहीं बनाता!’’
मिंकू सहेली की आवाज सुनकर पूर्ववत हो गया और आली ने खुद को सँवाचा और चाय लेते हुए टेबल पर रख दिया।
‘‘सब कुछ अपने वश में नहीं होता। इस व्यवस्था का हस्तक्षेप सिर्फ तुम लोगों की जिन्दगी में ही नहीं होता, हर उस आदमी की जिन्दगी में होता है जो उस व्यवस्था से बाहर जाने की सोचता है। जिन्दगी जैसी है, वैसी ही चलती रहे बस, तब तक तो ठीक है, लेकिन एक बार अपने मन की बात मानकर देखो, एक माँ अपनी दूध की कीमत के साथ खड़ी हो जाएगी, एक बाप कर्तव्य का कमण्डल लेकर और एक भाई इज्जत मरजाद का डण्डा लेकर और सब कुछ को समेटकर समाज धर्म का जाल लेकर… कोई कितना लड़ेगा, जबकि वह लड़ाई में अकेले हो!’’ मिंकू तिक्त हो उठा। उसके हृदय को जैसे रस्सी से बाँधकर हर दिशा से घोड़े खींच रहे हों और उनकी टाप सर को रौंद रही हो!
‘‘भइया चाय’’
सहेली की आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग की। उसने दीवार से नजर हटायी, टेबल पर पड़ी चाय पर डाली और सहेली की तरफ देखकर बोला, ‘‘थोड़ा पानी पिऊँगा’’
सहेली ने देखा उसकी आँखों पर बल था और होंठ विकृत से हो उठे थे। वह भागती सी पानी के लिए बाहर निकल गयी। वह उसको जाते हुए देखता रहा, फिर पता नहीं किस वस्तु पर उसकी दृष्टि अटक गयी, जिसका प्रत्यय उसके दिमाग में बिलकुल नहीं था। वह अब भी तिक्त था।
‘‘आज रुक जाइए।’’ उसने चेतना में आकर आली को देखा जो यह छोटा सा आग्रह करने के बाद बड़ी सादगी से  उसकी तरफ देख रही थी।
‘‘बहुत सा काम रुक जाएगा’’ मिंकू ने खुद को सहज करते हुए कहा।
‘‘आली दी की बात पर रुक भी जाइए भइया। आपके साथ बैठना पता नहीं क्यूँ अच्छा लगता है।’’ सहेली की बात पर मिंकू खुलकर हँस पड़ा, ‘‘तुम पहली हो जिसने ऐसा कहा, थैंक्यू इसके लिए भी और पानी के लिए भी।’’ पानी थाम्हते हुए वह मुस्कराया तो आली नाक चढ़ाती हुई मुन्न से बोली, ‘‘ठीक तो कह रही है’’! अन्तिम शब्द सुनाई नहीं दिया। ‘‘तुम्हें भी’’ वह माथे पर बल देकर उत्तर की प्रतीक्षा में आली को देखता रहा, लेकिन आली चुप ही रही।
‘‘वैसे तो बहुत बोलतीं हैं तुम्हारी आली दी लेकिन मेरे साथ अकेली होने पर मक्खा मार जाता है इनको’’, चाय उठाते हुए उसने आली को छेड़ा पर वह आँख चमकाकर खुद में पुन: गुम हो गयी। सहेली ने चिकोटी ली तो उसने मचलते हुए हाथ झटका और घूरकर उसे देखा। सहेली भी उसी अन्दाज में देखती हुई बाहर जाने लगी तो मिंकू ने टोका—
‘‘मुझे रोक रही हो और खुद जा रही हो।’’ वह मुस्कराती हुई पलटी’’ पापा आने वाले होंगे, बर्तन भी मेरे लिए ही पड़ा होगा। मैं कोई बहाना करके आऊँगी, पर आप रुकियेगा जरूर भइया।’’
मिंकू ने गहरी साँस छोड़ी, ‘‘लड़की में कुछ खास है।’’
‘‘क्याऽऽ..’’ आली ने माथा सिकोड़ा, उसने सफाई दी, नहीं यार, तुम भी!
कुछ देर तक कोई नहीं बोला। मिंकू आली को देखता, आली दीवार को देखती फिर वह टेबुल को देखता, आली उसको देखती।
“मैं चलूँगा’’, मिंकू ने उस क्रम को तोड़ा
‘‘आपको जाना नहीं है।’’
‘‘क्या करूँगा रुककर’’ वह खड़ा हो गया। आली भी उसी तत्परता से खड़ी हो गयी।

‘‘आली मेरा बड़ा नुकसान होगा।’’ उसने आग्रह सा किया। आली ज्यों कि त्यों खड़ी रही, उसकी आँखों में एक शरारत खेल रही थी, साथ ही बहुत कुछ बात कर लेने के लिए आतुर एक मूक भाषा। उसने टालना चाहा पर उलझ गया। उसने आली का हाथ अपने हाथों में ले लिया और पृष्ठ भाग को दूसरे हाथ से आवृत्त कर, होठों से लगा लिया।
‘‘आली मैंने मजाक नहीं किया था, सच में तुम्हें चाहा था।’’
‘‘हुँह, लड़की की चाहत कोई नहीं जानना चाहता!’’
‘‘यानि मैंने तुम्हारी चाहत को नहीं जाना है?’’
‘‘दावा करते हो?’’ आली की आँखों में एक कठोरता फैल गयी। वह इस परिवर्तन को भौचक सा देखता रहा।
‘‘बोलो!’’ आली ने उसी में रहते हुए अपनी बात पर और बल दिया
‘‘क्यों नहीं!’’ मिंकू ने हिचक छोड़ दी।
‘‘तो, क्या खुद को मेरे अन्दर पलने दोगे।’’

वह भौचक सा देखने लगा आली को, आली की आँखों में अब भी कठोरता थी। मिंकू को अचानक कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह दीवार पर, खिड़की पर, आँगन में घूमकर पुन: आली पर रुक गया।
“अगर उसने नकार दिया तो…वह क्या समझेगा! सोचेगा कितनी गिरी हुई है…तो क्या हुआ, मैंने भी तो उसी से नेह की गाँठ जोड़ी थी। मन की बात फिर किससे कहूँगी, सोचे जो सोचना हो…!”
कब की यह बात उसके अन्दर पल रही थी, यह किसे पता? लड़की के मन में क्या है, कौन जान सकता है, यह व्यवस्था का दबाव ही है, मासिकता पर लगा सामन्ती पहरा ही है जो एक लड़की अबूझ पहेली बन जाती है। दोनों अपने-अपने ढंग से सोच रहे थे।
आली को दुबारा मिंकू की तरफ देखने का साहस न हुआ। मिंकू ने उसकी ठुड्डी को ऊपर उठाया। आली कुछ समझती उसके पहले ही उसने उसके होठों को फिर से चूम लिया। आली ने पलक उठाकर देखा और मिंकू की आगोश में सिमट गयी।

***
एक बार फिर सभा जमी, अन्ताक्षरी हुई, एकल गायन हुआ, पहेली बुझायी गयी, ओक्का-बोक्का हुआ, कउवा उड़, चिरई उड़ हुआ, नोंक-झोंक हुई।
हल्की ठण्डी की शुरूआत हो चुकी थी। सामने सबकी आँखों में नींद समाने लगी। आली की खुशी ना चाहते हुए भी दिख जा रही थी। आगे का कुछ नहीं पता था उसे, पर जो अभी था, वह बेहद सच्चा और इमानदार था।

(नोट-फीचर्ड इमेज गूगल से साभार, आर्टिस्ट-नूपुर सोलंकी।)

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