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कविता

‘जॉर्ज फ्लॉयड हम भी साँस नहीं लेे पा रहे हैं’

25 मई 2020 को अमेरिका मिनेपॉलिस शहर में अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय के 46 वर्षीय जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद के बाद पूरा अमेरिका सुलग उठा है। बताया जा रहा है कि यह मार्टिन लूथर किंग के बाद अमेरिका का अब तक का सबसे प्रभावशाली व बड़ा जन-आंदोलन है ।

इस आंदोलन में अब तक साढ़े चार हज़ार से ज्यादा गिरफ्तारियां हो चुकी हैं । इसके चलते अमेरिका के चालीस से ज्यादा शहरों में कर्फ्यू लग चुका है. ख़बरें बता रही हैं तोड़-फोड़, आगजनी, स्लोगन और जन-सैलाब से अमेरिका पट गया है ।

कोविड- 19 जैसी स्थितियों के बाद जब पूरी दुनिया ही लॉकडाउन जैसी स्थितियों से गुजर रही है तो अमेरिका में इस किस्म का आंदोलन कुछ कहता है. सवाल उठता है क्या यह आंदोलन अमेरिका में अचानक इन दिनों उठ खड़ा हुआ है?

आखिरकार उसकी जड़ में क्या है, जिसको वैश्विक समर्थन मिल रहा है और पूरी दुनिया के लोग एक स्वर हो गए हैं. क्या यह विरोध सिर्फ नस्लवाद का विरोध है जैसा कि ऊपरी तौर पर दिखता है या क्या यह गुस्सा इतना सतही है? या यह उबाल, एंगर और ही कुछ कहता है आखिरकार वह कौन सी वैश्विक व्यवस्था है जिसमें सब का दम घुट रहा है और सब के सब एक स्वर में कह रहे हैं- ‘आई कांट ब्रीथ’.

इतिहास बताता है कि अमेरिका में ‘नस्लवाद’ ह्ववाइट् सुप्रिमेसी कोई नई चीज नहीं है. यह अमेरिका की नींव का अभिन्न हिस्सा है. अफ़्रीकी-अमेरिकी लोग इसके लंबे समय से शिकार होते रहे. ऊपर से साफ सुथरे दिखने वाले अमेरिका की गलीज सच्चाई यही है.

इस उग्र आंदोलन के पीछे भले ही जॉर्ज फ्लॉयड की मौत तात्कालिक कारण के रूप में दिख रही हो लेकिन इसकी जड़ें अमेरिका में गहरी है. यह पहली बार नहीं है जब किसी अफ्रीकी अमेरिकी को पुलिस की हिंसा का शिकार होना पड़ा है.

इसका लम्बा इतिहास है. बल्कि आंकड़े बताते हैं कि पिछले 5 वर्षों में करीब 4,400 पुलिस शूटआउट के मामले सामने आए हैं जिनमें अफ़्रीकी-अमेरिकी समुदाय के लोगों को शिकार होना पड़ा है. वाशिंगटन पोस्ट की एक शोध रिपोर्ट मैं बताया गया है कि अफ़्रीकी-अमेरिकी लोग अमरीका की कुल आबादी का मात्र 13 फ़ीसदी हिस्सा हैं लेकिन पुलिस की गोली से मरने वालों की संख्या देखा को जाए तो कुल मौतों का एक चौथाई हिस्सा अफ़्रीकी-अमेरिकी लोगों का है.

निहत्थे लोगों की मौतों के मामले में कुल मौतों का एक तिहाई अफ़्रीकी-अमेरिकी लोग हैं. किसी निहत्थे ह्ववाइट् व्यक्ति की तुलना में किसी निहत्थे काले व्यक्ति के पुलिस द्वारा मारे जाने की संभावना चार गुना अधिक होती है और यह भी कि पिछले 5 वर्षों में पुलिस की गोली से औसतन हर दिन तीन अफ़्रीकी-अमेरिकी लोगों की मौत हुई है.

इन सब तथ्यों, कारणों के बाद भी मूल मामला सिर्फ नस्लवाद का नहीं लगता. बल्कि लगता है नस्लवाद, श्रम और संसाधनों की लूट को छुपाने का एक ज़रिया है. जिस चादर से अब तक इस लूट को ढकने-छुपाने का काम किया जा रहा था उसी को हथियार बनाकर अब इसको उजागर करने का काम हो रहा है.

इस आन्दोलन की पृष्ठभूमि में तीन मुख्य कारण दिखाई देते हैं- पूंजीवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था के अंतर्विरोध और मंदी, कोविड-19 जैसी महामारी की बाद उपजी बेरोज़गारी, और दक्षिणपंथी राजनीति के चलते बाद से बदतर हुआ नस्लवाद.

आर्थिक मामलों के जानकर शोधकर्ता चिंतक बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में अमीर और गरीब की खाई बहुत तेजी से बढ़ी है. (अधिक जानकारी के लिए देखें ऑक्सफैम इंटरनेशनल की रिपोर्ट्स) पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ा है. बेरोज़गारी की समस्या में अभूतपूर्व तेजी आयी है. आम जन का जीवन स्तर लगातार खराब हुआ है.

ये चेतावनियाँ भी दी गयीं कि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो जन-आक्रोश का सामना करना मुश्किल हो जायेगा. दरअसल आपदाएं सत्ता को नंगा कर देती हैं. कोविड-19 ने इस स्थिति में ‘कोढ़ में खाज’ का काम किया है. आंकड़े बताते हैं 4 करोड़ से ज्यादा अमेरिकी लोग सिर्फ महामारी के इस दौरान अपने रोजगार गवां चुके हैं. बाक़ी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पूर्वाग्रह, समझ और बेवकूफियों ने इस मामले को और हवा दे दी है. इन्हीं तीनों सम्मिलित स्थितियों की उपज है यह जन आक्रोश.

इस आंदोलन ने भारत को भी आंदोलित करने का काम किया है. भारतीय अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया में इस आंदोलन के पक्ष में बहुत कुछ लिखा जा रहा है. इस आंदोलन ने अमेरिका की चौहद्दी पार कर पूरी दुनिया को अपने साथ ले लिया है.

बहुत सारे लोग टिप्पणियां, लेख और कविताएं लिख रहे हैं, अपना जुड़ाव व प्रतिबद्धता इस आन्दोलन के साथ दिखा रहे हैं, इस मामले को अपनी तरह से समझने की कोशिश कर रहे हैं और अपने यहां के शोषण के साथ, जोड़ कर देख रहे हैं.

इधर तीन कविताएं सोशल मीडिया पर दिखी, जिनमें इस आंदोलन की धमक सुनाई देती है- पहली कविता वरिष्ठ कवि मदन कश्यप जी की है, दूसरी कविता सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यकर्ता सीमा आज़ाद की है. और तीसरी कविता समकालीन कवयित्री पूर्णिमा मौर्या की है. तीनों ने अपनी तरफ से इस आंदोलन को समझने, आत्मसात करने के साथ, जो महसूसा है उसे कविता का विषय बनाया है.

तीनों कविताएं इस आन्दोलन से उपजी होने के साथ एक और कॉमननेस रखती हैं. वर्तमान व्यवस्था के भीतर जो घुटनभरा माहौल है, उसके प्रति कसमसाहट और प्रतिकार तीनों में दिखाई पड़ता है. प्रस्तुत हैं पाठकों के लिए क्रमशः तीनों कविताएँ –

1. मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ
-मदन कश्यप

वह न रोया
न गिड़गिड़ाया
न दया की भीख मांगी

बस एक सच को
अपने समय
और समाज के सत्य को
तथ्य की तरह रखा

साँस टूटने के पहले की
आखिरी आवाज़ थी
‘मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ ‘!

2. आई कांट ब्रीथ
-सीमा आज़ाद

मुझे घुटन हो रही है

सदियां बीत गईं
मेरे फेफड़े नहीं भर सके ताज़ी हवा से,
जॉर्ज फ्लॉयड
केवल तुम नहीं
हम भी सांस नहीं लेे पा रहे हैं।

गांवों के बजबजाते दक्खिन टोले में,
महानगरों के विषैले सीवर होल में,
मनुवाद के घुटनों तले
घुट रहे हैं हम
सदियों से।
जॉर्ज फ्लॉयड
हम भी सांस नहीं लेे पा रहे हैं।

घरों के सामंती बाड़े में,
रसोईघर के धुएं में,
धर्मग्रंथों के पन्नों तले
पितृसत्ता के क़दमों तले,
घुट रहे हैं हम
सदियों से।
जॉर्ज फ्लॉयड
केवल तुम नहीं
हम भी सांस नहीं लेे पा रहे हैं।

हम भी सदियों से सांस नहीं लेे पा रहे हैं
अहिल्या और सीता के रामराज्य से –
ऊना के लोकतंत्रिक राज्य तक,
हममें से कुछ घुटन से मरे
तो कुछ का दम घोंट दिया गया
तुम्हारी तरह।
रोहित वेमुला, प्रियंका भोटमांगे, सुरेखा भोटमांगे
और कई अनाम नामों की
लंबी श्रृंखला है
जो इस घुटन से मारे गए।

जॉर्ज फ्लॉयड,
तुम्हें यूं मरते देख
हमारी घुटन बढ़ रही है,
पूरी दुनिया में घुटन बढ़ गई है,
अचानक हम सबने एक साथ महसूस किया-
‘वी कांट ब्रीथ’
हमें ताज़ी हवा चाहिए।

तुम्हारे देश में
लोग मुट्ठी तानें सड़कों पर उतर गए हैं
घुटन से निकलने के लिए,
ताज़ी हवा के लिए,

जॉर्ज फ्लॉयड,
यह हवा आंधी बन सकती है।
इसे इधर भी आने दो।

3. जार्ज फ्लॉयड के नाम
-पूर्णिमा मौर्या

ज़ालिम तो ज़ालिम होते हैं
चाहे हमारे देश में हो
या
तुम्हारे देश में हों
साथी जॉर्ज फ्लॉयड*!

तुमने देखा होगा
इनमें होती है
एक सी हवस
एक सी सनक
एक सी अकड़
और एक ही सी क्रूरता
हमें और तुम्हें
रौंद देने की
साथी जॉर्ज फ्लॉयड!

तुमने महसूसा होगा
इनमें होती है
एक सी पत्थरदिली
एक सी मक्कारी
एक सी बेशर्मी
एक सा ठण्डापन
और एक ही सा लचीलापन
साथी जॉर्ज फ्लॉयड!

तुमने समझा भी होगा
‘द नी ऑन द नेक’
हमारे और तुम्हारे समय का रूपक है
और यह भी कि
इनका दिल चूहे सा
चरित्र लोमड़ी सा
क्रूरता भेड़िये सी होती है
इन्हें गुरेज नहीं होता
छुपने से
घुटनों के बल आने से
या गर्दनें तोड़नें से
हमारी और तुम्हारी
साथी जॉर्ज फ्लॉयड!

तुमने भी सुना होगा
दुनिया के हर कोने में
इन्हें
एक ही ढंग से मुस्कराते
‘मन की बातें’ सुनाते
गुर्राते
बेहयाई करते
साथी जॉर्ज फ्लॉयड!

सच कहूँ साथी
इंसानियत की बिना पर
कुर्सियों पे जमे
ये वहशी लोग क़ब्ज़ा लेना चाहते हैं
हमारा-तुम्हारा स्पेस
सोख लेना चाहते हैं
तुम्हारे-हमारे हिस्से की
धूप
हवा
पानी
और ऑक्सीजन।

अपने गर्दन पर
आठ मिनट छियालीस सेकेंड
डेरेक शॉविन** के
घुटने का दबाव सहते हुए
तुमने क्या महसूसा होगा?
जब घुट रहीं थी
तुम्हारी सांसें
जब कह रहे थे तुम
‘प्लीज़, आई कांट ब्रीद*
साथी जॉर्ज फ्लॉयड!

तुम्हें
याद तो आए होंगे
तुम्हारा प्रिय शहर
रौशनी, हवा, घर
मां, पत्नी, दोस्त
और तुम्हारी प्यारी सिगरेट
साथी जॉर्ज फ्लॉयड!

तुम्हें
याद तो आये होंगे
तुम्हारे पुरखे
तुम्हारा इतिहास
इतिहास की कालिमा
तुम्हारा वर्तमान
साथी जॉर्ज फ्लॉयड!

और याद आएं होंगे
माइकल ब्राउन
जमार क्लार्क
जेरेमी मैक्डोल
विलियम चैपनमैन
वॉल्टर स्कॉट
अहमद आर्बेरी
ब्रेओना टेलर**
और ढेर सारे
ह्वाइट सुप्रिमेसी के शिकार
तुम्हारे अपने लोग
साथी जॉर्ज फ्लॉयड!

मुझे भी याद आ रहा है
मेरा इतिहास
मेरा वर्तमान
और ढेर सारे हताहत अपने लोग
साथी जॉर्ज फ्लॉयड!

घुट रही हैं मेरी भी सांसें
दमघोंटू
माहौल में।

*25 मई से अमेरिका के मिनियापोलिस में अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय के 46 वर्षीय जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद पूरे अमेरिका में प्रदर्शनों की लहर उठ गई है। पुलिस और प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोग पुलिस हिंसा को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

**25 मई 2020 को मिनियापोलिस पुलिस के एक पुलिसकर्मी डेरेक शॉविन ने जॉर्ज की गर्दन को आठ मिनट छियालीस सेकेंड तक अपने घुटने से दबाये रखा था, जिसके बाद जॉर्ज की मौत हो गयी। इस किस्म की रेसिस्ट पुलिसिया क्रूरता का अब वैश्विक स्तर पर विरोध हो रहा है।

*जार्ज फ्लायड के अंतिम शब्द

**माइकल ब्राउन, जमार क्लार्क,जेरेमी मैक्डोल, विलियम चैपनमैन, वॉल्टर स्कॉट, अहमद आर्बेरी, ब्रेओना टेलर अफीक्री-अमेरिकी लोगों के कुछ नाम हैं जिन्हें विगत वर्षों में ह्वाइट रेसिस्ट पुलिस हिंसा का शिकार होना पड़ा है।

  • टिप्पणीकार सर्वेश मौर्या डॉ. सर्वेश कुमार मौर्य समकालीन आलोचना का चर्चित नाम हैं और NCERT, मैसूर, में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। संपर्क: [email protected]
  • मदन कश्यप – ‘गूलर के फूल नहीं खिलते’ (1990), ‘लेकिन उदास है पृथ्वी’ (1993), नीम रोशनी में (2000) के कवि, समकालीन हिंदी कविता के चर्चित और सम्मानित कवि।
  • सीमा आज़ाद
    संपादक दस्तक नए समय की पीयूसीएल से जुड़ी मानवाधिकार कार्यकर्ता
    प्रकाशित रचना – जेल डायरी – ज़िंदांनामा : चांद तारों के बगैर एक दुनिया। कहानी संग्रह – सरोगेट कंट्री
  • डॉ़ पूर्णिमा मौर्या – एक कविता संग्रह ‘सुगबुगाहट’ और एक आलोचना पुस्तक ‘कमजोर का हथियार नाम से स्वराज प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित, पत्र, पत्रिकाओं व पुस्तकों में निरंतर लेख व कविताएं प्रकाशित। सम्प्रति-मैसूर में रहवास और स्वतंत्र लेखन. ईमेल – [email protected] 

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