गाथा इक सूरमे दी : जन नायक कामरेड बलदेव सिंह मान पर एक खोज खोज पूर्ण पुस्तक

पुस्तक

सुखदर्शन नत्त 


पंजाब के नक्सलवादी आन्दोलन से उभर कर सामने आये जन नायक और राजनैतिक नेताओं की पहली पंक्ति में आने वाले कामरेड बलदेव सिंह मान को शहीद हुए तकरीबन 34 वर्ष गुजर चुके हैं.

इतनी लम्बी अवधि के बाद उनके जीवन पर किसी पुस्तक का छपना स्वयं में ही इस बात का सबूत है कि न केवल वह क्रन्तिकारी आदर्श, जिनके लिए संघर्ष करते हुए कामरेड बलदेव मान ने अपनी जान कुर्बान की थी, आज भी समाज में उसी तरह प्रासंगिक हैं, बल्कि मान के साथी और वारिस अभी भी उसी शिद्दत, लगन और हिम्मत से उस संघर्ष को आगे बढ़ा रहे हैं.

इस पुस्तक के सम्बन्ध में विशेष बात यह भी है कि पुस्तक का सम्पादक कामरेड हरभगवान भीखी ने किया है. वे बलदेव मान के समकालीन नहीं है, बल्कि मान की शहादत के समय उनकी उम्र केवल 11 वर्ष की थी. वह कोई अकादमिक खोजकर्ता या इतिहासकार भी नहीं है न ही उनका कामरेड मान के कार्य क्षेत्र अमृतसर के साथ या उनके राजनीतिक दल के साथ कोई भी संगठनात्मक सम्बन्ध रहा.  हरभगवान का  जन्म पंजाब के मानसा ज़िले में हुआ और वे वहां पले-बढे.

हरभगवान, सीपीआई (एम एल) लिबरेशन के पूर्णकालिक सक्रिय कार्यकर्ता हैं. उनकी कर्मभूमि भी अब तक मालवा क्षेत्र ही रही है.  पुस्तक प्रकाशित करने जैसे जिस कार्य की अपेक्षा कामरेड मान के नज़दीकी साथियों या सियासी हमसफरों से की जाती थी, वह कार्य हरभगवान ने गंभीर वित्तीय संकट और बावजूद कामरेड मान के कार्यक्षेत्र से ढाई सौ किलोमीटर दूर रहने के बावजूद पूरा कर दिखाया.

इस कार्य के लिए हरभगवान भीखी को निश्चित ही क्रन्तिकारी आंदोलन की प्रतिबद्धता और शहादत से प्रेरणा मिली होगी. इसी वजह से वह इस बेहद कठिन और बुरी तरह पिछड़ चुके महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने में सफल रहे. परिणाम स्वरूप शहीद मान की स्मृति में यह पुस्तक आपके हाथों में पहुंच सकी.

इससे पहले वे इंकलाबी लहर की जानी-पहचानी महिला नेता (स्वर्गीय) कामरेड जीता कौर और राज्य के प्रथम पंक्ति के नक्सली शहीद कामरेड अम्र सिंह अच्चरवाल से सबंधित दो पुस्तकों को भी जनता तक पहुंचा चुके हैं. कामरेड मान से सबंधित यह पुस्तक हरभगवान की तीसरी ऐसी खोज पूर्ण पुस्तक है जो नक्सली आंदोलन को समर्पित है.

बलदेव मान से सबंधित पुस्तक लाने का यह कोई पहला प्रयास नहीं है.  हरभगवान की तरफ से यह पुस्तक प्रकाशन का कार्य हाथ में लेने से करीब दस वर्ष पूर्व पंजाबी के जाने-पहचाने कहानीकार अजमेर सिद्धु ने भी नक्सलवादी आंदोलन पर पुस्तक तैयार करने का प्रयास बहुत ही जोशो खरोश और उत्साह के साथ-साथ क्रन्तिकारी भावना को लेकर ही शुरू किया था.

उन्होंने बहुत सी सामग्री संकलित भी कर ली थी लेकिन संकीर्ण सोच के कुछ लोगों के असहयोग और बेतुके किंतु-परंतु वाले सिलसिले ने उन्हें इतना परेशान कर दिया कि उन्होंने जहां से यह प्रोजेक्ट शुरू किया था उसे वहीँ पर समाप्त कर दिया. इस सब के बावजूद इसे अजमेर सिद्धु की खुलदिली ही कहना चाहिए कि जब हरभगवान ने इस प्रोजेक्ट को हाथ में ले कर अजमेर सिद्धु से सम्पर्क किया तो उन्होंने सारी की सारी सामग्री उनके हवाले कर दी.

इसके साथ ही हर सम्भव सहयोग का भी वायदा किया. मैं गवाह हूं कि कामरेड मान के परिवारीजनों , रिश्तेदारों, नज़दीकी दोस्तों-मित्रों-संग्रामी साथियों और डाक्टर अवतार सिंह ओठी ने इस पुस्तक के लिए बहुत सहयोग दिया. इस सभी के पास कामरेड की यादों की जो भी पूंजी जिस जिस रूप में भी थी उसे हरभगवान को सौंप दिया. इनमें शहीद मान की रचनाएं भी थीं.

किताब की समुचित सामग्री का अध्ययन करते हुए मुझे अहसास हुआ कि पंजाब के नक्सली धड़ों के ज़्यादातर नेता लहर के इतिहास, इसमें समय-समय पर उठने वाली बहसों के संबंध में खुल कर बात करने, अपनी यादों के कड़वे-मीठे अनुभवों पर लिखने या मांग करने पर भी ऐसा रचनात्मक सहयोग देने के मामले में बहुत ही कंजूस या “शरमाकल” स्वभाव के हैं. वे नई सामाजिक सियासी हालात के नज़रिये से भी अतीत को फिर से देखने, जांचने और परखने की बात पर कोई उत्साह नहीं दिखाते.

यह सब किसी जीवित और आगे बढ़ने के इच्छा रखने वाली इंक़लाबी लहर के लिए कोई शुभ लक्षण नहीं हैं.
नेताओं की तरफ से नया लिखने या घटनाओं और घटनक्रमों का नए सिरे से विश्लेषण करने के मामले में उदासीन होने का ही परिणाम है कि इस पुस्तक के लिए सामग्री संग्रहित करने के लिए सम्पादक को उन्हीं रचनाओं का सहारा लेना पड़ा जो कामरेड मान की शहादत के बाद विभिन्न क्रन्तिकारी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। मांग करने के बावजूद एक दो को छोड़ कर किसी ने (जिनमें मैं खुद ही शामिल हूँ) भी पुस्तक अपना ताज़ा लेख/संस्मरण नहीं लिखा.

इसी लिए पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक महसूस करेंगे कि इस पुस्तक में कामरेड मान के हंसी-मज़ाक वाले स्वभाव, इंकलाबी लगन, निडरता, बेपरवाही, लोकप्रियता और सफलता पूर्वक लड़े गए जन आंदोलनों का ज़िक्र और ऐसे कई तरह के लिश्कारे तो कई जगहों पर नज़र आते हैं लेकिन उस दौर और उसके बाद के सामाजिक व सियासी हालात में आई तब्दीलियों का विवरण और इन तब्दीलियों के पीछे कार्यशील शक्तियों व कारणों का कहीं भी सटीक विश्लेषण कहीं नज़र ही नहीं आता.

नई पीढ़ी के सूझवान पाठकों के मन में जिज्ञासा होगी कि आनंदपुर साहिब का प्रस्ताव क्या था ? कैसे पंजाब के साथ धक्के की बात करने वाला, राज्यों को अधिक अधिकारों और फैडरल ढांचे को कायम करने जैसी लोकतान्त्रिक मांगों पर बहुत बड़ा सियासी आंदोलन खड़ा करने वाला, पंजाब के दरियाई पानियों के अनुचित बटवारे के खिलाफ बोलने और मार्कसी पार्टी के साथ मिल कर एस वाई एल नहर की खुदाई के खिलाफ कपूरी गांव में मोर्चा लगाने वाला अकाली दाल अचानक “धर्म युद्ध” की तरफ कैसे फिसल गया ?

आपरेशन ‘ब्लू स्टार’ जैसे कहर भरे और अमानवीय कुकृत्य और इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद नवंबर-1984 में देश भर में दिल्ली सहित अन्य स्थानों पर  सिखों के भयानक हत्याकांड से महज़ 8 महीने बाद ही अकाली दल के प्रधान संत हरचंद सिंह लोंगोवाल 24 जुलाई 1985 को राजीव गाँधी के साथ बैठने और “राजीव लोंगोवाल समझौते” के नाम से जाने वाले पूरी तरह निक्क्मे और पंजाब विरोधी समझौते पर हस्ताक्षर करने को क्यों और कैसे मान गए ?

इतिहास में एक जुझारू पार्टी के तौर पर उभरा अकाली दल धीरे-धीरे मोदी की साम्प्रदायिक और तानाशाह केंद्रीय सत्ता का बहुत ही वफादार सहयोगी कैसे बन गया ? खालिस्तानी उभार और शर्मनाक पतन के क्या कारण थे ? पंजाब समस्या पर वाम के अलग अलग धड़ों/दलों की समझ और पहुंच क्या थी ? ये बहुत से सवाल हैं जिन पर यह पुस्तक चर्चा करती नज़र नहीं आती.

ऐसी किसी भी पुस्तक के लेखक या सम्पादक के रास्ते में आने वाली एक निश्चित समस्या यह है कि क्रन्तिकारी लहर और इसके अलग-अलग सियासी या जन संगठनों से सबंधित पांडुलिपियां, रचनाएँ, प्रकाशित सामग्री, दस्तावेज़ों, यहाँ तक कि उनकी पत्र-पत्रिकाओं की फाईलों की सही संभाल और बाकायदा रेकार्ड रखने के मामले में हालत कोई ज़्यादा अच्छी नहीं है.

यही कारण है कि ज़रूरत की छपी हुई सामग्री या तो ढूंढे भी नहीं मिलती और या फिर “गुप्त रेकार्ड” के नाम पर इंकार कर दिया जाता है. ऐसी हालत में लेखक के पास बस यही उम्मीद बची है कि जिस शहीद पर पुस्तक लिखनी है उसका कोई साथी मिल जाये जो व्यक्तिगत रुचि के चलते कोई रेकार्ड या समाग्री संभाल कर बैठा हो. साथ ही यह भी आवश्यक है कि वह खज़ाना लेखक/सम्पादक के साथ साझा भी करने को तैयार हो. आप समझ सकते है ऐसा सब कुछ कोई लाटरी लगने जैसा ही होता है जिसकी कोई भी गारंटी नहीं होती.

इन सभी समस्यायों को आपके साथ बांटने का मकसद यही है कि यदि इन सभी दिक्क्तों के बावजूद कामरेड मान की शहादत के साढ़े तीन दश्कों के बाद भी हरभगवान इस पुस्तक की सामग्री एकत्र करके उसे छपवा लेते हैं तो यह किसी बहुत बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है.

विशेष तौर पर ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार पर कामरेड मान का लेख एक ऐसी रचना है जो साबित करती है कि इस पर कामरेड मान और इंकलाबियों की सोच उस सोच से पूरी तरह अलग थी, जो खालिस्तानी आतंकवाद के विरोध और “देश की एकता अखंडता की रक्षा” की आड़ में इन समस्यायों को पैदा करने वाली केंद्रीय सत्ता के पीछे जा कर खड़ी हो गईं थीं.

मैं समझता हूं कि यह प्रेरणामय पुस्तक केवल कामरेड बलदेव सिंह मान को उचित श्रद्धांजलि ही नहीं बल्कि अलग-अलग इंकलाबी नेताओं और शहीदों पर लिखी जाने वाली ऐसी पुस्तकों में अनजाने ही ऐसे बहुत घटनाक्रम, तारीखें, नाम-जगह, और व्यक्तियों के हवाले सुरक्षित हो जाते हैं जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के इतिहासकारों के लिए बहुत ही लाभप्रद्ध और सटीक हवाला स्रोत बनना होता है. मैं आशा करता हूँ कि साथी हरभगवान भविष्य में लेखन के क्षेत्र में और भी अधिक गंभीरता और मेहनत के साथ कार्य करेंगे.

(लेखक सुखदर्शन नत्त सीपीआई एम एल, लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी की सदस्य हैं, पंजाबी से अनुवाद-हिंदी स्क्रीन डेस्क )

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