समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

कविता

पूनम सोनछात्रा की कविताएँ प्रेम और दर्शन के महीन सिरे हैं

समकालीन जनमत
नवीन रांगियाल कई बार मैं महसूस करता हूँ कि कविताएँ किसी की नींद की तरह होनी चाहिए. उसकी धड़कन की हल्‍की आवाज़ें महसूस करने की...
स्मृति

केपी ससी : अद्भुत रचनात्मक अभिव्यक्ति, बेजोड़ प्रतिबद्धता

राम पुनियानी
सन् 1970 का दशक भारत में लगभग सभी क्षेत्रों में प्रतिरोध के आंदोलनों के उभार के लिए जाना जाता है। इस दशक में मजदूरों और कृषकों के...
कविता

‘ कविता, जीवन का उत्सव है/कविता थकने का नहीं/ लड़ने का नाम है ‘

आशाराम जागरथ, उमेश पंकज और भगवान स्वरूप कटियार का कविता पाठ  लखनऊ। जन संस्कृति मंच (जसम), लखनऊ की ओर से ‘सृजन हमारे समय में’ श्रृंखला...
कविता

रवित यादव की कविताएँ प्रश्नाकुल और उर्वर भावभूमि से उपजती हैं

उमा राग
आलोक रंजन हाल में रवित यादव की कविताओं से रु ब रु होने का मौका मिला । उनकी कविताओं में युवतर जीवन की समाज की...
सिनेमा

शासकवर्गीय प्रचार के विपरीत जनसामान्य के जीवन की वास्तविक तस्वीर दिखा गया पटना फिल्मोत्सव

समकालीन जनमत
‘ मट्टों की साइकिल’ के प्रदर्शन के साथ तेरहवें पटना फिल्मोत्सव का पर्दा गिरा पटना। ‘प्रतिरोध का सिनेमा : पटना फिल्मोत्सव’ फिल्म के क्षेत्र में सक्रिय...
सिनेमा

पटना फिल्मोत्सव : फिल्मों ने मानवीय सौहार्द, संवेदना और जीवन रक्षा के गंभीर सवालों को उठाया

समकालीन जनमत
पटना। सवालों से घिरे हुए हमारे समाज और देश में सत्ताधारी राजनीति प्रायः उनके हल नहीं तलाशती, बल्कि उन्हें और उलझाती है। समस्याओं को और...
जनमतसाहित्य-संस्कृति

हिंदी जातीयता के निर्माण का सवाल और निराला

दुर्गा सिंह
निराला बंगाली जातीयता से प्रभावित थे। ब्रह्म समाज, रामकृष्ण परमहंस, देवेन्द्र नाथ टैगोर, रवीन्द्र नाथ  टैगोर, विवेकानंद  के अलावा बंगाल के इस जागरण में जितने...
सिनेमा

फासीवादी ताकतों को हराना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए : लाल्टू

समकालीन जनमत
रेणु की फिल्म ‘संवदिया’ से उठा 13वें पटना फिल्मोत्सव का पर्दा पटना। ‘‘हमारे मुल्क में जब नफरत के लंबरदार नंगा नाच रहे हैं, हर कहीं...
कविता

सुंदर चंद ठाकुर की कविताएँ मर्मभेदी यथार्थ को उजागर करती हैं

समकालीन जनमत
कुमार मुकुल फौजी, संपादक और मैराथन दौड़ाक सुंदर चंद ठाकुर के भीतर इतना संवेदनशील कवि निवास करता है यह नहीं जान पाता अगर उनकी ‘चयनित...
पुस्तक

सुरेश काँटक की कहानियाँ : बर्बर होती व्यवस्था का “आनावरण ”

समकालीन जनमत
  भोजपुर की धरती सामंतवाद विरोधी किसान आंदोलन के लिए ख्यात है। वहीं, यह हिंदी कथा जगत में अपनी त्रयी के लिए भी जानी जाती...
कविता

सुधा उपाध्याय की कविताएँ सत्ता के क्रूर प्रपंचों को उजागर करती हैं

समकालीन जनमत
अंशु चौधरी समकालीन हिंदी कविता परिदृश्य में सुधा उपाध्याय परिचित नाम हैं। वे अपनी रचनाओं में अपनी विशिष्ट रचनात्मक तेवर, भाषा, और नवीन एवं सूक्ष्म...
पुस्तक

संस्थाओं की स्वायत्तता और लोकतंत्र

गोपाल प्रधान
सभी जानते हैं कि हमारे देश में जो भी लोकतंत्र है उसके पीछे संस्थाओं की स्वायत्तता की प्रमुख भूमिका है । न केवल न्यायपालिका, कार्यपालिका...
साहित्य-संस्कृति

उपन्यास ‘कर्बला दर कर्बला’ पूरे देश की कथा है

पटना। कालिदास रंगालय में नौ दिसम्बर को 1980 के दशक के भागलपुर पर केंद्रित गौरीनाथ के उपन्यास ‘कर्बला दर कर्बला’ पर हिरावल की ओर से...
कविता

दिव्या श्री की कविताएँ अपने परिवेश को ईमानदारी से व्यक्त करने की कोशिशें हैं

समकालीन जनमत
देवेश पथ सारिया युवा कवयित्री दिव्या श्री की कविताओं को लेकर सकारात्मक बातें पहले कहूँ तो दिव्या श्री द्वारा अपने परिवेश को ईमानदारी से व्यक्त...
सिनेमा

‘कंतारा’ जमीन की लड़ाई और हिस्सेदारी की एक मिथ कथा         

   जनार्दन  कंतारा कन्नड़ भाषा की फिल्म है, जो 30 सितंबर 2022 को देश और विदेश में रिलीज हुई। कन्नड़ भाषा के अलावा यह फिल्म...
कविता

महेश वर्मा की कविताएँ अनेक अबूझ, बिखरे दृश्यों से संवाद करती हैं

समकालीन जनमत
वसु गंधर्व पाठक बड़ी तन्मयता से, कविताओं के आवरणों से होकर कवि के हृदय की निशीथ तहों को आँकता है। कविता की अपनी अर्थ-भाव-भूमि से इतर,...
पुस्तक

भगत सिंह के साथी: यह किताब क्रांतिकारियों को तथ्यात्मक विवेचना की आधार भूमि पर परखते हुए नए रूप में सामने लाती है

समकालीन जनमत
अश्रुत परमानंद   किसी कवि, (शायद शैलेंद्र) की पंक्तियाँ थीं, “भगतसिंह इस बार न काया, लेना   भारत वासी की. मातृभूमि के लिए अभी भी, सजा ...
कविता

शशिभूषण बडोनी की कविताएँ बड़ी सरलता से दिल पर दस्तक देती हैं

समकालीन जनमत
कल्पना पंत शशिभूषण बडोनी की कविताएँ बड़ी सरलता और ख़ामोशी से दिल पर दस्तक देती हैं. पहली बार इन कविताओं को पढ़ने पर शिल्प की...
पुस्तक

अंबेडकर का वैचारिक निर्माण

गोपाल प्रधान
अंबेडकर की जीवनी लिखने की उलझन का जिक्र करते हुए वी गीता 2021 में पालग्रेव मैकमिलन से प्रकाशित अपनी किताब ‘भीमराव रामजी अंबेडकर ऐंड द...
साहित्य-संस्कृति

मुक्तिबोध पूँजीवादी समाज की जड़ को पकड़ने वाले कवि हैं :  डॉ. वंदना चौबे

 “मुक्तिबोध की रचनाधर्मिता और हमारा समय” पर संगोष्ठी वाराणसीः प्रलेस की बनारस इकाई की सचिव और आर्य महिला पीजी कॉलेज में सहायक प्रोफेसर डॉ. वंदना...
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