समकालीन जनमत
कविता

शशिभूषण बडोनी की कविताएँ बड़ी सरलता से दिल पर दस्तक देती हैं

कल्पना पंत


शशिभूषण बडोनी की कविताएँ बड़ी सरलता और ख़ामोशी से दिल पर दस्तक देती हैं. पहली बार इन कविताओं को पढ़ने पर शिल्प की सादगी मन मोह लेती है . कविताओं में जीवन के सहज चित्र हैं और वे जीवन के छोटे-छोटे लम्हों को स्पर्श करती हुई रुई के फाहों सी धरातल पर हौले से उतरती हैं.  हाल में ही ‘समय साक्ष्य’ से उनका पहला कविता संग्रह ‘पत्थर की लकीरें’ प्रकाशित हुआ है संग्रह की पहली कविता ‘नदी’ गहन अर्थपूर्ण कविता है नदी अपने रास्ते चुपचाप बहती चलती है मार्ग के बड़े से बड़े अवरोधों को सहन करती हुई जीवन रस की संभावनाओं का सृजन करती हुई. पहाड़ सी कठोर नहीं पर पहाड़ सा धीरज रखती है-

वह नहीं है पहाड़ सी है कठोर
जो करे विरोध
नदी तो है सहृदय
वह नहीं बेबस
करती सबका परोपकार

‘लड़की’ कविता में स्त्री की सामाजिक स्थिति व्यंजित है, अंगूठी कविता इच्छा और आवश्यकता के मध्य की ऊहापोह को अभिव्यक्त करती है, मां दुनियावी दृष्टि से पढ़ी लिखी नहीं है लेकिन सबका मन पढ़ लेती है-

माँ है नहीं पढ़ी लिखी
पढ़ लेती है कैसे
मन की बातॆं हम सबकी
अन्तर्यामी सी चुपचाप!

मौत का डर कविता में  पीछे छूट जाते परिवार की स्थिति की चिन्ताओं का अंकन है कवि अपने पीछे छूट जाते परिवार की तकलीफों की दहशत से भर कर सोचता है-

माँ की बूढ़ी आँखें
जो थी लगाये मुझसे बड़ी आस
थक गयीं हैं घूरते-घूरते
आसपास उदास

गाँव से अधिकतर लोगों का संबंध विभिन्न स्थान से आये हुए एक साथ गाड़ी में बैठे हुए यात्री जैसा रह गया है-

गाँव और मेरे बीच
रह गया है इतना संबंध
जितना एक यात्री का होता है
बगल की सीट पर बैठे
दूसरे यात्री से
बातॆं होती हैं
बस वैसे ही!

मायके में आई हुई बेटी इस दुविधा में है कि वह वहाँ मेहमान है या मेजबान. सार्थक काम कविता इस तथ्य को उकेरती है कि केवल कविता लिख देना नहीं अपितु बीहड़ों में उस कविता के साथ- साथ चलना भी है , आग की बात करना नहीं आग में उतरना भी है. पत्थर की लकीरें इस कविता संग्रह की सिग्नेचर कविता है. पहाड़ दूर से मनोरम लगते हैं पर पास से देखने पर दरकती खिसकती चट्टानें, उबड़ खाबड़ रास्ते सामने आते हैं, लेकिन फिर भी पहाड़ सुन्दर हैं श्रम के सौंदर्य और जीवन सौंदर्य की वजह से-

पीठ पर घास-लकड़ी लाती औरतें
पैदल नंगे पैर स्कूल जाते
छॊटे-छोटे बच्चे
चढते-उतरते खेत खेत खलियान
कितनी-कितनी थी
सुंदरताएँ

बर्फ की विडंबना यह है किउसमे कुछ भी जीवित नहीं रहता और मृत देह वहाँ एकदम सुरक्षित रहती है, सबसे सुंदर हाथ बेटी की विदाई के वक्त ,भोलापन, पीठ पर पहाड़, सचाई, सबसे बड़ी व बुरी खबर. व्यवहार, चलने का सुख. उन्मुक्त हँसी, फोटोग्राफी, गाँव का धारा, रुचियाँ और जुनून, महिलाओं के सरोकार इत्यादि विविधतापूर्ण कविताएँ हैं. किताबें कविता एक कैदी के जेल में बिताए अंधेरे वर्षों पर लिखी गई हैं जिन्हें किताबों के सान्निध्य ने उजाले से भर दिया-

किताबें
हैं जो जेल जीवन की मेरी
बहुत बड़ी अनमोल धरोहर
मैं चाहता हूँ संजोना
इन अनमोल संजीवनी सरीखी
किताबों को आजीवन
लोगों के जीवन में भी पहुँचे
ताकि रोशनी की किरण!

इस संग्रह की एक खास उपलब्धि है, कि कविताओं की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते बेहद भावव्यंजक रेखाचित्र.

कुल मिलाकर संग्रह की कविताओं में विषय वैविध्य है. बड़ी साधारण सी लगती कविताएँ असाधारण प्रभाव छोड़ती हैं. कविताओं में शब्दों. बिम्ब प्रतीकों का चाकचिक्य नहीं है,लेकिन वे जीवन से गहरे रूप से जुड़ी हुई हैं.

 

शशिभूषण बडोनी की कविताएँ

1. नदी

बह रही चुपचाप
ऊँचे-नीचे रास्ते पर
लगातार

पहाड़ यदि बनता
राह में अवरोध
वापस नहीं होती

नदी
धार के विपरीत
सहन कर अवरोध
बहती पुन: प्रवाह की ओर
वह नहीं है पहाड़ सी कठोर
जो करे विरोध
नदी तो है सहृदय
वो नहीं बेबस
करती सबका
परोपकार

वो भली है
लेकिन एक ताक़त है
और संभावना

 

2. संबंध

गाँव और मेरे बीच
रह गया है इतना संबंध
जितना एक यात्री का होता है
बगल की सीट पर बैठे
दूसरे यात्री से बातें होती हैं
बस वैसे ही!

गया  था गाँव से
कभी शहर
सोचा था-
आउँगा कभी लौटकर
तो होगी अपनी भी
एक पहचान!

 

3. सार्थक काम

आजकल मैंने कई
काम किए
विश्व बंधुत्व पर एक कहानी लिखी
गोधरा में हुए दंगे पर एक लेख
आतंकवाद के खिलाफ एक टिप्पणी
तुम आजकल क्या कर रहे हो
मेरे दोस्त
जब हो रहा है
इतना कुछ अनर्थ
हमारे देश में आजकल?
वह चुप रहा
बहुत देर तक देखता रहा
शायद मेरी कलम की ओर चुपचाप!
फिर धीरे-धीरे उसने
हाथ दिखाए अपने
जो थे बहुत झुलसे हुए
वह बोला-
मैंने एक जलती हुई
झोंपड़ी में से एक बच्चे को बचाने में
थोड़ी मदद की
और यह हाथ झुलस गये
आजकल तभी नहीं दिखाई नहीं दिया मैं
करवा रहा था
दरअसल
इन हाथों का इलाज !

 

4. पत्थर की लकीरें

पहाड़
कौन सा पहाड़
एक पहाड़ तो वह भी होता है
देखते हैं जिसे सैलानी
कार में घूमते हुए
कहते हैं वाह!क्या सुन्दर!
मारवलस सीन
टंगी होती है जिस पहाड़ की
तस्वीर उनके ड्राइंग रूम में.
और एक पहाड़ जिसे
आपको देखना होगा
वहाँ पहाड़ सा जीवन जीने वालों का,
जीवट से जो ढोते हैं
रोज पहाड़ सा बोझ
दिख जाएगी
खेत में काम करती औरतों
की दिनचर्या में हर रोज!
घास लकड़ी पानी को पीठ पर ढोती
गोबर से सने पैर
जिनमें पड़ीं दरारें
और हाथों पर
पत्थर की लकीरें!

 

5. बर्फ

यहाँ पहाड़ों की शान्त वादियों में
जब कभी हो जाता है मन
उदास, अशांत, उद्विग्न, परेशान
मिलता है मुझे सुकून निहारकर
हिमालय के गंभीर शांत
ऊँचे-ऊंचे हिमशिखर
उतर आता है मन अवसाद से
हिमालय की गंभीर शांति देखकर
पर अभी यह समाचार पढ़ हूँ हैरान
कि हिमालय में मिले
कई सौ वर्षों पूर्व मृत शरीर थे
वहाँ अब तक सुरक्षित
जस के तस
बर्फ की है यह भी एक विडम्बना
कि वहाँ कुछ भी जीवित नहीं रहता
वहाँ फूल नहीं उगते हैं
बीज नहीं अंकुआते हैं
कोपलें नहीं फूटती हैं
और मृत शरीर रहता है
वहाँ एकदम सुरक्षित!

 

6. किताबें

(कैदी नं ३०७ सुधीर शर्मा के लिए)

मुक्त हो चुका हूँ
उस काल कोठरी से
बिताए हैं जहाँ जेल जीवन के
जिलात भरे कई साल.
याद कर सिहर जाता हूँ
कैसे भटक जाता है
एक सीधा-सादा आदमी भी.
उसी काल कोठरी में
पल-पल मरते हुए
संजीवनी बनकर
आई थी किताबें
जैसे काल कोठरी के अंधियारे में
आई उजाले की किरण
जिसने बदल दिया मेरा जीवन!
यदि मिल जाती हैं
सही उम्र, सही समय पर
जीवन दृष्टि बदलने वाली किताबें
पढ़ने को
अपराध की दुनिया में जाने से पहले
तो नि:संदेह कोई बच जाता है
अपराध की अंधी सुरंग में
जाने से पहले
किताबें,
हैं जो जेल जीवन की मेरी
बहुत बड़ी अनमोल धरोहर
मैं चाहता हूँ संजोना
इन अनमोल संजीवनी सरीखी
किताबों को आजीवन
लोगों के जीवन में भी पहुँचे.
ताकि रोशनी की किरण!

 

7. रचना चाहता हूँ एक कविता

माँ की ममता पर
एक कविता
पत्नी के सच्चे प्रेम पर
बहिन की परिणय
बाधाओं पर
माँ के लिये असंभव है करना
काव्य सृजन
पत्नी के प्रेम पर
कविता रचने में
याद आ जाती है
बरबस मुझे
पूर्व प्रेयसी
बहिन के
परिणय बंधन पर
रचूँ कैसे कविता?
दहेज का दानव
कर रहा समाप्त
सब सृजन की संभावनाएँ

 

8. सबसे सुंदर हाथ

काम में दिन रात जुटी रहती
पत्नी के काम करते -करते
हो गये हैं हाथ खुरदुरे
लगते नहीं हैं वह मुझे सुन्दर

होते हैं कैसे कुछ सुन्दर स्त्रियों के
मखमली…मखमली..मुलायम हाथ
सोचा मैंने…..

इधर बहुत दिनों से जब
माँ हुई बहुत बीमार
असहाय, अशक्त.
करनी पड़ती
उनकी सेवा सुश्रुषा
बेड पर ही दिन रात

मुझसे ज़्यादा
पत्नी करती
उनकी सेवा
सुनती उनकी हर बात
पत्नी ही पिलाती
अब अपने हाथों
माँ को दवा पानी
खिलाती अपने हाथों
करती साफ़ सफाई
हर बात का रखती ख़्याल.

मुझे पता है
मुझे पता है
अब आपके ज़हन में हैं
जो सवाल-
क्या अब भी लगते हैं मुझे
पत्नी के हाथ खुरदुरे?
या लगते हैं वे
दुनिया के सबसे सुन्दर हाथ!

 

 

 

9. झुंझला जाता हूँ

कई बार
दवा बाँटने के काउंटर पर
जो है मेरा रोजगार….

तरह-तरह के सवालों
से होती है टकराहट
कैसे पानी से लें
ताजा ,ठंडा, गर्म,गुनगुना

दर असल अंग्रेजी दवाओं
में होता नहीं कोई ज्यादा
परहेज?

बस पेट में जानी चाहिये
लेकिन हम कहते
नहीं कभी ऐसा
दरअसल
वह एक लट्ठमार
सा जवाब लगता है

कहना यह
कि हाँ ठण्डे, गुनगुने, गर्म
पानी की तासीर की तरह
हँसकर, मुस्कुराकर
फर्क तो कुछ नहीं पड़ता
लेकिन हाँ…….
यह जरूर लगता है
कि शायद
मुस्कुराहट की मिठास
जरूर करेगी कम
दवा की कड़वाहट.

 

10. व्यवहार

महात्मा गाँधी के
सादगी के सिद्धांत प्रभावित करते हैं सबको
मुझे भी
पर उन सिद्धांतों पर चल पाना
है वाकई मुश्किल!
यह जाना मैंने जब
किया प्रयास एक दिन
अपने मोहल्ले के शौचालय
को स्वयं एक दिन सफाई करने की
ठानने पर!

महान कवि निराला की
साहित्य साधना से कौन साहित्य प्रेमी
प्रभावित न होगा
अनुयायी मैं भी होना चाहता हूँ
लिखना एक भी शब्द लगा मुझे
असंभव उनकी तरह
उससे भी मुश्किल
ठण्ड में ठिठुरते किसी आदमी को
चुपचाप कम्बल ओढ़ाना….!

महान चित्रकार एम.एफ. हुसैन के चित्र
किसे प्रभावित न करते होंगे
उनके व्यतिगत एक गुण
नंगे पैर चलने को अपनाना चाहा
मैंने भी एक दिन
तब पता लगा
एक महान कलाकार की
स्वयं से शुरू कर कष्ट सहने की
क्षमता पैदा कर
सृजन को सार्थक करना
है बहुत मुश्किल!

 

 

 

कवि शशिभूषण बडोनी
जन्म – 18/8/59 टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड।
शिक्षा : स्नातक, डी फार्मा
प्रकाशन : एक कहानी संग्रह, एक बाल कथा संग्रह, एक संपादित साक्षात्कार संग्रह।साहित्यिक पत्रिकाओं में कहानी, कविता, आलेख, समीक्षा सभी विधाओं में लेखन।पत्रिकाओं में रेखांकन भी।इधर विश्वरंग पत्रिका के नवीन नवंबर 22 कविता केंद्रित अंक में रेखांकन प्रकाशित।
आकाशवाणी, दूरदर्शन में रचनाएं प्रसारित।
संप्रति : सेवानिवृति के पश्चात लेखन, चित्रांकन ।
पता : गांव एवम् पोस्ट – शमशेरगढ़, देहरादून, उत्तराखंड
फोन 9410550100

टिप्पणीकार कवयित्री कल्पना पन्त, अध्ययन- नैनीताल अध्यापन- वनस्थली विद्यापीठ राजस्थान में प्रवक्ता हिन्दी के पद पर एक वर्ष कार्य तदनन्तर लोक सेवा आयोग राजस्थान से चयनित होकर राजकीय महाविद्यालय धौलपुर तथा राजकीय कला महाविद्यालय अलवर में तीन वर्ष और 1999 में लोकसेवा आयोग उ० प्र० द्वारा चयन के उपरान्त बागेश्वर , गोपेश्वर एवं ऋषिकेश के रा०स्ना०मेंअध्यापन, मई 2020 से सितबंर 2021 तक रा० म० थत्यूड़ में प्राचार्य पद पर,वर्तमान में श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के त्रषिकेश परिसर में आचार्य
लेखन- पुस्तक-कुमाऊँ के ग्राम नाम-आधार सरंचना एवं भौगोलिक वितरण- पहाड प्रकाशन, 2004
कई पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ, लेख, समीक्षाएँ एवं कहानियाँ प्रकाशित
यू ट्यूब चैनल-साहित्य यात्रा
ब्लाग- मन बंजारा, दृष्टि

सम्पर्क: 8279798510
ईमेल: kalpanapnt@gmail.com

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