Wednesday, December 7, 2022
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भगत सिंह के साथी: यह किताब क्रांतिकारियों को तथ्यात्मक विवेचना की आधार भूमि पर परखते हुए नए रूप में सामने लाती है

अश्रुत परमानंद


 

किसी कवि, (शायद शैलेंद्र) की पंक्तियाँ थीं,

“भगतसिंह इस बार न काया,
लेना   भारत वासी की.
मातृभूमि के लिए अभी भी,
सजा  मिलेगी फांसी की  “ .

भगतसिंह एक सवाल है. जो अलग अलग मौकों पर अलग अलग तरीकों और संदर्भों में अक्सर उठाया जाता है, और पूछा जाता है कि ” आज अगर भगत सिंह होते तो कंहा होते ? या किन हालात में होते ” ?

ये सवाल हर जेहन में उठते हैं. खास कर वो लोग, जो आजादी, समाज की बेहतरी का सपना देखते हैं उन सभी के दिल दिमाग में यह सवाल होता है.

कारण यह हैकि आजादी का जो चेहरा आज हम देख रहे है, उसे देख कर आशंका होती है कि  क्या यह वही आजादी है जिसका ख्वाब हमारे इन क्रांतिकारियों देखा था ? . अगर नहीं तो जिस आजादी की परिकल्पना उन लोगो ने की थी वो आज की इस तथाकथित आजादी से किन मायनों में अलग है, और कितना अलग है ?

कोई आठ बरस पहले किसी विद्यालय मे आशुभाषण प्रतियोगिता में निर्णायक के रूप में गया था जहां इस सवाल से पहली मुठभेड़ हुई थी.

पिछले एक डेढ़-दो साल पहले नई दिल्ली में भारत सरकार के एक मंत्रालय में हिंदी पखवाड़े के दौरान अधिकारियों के लिए आयोजित हिंदी निबंध प्रतियोगिता में यही सवाल मेरे सामने अचानक आ खड़ा हुआ था और हाल ही में दसवीं कक्षा की एक बच्ची ने तो कमाल ही कर दिया, ” फांसी पाए जाने के वक्त भगतसिंह और उनके साथी क्या सोंच रहे थे “, उसकी कविता में यह सवाल बेहद शिद्दत और सघन संवेदना के साथ मुखातिब था.

खैर भगत सिंह और उनके साथी आज अगर होते तो कंहा होते? क्या बस्तर, दण्डकारण्य, छत्तीसगढ़ , बैलाडीह पर्वत, उड़ीसा के आस पास आदिवासियों के साथ खड़े होते या कश्मीर घाटी में.

आज भगतसिंह मंदिर-मस्जिद,गौ-रक्षकों, माबलिंचिंग जैसै साम्प्रदायिक हथकंडों से जूझ रहे होते या मजदूरों, छोटे कारोबारियों, बंद पड़े कारखानों और सड़क पर खड़े किसानों का साथ दे रहे होते? कौन जाने अब तक वे किसी मुठभेड़ की खबर बन चुके होते या आजन्म कारावास की सजा काट रहे  होते.  या गणेश शंकर विद्यार्थी जी से दीक्षा लेकर जनता और उसके जनसरोकार से जुड़ कर सोद्देश्य पत्रकारिता करते हुए आज की सत्ताश्रयी पत्रकारिता को बेनकाब कर रहे होते.

बंबइया फिल्मों के प्रभाव में क्रांति को रोमांचक तथा ठां-ठां-वादी गतिविधि समझ लिया गया है. अक्सर प्रामाणिक और सही जानकारी के अभाव में इन क्रांतिकारियों को पढ़ा-लिखा तथा कुछ कुछ संजीदा उग्रवादी जैसा ही कुछ मान लिया जाता है. लेकिन ये यथार्थ नहीं है. क्रांति इतनी आकस्मिक और तात्कालिक चीज नही है. क्रांति सबसे पहले संवेदना,भावना और मानसिकता के स्तर पर घटित होने वाली कार्रवाई है. हमे यह मान लेने में कोई गुरेज नहीं कि हिंदी मे क्रांतिकारियों की इस मानसिक प्रक्रियाओं को दर्शाने वाली तथ्यात्मक सामग्री का करीब करीब अकाल रहा है. उन्हें आमतौर पर या तो देवताओं की तरह श्रद्धापूर्वक दिखाया गया है या उनके दिल-दिमाग को टटोले बिना ही उन्हे पथ से विचलित अपरिपक्व और जल्दबाज युवकों के रूप में बताया गया है.

किताब “भगतसिंह के साथी” इन खामियों और अपेक्षाओं को नए सिरे से खारिज करती है. वाम प्रकाशन, नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित यह किताब  क्रांतिकारियों को देवताओं  और भटके हुए जोश भरे युवकों की पारम्परिक बायनरी से हटा कर उन्हें एक तथ्यात्मक विवेचना की आधार भूमि पर परखते हुए नए रूप में सामने लाती है.

भगतसिंह तथा उनके साथी क्रांतिकारियों के कृतित्व और समग्र व्यक्तित्व के साथ साथ उनकी उन सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों की भी गहरी पड़ताल करती है, जिन्होने उनकी वैचारिक को आकार दिया. किताब में क्रांति के स्वरूप, उसके संघर्ष, उसके व्यावहारिक विरोधाभासों और समय,समाज तथा दीगर संदर्भों की विवेचना की गई है.

भगतसिंह आज होते तो क्या करते ? ये सवाल अगर आज भी मौजूं है, तो इसलिए क्यों कि इन शहीदों ने अपनी क्रांति भावना को क्षणिक,भावावेश अथवा सहज उद्वेगों पर आधारित प्रतिक्रिया नही बल्कि एक सुविचारित, सुस्पष्ट और सु-विवेचित तैयारी के साथ अपनाई गई सामाजिक, मानसिक कार्रवाई बताया था. और जीवन के तमाम प्रलोभनों और अपेक्षाओं और जीवन की कीमत पर अपने इस पुख्ता विश्वास की रक्षा भी की है.

आजादी को आठ दशक हो गए पर देश का जनमानस, यहां का युवक अभी भी चन्द्र शेखर आजाद, भगतसिंह,  अशफाक,बिस्मिल, राजगुरु और सुखदेव के अलावा बाकी ज्यादातर क्रांतिकारियों से नामों से भी अनभिज्ञ है. यह किताब ऐसे ज्यादातर क्रांतिकारियों के बारे में रोचक ढंग से बताती है. तथा उनकी सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की पड़ताल भी करती है जिन्होंने उनके क्रांतिकारी मानस का सृजन किया.

देश का मतलब कोई निश्चित भूभाग ही नही होता. देश का आशय वहां की नदियां, पहाड़, जंगल-जमीन, आसमान या समन्दर से नहीं होता. ये सभी चीजें देश की सीमाओं में शामिल हो सकती हैं, पर देश का असल मतलब वहा रहने वाले जनमानस, उसके “लोक” जिसे अंग्रेजी में “फोक” कहा जाता है से है.

इसलिए अगर कोई भी देश इतना समय पाकर भी अपने सभी निवासियों, अपने संवेदनशील, अपेक्षाकृत कमजोर और अल्पसंख्यक निवासियों में अपनेपन की भावना नही भर सका तो इसका मतलब है कि संकल्पना के स्तर पर कंही ना कंही देश संकट से ग्रस्त है. इस स्थिति को हमारे क्रांतिकारी बेहतर जानते समझते थे. इसीलिए देश की आजादी, उसके संसाधनों के सम्यक उपभोग तथा देशवासियों की बेहतरी, समता-समानता और सम्मानपूर्ण जीवन यापन  के अवसर सुनिश्चित करने लिए  उन्होंने खाका बनाया था कि सबसे पहले भोजन, शिक्षा स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का समान बंटवारा करना होगा.

अगर यह काम हो जाता तो आज शासक वर्ग को अपनी खामियों और नाकामियों से जनता का ध्यान बंटाने के लिए धर्मांधता, नफरत और सांप्रदायिकता का सहारा ना लेना पड़ता. और ना ही लोकतंत्र को धनपशुओं पर निर्भर रहना पड़ता.

किताब मे विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, जतीन्द्रनाथ दास, भगवतीचरण वोहरा तथा दुर्गा भाभी जैसे क्रांतिकारियों पर भी  महत्वपूर्ण और पठनीय सामग्री मिलती है. इनके बारे में अभी तक ज्यादा सामग्री उपलब्ध नहीं थी.

किंतु बटुकेश्वर दत्त, मन्मथनाथ गुप्त, यशपाल, अज्ञेय, धनवंतरी, इंद्रदेव विद्यालंकार, अशफ़ाक़ उल्ला खान, रामप्रसाद बिस्मिल जैसै कई क्रांतिकारी है जिन पर शोधपूर्ण और प्रामाणिक सामग्री आज भी उपलब्ध नहीं है . किताब मे इन क्रांतिकारियों पर भी सामग्री दी जानी चाहिए.

वो एक दौर था जब गुलामी के बंधन में जकड़ा हर संजीदा भारतीय अपने अपने तरीके, भरोसे और अकीदे के अनुसार अंग्रेजों से जूझ रहा था.

अपने सुख चैन की होली जलानेवाले इन क्रांतिकारियों के पास कांग्रेस जैसा व्यापक जन समर्थन संगठन और मान्यता नहीं थीं. हिंदू महासभा, आर्य समाज और संघ जैसा गुप्त धनबल और राजे रजवाड़ो का समर्थन सहयोग भी नहीं था. इनका रास्ता तकलीफों, सजाओं, संघर्षों से भरा हुआ था. इनकी अंतिम परिणति आजन्म कारावास, भूख, मौत और काल कोठरी, गुमनाम, एकांत और मौत ही होना था.  इन करीब करीब सभी क्रांतिकारी पारिवारिक तौर पर मध्यम पृष्ठभूमि से थे. फिर भी जिस हिम्मत, साहस, भरोसे और समर्पण के साथ ये बिना किसी समझौते के अंतिम सांस तक लड़े वह क्रांति मे इनके अगाध विश्वास को दिखाता है.

इन सभी क्रांतिकारियों को सुदीर्घ जीवन नहीं मिला. दो एक जिन्हे मिला भी हो पर उनके पास इतने साधन भी न थे कि वे अपनी वैचारिकता, अपनी सोच, समझ और क्रियाविधियों  को व्याख्यायित या परिभाषित कर सकते. भगतसिंह बेहद पढ़ाकू थे, लिखते भी खूब थे, सुनते हैं फांसी के बाद कोई चार-पांच बोरों में उनके कागजात और किताबे जेल प्रशासन ने उनके परिजनों को सौंपी थीं. इन चार-पांच बोरों में उनके द्वारा पढ़ी गई किताबों के अलावा उनके द्वारा लिखी जाने वाली किताबों के लिए असंख्य पृष्ठों मे टिप्पणियां और नोट थे.  कई लेखों और किताबों के प्रारूप थे, वैचारिक कार्यक्रमों की रूप-रेखाए़ं और डायरियां थीं. लेकिन असावधानी वश ये सभी चीजे सहेजी नहीं जा सकीं.  लेकिन ऐसा विश्वास करने के कई कारण है कि ये क्रांतिकारी भौतिक और सामाजिक आजादी तक ही सीमित नही थे. “इनका अंतिम मकसद समाज से किसी भी प्रकार के शोषण ,उत्पीड़न और दमन का खात्मा करना था, चाहे वह परिवार के भीतर हो समाज के भीतर हो या देश के भीतर हो या राष्ट्रवाद के नाम पर किसी ताकतवर देश द्वारा किसी कमजोर देश के साथ किया जाने वाला उत्पीड़न और शोषण”.

शायद आज हम इतने दयनीय,हास्यास्पद और इस कदर विभाजित और तन्हा ना होते अगर हमने इनकी दिशा और दृष्टि अपनाई होती. इस किताब में क्रांतिकारियों के रास्तों , उनके सपनों की झलक मिलती है. किताब की एक और खूबी इसकी  चित्रात्मक भाषा है. इसे पढ़ कर पाठक को इस समय में जीने उनके बीच से गुजरने जैसा अनुभव होगा.

किताब पठनीय बन पड़ी है. तथ्यों और सूचनाओं का प्रस्तुतिकरण बहुत सहज है. काफी शोध और श्रम से लिखी गई है. भारतीय समय और समाज में दिलचस्पी रखने वाले सभी युवाओं को पढ़नी चाहिए.

 

पुस्तक: भगतसिंह के साथी

लेखक त्रयी :-  प्रबल शरण अग्रवाल, हर्षवर्धन त्रिपाठी और अंकुर गोस्वामी.

प्रकाशक:- वाम प्रकाशन, शादीपुर खामपुर, न्यू रंजीत नगर,नई दिल्ली-110008

मूल्य: 295


समीक्षक: लेखक-एक्टिविस्ट अश्रुत परमानंद इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट हैं और सामाजिक- राजनैतिक विषयों पर लिखते रहते हैं।

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