Wednesday, February 8, 2023
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महेश वर्मा की कविताएँ अनेक अबूझ, बिखरे दृश्यों से संवाद करती हैं

वसु गंधर्व


पाठक बड़ी तन्मयता से, कविताओं के आवरणों से होकर कवि के हृदय की निशीथ तहों को आँकता है। कविता की अपनी अर्थ-भाव-भूमि से इतर, कई बार उसका ताल्लुक कविता या कविताओं के केंद्र में उस धूसर जगह से होता है जहाँ वह कवि को, उसके मन को, उसकी उपस्थिति को टोहाना चाहता है। एक तरह से उसकी बालसुलभ जिज्ञासा एक ऐसे मिथक को गढ़ लेती है जिसमें इस उम्मीद की जगह रहती है कि कवि ने जितनी तन्मयता से कविता लिखी है, कविता ने भी, उतनी ही तन्मयता से, पूरा या आधा, कवि को अपने भीतर लिखा है। फिर आगे की बात यह कि कविता पढ़ने के बाद, वह कविता, उसी तरह से पाठक के भीतर कवि को भी लिख देगी और उसकी आत्मा की विवर्ण, आदिम तहों में से यह रहस्यमय मनुष्य झाँकेगा, बोलेगा। महेश के पाठक उन्हें इसी तरह अपने भीतर जब न तब बोलते सुनते हैं, जीवन और दुनिया की तमाम चीजों और रंगों और रागों को देखने का सलीका पाते हैं, और उनके नर्म स्पर्श को अपने कंधों पर महसूसते हैं।

इसीलिए महेश की कविताएँ एकमुश्त इतनी इंटीमेट हैं कि उन्हें किसी गद्यात्मक बिचौलिये की कतई ज़रूरत नहीं, और यह बिचौलिया संभवतः पाठक से उनकी कविता के सीधे संवाद को कुछ स्तर तक बाधित ही करेगा, लेकिन यह कविताएँ इस पाठक (ध्यान दीजिये, सिर्फ पाठक; टिप्पणीकार, आलोचक, कुछ नहीं) से किस तरह मुख़ातिब होती हैं कुछ टुकड़ों में यह देखने की कोशिश यहाँ की जा सकती है।

संवाद का हमारा सबसे आंतरिक शिल्प भाषा का नहीं, दृश्य का होता है। यदि लिखित या कथित भाषा के सभी सूत्रों को एक एक कर के हटाते जाएँ तो हमारे अस्तित्व को निर्धारित करता जो विचार भीतर बचेगा वह दृश्यमान होगा। आवेगों के तीव्रतम सिरों पर हम हमेशा मौन को चुनते हैं, और वेदना, या हर्ष, या करुणा, किसी को कथ्य में न ढाल कर, अनुभूत करते, दृश्यागत करते हैं। अतीत हमारे लिए दृश्य है; हमारी अपेक्षाएँ हमारे लिए दृश्य हैं; प्रेम, वितृष्णा, सब की हमसे संवाद की भाषा दृश्य की भाषा है। तो निश्चित ही जिन कविताओं को हम दुहराते हैं, जिनके पास हम बार बार लौटते हैं वे तर्क और विचार की मार्फत हमतक पहुँचने और हमसे संवाद करने की स्थिति में आने से पहले ही कुछ आदिम, बेहद आंतरिक, और भीतरी दृश्यों की लय में हमसे बोलती हैं। यह दृश्य महज़ कविता के कथ्य के निर्मित दृश्य नहीं होते, बल्कि भाषाई और विन्यास संबंधी अनेक सूत्रों के इंगित से अपने होने को बुदबुदाते हैं जिन्हें हर पाठक अपने अलग ढंग से सुनता है। महेश की कविता भी ऐसे ही अनेक, अबूझ, बिखरे दृश्यों से हमसे संवाद करती है जिनमें हम भाषा से इतर, असपष्ट, लेकिन नितांत व्यक्तिगत, अपने ही जीवन के सूत्रों को खोज सकते हैं। मसलन उनके संग्रह की हमनाम कविता “धूल की जगह” को अगर हम एक सामान्य आस्वादन के पाठ से, अर्थ-मीमांसा की चेष्टा करते हुए पढ़ें तो यह कविता लगभग अबूझ है। लेकिन इसका पाठ, अनायास हमारे भीतर के खोखल को कुछ बिखरे दृश्यों से भर देता है जिसमें शयनकक्ष के पलंग के नीचे मृत्यु की बिल्ली सोयी रहती है, सबसे सरलतम वाक्य के अक्षुण्ण अबूझ रह जाने का भय है, संवाद की हमारी सीमाएँ हैं जिन्हें हम कभी नहीं लांघ पाएँगे, धूसर होता एक पुराना समय है जहाँ यह मालूम था कि “धूप आने पर क्या फैलाना है, क्या समेट लेना है बारिश में”। यहाँ कौन गीत था हमें याद नहीं, लेकिन कोई गीत था।

इसके उलट, कुछ कविताओं में महेश रोज़मर्रा की बेहद मामूली वस्तुओं को अपना केंद्र बनाते हैं। यहाँ वे इन वस्तुओं का दैवीकरण नहीं करते, उन्हें sublime बनाने की कोशिश नहीं करते, उन्हें किसी रोमांटिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं इस्तेमाल करते। उन्हें बस एक अबोध सरलता से चित्रित करते हैं। इस चित्रण में कोई थोपा हुआ दार्शनिक निष्कर्ष नहीं होता। यह बेहद निजी कविताएँ होती हैं जिनमें कवि दृश्य के पीछे से कहीं बस अपने परिवार के बहुत से लोगों की नींद को दर्ज़ कर रहा होता है; एक बीस साल पुरानी तस्वीर में ठहरा समय ताक रहा होता है; अपनी घिस चुकी पुरानी कमीज़, या किसी पुराने पेड़ को एक आश्वस्त चुप्पी में दर्ज़ कर रहा होता है। यह धीमे गति से जीवन को देखते महसूसते हुए, धीमी गति से लिखी गयी कविताएँ होती हैं जिनका पाठ भी बहुत धीमे से भीतर उतरता है।

कुछ अन्य कविताओं में महेश अपने कथ्य के अलहदेपन से एक समानान्तर सामाजिक यथार्थ परिकल्पित कर लेते हैं जो एक ही बार हमारे लिए बेहद निजी और बेहद दूरस्थ होता है। मसलन उनकी यह कविता देखिये

प्रिया मैं

तुम्हारे लिए कर्णफूलों का एक जोड़ा छाँट रहा हूँ ढेर सारे सुन्दर जोड़ों में से

अपने एकान्त को सजाना चाहता हूँ

तुम्हारे सुन्दर पाँवों के लिए मोज़े
ताम्बई नेलपालिश, सुनहला इत्रदान
अपने एकान्त में रंग भरना चाहता हूँ ना !

इस पायल की रुनझुन गूँजती नहीं मेरे प्रदेश में कुछ है जो आवाज़ों और देखते रहने को सोख लेता है

एक कंघी और घुंघराले बालों के बीच
तुम्हारे आदिम कबीले का चिह्न बनाकर
प्रेमपत्र क्या भेजूँगा : अपने आप में बुदबुदा रहा हूँ

मुझे ख़ाली शब्दों और चमकदार चीजों के बीच
निस्बत खोजने से ज्यादा आत्मीय कोई चीज़ चाहिए थी
इससे तो अच्छा होता कोई बेवजह
मेरे हृदय को छेद देता।

यह कविता जैसे हमारे समय की, हमारे सामाजिक संदर्भों की है ही नहीं। यह इस दुनिया से विलग एक स्वप्नलोक में घटित हो रही है जिसमें हमारी सभ्यता के शैशव-काल के कुछ चित्र हैं लेकिन ये चित्र ऐतिहासिक नहीं हैं, कवि का ऐसा कोई मुगातला नहीं की ऐसा कुछ इस पृथ्वी पर कभी घटित हुआ हो। लेकिन इसमें प्रेम है, और वह प्रेम हमारे अपने सामाजिक वितान में किए गए प्रेम से मेल खाता है, उसके रहस्यों को इस यथार्थ की बहुत सी प्रेम की कविताओं से बेहतर टटोलता है; इसके साथ ही इसमें ‘वह’ है जो कवि के प्रदेश में पायल की रुनझुन को नहीं झनकने देता, और आवाज़ों और देखते रहने को सोख लेता है। स्पष्ट है कि हमारी सभ्यता में ऐसी बहुत सी सत्ताएँ हैं जो यह काम किया करती हैं। यह कविता पहले पाठक को escapism के छलावे से मुग्ध करती है, लेकिन परिकथात्मक escapism के सतहीपन के विपरीत पाठक इस कल्पित सृष्टि को अपनी स्मृतियों, अपने नितांत निजी अनुभवों की तर्ज़ पर वास्तविक दुनिया से अधिक विश्वास योग्य मानने लगता है। यहाँ suspension of disbelief जैसी कोई चीज़ घटित होती है, और यह असंभव सा लगने लगता है कि अतीत में अपना किया कोई प्रेम, प्रिय को सौगात भेजने की आकुलता, यह सब उस दुनिया से बाहर भी घटित हो सकता है जिसमें क़बीले न हों, साँझ इतनी पीली न हो, क़बीलों के चिन्ह न हों, आदि। ऐसी ही एक और उल्लेखनीय कविता है “चंदिया स्टेशन की सुराहियाँ प्रसिद्ध हैं” जो हमारी सभयता के अतीत के समानान्तर एक और अतीत को गढ़ती है, लेकिन उस अतीत से निकले अनुमान हमारे अपने वर्तमान पर भी लक्षित हो सकते हैं।

अतीत इन कविताओं में बहुत सा है, और बहुत तरीकों से सामने आता है, लेकिन उसके प्रति इनकी दृष्टि में, एक दो अपवादों को छोड़ दें, तो कोई रूमानियत नहीं है। अतीत को यह कोरे भावनात्मक नज़रिये से नहीं देखतीं। इन मायनों में यह नौस्टाल्जिया की कविताएँ हैं ही नहीं क्यूंकि यह अतीत को वर्तमान से काट कर, उसके दृश्यों और संवेदनाओं में खुद को खो नहीं देतीं। यहाँ अतीत इस तरह है कि-

“एक समकालीन वाक्य उतना भी समकालीन तो नहीं है
वह पुरानी लय का विस्तार है
और इतिहास की शिराओं का हमारी ओर खुलता घाव”

घाव की भीतरी जैविक उपस्थिती, बाहर के उसके स्फुटन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। उसी तरह इतिहास में हुई कोई भी हत्या आज की हुई किसी भी हत्या में शामिल है। सांप्रदायिक हिंसा में किसी की मृत्यु होने में आज भी गोधरा और भागलपुर के दंगे जीवित हैं। यहाँ Faulkner के बहुश्रुत कथन The past is never dead, it is not even past, जैसा ही कुछ दृष्टिगत होता है।

कवि का हृदय एक बेचैन जगह है जिसमें से वह अपनी व्यथाओं की कथा इतनी निष्ठा से कहता है कि उसमें प्रतिबिम्बित अपनी छवि देख कर पाठक बहुत vulnerable हो जाता है। मसलन ऐसा कोई वाक्य कि

“मेरा एक हाथ थामे रहना एकांत”

या

“कहाँ जाऊँगा तुम्हें तो मालूम हैं मेरे सारे जतन
इस गर्वीली मुद्रा के भीतर एक निरुपाय पशु हूँ
वधस्थल को ले जाया जाता हुआ “

यह सरल सी स्वीकृति पाठक को अपने illusions के बोझ से मुक्त कर देती है। वह अपने दुःख को विराट समझे बिना, अपनी नग्न आकृति देख पाता है; अपनी कमज़ोरियों और असफलताओं के मायने समझ पाता है। यहाँ आत्म की परिकल्पना शक्ति-केंद्रित नहीं है। कवि की दुनिया का मनुष्य लड़ता है, और हारता भी है, अपनी थकन में लिप्त भी होता है, फिर भी गीत गुनगुनाना नहीं छोड़ता, जैसे-

“गीत लिखना चाहिए गुनगुनाते हुए
एक हारी हुई लड़ाई की टेक पर
लौट आए सबसे पुराना छन्द
व्यर्थ के तुकान्त के लिए भी एक सहृदयता मिले
इतना मुस्कुराते हुए सुनाना चाहिए गीत”

महेश कविता के अपने approach की सीमाओं को बेहतर ढंग से समझते हैं। इन कविताओं की उदासी अपने उद्गम की पड़ताल करते हुए सामाजिक यथार्थ की ओर उन्मुख नहीं होती; अगर होती भी है तो उसका स्वभाव उग्र नहीं होता; उसका मूल स्वर वेदना का होता है, क्रोध का नहीं। जैसे

“वह इतनी सरल बात थी कहने में
कि मुझे भाषा की शर्म थी उसे लिखने में…

अगर दुख थी यह बात
तो यह संसार के सबसे सरल आदमी का दुख था
यह भूख थी अगर तो उन लोगों की थी
जो मिट्टी के बिस्कुट गढ़कर दे रहे थे अपने बच्चों को
जो बीच बीच में देख लेते थे आकाश

अगर यह हत्या थी
तो यह एक आदिवासी की हत्या थी”

जहाँ उग्र राजनैतिक चेतना स्थितियों की बेहतरी के लिए संघर्षपूर्ण कदम उठाने को अग्रसर होती है, इन कविताओं में प्रथमदृष्टया उस जगह पर हमें बहुत सी शांति और ठंडापन दिखते हैं। लेकिन जीवन और दुनिया को देखने की जिस वैकल्पिक, सहृदय दृष्टि से यह कविताएँ उन्मुख होती हैं वहाँ राजनीति अनुपस्थित है ऐसा नहीं है। एक तरह से यह कविताएँ हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक अस्तित्व की उस गहरी और गंभीर जगह पर स्थित हैं जहाँ से हमारी राजनैतिक चेतना निर्मित होती है, वहाँ से नहीं जहाँ से वह दुनिया के सामने आती है। मसलन कविता “भाषा” का यह हिस्सा-

“जो शब्द हत्या को वैध बनाते थे
वे आज भी हमारी भाषा में गूँज रहे हैं

जैसे कि एक नृशंस हत्या हुई थी को
ऐसे याद रखना कि यहीं पर एक
बलि दी गई थी”

यह कवि एक ही समय उद्वेलित भी करता है, अभिभूत भी; क़लम के एक ही सिरे से प्रकाश को भी लिखता है और अंधकार को भी। यह हमारे अंतरतम आवेगों के संकुचित अर्थ हमें ही वापस लौटता है। इसे पढ़ना सिर्फ अपने ही नहीं, बहुत से युगों तक विस्तृत वेदनाओं के चिट्ठे को पढ़ना है, हर युग की उदासी को अपने भीतर की उदासी की तहों से जुड़ते महसूसना है।

तो आगे दी हुई पंद्रह कविताओं को पढ़िये, कई बार, और ऊपर लिखा सब भूल जाइये।

 

महेश वर्मा की कविताएँ

1. अधूरा

अधूरी चीज़ें पूरी होंगी
दूसरे अधूरेपन की शिराओं से
बहता ख़ून तलवों पर चिपचिपाएगा

अधूरी कहानी पूरी होगी
कल्पना में उठी कुल्हाड़ी गिरकर
सही जगह घाव करेगी।

घुट रहा अधूरा शाप
बान की तरह छूटेगा और
सुख का सीना छेद देगा।

अधूरा गान होठों से बाहर आएगा
तो एक आँसू उसको अपने में सोख लेगा

आँख भर सोने की इच्छा पूरी होगी
अंधेरा सपनों को मूँद लेगा।

2. और

उदास दिन कोई नहीं पुकारेगा। एक दिन अनंत बूँदों में अनंतकाल तक टपकता रहेगा। रात एक जगह बर्फ़-सी जम जाएगी, कोहरा सूर्य को ढँक लेगा। संगीत और रुदन सूख जाएँगे वाद्य पर और कंठ पर : प्यास रास्ता भूल जाएगी। भूलने की धूल भरी आँधियाँ उठती रहेंगी, उठती रहेंगी और यह धूल आँसुओं को सोख लेगी।

धूल पर भूल की परत, भूल पर धूल की परत,
आग पर राख की परत, आँख पर राख की परत

एक दुःस्वप्न अपने घर से बाहर धकेलेगा ठिठुरन में तो दूसरे बुरे सपने की झाड़ी अपने आग़ोश में खींच लेगी।

रात कभी ख़त्म नहीं होगी
न कोई दिन बीतेगा।

3. पहला हर्फ़

उम्र के आख़िरी बरस
नई ज़ुबान सीखने में
पहला हर्फ़ वो लिखना चाहिए
जिससे कोई नाम शुरू होता हो
और पहला लफ़्ज़
वो नाम लिखना चाहिए

ये वही नाम है ना
जहाँ तुम्हारी नींद और तुम्हारी जाग का हिसाब रखा है?

ये उसी नाम के मनके हैं ना भिक्षु तुम्हारे हाथ में?

इसे हर ज़ुबान में लिखना सीख लेना चाहिए
ताकि दुनिया की किसी भी जगह इसे देखो
अगर ये कहीं लिखा हुआ है
तो इसे पढ़ सको और तुम्हें लगे
कि अकेले नहीं हो

4. पीठ

अनंत कदमों भर सामने के विस्तार की ओर से नहीं
पीठ की ओर से ही दिखता हूँ मैं
हमेशा जाता हुआ

जाते हुए मेरी पीठ के दृश्य में
पूर्वजों का जाना दिखता है क्या?

तीन कदमों में तीन लोक नापने की कथा
रखी हुई है कहीं, पुराने घर के ताखे में

निर्वासन के तीन खुले विकल्पों में से चुनकर
अपना निर्विकल्प,
अब मैं ही था सुनने को
निर्वासन का मंद्रराग

यदि धूप और दूरियों की बात न करें हम
जाता हुआ मैं सुंदर दिखता हूँ ना?

5. मेरे पास

मेरे पास जो तुम्हारा ख़याल है
वह तुम्हारे होने का अतिक्रमण कर सकता है
एक चुप्पी जैसे चीरती निकल सकती हो कोलाहल का समुद्र

मैं एक जगह प्रतीक्षा में खड़ा रहा था
मैं एक बार सीढ़ियाँ चढ़कर वहाँ पहुँचा था
मैंने बेवजह मरने की सोची थी
मैंने एकबार एक फूल को और
एकबार एक तितली के पंख को ज़मीन से उठाया था
मैं दोपहरों से वैसा ही बेपरवाह रहा था जैसा रातों से
मैं रास्ते बनाता रहा था और
मैं रास्ते मिटाता रहा था – धूल में और ख़याल में
इन बेमतलब बातों के अंत पर आती रही थी शाम

तुम्हारा एक शब्द मेरे पास है
यह किसी भी रात का सीना भेद सकता है और
प्रार्थनाघरों को बेचैन कर सकता है
सिवाय अँधेरे के या गुलामी के पट्टे के
इसे किसी और चीज़ से नहीं बदलूँगा

इसे दोहराता हूँ
कि जैसे माँज के रखता हूँ चमकदार!

 

6. जलसे का गीत

मेरा एक हाथ थामे रहना एकांत!
इस जगह इस नदी में पानी बहुत है
उतना ही कोलाहल गूँजता है बाहर

बहुत सारे बन्धु-सखा-सहचर
ये अपने होने की आँच से दीप्त
कैसे नक्षत्रों की तरह घूमते हैं
इस पुरातन जलसाघर में,
मेरे पास तो अपनी भी परछाई नहीं है
मुझे एक पुराने छाते भर छाँव देना आकाश!

यहीं इस ठण्डी घास पर खो गई है भाषा
पानी में बर्फ के टुकड़े की तरह आकार खो रहा है स्वर
पता नहीं ये किसकी मुस्कान है किसके चेहरे पर
सामने से मेरा ही चेहरा पहने आ रहा हो एक मनुष्य

तुम्हारे सामने लौटूँ
तो मुझे, मेरे चेहरे के बारे में देर तक बताना दर्पन!

 

7. धूल की तरह

बहुत लंबी यात्रा से लौटा हूँ
इस पुराने घर
जूतों, कपड़ों और बरौनियों पर
जमी आई धूल भी पनाह माँगती है इसी घर में।

अगर यह जूता कभी यात्राओं के रहस्य खोलेगा
धूल उसकी तस्दीक़ करेगी

इतने अपरिचय से मुझको मत देखो साँस!
अपने भीतर आने दो
और देह के अम्ल का हिस्सा होने दो।
वहीं एक गुनगुनी नींद सो रहूँगा।
वही मेरा घर है।

कुछ भीतर की धूल भी आराम करना चाहती है
साँस के साथ भीतर गई थी
और भीतर कहीं रास्ता भूल गई

कम से कम आज रात
हम सबको यहीं सोने दो।

 

8. पंख

मरने से कुछ समय पहले
दादी ने एक पंख मुझे देते हुए कहा :
यह गरुड़ का पंख है, इसे हमेशा पास रखना
एक ढंग से यह प्रजापति का आशीष है

अगर मैं थोड़ा और बिगड़ैल बच्चा होता
तो इस पंख को कंचे से बदल चुका होता

अगर मैं थोड़ा और बहादुर होता
तो मरने वालों में शामिल होता
तो एक ख़ूनआलूदा पंख पर किसका ध्यान जाता

अगर मैं थोड़ा और उदास होता
तो सलेटी रंग का होता
और बहुत भुलक्कड़ हुआ करता

बहरहाल पंख किसी तरह मेरे पास बचा रहा

मेरी सात बेटियों में से तीसरी बेटी
रात में छुपकर कविता लिखती है
लेकिन सूर्योदय अपनी मुस्कान में उनको प्रकाशित कर देता है

जब मुझे यकीन हो जाएगा
कि वह हवा को अपनी सखी बना चुकी
तब उसे मैं यह पंख सौंप दूँगा
लेकिन इसके पीछे की कहानी को बदल दूँगा।

 

9. रात में बारिश

इस बार भी अजब ढंग की बारिश हो रही है
वह बहुत कम होती है और जैसे
अपना होना छुपाती हुई बरस रही है

हमारे सोने के बहुत बाद
मंद्र स्वर में बरसना
और सूर्योदय से पहले चुप लगा देना

कितने प्राण उसकी आस में आकाश ही देखते रहते हैं
बीज धरती के भीतर उसे पुकारते होंगे

तृण और छोटी वनस्पतियाँ और –
और विनय में झुकी हुई हैं इस अभाव पर

चुपचाप बरसती हुई वह सरसराती
हमारी नींद का हिस्सा बन सकती है और
इस बात की लत लगा सकती है
कि रात ऐसे ही बजती रहेगी

कभी डर का सपना देखते ऐसे में
तो लगता बादल गरजने की आवाज़ है
दूर से आती हुई।

 

10. चढ़ आया है पानी

देह के भीतर चढ़ता जा रहा है पानी
बाहर आईने में रोज़ परख रहा हूँ मैं
अपनी त्वचा का आश्वासन,

एक पुराने चेहरे के लिए
मेरे पास है मुस्कान का समकालीन चेहरा।

कल जो कमर तक था पानी आज
चढ़ आया है सीने तक
सुनाई देने लगी है कानों में हहराते पानी की आवाज़
दिखाई देते हैं फुनगी के थोड़े से पत्ते
डूब जो चुकी है पगली झाड़ी,

पर्व की रात सिराए दीपक सी
अब भी डगमग उतराती हो आत्मा
इसी बढ़ते जल में

 

11. अद्वितीय जीवन

अपने वृक्ष से अलग
ज़मीन की घास मिट्टी पर
भीगते, सूखते, क्षय होते
पत्तों के अलग-अलग रूपाकार और ऐंठन में
उनके मौलिक और अद्वितीय जीवन को देख सकते हैं

हर पत्ते के पास अपनी एक कहानी है
वृक्ष की शिराओं से होकर आता
जल, खनिज और जीवन उन तक
एक जैसा नहीं पहुँचता था ना

अलग होने से पहले वृंत ने
क्या टहनी से कुछ कहा था?
विश्वास करने की वजहें हैं कि
हर एक पत्ता अलग शब्द कहता है अलविदा के-
अपने वृक्ष,अपनी शाख से

हर पत्ता अलग ढंग से पीठ टिकाता है
अपनी अंतिम विश्राम स्थली पर
अलग-अलग विन्यास में बुझती हैं
अलग-अलग पत्तियों की कोशिकाएँ

सब पर अलग अलग ढंग से उतरता है
पीला, भूरा और काला रंग

 

12. नसीहत

वसीयत चुपचाप लिखनी चाहिए
और लिखकर भूल जाना चाहिए।

ज़हरीली हवा और राख से ढके
इस संसार में क्या है छोड़कर जाने के लिए

किसी बोझिल दिन के उदास विवरणों को
डायरी में दर्ज करने जैसा
सबसे छोटी पर्ची में, सबसे साधारण अक्षरों में लिखना,
और लिखकर भूल जाना (चाहिए)।

गीत लिखना चाहिए गुनगुनाते हुए
एक हारी हुई लड़ाई की टेक पर
लौट आए सबसे पुराना छन्द
व्यर्थ के तुकान्त के लिए भी एक सहृदयता मिले
इतना मुस्कुराते हुए सुनाना चाहिए गीत,
छन्द-भंग पर हो गया था हृदयाघात
इस किंवदन्ती पर विश्वास करते हुए
गीत लिखना चाहिए।

कथा लिखनी चाहिए ऐसे कि
पंक्तियों के बीच रिसते खून से
चिपचिपा जाए उँगली पृष्ठ पलटते

न हो भले ही कथा का शीर्षक― ‘रक्तपात’

 

13. क़िस्सागो

एक बार ऐसा हुआ
कहकर एक बार जब वह रूका
तो ऐसा हुआ कि उसे कुछ भी याद नहीं आया
अभी इतने किस्से थे बताने को
कि गुज़र जानी थीं हज़ार रातें जब वह रुका–
वह खोजता रहा रेगिस्तान, जंगल,
समय और आकाश के भीतर, वह खोजता रहा
और बाहर बैठे रह गए सुनने वाले बहुत सारे लोग

फिर ऐसा हुआ एक बार कि बहुत सारे लोग
मदद को चले गए उसके पीछे उसके भूलने की जगहों पर
और भूल गए क़िस्सागो का चेहरा
अपने ग्रह आकाश और स्मरण समेत
खो गए सारे लोग, एक भूले हुए किस्से की ख़ातिर
फिर बाहर भूल गए लोग यह सारा किस्सा

ऐसा हुआ एक बार।

14. गाँठ खोलो

मनुष्यों के कोलाहल से भरे
इस जलसाघर में
आकुलता से कोई परिचित ढूँढ़ते
हम दो ही हैं : विश्वास करो।

देखना कैसे बदल जाएगा
शुभ प्रसंग का यह सबसे पुरातन दृश्य,
अपरिचय की गाँठ खोलो
और कुछ झिझकने के शब्द बोलो।

आँचल की गाँठ खोलकर कैसे
तीन रहस्यमय लौंग
निकालकर दिए थे इसी आषाढ़ के मास में
याद करो,
विस्मरण की गाँठ खोलो और किसी
बहुत पुराने परिचित का हाल पूछने में
बहाने के शब्द बोलो।

हाल नहीं बताकर जो फिर से माँग बैठूँ
वैसा ही एक लौंग
तो नाक की लौंग छूकर
अपने पुरातन जादू से
मिटा दो सब पुराने छन्द, पुराने चिह्न

और नए शब्द बोलो।

अपरिचय की गाँठ खोलो।

15. चंदिया स्टेशन की सुराहियाँ प्रसिद्ध हैं

जंगल के बीच से किंवदन्ती की तरह वह आई प्यास उस
गाँव में और निश्चय ही बहुत विकल थी।

और चीज़ें क्यूँ पीछे रहतीं जब छोटी रानी ही ने उससे
अपनी आँखों में रहने की पेशकश कर दी, लिहाज़ा
उसे धरती में ही जगह मिली जहाँ की मिट्टी का उदास
पीला रंग प्रेमकथाओं की किसी साँझ की याद दिलाता है।

पहली जो सुराही बनी वह भी प्यास धरने के लिए
ही बनी थी लेकिन कथाएँ तो ग़लती से ही आगे बढ़ती हैं।

आगे बढ़ती ट्रेन उस पुराने गाँव की पुरानी कथा में
थोड़ी देर को जब रुकती है तो लोग दौड़कर दोनों
हाथों में सुराहियाँ लिए लौटते हैं – कथा में नहीं बाहर
सचमुच की ट्रेन में।

वे भी इसमें पानी ही रखेंगे और विकल रहेंगे,
ग़लती दुरुस्त नहीं हुई है इतिहास की।


 

कवि महेश वर्मा
जन्म- 30 अक्टूबर, 1969 (अम्बिकापुर छत्तीसगढ़)

कविताएँ, कहानियाँ और रेखाचित्र सभी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित। वेब पत्रिकाओं में कविताओं का नियमित प्रकाशन। पाकिस्तान की साहित्यिक पत्रिका दुनियाज़ाद और नुकात में कविताओं के उर्दू अनुवादों का प्रकाशन। कविताओं का मराठी, अंग्रेज़ी और क्रोएशियाई में अनुवाद भी प्रकाशित। फ्रेंच अनुवाद प्रकाश्य। चित्रकला में गहरी रुचि।

कविता संग्रह ‘धूल की जगह’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित।

ईमेल : maheshvermav@gmail.com

टिप्पणीकार कवि वसु गंधर्व
उम्र- 21 वर्ष, अंग्रेज़ी, अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान में स्नातक। कई पत्रिकाओं और वेब ब्लॉग्स में कविताएँ प्रकाशित। शास्त्रीय संगीत के गंभीर छात्र, वर्तमान में पण्डित अजय चक्रवर्ती के शिष्य। कविता के अलावा विश्व साहित्य, दर्शन, और अर्थशास्त्र में रुचि।

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