समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

कविता

सरिता संधू की कविताएँ व्यवस्था की आँखों में झाँकती संवेदनाएँ हैं

हीरालाल राजस्थानी सरिता संधू पिछले दो सालों से दलित लेखक संघ से जुड़ी हुई हैं। उनकी विशेषता है कि संगठन के प्रति अपने कर्तव्यों का...
साहित्य-संस्कृति

खनकने लगी हैं गुल की मोहरें

पीयूष कुमार फिर से दिन आ गए खिल के खिलखिलाते गुलमोहर के। वसंत की अगवानी में सेमल और पलाश की ललाई कम हो गयी थी...
शख्सियतसाहित्य-संस्कृति

आम किसान की पक्षधरता के कहानीकार हैं मार्कण्डेय

दुर्गा सिंह
(हिन्दी के प्रसिद्ध कहानीकार मार्कण्डेय के जन्मदिन, 2 मई पर विशेष) आज जबकि गांव और किसान दोनों पूंजी और बाजारवादी प्रसार के बीच बेतरह पीछे...
साहित्य-संस्कृति

मुकुल सरल की ग़ज़लें और नज़्म लोकतंत्र की स्थिति, मानवता और प्रेम को व्याख्यायित और पुनर्व्याख्यायित करती हैं

राज वाल्मीकि नई दिल्ली। “इस किताब में बहुतों की आवाज़ शामिल है। इसमें मुल्क के आज के हालात को शामिल किया गया है। मुकुल सरल...
कविता

फ़रीद इस समय की कविता के प्रखर स्वर हैं : आलोक धन्वा

पटना। “फ़रीद इस समय की कविता के प्रखर स्वर हैं। इधर अच्छी कविताएँ लिखीं जा रहीं हैं, कविताएँ लिखी जानी चाहिए। ये कविताएँ सामने आ...
कविता

आनंद बहादुर की कविताएँ जीवन की अंतर्यात्रा को उकेरती हैं

समकालीन जनमत
विनय सौरभ   नहीं होने ने जो थोड़ी सी जगह खाली की है वह मैं हूँ एक दिन नहीं होना किसी जगह से आएगा और...
कविता

पुरू मालव की कविताएँ एक आत्मीय आग्रह के साथ बड़े सवालों पर बात करती हैं

समकालीन जनमत
निरंजन श्रोत्रिय   युवा कवि पुरू मालव की आसान-सी दिखने वाली ये कविताएँ हमारे भीतर एक फोर्स के साथ खुलती हैं। वह चाहे विस्थापन का...
स्मृति

नक्सलबाड़ी विद्रोह, भोजपुर आंदोलन और कवि-आलोचक रामनिहाल गुंजन

सुधीर सुमन
  (पहले स्मृति दिवस पर) रामनिहाल गुंजन के पूर्वज पटना जिले के बिहटा थाने के भरतपुरा गांव से आकर आरा में बसे थे। गांव में...
कविता

मोहन कुमार डहेरिया की कविताएँ व्यक्तिगत और सामूहिक अभिव्यक्ति को सशक्त और बेचैन होकर ज़ाहिर करती हैं

समकालीन जनमत
पीयूष कुमार आत्मा के पेड़ पर बैठा कवि मोहन कुमार डहेरिया की कविताओं में मनुष्यविरोधी समय का अतियथार्थ अपनी विकलताओं और भावसघनाओं के साथ आता...
साहित्य-संस्कृति

गज़लें लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़ी हैं – डॉ जीवन सिंह

समकालीन जनमत
लखनऊ। जन संस्कृति मंच के सहयोग से ‘रेवान्त’ पत्रिका की ओर से चर्चित जनवादी गजलकार डी एम मिश्र (सुल्तानपुर) के नवीनतम ग़ज़ल संग्रह ‘समकाल की...
पुस्तक

अशोक चन्द्र की किताब ‘ स्वर्ग की यातना ’ : जन्नत के ज़ख़्म पर जिरह करती एक किताब

समकालीन जनमत
लखनऊ। ‘ कश्मीर जो कभी धरती का स्वर्ग माना जाता था, वह आज यातना शिविर में बदल चुका है। उसे अंग भंग कर लहूलुहान किया...
कविता

जोगेन चौधुरी की कविताएँ चित्रकला सा वितान रचती हैं

समकालीन जनमत
मीता दास मैंने ‘उजाले और अँधेरे में एक फूल’  नाम से एक पुस्तक का अनुवाद किया जिसमें शीर्षस्थ समकालीन भारतीय कलाकार जोगेन चौधरी की मूल...
स्मृति

पाश : सपने हर किसी को नहीं आते

कौशल किशोर
शहादत दिवस (23 मार्च) पर  ‘भगत सिंह ने पहली बार पंजाब/जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से/बुद्धिवाद की ओर मोड़ा था/जिस दिन फांसी दी गई/उनकी कोठरी में...
साहित्य-संस्कृति

नयी कहानी आन्दोलन में हाशिये पर धकेल दिया गया ग्राम समाज

सुशील मानव
इलाहाबाद। गाँधी जी ने कहा था, कि असली भारत गांवों में बसता है। मेरे सपनों का स्वराज्य और ग्राम स्वराज्य का मॉडल देते हुए उन्होंने...
कविता

विमल किशोर की कविताओं में स्त्री मुक्ति की आकांक्षा – उषा राय

लखनऊ। लखनऊ पुस्तक मेले में , 18 मार्च को विमल किशोर के कविता संग्रह ‘पंख खोलूं उड़ चलूं’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन...
पुस्तक

नागरिकता बनाम मनुष्यता का अप्रतिहत आख्यान : अमर देसवा

समकालीन जनमत
कार्तिक राय चर्चित कहानियाँ ‘ छबीला रंगबाज़ का शहर ’ और ‘ वास्को डी गामा की साईकिल ’ से अपनी पहचान बना चुके प्रवीण कुमार...
कविता

अनिल अनलहातु की कविताएँ हमारी हताशा और जिजीविषा का अन्तर्द्वन्द्व हैं

समकालीन जनमत
प्रभात मिलिंद अनिल अनलहातु हमारे समय के विरल और अनिवार्य कवि हैं. कविताओं में वक्रोक्तियों का कारुणिक प्रयोग कैसे संभव हो सकता है, व्यंग्य में...
कविता

रूपम मिश्र का कविता पाठ : कविता जीवन के आवेग से पैदा होती है

समकालीन जनमत
इलाहाबाद। जन संस्कृति मंच, इलाहाबाद द्वारा तीन मार्च को मेयो हाॅल के पास स्थित अंजुमन-रूह-ए-अदब के हॉल में कविता पाठ और परिचर्चा का आयोजन हुआ।...
कविता

शिरोमणि महतो की कविताओं की प्रकृति देशज है।

समकालीन जनमत
निरंजन श्रोत्रिय युवा कवि शिरोमणि महतो की इन कविताओं में भाषा और अनुभवों की ताजगी साफ देखी जा सकती है। इन कविताओं मे कवि ने...
साहित्य-संस्कृति

भारतीय फासीवाद के मूल में सांस्कृतिक पर्यावरण पर वर्णाश्रम के संस्कारों का प्रभुत्व कायम करना

समकालीन जनमत
लखनऊ। जन संस्कृति मंच लखनऊ के वार्षिक आयोजन के तहत पहले सत्र में अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम 25 फरवरी...
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