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पुस्तक

अशोक चन्द्र की किताब ‘ स्वर्ग की यातना ’ : जन्नत के ज़ख़्म पर जिरह करती एक किताब

लखनऊ। ‘ कश्मीर जो कभी धरती का स्वर्ग माना जाता था, वह आज यातना शिविर में बदल चुका है। उसे अंग भंग कर लहूलुहान किया गया। ऐसा पहले भी हुआ और 5 अगस्त 2019 को यही घटना फिर हुई जब भारत सरकार ने 370 खत्म कर उसके राज्य के दर्ज़ा को खत्म कर दिया। कवि और लेखक अशोक चन्द्र की सद्य प्रकाशित किताब ‘स्वर्ग की यातना’ इसी का आख्यान है। इसके केंद्र में कश्मीर, कश्मीरी और कश्मीरियत है। वह वस्तु परक तरीके से तथ्यों की रोशनी में कश्मीर के इसी यथार्थ, जिसके दायरे में भूगोल, इतिहास, राजनीति, संस्कृति आती है, का विवेचन करती है। यह कश्मीर के बारे में पाठकों को लोकतांत्रिक राय बनाने में मदद करती है। ‘

यह विचार अशोक चंद्र की किताब ‘स्वर्ग की यातना’ के विमोचन के मौके पर वक्ताओं ने व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन 25 मार्च को लखनऊ पुस्तक मेला में वाणी प्रकाशन द्वारा हुआ। इसकी अध्यक्षता जाने-माने राजनीतिक चिंतक प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने की। वक्ताओं में वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव और कवि कात्यायनी शामिल थीं। युवा आलोचक आशीष सिंह ने पुस्तक का परिचय दिया और कार्यक्रम का संचालन किया ‘इंडिया इन साइड’ के संपादक अरुण सिंह ने। इस मौके पर लेखक अशोक चंद्र ने इसकी रचना प्रक्रिया व पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह उनके तीन दशक के अध्ययन व शोध से संभव हुआ है।

वक्ताओं का कहना था कि कश्मीर को लेकर दो नजरिया है। एक नजरिया शासक वर्ग और राष्ट्रवादी चिंतन का है और दूसरा कश्मीरी जनता के पक्ष में खड़ा होकर इसे देखने का है। मीडिया और सरकारी प्रचार ने जिस तरह से कश्मीर के यथार्थ को लोगों तक पहुंचाया है, उसी का नतीजा है कि आज वहां की जनता के पक्ष में खड़े होकर कश्मीर और कश्मीरियों के बारे में बात करते ही आप सवालिया घेरे में आ जाते हैं। अशोक चंद्र की किताब कश्मीर को लेकर ब्रिटिश सरकार, कश्मीर नरेश, पाकिस्तान, शेख अब्दुल्ला, भारत सरकार की भूमिका पर बात करती है। कश्मीर, कश्मीरी और कश्मीरियत और इस संकट को केन्द्र में रखकर लिखी गई यह किताब कई नये पाठ रखती है।

वक्ताओं का यह भी कहना था की कश्मीर के साथ भारतीय सत्ता का वही रवैया है जो पाकिस्तान सरकार का बलूचिस्तान के साथ रहा है। जहां कश्मीर के महाराजा की मंशा स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व को बनाए रखने तथा विलय के मुद्दे पर भारत व पाकिस्तान के साथ सौदेबाजी की थी, वहीं भारत में शामिल होने के पीछे शेख अब्दुल्ला की भूमिका है। 370 के माध्यम से ही कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बना। इस धारा को लेकर कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला। यह सिर्फ कश्मीर तक सीमित नहीं है बल्कि संविधान में 371 और उसकी कई उप धाराएं हैं जो पूर्वोत्तर के राज्यों और अन्य कई राज्यों को इसी तरह का विशेष राज्य का दर्जा देती हैं। कश्मीर के साथ उसके विरोध में माहौल इसलिए बनाया गया या बनाया जाता है क्योंकि वह मुस्लिम बहुल राज्य है और हिंदुत्ववादी शक्तियों को मुस्लिम विरोधी भावना बनाने में इससे मदद मिलती है।

वक्ताओं का यह भी कहना था कि इतिहास-भूगोल-संस्कृति से गुजरती यह किताब ना सिर्फ़ संवैधानिक तथ्यों के आलोक में आगे बढ़ती है, बल्कि सरकार के समक्ष कई ऐसे सवाल उठाती है, जिसका समाधान अपेक्षित जान पड़ता है। विगत 70 वर्षों से कश्मीरी अवाम के दुःख-दर्द और राजनीतिक संवेदनहीनता को समझा जाना चाहिए। 370 खत्म करने के बाद वहां के क्या हालात हुए ? क्या वहां आतंकवाद का एक ही चेहरा है ? पूरा राज्य फौजी छावनी में बदल गया। नेट व अन्य सूचना के श्रोत बंद कर दिए गए। दुनिया से काट दिया गया। सामान्य नागरिक सुविधाओं से वहां के लोग वंचित हो गए। कश्मीरी महिलाओं को लेकर घटिया प्रचार हुआ। अशोक चंद्र की किताब कश्मीर के राजनीतिक संकट और उसकी वजहों पर विस्तार से चर्चा करती है।

वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कश्मीर पर जानने के लिए यह एक मुकम्मल पुस्तक है। वाणी प्रकाशन की ओर से विनोद त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहर की गंभीर और अध्यवसायी शख़्सियतों की सहभागिता रही। इस अवसर पर कौशल किशोर, वीरेन्द्र सारंग, चन्द्रेश्वर,अनिल कुमार सिंह (फ़ैज़ाबाद), बन्धु कुशावर्ती,अजीत प्रियदर्शी, डॉ. प्रमोद कुमार, तस्वीर नक़वी, कलीम खान, प्रभात त्रिपाठी, अनिल श्रीवास्तव, दीपक श्रीवास्तव, दया शंकर राय, प्रतुल जोशी, रंजीत कुमार, रमेश सिंह सेंगर, चन्द्रभान आदि बड़ी संख्या में मौजूद थे।

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