Tag : साहित्य

साहित्य-संस्कृति

दुनिया की दीवारों में रचनाकार खिड़की के समान: प्रो. शंभुनाथ

अम्बरीन आफ़ताब डॉ. राही मासूम रज़ा साहित्य अकादमी एवं प्रकाशक मंच के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 01 सितंबर, 2020 को फेसबुक लाइव के माध्यम से...
ज़ेर-ए-बहस

 किन्नर समुदाय: प्रचलित धारणाएँ और यथार्थ

समकालीन जनमत
रविवार 16 अगस्त 2020 को कोरस के फेसबुक लाइव ‘स्त्री संघर्ष का कोरस’ में ‘वर्तमान भारतीय संदर्भ में किन्नर समुदाय’ विषय पर  परिचर्चा की गई...
शख्सियत

मेरे जीवन में प्रेमचंद: शेखर जोशी

समकालीन जनमत
( नयी कहानी आंदोलन के प्रमुख कहानीकार शेखर जोशी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के ओलियागांव ग्राम में हुआ. अपनी माँ की असमय मृत्यु...
स्मृति

कवि बी एन गौड़: सब में बसता हूँ मैं

कौशल किशोर
86वें जन्मदिवस पर ‘मरूंगा नहीं…/क्रान्ति का इतिहास इतनी जल्दी नहीं मरता/बलिदान के रक्त की ललाई को/न धूप सुखा सकती है/न हवा और न वक्त/….इसलिए, मैं...
ज़ेर-ए-बहस

सभी आवाज़ों को मजबूत करना, सभी गीतों को ताकत देना तथा सवाल खड़े करना ही कला का सच्चा काम है: टी.एम. कृष्णा

समकालीन जनमत
टी. एम. कृष्णा (अवधेश जी द्वारा मुझे हिन्दी में बोलने के लिए बोला गया है लेकिन मेरा हिन्दी तो बहुत खराब है मैं हिंगलिश बोलूँगा।...
साहित्य-संस्कृति

तुपकी की सलामी का लोकपर्व : बस्तर का गोंचा

समकालीन जनमत
रथयात्रा की बात करते ही जगन्नाथपुरी की बात जेहन में आ जाती है लेकिन इसका एक बस्तरिया संस्करण भी है जिसे ‘गोंचा तिहार’ कहा जाता...
शिक्षा

बच्चों की रचनात्मकता को ऑनलाइन विकसित करता “जश्न ए बचपन”

समकालीन जनमत
उत्तराखण्ड के सरकारी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों के फोरम “रचनात्मक शिक्षक मण्डल” ने लॉक डाउन के दिनों में बच्चों की रचनात्मकता को बनाये रखने के...
साहित्य-संस्कृति

चिंताएँ और सरोकार एक से हों तो मिलकर रचते हैं बड़ा कैनवास

दीपक सिंह
मई दिवस के अवसर पर समकालीन जनमत के फेसबुक पेज द्वारा आयोजित लाइव कार्यक्रमों की तीसरी कड़ी में 1 मई मजदूर दिवस शाम 7 बजे...
साहित्य-संस्कृति

साहित्य की पारिस्थितिकी पर खतरा

गोपाल प्रधान
साहित्य की पारिस्थितिकी आखिर है क्या ? इसका सबसे पहला उत्तर किसी के भी दिमाग में यह आता है कि समाज ही साहित्य की पारिस्थितिकी...
साहित्य-संस्कृति

प्रतिरोध साहित्य का मूल स्वर है जो समाज निर्माण का स्वप्न लेकर चलता है

डॉ हरिओम
  साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता रहा है. मतलब समाज जैसा है उसे वैसा ही दिखाने वाला लेखन साहित्य है. बचपन से हम...

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