समकालीन जनमत
पुस्तक

जंग के बीच प्रेम और शांति की तलाश का आख्यान है ‘अजनबी जज़ीरा’

आग में खिलता गुलाब?

अपने अंतिम दिनों में सद्दाम हुसैन जिन सैनिकों की निगरानी में रहते रहे उन सैनिकों को ‘सुपर ट्वेल्व’ कहा जाता था। इन्हीं सैनिकों में एक सैनिक था– विल वार्डेनवर्पर। विल ने सद्दाम के साथ अपने अनुभव को एक किताब की शक्ल दी। किताब का नाम है – ‘द प्रिज़नर इन हिज़ पैलेस, हिज़ अमेरिकन गार्ड्स एंड व्हाट हिस्ट्री लेफ़्ट अनसेड’। सद्दाम हुसैन के अंतिम दिनों के हालात को जानने के लिए एक एक जरूरी किताब है। किताब में बताया गया है कि इन्हीं सैनिकों के हाथों सद्दाम फाँसी देने वालों को सुपुर्द किए गए। सद्दाम के अंतिम दिनों के साथी इन फौजियों को उनसे (सद्दाम से) बहुत लगाव हो गया था। मुहब्बत बेखौफ़ दरिया है, जिसे रोकना कतई आसान नहीं। सुपर ट्वेल्व को सद्दाम से मिलने-जुलने की मनाही थी। मगर सैनिक उनके हमराज होते जा रहे थे। इनके लिए सद्दाम एक यारबास आदमी थे। इस किताब में कुछ दिलचस्प और बेहद तकलीफ देने वाले वाकये दर्ज़ हैं, मसलन – ‘सद्दाम को सरप्राइज देने की योजना बनाई गई। पुराने कबाड़ख़ाने से एक छोटी मेज़ और चमड़े के कँवर की कुर्सी निकाली गई और मेज़ के ऊपर ईराक का एक छोटा झंडा लगाया गया।’ मगर यह एक प्रहसन था- दुश्मन देश के फौजियों द्वारा सद्दाम को खुश रखने की अंतिम कोशिश। सद्दाम उस वक्त अपने से अधिक क्रूर शक्ति के हवाले थे, जो अपनी शान के खिलाफ़ उठी हर गुस्ताख निगाह को मुर्दा बनाने का खिताब हासिल कर चुकी थी। लिहाजा 30 दिसंबर 2006 को उनको भोर के तीन बजे जगाया गया और बताया गया कि थोड़ी ही देर में उन्हें फाँसी दी जाएगी। फाँसी का ऐलान सुनते ही वह खामोश हो गए। उनके भीतर कुछ टूट सा गया। उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। वे नहाए और खुद को फाँसी के लिए तैयार किया।

सद्दाम की फाँसी के बाद सुपर ट्वेल्व के कई सैनिकों ने फौज़ से खुद को अलग कर लिया। वे एक सल्तनत के ढहने, एक तानाशाह के अंत और लाखों लोगों की तबाही के गवाह थे। वे खुबसूरत रिहायशों की बर्बादी का मंजर देख चुके थे। उन्हें लड़ाई और खून से नफ़रत हो गई थी। वे बरबाद शहर और बुझी निगाहों से दूर होना चाहते थे। वे मुहब्बत में पनाह चाहते थे। इस किताब में दर्शाया गया है कि खूनखराबे से तंग आकर सुपर ट्वेल्व के फौजी फौज को छोड़कर अमन – चैन की जिंदगी तलाशने लगे।

इजराइल और फलस्तीन के बीच फँसे मासूम इंसानों की तस्वीरें हमारे जेहन में ताजा हैं  और हम वहाँ की तबाह जिंदगी और वहाँ के हुक्मरानों के बयानों को सुनकर थक-थका कर, माथा पकड़ कर बैठ चुके हैं। अफगानिस्तान में जिंदगी की मियाद नहीं है। अफनानिस्तान से ‘अमन की फौज’ रूखसत होने की तैयारी कर रही है। इजराइल और फलस्तीन के निजाम हालाँकि बदल गए हैं। मगर तकदीर के बदलने का इंतजार है। आश्चर्यजनक रूप से इस मुद्दे को भारतीय मीडिया ने भी खूब जगह और समय दिया। ऐसी तमाम लड़ाइयां इतनी आम हो चुकी हैं कि हम सभी का जेहन इस बात पर यकीन करने के लिए तैयार हो गया है कि लड़ाइयाँ मासूमों की जिंदगी के एवज पर लड़ी और जीती जाती हैं और यह सब चलता रहता है। लिहाजा इस सदी का इंसान अपने से पहले सदी वाले इंसान के बनिस्पत तबाही और मौत से परेशान नहीं हो पाता। उसकी संवेदनाएं थोड़ी जम सी गई हैं। हम तैयार हैं और मानते हैं कि लड़ाइयों में खाली बड़ी–बड़ी इमारतें जमींदोज नहीं होतीं, फ़कत इंसान नहीं मरा करते, बल्कि इंसानियत तक तबाह हो जाती है, मर जाती है और यह सब होता रहता है। ज़ख्म को सदियाँ सालों तक सिसकते हुए अपनी पीठ पर ढोती रहती हैं और तारीख के नक्कारखाने में सदियों की कराह अभिशप्त प्रेतात्मा के मानिंद सैकड़ों साल तक कराहती रहती है।

दुनिया के तमाम हिस्सों में लड़ाइयाँ होती रही हैं और लोग तबाह होते रहे हैं– अफ़गानिस्तान, ईराक, फलस्तीन-इजराइल और सीरिया, इनके साथ–साथ तमाम देशों की सरहदें। कहीं-कहीं कुछ लोग अपनी सरहदों को महफूज़ रखने के लिए दीवार तक खड़ी कर लिए और कुछ लोग कर रहे हैं (यह वक्त दीवारों का है) और जहाँ दीवारें नहीं हैं, वहाँ दीवारों वाली सरहदों से अधिक खौफ़नाक मंजर पेश होता (हो रहा) है। पूरी दुनिया में लाखों लोग लड़ रहे हैं और लाखों बेगुनाह मर रह रहे हैं। दुनिया का हर कोना सुरक्षा को लेकर चिंतित और हलकान है। हर जगह जिंदगियां तबाह हो रही हैं और कब्रिस्तान व मरघट आबाद हो रहे हैं। तमाम औरत-मर्द और बच्चे कब्रिस्तानों में पनाह पा रहे हैं। हर तरफ नफरत का मंजर है। मगर क्या इतने खौफ़जदा माहौल में भी बिना मुहब्बत किए जिया या रहा जा सकता है? या यूं कहें कि क्या हर लड़ने वाला लड़ाका संगदिल (होता है) हो गया है, उसे गुलाबों का खिलना, कलियों का चटकना और बच्चों की किलकारी जरा भी पसंद नहीं है?

ऐसा नहीं है। मुहब्बत कभी नहीं मरती। लोग कहते हैं कि पत्थरों के भी दिल हुआ करते हैं। मजदूरों का मानना है कि मशीनों के भी जज्बात हुआ करते हैं। नदियाँ किनारों की मुहब्बत में कैद होकर हजारों साल एक ही तरह से बहते हुए अपनी उम्र जाया कर देती हैं। जो जहाँ है दिल लगाए बैठे है। इसीलिए मुहब्बत का कारोबार दुनिया का सबसे पाक और हमेशा चलने वाला कारोबार है। कई लड़ाके दुश्मन की लड़कियों से दिल हार जाते हैं। उनके आका जीत की मुनादी कर रहे होते हैं और उनके लड़ाके दिल के हाथों हार रहे होते हैं– ‘जंग के दौरान चंद सिपाही अपने ही साथी महिलाओं से संबंध बनाकर उन्हें गर्भवती बना चुके थे। या फिर बीच जंग में आगे लड़ने से मना कर चुके थे। उन पर ट्रायल चल रहा था।’ हारने और जीतने का यह खेल आग में जल रहे हर मुल्क में चल रहा है। मुहब्बत की आग से खेलने की यह अदा सदा से रही है। आग के दरिया में मुहब्बत का गुलाब खिलता है। क्या इस तरह के मंजर पर अफ़साने साया हुए हैं?

मेरे ख्याल हुए हैं और कई हुए हैं– वार एंड पीस, फॉर ह्वोम द बेल्स टॉल्स (हेमेंग्वे), गॉन विथ विंड और द नेकेड एंड द डेड (नॉर्मन मेलर)। मगर हम जिस नावेल की बात कर रहे हैं उसकी जमीन ईराक है और एक फौजी जंग का अंत मुहब्बत में तलाशता नज़र आता है (ऊपर इसी नावेल की एक पंक्ति को बतौर संदर्भ लिया गया था)। वह भी दुश्मन मुल्क की औरत से मुहब्बत करने लगा है। इस परचे में इस नावेल पर कुछ जरूरी बात करने का इरादा है।

‘अजनबी ज़जीरा’ एक नजीर है– लड़ाई और लश्कर के खौफ़ में रह रहे लोगों की कहानी है । यह एक माँ और एक मुसीबतजदा औरत की कहानी है। इस नावेल में मुहब्बत के रंग को नुमाया किया गया है- दहकते शोलों पर मुहब्बत का रंग, ऐतबार जगाने वाला रंग है। नासिरा शर्मा ने बहुत मुहब्बत और यकीन से पाक-ए-मुहब्बत को अफ़साने में पिरोया है। ‘अजनबी ज़जीरा’ युद्ध के दरिया में खिले हुए कमल की तरह है। जैसे साहिल के दायरे की आदत वाला दरिया धीरे–धीरे साहिल को तोड़कर नया रास्ता बनाता है, हालांकि ऐसा करने में कई बरस खर्च हो जाते हैं, उसी तरह पांच बच्चों की माँ समीरा, जिसका शौहर युद्ध के हालात का शिकार होकर दुनिया से विदा हो चुका है, धीरे – धीरे मार्क (दुश्मन खेमे का कमांडर) से मुहब्बत कर बैठती है और उसमें जिंदगी की पनाह पाती है। मगर इतना सब कुछ होता कैसे है?  अपने दीन, तालीम और नस्ल पर फ़ख्र करने वाली औरत और दुश्मनों के हर गली–कूचे तबाह करने वाला तेज तर्रार मार्क जैसे दो एकदम अलग लोग मुहब्बत की ओर कैसे बढ़ने लगते हैं?

नासिरा शर्मा के इस अफ़साने को मुहब्बत की नज़्म कहा जा सकता है। एक ऐसी नज़्म जिसकी शुरूआत मातम और मजबूरी से होती है– ‘शौहर जितना भी प्यार क्यों न हो, लाश तो दफनानी ही पड़ेगी…’ उपन्यास की शुरूआत ही मौत और मातम की मुनादी से होती है, मगर मुहब्बत कुछ ऐसी कि मौत के आगोश में पड़ा शौहर अब भी जिंदा और इश्क के काबिल लगता है– ‘इस हालात में भी तुम दुनिया के सबसे हसीन मर्द लग रहे हो।’ नासिरा जी नावेल के शुरू में ही दिखा देती हैं कि समीरा का पोर–पोर उसके शौहर की मुहब्बत में डूबा हुआ है।

वैसे यह अफसाना नहीं हकीकत है। यह हकीकत बयानी है ईराक के एक नामवर शहर, जिसे अपने हुस्न और तालीम पर कभी फ़ख्र था। मगर अब उस मुल्क का बादशाह शिकस्त खा चुका है और कहीं छुप गया है (उसके अंजाम को लेख के शुरूआत में ही आयत कर दिया गया है)। फतेह हासिल करने वाले मुल्क की फौज़ बादशाह (उनके लिए तानाशाह) की तलाश में लगी हुई है और शहर के हर आदमी पर निगाह रख रही है, जिससे हर जिस्म में भय, थकान और गैर-यकीनी सूरतेहाल है। ‘इराकी बाथ पार्टी’ के मेंबर या सद्दाम हुसैन से रिश्ता रखने वाले हर शख़्स की गिरफ़्तारी, हत्या और जेल हो रही है। तमाम गैर-मुनासिब हालात ने मुल्क के सभी गांवों और शहरों को बेनूर और बे-आबरू कर दिया है। समीरा का शहर भी अपवाद नहीं।

समीरा के शहर की बदहाली पर मुगलिया सल्तनत के तबाह होते बेनूर होती दिल्ली की याद ताजा हो जाती है– “इस शहर में कुछ ऐसा जादू है जिससे कोई बेताल्लुक नहीं रह सकता। इसके अतीत की शानो-शौकत के खंडहर जो हर तरफ बिखरे पड़े हैं, उनको देखकर दिमाग सोच में डूब जाता है। ख़ाक में मिलते हुए महल, बेशुमार इमारतें और मक़बरे जो भविष्य के लोगों को अपने वासियों को कभी न खत्म होने वाली शोहरत की याद दिलाते हैं, और फिर भी लोग वहाँ से बगैर देखे, बगैर जाने गुज़र जाते हैं। लेकिन इन सबको नज़अंदाज नहीं किया जा सकता है।”*1

दिल्ली की तरह ही खंडहर शहर और बेसहारा होती समीरा दोहरी मार का शिकार है। समीरा का शौहर बाथ पार्टी का मेंबर था, इसलिए मरने के बाद भी जनाज़े की रस्म पूरी होने में बड़ी मुश्किल पेश आ रही है, मगर शहर अभी मरा नहीं है, कुछ लोग हैं, जिनमें इंसानियत जिंदा है और वे कफन–दफन के लिए आगे बढ़ते हैं– ‘हम आखिरी रसूमात के लिए आए हैं। सामने खड़े स्याह लिबास वाले ने कहा और दूसरे साथिओं ने हामी भरी।…..लाश को कफ़नाने के बाद वे सब बाहर निकले…’

कोई मुल्क जब बरबाद होता है, तो सब कुछ एक साथ बरबाद नहीं होता। बरबादी की ओर बढ़ते मुल्क भी धीरे-धीरे बर्बाद होते हैं। बर्बाद होते मुल्क बर्बाद होते–होते भी तमाम मौकापरस्त लोगों को आबाद कर जाते हैं और कुछ लोगों के पौ-बारह होने लगते हैं। जैसे जब कोई मरता है तो उसके साथ बहुत कुछ मर जाता है, मगर कीड़ों की मौज हो जाती है। वे इत्मीनान से लाश की दावत में शरीक होते हैं। ‘निष्ठावान ईराक़ियों के लिए सब कुछ खत्म हो चुका था, मगर अन्य विचार रखने वालों के लिए सही शुरुआत अब ईराक़ में होने वाली थी।’ हालाँकि लड़ाई और सियासत के दौरान जिस तरह सड़कें रौंदी और लहूलुहान की जाती हैं उसी तरह औरत भी तार–तार होती है– ‘जिस समाज में जवान माँ पर नज़रें गड़ी हों वहाँ पर कमसिन लड़कियों की क्या सुरक्षा है?’ उपन्यास में एक जगह समीरा अपने हालात पर सोचती है– ‘बग़दाद का आसमान उक़ाबों से भरा है जो एक झपट्टे से ताजा कबूतरों अपनी हवस का निवाला बनाने को बेचैन हैं…मेरे सामने अब सिर्फ़ दो रास्ते हैं, एक अस्मत-फ़रोशी का और दूसरा किसी ख़ुशहाल बूढ़े से शादी करने का, ताकि बंद दरवाजा खुल जाए वरना लड़कियां बाग़ी होकर ऐसा कदम उठाएँगी जिसमें सिर्फ़ पछतावा ही हाथ आएगा।’

दुनिया के तमाम शहरों के शहरी अपने शहर के हुस्न से इश्क करते हैं। उसके जर्रे पर मिटने को तैयार रहते हैं। इसी प्रेम के कारण ताकतवर दुश्मनों से लड़ जाते हैं। समीरा को अपनी गलियों और पड़ोसियों से मुहब्बत है। वह छायादार दरख्त की तरह वतनपरस्त औरत है। उसका शहर जिस हालत में पहुँच गया है, उस पर उसका दिल रोता है। जिस घर में कभी चाँद तारों की बातें होती थीं, वह घर दहशत पैदा करने लगा है– ‘घर में एक अजीब-सी बू बस गई थी। शुरू में उस बू ने पाँचों का जीना दूभर कर दिया था। मतली हरदम महसूस होती मगर धीरे-धीरे बिना ताजा हवा के पाँचों इस गंध की आदी हो चुकी थीं जैसे नेदा बम और गोलियों की, जिसको सुने बिना उसे नींद नहीं आती थी।’ नेदा समीरा की सबसे छोटी बेटी है। समीरा अपनी बच्चियों और मध्यवर्गीय समाज की विडंबना से चिंतित है। वह जानती है कि मध्यवर्ग झूठी शान के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा देता है। वह अक्सर सोचते–सोचते बेहाल हो जाती है– ‘वह मध्यवर्ग की बेबस लड़कियाँ हैं, जो हालात की बुरी तरह शिकार हो चुकी हैं, जिनका न खानदान में कोई बचा है, न बैंक में कोई बैलेंस। जो है सिफ़ उनका कुंवारापन।’

देखा जाए तो अजबनी जज़ीरा किसी एक मुल्क की दास्तान नहीं है- अफगानिस्तान, सीरिया, नाइजीरिया और हालिया इस्राइल-फलस्तीन जैसे मुल्क जंग और जिंदगी के बीच फँसे हुए हैं। आए दिन वहाँ से खराब खबरें आती रहती हैं, जिन पर पहले ही बातें रखी जा चुकी हैं।

अज़नबी जज़ीरा को क्या माना जाए? मुहब्बत का अफसाना या उपनिवेश और पूंजी के पंजे में फँसे एक मुल्क की छटपटाहट की दास्तान, या फिर दोनों?

जाहिर तौर पर अजबनी जज़ीरा जिस्मानी मुहब्बत की दास्तानगोई भर नहीं है। यह एक औरत की निजी परेशानियों का पुलिंदा भी नहीं है, यह उन तमाम औरतों और उनकी असहाय बेटियों की ओर से दायर किए गए बयान या हलफ़नामा की तरह है, जिनके मुल्क की किस्मत फौज़ के साये में जलने और बिखरने को रह गई हैं। इसीलिए यह नावेल सियासत को नहीं बल्कि सियासत के बाद उजाड़ होती दुनिया को उजागर करता है। नावेल बहुत खामोशी से यह भी जता जाता है कि फौज़ों का हासिल कुछ भी नहीं। दरअसल फौज़ें और उनका काम दो-धारी तलवार की तरह है, जो दोनों ओर के इंसान को लहूलुहान कर रही हैं। इतना ही नहीं, विदेशी फौज़ की निगहबानी में सांस ले रहे मुल्कों के शहरी सारी नैतिकता छोड़कर और बे-आबरू होकर भी जिंदगी का तार पकड़े रहना चाहते हैं-“ हमारी निष्ठा की पताका…हमारे ही लोगों की गद्दारी से तार-तार हो गई। इस सबके बावजूद लोग जी रहे हैं, जीने को मजबूर हैं। हराम और हलाल की बंदिशों को तोड़कर जीना चाहते हैं।” इस नावेल में कई जगह भूख और खाने-पीने की चीजों के रिश्तों की बहुत बारीकी से पड़ताल की गई है– “अरसे बाद घर में खाना पका था वह भी एक साथ तीन चीजें खाने के लिए माँ ने पकाई थीं– सालन, चावल और स्वीट डिश। मोहल्ले में नए खुले तंदूर की गर्म-गर्म रोटी भी थी जिसकी महक सारे घर में फैल चुकी थी।”

अजनबी जज़ीरा की भूख दुनिया के दूसरे हिस्सों के भूख से एकाकार हो जाती है। समीरा और उसकी बेटियों की भूख, बेघर हुए आदिवासियों और मुल्क और जमीन की तलाश करने वाले तमाम गैर-मुल्की लोगों की भूख से मिलकर एक ऐसी दुनिया को हकीकत बनाती है, जिसमें भूख, बेकदरी, डर और बे-हिसाब यातनाएं हैं।

यह नावेल तोड़ने वाला नहीं जोड़ने वाला नावेल है। समीरा बेवफा नहीं है। तकदीर की मारी है। वह एक दुखियारी माँ है, एक औरत है जिसे शौहर के साथ बच्चों का बाप चाहिए। यह अफसाना एक तलाश है। तलाश की जद में मुहब्बत है और माँ की फिक्र शामिल है। नावेल में पांच बच्चों की माँ को दुश्मन मुल्क का फौजी पनाह और मुहब्बत देता है। आज जहाँ हर तरफ अपनी नस्ल की तलाश की जा रही है, सबको अपने जैसा बनाने की कोशिशें जोरों पर हैं, अपनी संस्कृति को जोड़ने की हिकमत हिंसात्मक रूप अख्तियार कर चुकी है, वहाँ निहायत अलग धर्म और संस्कृति के दुश्मन मुल्क के इंसानों के बीच मुहब्बत होना और उसे अंजाम तक पहुँचाना इस नावेल का हासिल है।

निश्चित रूप से मुहब्बत सीमेंट है, यह टूटने के दौर में जोड़ने का अजमाया नुस्खा है। अजनबी जज़ीरा में नासिरा शर्मा ने इस नुस्खे की ताकत को समझा है और उसे बहुत ईमानदारी से पेश किया है।

संदर्भ –  

*1– डेलरिंपल विलियम, आख़िरी मुगल, पृ.83, प्रकाशन – ब्लूम्सबरी

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