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प्रेमचंद और भारतीय किसान: सुधीर सुमन 

प्रेमचंद की कृतियों में भारतीय समाज के विस्तृत चित्र मिलते हैं। उनका साहित्य ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है। शायद ही ऐसा कोई चरित्र या सामाजिक प्रश्न हो, जिसकी उपस्थिति उनके साहित्य में न हो। एक नए उभरते हुए मध्यवर्ग और राष्ट्रीय आंदोलन पर उनकी गहरी आलोचनात्मक निगाह रही है। इसके बावजूद अगर प्रेमचंद किसान-जीवन के कथाकार माने जाते हैं, तो इसकी वजह यह है कि किसानों को वे नए भारत का निर्माण करने वाली बुनियादी ताकत के बतौर देखते हैं। उनकी धारणा है कि किसानों की बदहाल जिंदगी में बदलाव से ही मुल्क की सूरत बदलेगी। उनका आकलन है कि ‘अंग्रेजी राज में गरीबों, मजदूरों और किसानों की दशा जितनी खराब है और होती जा रही है, उतनी समाज के किसी अंग की नहीं।’ राष्ट्रीयता या स्वराज्य उनके लिए विशाल किसान जागरण का स्वप्न है, जिसके जरिए भेदभाव और शोषण से मुक्त समाज बनेगा। उन्हीं के शब्दाें में- ‘हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें तो वर्णों की गंध तक न होगी। वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा।’
‘जमाना’ पत्रिका में 1919 में ही प्रेमचंद लिखते हैं- ‘‘आने वाला जमाना अब किसानों-मजदूरों का होगा। दुनिया की रफ़्तार इसका साफ संकेत दे रही है—-जल्द या देर से, शायद जल्द ही, हम जनता को मुखर ही नहीं अपने अधिकारों की मांग करने वालों के रूप में देखेंगे और तब वह आपकी किस्मतों की मालिक होगी। तब आपको अपनी बेइंसाफियां याद आएंगी और आप हाथ मल कर रह जाएंगे। जनता की इस ठहरी हुई हालत से धोखे में न आइए। इंकलाब के पहले कौन जानता था कि रूस की पीडि़त जनता में इतनी ताकत छिपी हुई है।’’ इस उद्धरण पर गौर किया जाए तो कई संकेत मिलते हैं। एक तो यह कि प्रेमचंद के लिए जनता का मतलब आमतौर पर मजदूर-किसान है, दूसरा यह कि उन्हें इस जनता की छिपी हुई क्रांतिकारी ताकत का अंदाजा है और तीसरा यह कि उन्हें पूरा भरोसा नहीं कि किसान-मजदूरों का राज जल्द आ जाएगा, इसीलिए उन्होंने ‘शायद’ शब्द का इस्तेमाल किया है।
प्रेमचंद को आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सामंती-अभिजात्य लोगों और मध्यवर्गीय अवसरवादियों को लेकर गहरा संशय था। ‘गबन’ उपन्यास के अविस्मरणीय चरित्र देवीदीन खटीक, जिसके दो बेटे स्वाधीनता आंदोलन में शहीद हुए थे, को आने वाले राज के बारे में तगड़ा संशय है- ‘‘अरे, तुम क्या देश का उद्धार करोगे! पहले अपना उद्धार कर लोे। गरीबों को लूटकर विलायत का घर भरना तुम्हारा काम है। —सच बताओ, जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंग्रेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंग्रेजी ठाठ बनाए घूमोगे_ इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा? तुम्हारी और तुम्हारे भाई बंदों की जिंदगी भले आराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा। —तुम दिन में पांच बेर खाना चाहते हो, और वह भी बढि़या माल_ गरीब किसान को एक जून सूखा चबेन भी नहीं मिलता। उसी का रक्त चूसकर तो सरकार तुम्हें हुद्दे देती है। तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है? अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग विलास पर इतना मरते हो_ जब तुम्हारा राज हो जाएगा, तब तो गरीबों को पीसकर पी जाओगे।’’
इस देश में पिछले साठ साल का राज यह बतलाता है कि प्रेमचंद की आशंकाएं सही थीं। आज का शासकवर्ग और उसके हाकिम-हुक्काम प्रेमचंद के जमाने से भी अधिक सुविधापरस्त, भ्रष्ट, अन्यायी, बेईमान और फरेबी हुए हैं। हाकिमों को आज भी बड़ी-बड़ी तलबें चाहिए_ उन तलबों से भी उनक पेट नहीं भरता तो वे विकास योजनाओं की राशि और गरीबों की राहत सामग्री तक डकार जाते हैं। राजनीति में आज भी बड़े भूस्वामियों, पूंजीपतियों और अवसरवादी मध्यवर्ग का वर्चस्व है। विलायत यानी साम्राज्यवादी शक्तियों का घर भरने का काम आज पूरी बेहयाई और बर्बरता के साथ जारी है। कानून और न्याय आज भी धनिकों के लिए है। जो वास्तविक उत्पादक शक्तियां हैं, वे आज भी जमीन से वंचित हैं या उन्हें जमीन से बेदखल किया जा रहा है। उत्पादन के साधनोें पर उसका अधिकार नहीं है। पूरे देश में हक मांगते गरीबों और मजदूर-किसानों के ऊपर पुलिस की गोलियां चलाई जा रही है। गरीब-मेहनतकशों की हत्याएं इस मुल्क की आम परिघटना बनती जा रही है। विडंबना यह है कि अपने किसानों को भारी सब्सिडी देने वाले अमेरिका के इशारे पर हमारे देश का शासकवर्ग किसानों को दी जाने वाली सारी सुविधाएं खत्म करता जा रहा है। कर्ज के जाल में फंसा कर उन्हें मार रहा है। ‘जॉन सेवकों’ की दलाल सरकारों ने किसानों और मजदूरों को आत्महत्या और भुखमरी के दुष्चक्र में डाल दिया है।
प्रेमचंद जहां अपने साहित्य में किसान-मजदूरों के शोषण, दमन और गरीबी का हृदयविदारक चित्र उपस्थित करते हैं, वहीं उनकी शक्ति की पहचान भी कराते हैं। किसानों की बदहाली की वजहों को प्रेमचंद ने कई आयामों से देखा है। ‘प्रेमाश्रम’ में किसान बेदखली और लगान के खिलाफ प्रतिरोध करते नजर आते हैं, ‘कर्मभूमि’ में वे लगानबंदी का विरोध करते हैं और मध्यवर्गीय नेतृत्व के अवसरवाद का आघात झेलते हैं और ‘गोदान’ में होरी के जरिए जमींदारों और महाजनों तथा वर्णव्यवस्था के द्वारा मृत्यु के मुख में धकेले जाते किसानों की त्रसद कथा कहते हैं। किसानों की आत्महत्या, किसान आंदोलनों की दशा-दिशा, ग्रामीण मेहनतकश स्त्री की दावेदारी, सांप्रदायिकता, धार्मिक पाखंड और तथाकथित जनभागीदारी वाले हमारे लोकतंत्र के संदर्भ में ये तीनों महत्वपूर्ण उपन्यास हैं, जिन पर विस्तार से बातचीत हो सकती है। लेकिन फिलहाल ‘रंगभूमि’ की चर्चा जरूरी है।
आलोचक वीर भारत तलवार ने एक जगह सही ही लिखा है कि प्रेमचंद साहित्य को पढ़कर हिंदी भाषी गरीब किसान अपने वर्ग शत्रुओं को और भी अच्छी तरह पहचान सकेगा। आज सिंगूर, नंदीग्राम, दादरी, कलिंगनगर आदि जगहों में विकास के जिस तर्क और शासन तंत्र के जिस धौंस के जरिए किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने का जो हिंसक अभियान चलाया जा रहा है , वह बरबस प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ की याद दिलाता है। ‘रंगभूमि’ में सिगरेट का कारखाना खोलने के लिए जॉन सेवक अपने गुमाश्ते ताहिर से पूछता है कि वह सूरदास की जमीन कितने में दिला सकता है। ताहिर कहता है कि उसे शक है कि वह इसे नही बेचेगा। तब जॉन सेवक पूरे दंभ से बोलता है- ‘अजी बेचेगा उसका बाप, उसकी क्या हस्ती है? रुपये के सत्तरह आने दीजिए और आसमान के तारे मंगवा लीजिए।’ मगर सूरदास तैयार नहीं होता। तब ताहिर मुहल्ले वालों को धमकी भरे लहजे में समझाता है- ‘‘जिस वक्त साहब जमीन लेने पर आ जाएंगे, ले ही लेंगे, तुम्हारे रोके न रूकेंगे। जानते हो, शहर के हाकिमों से उनका कितना रब्त-जब्त है?—सीधे से, रजामंदी के साथ दोगे तो अच्छे दाम पा जाओगे, शरारत करोगे, तो जमीन भी निकल जाएगी, कौड़ी भी हाथ न लगेगी।’’ मुहल्लेवालों एकजुटता को तोड़ने के लिए वह सबको तरह-तरह के प्रलोभन देता है, समृद्धि के सपने दिखाता है और जमीन छीन लेता है। फिर बाद में वह दूसरों से भी घर खाली कराने लगता है। उन्हें जो मुआवजा दिया जाता है, उससे वे कहीं छप्पर डालकर भी नहीं रह सकते। पुलिस जॉन सेवक की मदद करती है। लोगों के घर में घुसकर सामान फेंकने लगती है। प्रेमचंद ने लिखा है- ‘‘मानो दिन-दहाड़े डाका पड़ रहा हो।’ सूरदास अपनी झोपड़ी छोड़ने को तैयार नहीं होता, जनता जुट जाती है, उसके बाद पुलिस गोलियां चलाती है। इस प्रसंग में रामविलास शर्मा ने बड़ी मार्मिक टिप्पणी की है कि ‘इस तरह अंग्रेजी राज किसानों की जमीन उन्हीं के खून से तर करके अपने वफादार दोस्त जॉन सेवक को भेंट करता है।’ क्या आज के बदले संदर्भों में यह आज के राज पर भी एक तीखा कमेंट नहीं है?
सूरदास मरते वक्त भी हार स्वीकार नहीं करता- ‘‘हम हारे तो क्या, मैदान से भागे तो नहीें, रोए तो नहीं, धांधली तो नहीं की। फिर खेलेंगे, जरा दम ले लेने दो, हार-हार कर तुम्हीं से खेलना सीखेंगे और एक न एक दिन हमारी जीत होगी, अवश्य होगी।’ बेशक सूूरदास के वंशजों ने अभी भी हार नहीं मानी है। वह अपने संगी साथियों से कहता है- ‘‘हमारा दम उखड़ जाता है, हांफने लगते हैं, खिलाडि़यों को मिलाकर नहीं खेलते, आपस में झगड़ते हैं, गाली-गलौज, मारपीट करते हैं। कोई किसी को नहीं मानता।’ ‘अगर अपने उजड़े हुए घर बसाने हैं तो अपना एका मजबूत करो।’ आरा की नाट्यसंस्था युवानीति ने अभी अभी ‘रंगभूमि’ का नाट्य मंचन किया तो दर्शक उससे बेहद कन्विंश दिखे। उन लोगों ने कहा कि इसका मंचन ज्यादा से ज्यादा गांवों में किया जाना चाहिए। यकीनन यही प्रेमचंद साहित्य की ताकत है। भारतीय किसानों के लिए प्रेमचंद आज भी सर्वाधिक प्रासंगिक हैं।
प्रेमचंद जहां अपने साहित्य में किसान-मजदूरों के शोषण, दमन और गरीबी का हृदयविदारक चित्र उपस्थित करते हैं, वहीं उनकी शक्ति की पहचान भी कराते हैं। पूर्वजन्म के चमत्कार से भरे ‘कायाकल्प’ में भी दलित बेगार करने से इन्कार करते हैं। किसान अहिंसावादी नेता चक्रधर की धौंस बर्दास्त नहीं करते। चक्रधर की ठोकरों से एक किसान की मृत्यु हो जाती है , तो दूसरा बूढ़ा किसान उसे माफी नही देता। उसका निर्णायक स्वर है- ‘‘तुम बाबू जी को दयावान कहते हो, मैं उन्हें सौ हत्यारों का एक हत्यारा कहता हूं। राजा हैं, इससे बच जाते हैं, दूसरा होता तो फांसी पर लटकाया जाता। मैं तो बूढ़ा हो गया हूं, लेकिन उनपर इतना क्रोध आ रहा है कि मिल जाएं तो खून चूस लूं।’
प्रेमचंद का साहित्य आज की परिस्थितियों में यह संदेश दे रहा है कि नवउपनिवेशवाद और उसके देशी आधारों के जनविरोेधी शासन को मजदूरों और किसानों के आंतरिक गुणों का विकास करके ही ध्वस्त किया जा सकता है और नए समाज और राष्ट्रनिर्माण के अधूरे सपने को साकार किया जा सकता है। प्रेमचंद जहां साहित्य में भारतीय किसान के नजरिए को ले आए वहीं अपनी कृतियों के जरिए किसानों की चेतना को विकसित करने का भी काम किया। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि साहित्य में विषय के तौर पर किसान मजदूर प्रेमचंद के लिए सचेतन चुनाव थे। प्रेमचंद इनके प्रति कितना सचेत थे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब बहुतों को चीन के हुनान किसान आंदोलन की रिपोर्ट का पता नहीं था, तब उन्होंने उस पर टिप्पणी लिखी थी- ‘‘हमारे पड़़ोस के मुल्क में वहां के नेताओं द्वारा किसानों की शक्ति की पहचान ली गई है, लेकिन हमारे अपने देश में नेताओं ने किसान की शक्ति को नहीं पहचाना है।’’ इसीलिए उन्होंने यह भी कहा कि ‘मैं उस आने वाली पार्टी का मेंबर हूं, जो अवाम अलनास (जनसाधारण) की सियासी तालिम को अपना दस्तरूल-अमल (विधान) बनाएगी।’
 (‘समकालीन लोकयुद्ध’ में पूर्व प्रकाशित)

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