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शख्सियत

मेरे जीवन में प्रेमचंद: शेखर जोशी

( नयी कहानी आंदोलन के प्रमुख कहानीकार शेखर जोशी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के ओलियागांव ग्राम में हुआ. अपनी माँ की असमय मृत्यु के कारण 9 साल की छोटी वय में ही वे सुदूर राजस्थान के अजमेर जिले के केकड़ी कसबे में अपने मामा के पास पढ़ने के लिए आ गए. केकड़ी तब इतना छोटा क़स्बा था कि वहां एक भी लाइब्रेरी न थी. ऐसे में स्कूली पाठ्यपुस्तकों में उपलब्ध प्रेमचंद की कहानियों ने ही साहित्य और जीवन के संस्कार दिए. प्रेमचंद जयंती के अवसर पर समकालीन जनमत के लिए लिखी इस टिप्पणी के लिए हम शेखर जी के साथ उनकी बेटी कृष्णा पंत के विशेष आभारी हैं जिन्होंने यह टिप्पणी फ़ोन की बातचीत से हासिल की फिर सुलेख कर हमें भेजी. सं.)

प्रेमचंद जी से मेरी पहली मुलाकात कब हुई थी यह ठीक-ठीक याद नहीं. संभवत जब मैं कक्षा 6 का विद्यार्थी था तब हम लोगों ने किसी बड़ी कक्षा की पाठ्य पुस्तक से ‘बड़े भाई साहब’ कहानी पढ़ी थी जिसने हमें बहुत गुदगुदाया था. इसके बाद इसी तरह कभी ‘ईदगाह’ तो कभी ‘बूढ़ी काकी’ या ‘ठाकुर का कुआं’ कहानियां पढ़ने को मिली और प्रेमचंद मेरे पसंदीदा लेखक बन गए. राजस्थान के अजमेर जिले के छोटे कस्बे केकड़ी में मुझे स्कूली पढ़ाई के लिए भेजा गया था, वहां स्कूल में लाइब्रेरी नहीं थी। पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से ही अपनी साहित्यिक प्यास बुझानी पड़ती थी. उम्र बढ़ने के साथ जब पत्रिकाओं और पुस्तकालयों की सुविधा मिली तो स्वाभाविक रूप से प्रेमचंद साहित्य को पढ़ने का मौका मिला. दूसरे लेखकों की रचनाएं भी पढ़ने को मिली लेकिन हमारे लिए प्रेमचंद का लेखन सर्वोपरि था. अपने लेखन में प्रेमचंद जिस दुनिया की बात करते हैं जो उनके आसपास बिखरी पड़ी है और वैसे ही हमारे आसपास की दुनिया है। मैं भी किसान परिवार की संतान हूं और जानता हूं कि किसान को अपने खेत खलिहान से कितना बड़ा लगाव होता है. मौसम की मार से पकी फसल चौपट हो जाने पर उसे कैसी हताशा होती है, अपने गाय, बैल, बछड़ों से कितना लगाव होता है. प्रेमचंद के साहित्य में किसान जीवन का भरपूर चित्रण मिलता है .

जब मैंने लिखना शुरू किया तब थोड़ा बहुत देशी-विदेशी साहित्य को भी पढ़ लिया था. उन पढ़ी हुई पुस्तकों का भी कुछ प्रभाव रहा होगा जिसमें प्रेमचंद का प्रभाव सर्वोपरि था. प्रेमचंद ने सिखाया था कि दूर की कौड़ी लाने की बजाय आसपास की जिंदगी से प्रेरणा लेनी चाहिए. भाषा के संबंध में भी प्रेमचंद मेरे आदर्श रहे हैं. बहुत बोझिल, कलात्मक अभिव्यक्ति की अपेक्षा आम फ़हम भाषा में अपनी बात पाठकों तक पहुंचाना लेखक और पाठक के बीच के संबंध को प्रगाढ़ बनाता है. मेरी पहली कहानी ‘आदमी और कीड़े’ एक आदर्शवादी कहानी थी. मैं उसे भी प्रेमचंद के आदर्शवादी और सुधारवादी लेखन की ही देन समझता हूं. प्रेमचंद के उपन्यासों में जीवन की वास्तविकताओं का रूप मिलता है उससे पाठक के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है और वह सामाजिक विसंगतियों को बदलने के लिए प्रेरित होता है. शोषित और असहाय लोगों के प्रति पक्षधरता का एक ऐसा मुद्दा है जो किसी भी नए लेखक के लिए प्रेमचंद की अमूल्य देन है. प्रेमचंद साहित्य से हम अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का गुर सीखते हैं .

एक उदाहरण के रूप में गोदान के उस प्रसंग का उल्लेख करूंगा जिस में एक दलित कन्या से एक सवर्ण का संबंध बन जाता है। जिस कालखंड में गोदान उपन्यास की रचना हुई थी तब दलितों में प्रतिरोध का वह ज़ज़्बा नहींं रहा होगा जो हम आज देखते हैं, लेकिन प्रेमचंद ने दलित युवती सिलिया और सवर्ण मातादीन के प्रसंग में दिखाया है कि उनकी बढ़ती हुई अंतरंगता को देखकर सिलिया के परिजनों ने मातादीन से कहा कि वह सिलिया से विधिवत विवाह कर उसे अपनी पत्नी बना ले लेकिन मातादीन ने साफ़ इंकार कर दिया तब आक्रोशित दलितों ने उसे दबोच कर उसके मुंह में हड्डी घुसेड़ दी.
प्रेमचंद इस प्रकार जहाँ एक ओर दलितों को प्रतिरोध के लिए प्रेरित कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर सवर्णों को भी चेतावनी दे रहे हैं कि मर्यादा से बाहर जाने पर उनकी भी ऐसी ही गति होगी.

संभव है मेरे अवचेतन में प्रेमचंद की प्रतिरोध करने की यह तकनीक रही होगी कि अपनी एक कहानी में मैंने एक दलित पात्र के मुंह से कहलाया था “पूरा नाम लिखने में स्याही ज्यादा खर्च हो जाएगी क्या ?” जब एक सवर्ण अपने मकान की तामीर कराने वाले दलित मजदूरों की हाजिरी देते हुए उनके संक्षिप्त और अधूरे नामों का उच्चारण कर रहा था जैसे पदम राम को पदिया और केसर राम को केसरवा के नाम से संबोधित कर रहा था. वे लोग सामान्यत इसे अपनी नियति मानकर कभी विरोध नहीं करते।

महाजनी सभ्यता में शोषण के विविध रूप प्रेमचंद सहित मिलते हैं जो आज भी समाज में विद्यमान है और लेखकों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं।

 

 

(शेखर जोशी

जन्म : 10 सितम्बर 1932, अल्मोड़ा जनपद, उत्तराखंड के ओलियागाँव नामक स्थान में एक किसान परिवार में.

इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही सुरक्षा विभाग की चार वर्षीय ई एम ई अपरेंटशिप (सिविलियन) के लिए चयन.

1955 से 1986 तक आर्मी बेस वर्कशॉप, इलाहाबाद में कार्यरत फिर वर्कशॉप ऑफिसर के पद से स्वैच्छिक अवकाश लेकर स्वतंत्र लेखन.

1958 में पहला कहानी संग्रह ‘कोसी का घटवार’ प्रकाशित हुआ. उसके बाद प्रकाशित कृतियाँ – ‘साथ के लोग’, ‘हलवाहा’, ‘नौरंगी बीमार है’, ‘आदमी का डर’, ‘डांगरी वाले’, ‘संकलित कहानियाँ’, ‘मेरा पहाड़’ इत्यादि कहानी संग्रह.

‘एक पेड़ की याद’ (शब्दचित्र और रिपोतार्ज़), ‘स्मृति में रहे वें’ (संस्मरण), ‘न रोको उन्हें शुभा’ (कविता संग्रह) तथा ‘मेरा ओलियागांव’ शीर्षक आत्मकथात्मक ग्रामवृत्त शीघ्र प्रकाश्य.

‘दाज्यू’ कहानी पर चिल्ड्रन फ़िल्म सोसाइटी द्वारा और ‘कोसी का घटवार’ पर प्रसार भारती द्वारा मार्डन क्लासिक सिरीज़ में फ़िल्म निर्माण.

कई कहानियों का प्रसिद्ध रंगकर्मियों द्वारा मंचन. बम्बई टाकिंग बुक सेंटर द्वारा दो कहानी संग्रहों का छः कैसेट्स में ध्वन्यांकन.

प्रमुख पुरूस्कार व सम्मान:

महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा साहित्य भूषण सम्मान ( उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान), पहल सम्मान, इफ़्को श्रीलाल शुक्ल स्मृति सम्मान, अखिल भारतीय मैथिली शरण गुप्त सम्मान (मध्य प्रदेश शासन), अखिल भारतीय जनवाणी सम्मान (इटावा हिंदी सेवा निधि), अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान (मुज्ज़फरपुर, बिहार), पहाड़ रजत सम्मान, राही मासूम रजा अकादमी सम्मान (लखनऊ, उत्तर प्रदेश) तथा अन्य.

प्राय: सभी भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेज़ी, रूसी, जापानी, पोलिश और चेक भाषाओं में अनेकों कहानियों का अनुवाद प्रकाशित व प्रसारित.)

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