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दुनिया की दीवारों में रचनाकार खिड़की के समान: प्रो. शंभुनाथ

अम्बरीन आफ़ताब


डॉ. राही मासूम रज़ा साहित्य अकादमी एवं प्रकाशक मंच के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 01 सितंबर, 2020 को फेसबुक लाइव के माध्यम से डॉ. राही मासूम रज़ा साहित्य सम्मान समारोह-2020 का सफलतापूर्वक आयोजन संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार तथा प्रतिष्ठित पत्रिका ‘वागर्थ’ (भारतीय भाषा परिषद) के यशस्वी संपादक, प्रो. शंभुनाथ उपस्थित रहे जिन्हें वर्ष 2020 के डॉ. राही मासूम रज़ा साहित्य सम्मान से अलंकृत किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता सुविख्यात कथाकार तथा डॉ. राही मासूम रज़ा साहित्य अकादमी की संरक्षक, डॉ. नमिता सिंह ने किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने अकादमी की स्थापना के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डॉ. राही मासूम रज़ा के विचारों की आधारभूमि पर अकादमी की स्थापना की गई है। इसका सर्वप्रमुख उद्देश्य साहित्य और समाज के जनसरोकारों को एक साझा व सार्थक मंच प्रदान करना है जिससे कि हम सभी राही के सिद्धांतों के अनुरूप एक ऐसे समाज की निर्मिति में अपना योगदान दे सकें जो तमाम तरह की संकीर्णताओं से मुक्त हो। राही की सामाजिक चिंताएं अत्यंत व्यापक और गहरी थीं। वे हिन्दुस्तानी सभ्यता और साझी संस्कृति के प्रतीक थे। राही की निर्भीकता और स्पष्टवादिता उनके लेखन को वैशिष्ट्य प्रदान करते हैं। प्रतिवर्ष राही के जन्मदिन पर उनकी परंपरा के लेखकों का सम्मान करके अकादमी वस्तुतः राही की प्रगतिगामी वैचारिकी को आगे बढ़ाने का कार्य करती है। वर्ष 2020 के सम्मान हेतु अकादमी द्वारा लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार प्रो. शंभुनाथ के चयन पर हर्ष व्यक्त करते हुए डॉ. नमिता सिंह ने इस अवसर को अकादमी के लिए गौरव का क्षण बताया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित ख्यातनाम साहित्यकार, आलोचक तथा संपादक प्रो. शंभुनाथ ने डॉ. राही मासूम रज़ा साहित्य सम्मान सहर्ष स्वीकार करते हुए कहा कि वही पुरस्कार सार्थक है जो सभी के बीच सिर उठाकर प्रदान किया जाता है और उसी स्वाभिमान के साथ किसी लेखक द्वारा ग्रहण भी किया जाता है। डॉ. राही मासूम रज़ा सम्मान ऐसा ही प्रतिष्ठित सम्मान है। राही के संपूर्ण लेखन में अंतरसांस्कृतिक प्रेम सर्वप्रमुख मूल्य है। उनकी धर्म निरपेक्ष सांस्कृतिक चेतना, गंगा-जमुनी तहज़ीब के प्रति विराट समर्पण हमें आकर्षित करती है। ऐसे रचनाकार के नाम पर दिए जा रहे सम्मान से विभूषित होना स्वयं को गौरवान्वित करना है। इस अवसर पर राही को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने इस पुरस्कार को इस विकट समय में साहित्यिक भरोसे की संज्ञा प्रदान की।
प्रो. शंभुनाथ ने कहा कि राही के समय की तुलना में अब काफी परिवर्तन आ चुका है। फिर भी साहित्य से जुड़ी चिंताएं और सरोकार अब भी वही हैं। यह दौर उत्तर-सत्य का है जिसमें डिजिटल तकनीकों ने झूठ और अज्ञानता का प्रचार व्यापक स्तर पर करते हुए अब तक के समूचे ज्ञान को रौंदकर रख दिया है। साहित्य इस उत्तर-सत्य के दौर में भी एक दुर्ग की तरह खड़े होकर समस्त विद्रूपताओं को चुनौती देने का कार्य कर रहा है। पंचतंत्र और कृत्तिवास रामायण के रोचक प्रसंगों का वर्णन करते हुए प्रो. शंभुनाथ ने समकालीन समय और समाज में परिव्याप्त सांस्कृतिक समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया कि किस प्रकार राजसत्ताएँ जनसाधारण की सांस्कृतिक इच्छाओं को विकृत करते हुए न्यायप्रियता के स्थान पर जनप्रियता को बढ़ावा देती हैं। जनप्रियतावाद न्याय का शत्रु होता है जिसका लक्ष्य तर्कशील नागरिकों को झुंड में बदल देना है। मीडिया की नकारात्मक भूमिका की ओर संकेत करते हुए उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों के प्रति चिंता व्यक्त की कि किस प्रकार प्रछन्न भय का वातावरण उत्पन्न कर समाज को भीड़तंत्र में परिवर्तित किया जा रहा है जिसमें स्व, वैयक्तिकता और विचार करने की शक्ति का सर्वथा अभाव है। वर्तमान में हमारे समय के लोग भीतर सामंती कूपमंडूकता और बाहर पश्चिमी आवरण के बीच पिस रहे हैं। सभ्यता के उच्चतम शिखर पर पहुंच कर भी धार्मिक कट्टरता बढ़ती ही जा रही है। अंधानुकरण और अंध-उपभोक्तावाद के दौर में इन भयंकर दृश्यों पर विचार करना आवश्यक है। भारत के सच की और उसके विचार की हमें अपने जीवनानुभवों से रक्षा करनी होगी और झुंड से समाज की ओर लौटना होगा।

प्रो. शंभुनाथ ने भारतीय संस्कृति के बहुलतावादी स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि देश की सांस्कृतिक धाराओं में आत्मनिरीक्षण और पुनर्गठन रूपी दो शक्तियां विन्यस्त हैं जिसे दबाया तो जा सकता है परंतु मिटाया नहीं जा सकता। घृणा, हिंसा के वर्तमान समय में रचनाकार न केवल यथार्थ को देख रहा है अपितु उसके पार भी जा रहा है। इस प्रकार सभी रचनाकार दुनिया की दीवारों में खिड़की के समान है जो अपने लेखन के माध्यम से निरंतर जड़ताओं पर प्रहार कर रहे हैं। उन्होंने वर्तमान आलोचना के गिरते स्तर की ओर संकेत करते हुए इसे निर्लज्ज प्रशंसा, इमेज मैनेजमेंट और ब्रांड एम्बेसडरों का युग माना। आलोचनात्मक दृष्टि की सुदीर्घ परंपरा को समझने और पुनः विकसित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि उनका लिखना, वस्तुतः जो दिखाया जा रहा है और प्रचारित किया जा रहा है, उसके बाहर की दुनिया को देखना है।

इस सम्मान हेतु अकादमी का आभार व्यक्त करते हुए प्रो. शंभुनाथ ने इसे उन समस्त रचनाकारों को समर्पित किया जो अपने प्रयासों से, लघुतम रूप में भी व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रख्यात शिक्षाविद एवं डॉ. राही मासूम रज़ा के पारिवारिक सदस्य, डॉ. नदीम हसनैन उपस्थित रहे जिन्होंने राही की शायरी के कुछ अनभिज्ञ पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राही ने शायरी और गद्य, दोनों में समान सफलता अर्जित की। समाज, राजनीति, धर्म आदि में व्याप्त हर प्रकार की संकीर्णता और जटिलता का मुखर विवेचन उनकी शायरी में निहित है।

अकादमी के महामंत्री श्री राम किशोर ने अकादमी के सिद्धांतों और उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए उसकी वार्षिक रिपोर्ट को प्रस्तुत किया तथा वर्ष भर चली अकादमी की गतिविधियों व क्रियाकलापों से सभी को अवगत कराया।
डॉ. गीता दूबे ने प्रो. शंभुनाथ के रचनात्मक अवदान पर विस्तार से चर्चा करते हुए उनकी सुदीर्घ साहित्यिक यात्रा को श्रोताओं के साथ साझा किया तथा डॉ. अलका प्रमोद ने सम्मान-पत्र का वाचन किया।

अकादमी की अध्यक्षा व वरिष्ठ पत्रकार, सुश्री वंदना मिश्र ने राही के सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में किए गए कार्यों का स्मरण करते हुए उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। अंत में उन्होंने उपस्थित विद्वज्जनों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन राजुल अशोक ने किया तथा समस्त कार्यक्रम श्री अशोक हमराही के निर्देशन में संपन्न हुआ। इस दौरान साहित्य जगत के सम्मान्य विद्वानों के अतिरिक्त विभिन्न विश्वविद्यालयों से जुड़े छात्रों, शोधार्थियों आदि की बड़ी संख्या में डिजिटल उपस्थिति उत्साहजनक रही।
(अम्बरीन आफ़ताब, शोधार्थी(हिन्दी विभाग),
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़।)

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