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दुनिया में जो भी करुणा है, प्रेम है, मौलिकता है वह स्त्रियों के ही कारण है ! : कथाकार शिवमूर्ति

कोरस के फेसबुक लाइव में 20 सितंबर को हिंदी के प्रसिद्द कथाकार शिवमूर्ति जी तथा समता राय से दीपक ने बातचीत की । कार्यक्रम की शुरुआत में दीपक द्वारा पूछे गए पहले प्रश्न कि उनकी कहानियों की मुख्य पात्र स्त्रियाँ ही होती हैं, इसकी क्या कोई खास वजह है? का जवाब देते हुए शिवमूर्ति जी कहते हैं कि अक्सर कथाकार की कथा-वस्तु उसके अपने स्वयं के जीवन से ही उठाई गई होती है और मेरे जीवन में मुख्य भूमिका वाले पुरुष पाँच से छः ही रहे हैं पर स्त्रियों की एक बहुत लम्बी सूची है । इस सूची में किशोरियों से लेकर वृद्धाओं तक की अलग –अलग उम्र की संघर्षशील, जुझारू और समझौता न करने वाली स्त्रियाँ रहीं हैं । इन सभी स्त्रियों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है और यही कारण है कि वे जब भी लिखने बैठते हैं तो यही स्त्रियाँ उनके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं ।

दूसरे सवाल कि स्त्रियों के अन्दर का जो संसार है, जहां तक पहुँच पाना पुरुषों के लिए प्रायः मुमकिन नहीं होता, वहाँ तक उनकी पहुँच कैसे बनती है ? वे कहते हैं कि कई बार गीतों के माध्यम से हम उनके जीवन के दुख दर्द को समझ पाते हैं । इस बात का श्रेय वह पूरी तरह से अपनी माँ को देते हुए बताते हैं कि उनकी माँ एक बड़ी ही बेहतरीन गायिका थीं और एक वक्त था जब वे अपने घर के दरवाज़े पर खड़े होकर सामने के रास्ते से आते-जाते व्यक्तियों से गीतों में ही सवाल करतीं थीं और अगर वे उसका जवाब नहीं दे पाते थे तो वह उनकी पगड़ी रखवा लेतीं थीं । शिवमूर्ति जी कहते हैं कि इसके अलावा भी उनके कान गीतों और लोकगीतों को ढूँढते ही रहते हैं । इसके साथ ही बहुत-सी घटनाएं तो वे अपनी पत्नी के माध्यम से सुन पाते हैं और कुछ अपनी पत्नी की बड़ी बहन द्वारा भी सुनते रहते हैं ।

अगला प्रश्न था कि शिवमूर्ति जी की कहानियों में ज़्यादातर ग्रामीण परिवेश की स्त्रियाँ ही मिलती हैं । शहरी स्त्रियां बहुत कम मिल पाती हैं, इसके पीछे क्या कारण है ? इसका जवाब देते हुए वे कहते हैं कि उनके जीवन में ज़्यादातर गाँव से जुडी हुई स्त्रियाँ ही रहीं हैं । वे शहरी स्त्रियों के मूल्यों, आदर्शों से अपरिचित हैं । शिवमूर्ति जी की कहानी “केसर कस्तूरी” के कुछ संवाद जिसमें भारतीय महिलाओं के दुर्भाग्य की चर्चा की गई है, पर पूछे गए प्रश्न का जवाब देते हुए वे कहते हैं कि यह कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है । संवाद में केसर अपने मायके न लौटने के फैसले को लेकर पिता से कह रही है कि यह तो उसका भाग्य है और वह उससे खुद निपट लेगी । लेखक कहते हैं कि भारतीय महिलाओं के मन में यह बचपन से ही डाल दिया जाता है कि यह उनका घर नहीं है, उन्हें शादी करके किसी और के घर का हो जाना है और उसके बाद मायके लौटना कोई सम्मानजनक बात नहीं है । उसका लौटने पर मायके में वह सम्मान नहीं रह जाता । यह कहकर केसर अपने पिता को अपराधबोध से मुक्त कर रही है, जैसे पीढ़ियों से भारतीय महिलाएं करती आयीं हैं ।

केसर-कस्तूरी कहानी की मुख्य पात्र केसर को ही लेकर समता जी प्रश्न करती हैं कि आज जब महिलाओं की आज़ादी पर इतने सवाल उठ रहे हैं और आम तौर पर ये सुनाई भी देता है कि शहर की महिलाओं से ज्यादा तेज़ तो गाँव की औरतें हैं तो ऐसे में क्या लगता है कि केसर जैसी कितनी लड़कियां आज भी हमारे गाँवों में होंगी ? शिवमूर्ति जी कहते हैं इसमें गाँव शहर की बात नहीं है । जितना ज्यादा एक व्यक्ति विविध प्रकार की परिस्थितियों से परिचित होता है उतना ही उसकी परिस्थितियों से समन्वय स्थापित कर पाने की क्षमता बढ़ जाती है । गाँव की लड़कियों को अक्सर शहर की लड़कियों से ज्यादा कठिन परिस्थितियों से जूझना पड़ता है और यही कारण है कि हमें गाँव में केसर के समान दर्जनों स्त्रियाँ मिलती हैं, जो अपनी परिस्थितियों को हर रोज़ बेहतर बनाने की ओर संघर्षरत हैं । वे औरों पर निर्भर नहीं रहतीं हैं, खुद ही अपनी स्थितियों का आंकलन करके उनको सुधारने में लग जाती हैं, इसीलिए यह कहा जा सकता है कि जीवन और परिस्थितियों से वे ज्यादा अच्छी तरह से परिचित हो चुकी होती हैं । साथ ही साथ वह यह भी कहते हैं कि गाँव और शहर की महिलाओं का आपस में जुड़ना बहुत ही ज़रूरी है । अभी तो हम जैसे केसर को ही देखते हैं, उसका संघर्ष उसके अन्दर की आवाज़ से उठता है तो सोचिये जब गाँव की महिलाओं को सावित्रीबाई फुले और उनके ही जैसी और महिलाओं के बारे में पता चलेगा तो वे अपने संघर्षों को लेकर वे एक बड़ा आन्दोलन खड़ा कर सकती हैं ।

दीपक अगला सवाल करते हैं कि शिवमूर्ति जी के कथा-संसार में स्त्रियाँ खल-पात्र के रूप में नहीं दिखती हैं, वे सामंतवादी ताकतों से या दलाली के खिलाफ लड़ती नज़र आती हैं पर पुरुष इन सभी लड़ाइयों में नदारद हैं, ऐसा क्यों है ? शिवमूर्तिजी कहते हैं कि उनके अनुसार स्त्रियों में खल भावना पुरुषों के मुकाबले बहुत ही कम है । वे स्नेहिल हैं, प्रेमिल हैं और ज्यादा नैतिक हैं । दुनिया में जो भी करुणा है, प्रेम है, मौलिकता है वह स्त्रियों के ही कारण है । इन सब में अच्छे पुरुष जैसे अपवाद है वैसे ही खल-स्त्रियाँ भी अपवाद ही हैं ।
इसके बाद शिवमूर्ति जी की रचना “कुच्ची का कानून”, जिसका मंचन समता जी ने कई दफे करवाया है, पर दीपक एक लम्बी चर्चा करते हैं । यह नाटक एक स्त्री का उसकी अपनी कोख पर कितना अधिकार है और होना चाहिए, इस सवाल को अपना आधार बनाता है । समता जी बताती हैं कि यह विषय हमारे समाज के लिए जितना ही विवादास्पद और अव्यवहारिक था, उसके बिलकुल उलट उस पर दर्शकों की प्रतिक्रिया रही । वे बताती हैं कि गाँव में भी नाटक का मंचन हुआ और ऐसा लगा मानो दर्शक भी नाटक के साथ एकमेक हो गए हों । इस पर शिवमूर्ति जी कहते हैं कि उनके अपने विचार में भी गाँव के लोग शहर के लोगों से ज्यादा प्रगतिशील हैं । वे ज्यादा सहजता से नई चीजों को स्वीकार कर लेते हैं । इस कहानी से उठे प्रश्नों को महिलाओं ने तो स्वीकारा ही पर पुरुषों ने भी इस सवाल से अपनी सहमति दिखाई । ऐसा ज़रूरी नहीं है कि दर्शक जो चाहते हैं, हम उन्हें वही देंगे तभी वह हमें देखेंगे या पढेंगे । हम अगर उन्हें नई सोच, नए सवाल देंगे तब भी वे उस पर अपनी प्रतिक्रिया पूरे उत्साह से दर्ज करवाते हैं ।

आगे दीपक पूछते हैं कि शिवमूर्ति जी की रची महिला पात्रों का अक्सर किसी पशु से एक ख़ास रिश्ता दिखाई पड़ता है, क्या इसके पीछे भी लेखक की कोई सोच है ?शिवमूर्ति जी कहते हैं कि साहित्य जीवन का प्रतिरूप है और इसलिए जो जीवन में दिखता है, वह साहित्य में भी दिखता है । उनके अपने जीवन में जो महिलाएं हैं, उनका किसी न किसी पशु से ख़ासा जुड़ाव या लगाव रहा है, जैसा गाँव के लोगों का होता ही है और इसीलिए वह उनके पात्रों में भी दिखाई देता है ।

दीपक के आखिरी सवाल कि क्या शिवमूर्ति जी की रचनाओं की महिला पात्र किसी तरह के क्रम में आती हैं या उन्हें हमें एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न समझना चाहिए ? का जवाब देते हुए वे कहते हैं कि उनके ये सभी पात्र एक क्रम में ही रचे गए हैं । उदाहरण के तौर पर वे तीन पात्र लेते हैं शनिचरी, बिमली और कुच्ची । जिसमें शनिचरी सन 1940 के आसपास पैदा होती है और उसी की बेटी है बिमली, जो सन 1970 के आसपास पैदा होती है और बिमली की ही बेटी है कुच्ची, जो सन 1995 के आसपास होती है । इस तरह से हम एक क्रम देख सकते हैं तीन अलग-अलग रचनाओं के किरदारों में । तीन पीढ़ी के बाद अब वह इस क्रम की चौथी पीढ़ी को लेकर भी तैयार हैं, जो जल्द ही पाठकों के समक्ष हाज़िर होगी l इसी बात से शिवमूर्ति जी अपनी बात समाप्त करते हैं l

प्रस्तुति: मीनल

शिवमूर्ति जी का यह साक्षात्कार यहाँ देख सकते हैं

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