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‘क्यों कर न हो मुशब्बक शीशे सा दिल हमारा’ -शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की याद

फ़ारूक़ी साहब नहीं रहे। यह इलाहाबाद ही नहीं, समूचे हिन्दी-उर्दू दोआब के लिए बेहद अफसोसनाक खबर है। वे उर्दू के जबरदस्त नक्काद [आलोचक] थे, बेहतरीन नॉवेलनिगार थे, बहसों को प्रश्रय देने वाले सम्पादक और शानदार शायर थे। उनका जाना हमारी दुनिया के एक समग्र अदीब का जाना है। बीते 25 दिसम्बर को कोरोना की महामारी ने हमसे उन्हें छीन लिया।

आजमगढ़ में पैदा हुए और गोरखपुर में पले-बढ़े शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी भारतीय डाक विभाग के बड़े अफसर थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया था। पश्चिमी काव्यशास्त्र की बारीकियों के साथ पूरब की काव्यशास्त्रीय परम्पराओं पर अचूक दक्षता उनकी आलोचकीय तैयारी का हिस्सा थी। उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान, सरस्वती सम्मान और पद्म श्री से नवाजा गया था।

फ़ारूक़ी साहब का सबसे महत्वपूर्ण काम हमें अपनी मध्यकालीन काव्य-परंपरा का बोध कराना था। उर्दू कविता के महान शायर मीर तकी मीर पर उनकी किताब ‘शेर ए शोर-अंगेज’, सिर्फ इसलिए नहीं याद की जाएगी कि वह उर्दू कविता के एक शायर को दुनिया भर की कविता की मुख्यधारा का कवि बना देती है, वह इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने हमें नए तरीके से कविता पढ़ने की तमीज दी, मजमून और मानी, मुशायरा कंडीशन, छंदशास्त्र आदि विषयों पर नए सिरे से काम करते हुए, आधुनिकता के साथ पुरानी काव्यशास्त्रीय परंपरा की संगत विकसित की।

पुरानी उर्दू टीका परंपरा को नए सिरे से विकसित करते हुए फ़ारूक़ी साहब ने शेर पढ़ने और समझने के अलग औजार विकसित किए। पाठ केंद्रित आलोचना को नई ऊँचाइयाँ देते हुए उन्होंने भाषा के विभिन्न स्तरों की अनूठी व्याख्या के जरिए कविता की सघन दुनिया को समझने की ताकत हमें दी।

मीर की कविता की व्याख्या करते हुए फ़ारूक़ी साहब ने अन्य बहुत सारे कारकों के साथ एक और कारक की ओर इशारा किया था। वह कारक था मीर की कविता में इस्तेमाल हिन्दी मीटर। उर्दू छंदशास्त्र में दर्ज गजल की तमाम विविधताओं से भी आगे बढ़ती हुई मीर की शायरी के छांदिक सौन्दर्य को समझाते हुए फ़ारूक़ी साहब ने बताया कि इस सरजमीं पर ही मीर की शायरी की छांदिक बहुलता विकसित हुई।

फ़ारूक़ी साहब का पूरा काम पूर्व आधुनिक काल की व्याख्या का था। उस दौर के जीवन, शायरी, मूल्यवत्ता, इश्क, रकाबत वगैरह, गरज कि समूची सांस्कृतिक दुनिया में हमारा प्रवेश फ़ारूक़ी जैसे विद्वानों की बदौलत ही संभव हुआ। हिन्दी विद्वत परंपरा में इस तरह का काम आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का था। हालांकि द्विवेदी जी का काम पूर्व-आधुनिक काल के प्रारम्भिक हिस्से पर केंद्रित था और फ़ारूक़ी साहब का काम इसके आखिरी दौर पर। औपनिवेशिकता द्वारा खंडित हमारे मानस को हमारी ही परंपरा व संस्कृति से दीक्षित करने का जरूरी काम फ़ारूक़ी साहब ने किया। ‘इश्क की रवायतों और रवायतों के इश्क’ की दुनिया, जो हमसे छूट गई थी, उन्होंने हमें उससे फिर से जोड़ा।

इसी कड़ी में उनके सारे काम-काज को देखा जाना चाहिए। उनका कथा साहित्य, ‘सवार तथा अन्य कहानियाँ’ और उपन्यास ‘कई चाँद थे सरे आसमाँ’ को भी इसी सिलसिले में देखा जाना चाहिए। पूर्व आधुनिक दुनिया के शायरों, मुसहफी, ग़ालिब, सौदा आदि के जीवन को आधारित करके लिखी हुई कहानियाँ और उनके उपन्यास की वजीर खानम हमारे लिए उस भूली दुनिया की खिड़कियां हैं। ‘दास्तानगोई’ को भी इसी सिलसिले की अगली कड़ी समझा जाना चाहिए।

आधुनिकता और प्रगतिशीलता की शीत-युद्ध के दौरान चली बहसों में फ़ारूक़ी साहब आधुनिकता के पक्षधर आलोचक के रूप में दिखते हैं पर सरदार जाफरी आदि प्रगतिशील खेमे के विद्वानों, शायरों से उनकी अदबी बहसें उनके द्वारा सम्पादित ‘शबखून’ के पन्नों पर लगातार चलती रहीं।

उपनिवेश के हाथों हमारी जुबान, तहज़ीब, समझ और सोच में हुए बदलावों को मजबूती से रेखांकित करने वाले उत्तर-औपनिवेशिक चिंतक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी को जन संस्कृति मंच की ओर से आखिरी सलाम।

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