समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

साहित्य-संस्कृति

गोरख पांडेय : साक्षात्कारों के आईने से

समकालीन जनमत
      “ कविता और प्रेम—दो ऐसी चीज़ें हैं, जहाँ मनुष्य होने का मुझे बोध होता है.”   “कविता को दमन के ज़रिए ख़त्म...
पुस्तक

‘उड़ता बनारस’: स्थापत्य में फ़ासीवाद                                       

गोपाल प्रधान
सुरेश प्रताप की किताब ‘ उड़ता बनारस ’ हमसे वर्तमान शासन के कुछ कारनामों को गहरी निगाह से देखने की मांग करती है । पिछले...
कविता

कल्पना झा की कविताएँ जो कुछ भी सुंदर है उसे बचा ले जाने की कोशिश हैं

समकालीन जनमत
आनंद गुप्ता रंगकर्मी एवं अभिनेत्री कल्पना झा की कविताओं में स्त्री मन की गहरी समझ है. इनकी कविताओं से गुजरते हुए हम स्त्रियों के दुख...
पुस्तक

विभाजन की विभीषिका और उत्तराखंड के इतिहास की गुमशुदगी की परत में लिपटा एक बयान

के के पांडेय
यह कथा सानीउडियार क्षेत्र, जिला बागेश्वर (पहले अल्मोड़ा) उत्तराखंड के एक व्यक्ति हाजी अब्दुल शकूर की है। उनका खानदान उन्नीस सौ ईस्वी से कुछ पहले...
स्मृति

‘ रचना, विचार और आन्दोलन के साथी थे सुरेश पंजम ’

समकालीन जनमत
लखनऊ। नागरिक परिषद व पीपुल्स यूनिटी फोरम के संयुक्त तत्वावधान में साहित्यकार, शिक्षक व सामाजिक चिंतक डा. एस. के. पंजम की याद में 19 सितम्बर...
कविता

अनामिका अनु की कविताएँ स्त्री विमर्श को कई कोणों से देखती हैं

समकालीन जनमत
विशाखा मुलमुले   अनामिका अनु जी मूलतः बिहार की रहवासी हैं व कर्मभूमि से केरल की हैं। मैं जब उनकी कविताएँ पढ़ती हूँ तो कविता...
स्मृति

‘ जब भी समाज में अंधेरा गहराता है, विचार के गर्भ से उठती है आंधी ’

समकालीन जनमत
 काॅ. बृजबिहारी पांडे की स्मृति सभा में जुटे देश के विभिन्न हिस्सों के वामपंथी नेता पटना। भूमिहीन गरीब किसानों के ऐतिहासिक नक्सलबाड़ी उभार के दौर के...
पुस्तक

स्मृतियों के कथ्य में जीवनानुभव की अभिव्यक्ति

समकालीन जनमत
राम विनय शर्मा ‘ग़ाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल’ पत्रकार और लेखक उर्मिलेश के संस्मरणों का संकलन है। ‘प्रमुखतः इसमें साहित्य-संस्कृति और मीडिया से सम्बद्ध लोगों, प्रसंगों...
कविता

सतीश छिम्पा की कविताएँ अपने समय से किये गए बेचैन सवाल हैं

समकालीन जनमत
अनुपम त्रिपाठी सतीश जी राजस्थान के रहने वाले हैं. इनके तीन कविता संग्रह ‘लहू उबलता रहेगा’ (फिलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष के लिए), ‘लिखूंगा तुम्हारी कथा’, ‘आधी...
यात्रा वृतान्त

रौशनी झरोखों से भी आती है

के के पांडेय
भट्ट जी, इसी नाम से पुकारते हैं हम उन्हें. वैसे उनका पूरा नाम खीमानंद भट्ट है. अल्मोड़ा में रहते हैं. वे न तो अल्मोड़ा की...
कहानी

स्लोवेनियन कहानीकार लिली पोटपारा की कहानी ‘ चाबी ’

समकालीन जनमत
( ‘ चाबी  ‘लिली पोटपारा द्वारा लिखित स्लोवेनियन भाषा की कहानी है। लिली पोटपरा स्लोवेनियन साहित्य की एक प्रसिद्ध व पुरस्कृत लेखिका व अनुवादिका हैं।...
स्मृति

भविष्य के समाज की ताबीज

गोपाल प्रधान
नहीं जानता कि महान व्यक्ति किस तरह के होते हैं लेकिन कामरेड बृजबिहारी पांडे बिना शक महान थे। उनका अहैतुक स्नेह मुझे समय समय पर...
पुस्तक

सरकार का अपने ही नागरिकों से युद्ध

गोपाल प्रधान
लेख के शीर्षक से भ्रम सम्भव है कि यह किताब नागरिकता संबंधी कानूनों के बारे में है लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश की सरकार लम्बे...
पुस्तक

वैश्विकता और स्‍थानीयता को जोड़ने वाली आत्‍मालोचना युक्‍त भावना

समकालीन जनमत
कुमार मुकुल ताइवान के वरिष्ठ कवि, आलोचक ली मिन-युंग की कविताएँ आजादी, प्रेम और स्‍वप्‍न की भावनाओं को सहज और सचेत ढंग से स्‍वर देती...
कविता

सोनू यशराज की कविताएँ किताबों से एक स्त्री का संवाद हैं

समकालीन जनमत
आलोक रंजन सोनू यशराज की अधिकांश कविताएँ किताबों को समर्पित हैं और शेष स्त्री प्रश्नों से जुड़ी हुई । किताबों के माध्यम से रचनाकार ने...
कविता

प्रेम की अँजोरिया फैलाती हैं नीरज की कविताएँ

समकालीन जनमत
रमण कुमार सिंह अवधी पृष्ठभूमि के कवि नीरज की कविताएँ किसान जीवन और संस्कृति से हमारा साक्षात्कार कराती हैं। सबसे ज्यादा आकर्षित करती है उनकी...
पुस्तक

जाति-मुक्ति का प्रश्न, उसकी राजनीति और पूंजी-लोक (नवीन जोशी के उपन्यास के बहाने कुछ बातें)

के के पांडेय
(एक दलित नौजवान के अंतर्द्वंद की कथा के भीतर से उत्तराखंडी समाज के भीतर की जातिगत विषमताओं, कारपोरेट की गुलामगीरी और राजनैतिक आंदोलनों के सामाजिक...
कविता

शिवनंदन कवि आ उनकर दूगो गीत

बलभद्र
भोजपुर के बड़हरा ब्लॉक में एगो गाँव बा मौजमपुर। एहिजा के रहलें एगो शिवनंदन कवि। उनकर एगो कविता बा जवना में पत्थल-पानी परला के चलते...
पुस्तक

कितने बहानों के बीच देश काल: अरुणाभ सौरभ का काव्य संग्रह ‘किसी और बहाने से’

समकालीन जनमत
रोमिशा  जाने कितने बहानों से कवि अपने ईर्द -गिर्द के समाज, देश, काल में क्या सब देख लेता है और उसी देखने के क्रम में...
कविता

जसिंता केरकेट्टा की कविताएँ सत्ता की भाषा के पीछे छुपी मंशा को भेद कर उसके कुटिल इरादों को बेनकाब करती हैं

समकालीन जनमत
निरंजन श्रोत्रिय युवा कवयित्री जसिंता केरकेट्टा की कविताओं को महज जनजातीय स्मृतियों अथवा चेतना की कविताएँ कहना न्यायसंगत न होगा। अपने पर्यावरण और जातीय स्मृतियों...
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